नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

वासुदेव बलवंत फाड़के - कथालेख - अखिलेश सिंह श्रीवास्तव



वासुदेव बलवंत फाड़के

कथालेख


अखिलेश सिंह श्रीवास्तव


भारतीय एकता अभाव का फ़ायदा उठा, मुट्ठी भर दुष्ट अंग्रेज़ों ने भारतीय सैन्य टुकड़ियों के माध्यम-से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दबा दिया। फ़िरंगियों नें अठारह सौ संतावन का संग्राम दबा अवश्य दिया परंतु उन्होंने इस दौरान यहाँ की क़ौमी एकता की मज़बूती भी देख ली। वे समझ गए यदि यही स्थिति रही तो दूसरा विद्रोह शीघ्र होगा और उसे दबाना ब्रिटिश हुकूमत के बूते से बाहर होगा लिहाज़ा अंग्रेज़ी रण नीति में भारतीय सर्वधर्म एकता का खंडन, प्रधान लक्ष्य बन गया। वर्ग विभेद के लिए हर वर्ग के लालची, ग़द्दार प्रवृत्ति लोगों को येन, केन, प्रकरेण समाज और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए दुष्प्रेरित किया गया। ये वो भारतीय थे जो तन-से भारतीय पर सोच-से अंग्रेज़ थे। मैं तो साफ़ कहता हूँ कि इस प्रकार के तथाकथित देशी लोग आज भी इस देश के लिए नासूर हैं।

संग्राम विखंडन पश्चात भारतीय शासन इंग्लैण्ड की रानी के हाथों में चला गया। दिखाने के लिए ये भारतीयता संरक्षिका थीं पर बुझी राख के भीतर चिंगारी तो भारतीयता विरोधी ही थी। ऐसी ही चिंगारी भारतीय क्रांतिकारियों के अंतरमन में अंग्रेज़ी साम्राज्य के लिए प्रज्ज्वलित थी जो शोला बनने के लिए उतारू थी। समय चक्र बड़ी ईमानदारी से चालता है इसी चक्र की गति में उदय हुआ एक शूर-वीर का जिसका नाम था वासुदेव बलवंत फड़के। यह वह चिंगारी थी, संग्राम उपरांत बरतानिया सरकार जिसके नाम से भयभीत रहती।

चार नवंबर अठारह सौ पैंतालीस के दिन महाराष्ट्र रायगढ़ के शिरढोणे (शिर्धो) गाँव के फड़के परिवार में वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म हुआ। बाल्य काल-से वासु का साहस और ओजपूर्ण वाणी ग्राम वासियों के लिए आश्चर्य का केंद्र थीं, ग्राम्य पुजारी जब भी इस बालक की गतिविधियों को देखते तो हमेशा कुछ अलग, अनोखे की परिकल्पना में खो से जाते। अंग्रेज़ों के बढ़ते अत्याचारों ने वासु के बाल मन में इसके प्रतिशोध की भावना को जन्म दिया। उसके पिता चाहते थे वासु शिक्षा प्राप्त कर नौकरी करे और सुखी जीवन बिताए। वासु अभी बारह वर्ष का था, भारतीय आबो-हवा स्वतंत्रता जयकारों से गूँज रही थी। यह गूँज वासु के मन में दबी स्वतंत्रता संग्राम की भावनाओं को नई दिशा देने वाली सिद्ध हुई।

कल्याण एवं पुणे-से अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद उसनें तत्कालीन बंबई में पुणे मिलट्री स्टोर के लेखा विभाग में नौकरी कर ली। पंद्रह वर्षों तक सफल नौकरी के दौरान भी स्वतंत्रता के विचार हमेशा उसके भारतीय ह्रदय को आंदोलित करते। वर्त्तमान में किसानों के प्रति अंग्रेज़ी द्रष्टिकोण, छोटे कामगारों के प्रति हीन भावना, भारतीय महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, शोषण आदि अनेक समकालीन परिस्थितियाँ उसे विवश कर रहीं थीं कि एक ज़ोरदार उत्तर इन आतताइयों को दे। इस वीर की भुजाओं में उफ़नते आवेग को तूफ़ान बनने का समय धीरे-धीरे समीप आ रहा था। जिन क्रांतिकारियों से उसके संवाद होते वह सभी फड़के के विचारों से बहुत प्रभावित हो जाते। युवा वासु तत्कालीन शीर्ष पुरुष महादेव गोविंद रानाडे-से बहुत प्रभावित था।

परिवार पोषण के सत्य को अंगीकार कर वासु अंग्रेज़ी अत्याचारों के हलाहल को कंठसात कर रहा था, पर मातृभूमि स्वतंत्र का कंटक मार्ग इस पथिक की प्रतीक्षा कर था। होनी को जो मंजूर होता है जीवन उसी के मुताबिक़ मुड़ जाता है। अठारह सौ इकहत्तर में एक तार के माध्यम से उसे पता चला कि उसकी माता जी अंतिम अवस्था में हैं और उससे मिलाना चाहतीं हैं। मातृभूमि और जन्मदात्री दोनों माँओं के प्रति अथाह श्रद्धा रखने वाले वासुदेव के आकस्मिक अवकाश प्रार्थना को उसके अँग्रेज़ अधिकारी ने कटु वचनों के साथ ख़ारिज कर दी। यह रात्रि उसके जीवन की सर्वाधिक तनावपूर्ण थी। माँ की एक-एक यादें उसकी स्मृति पटल पर क्षण भर में घूम गईं। पिछली बार जब घर गया था तब माँ की दी हुईं बहुत सारी वस्तुएँ अभी भी यथावत थीं। प्रभात की प्रथमकिरण के साथ वासुदेव ने अवकाश आवेदन के निरस्त होने के बाद भी अपने घर की राह पकड़ी। दुखद क्षण ! वह घर तो पहुँच गया पर माँ का बैकुंठ गमन हो चूका था। जीवन की इस अप्रत्याशित घटना ने उसके धैर्य के सारे बाँध तोड़ दिए अब उसनें इस कुशासन के विरुद्ध शस्त्र संधान का निर्णय लिया। शायद समय उससे यही माँग रहा था।

इतिहास की पुनरावृत्ति हो चुकी थी। अंग्रेज़ी साम्राज्य के समक्ष फिर एक बार स्वतंत्रता संग्राम का क्रांतिकारी परचम लहराने लगा, परिणामतः कपटी फ़िरंगियों की आँखों में एक बार फिर संतावन का भय दिखने लगा। किसानों, छोटे कामगारों, श्रमिकों, कोल, भील, धन्गड़, जैसे आदिवासियों को संगठित एवं प्रशिक्षित कर एक सेना गठित करी रामोशी नाम से विख्यात हूई। यह नाम बरतानिया हुक्मरानों के लिए यमावातार था। रामोशी ने सार्वजनिक स्थलों पर, वन्य मार्गों में, अंग्रेज़ी खेमों में आमने-सामने मुकाबला किया और अंग्रेज़ों को धुल चटाई। इन युद्धों का परिणाम यह हुआ कि महाराष्ट्र क्षेत्र में अंग्रेज़ कुछ भी करने से पूर्व सौ बार सोचते। ऐसा नहीं की सर्वस्व फड़के को सहायता ही मिली कई देशी रियासतों नें रामोशी को सहायता देनें से मना कर दिया अतः अर्थ व्यवस्था के लिए इन लोगों ने अंग्रेज़ी खज़ानों के साथ–साथ उनके पिट्टू राज्यों को भी लूटा। यहाँ अंग्रेज़ों का एक और दोगला रूप सामने आया। अंग्रेज़ चम्मच साहूकर जब अपनी फ़रियाद लेकर अंग्रेज़ों ले पास जाते तो उलटा अपशब्द सुन वापस आ जाते। अब उनमें से बहुतेरे साहूकारों ने चुपके से फड़के को आर्थिक मदद पंहुचाना शुरू कर दी।

जब कभी कोई जंग रामोशी हार जाती तब फड़के धैर्य रखने के लिए कथाओं के माध्यम से उत्प्रेरित करता। उसका ध्येय वाक्य था कि स्वतंत्रता-से ही सभी समस्याओं का समाधान निकलेगा। स्वतंत्रता के मतवाले वासुदेव बलवंत फड़के-से प्रभावित हो कर अब अनेक लोग इस कार्य में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप-से उसके साथ हो लिए। विद्रोह का इतना सुसंगठित एकल संगठन अंग्रेज़ों के सम्मुख प्रथम बार आया था।

फड़के की युद्ध नीति ऐसी थी कि उसनें बाहरी इलाक़े से अंग्रेज़ चौकियों को घेर कर उनका ऐसा सफ़ाया किया कि पुणे में बैठा कप्तान किम्कर्तव्य विमूढ़ हो गया और स्वयं की जान बचा कर भगा। अब पुणे में वासुदेव का नियंत्रण था जिसे लोक जनों ने स्वीकार भावों से देखा। फड़के की पूणा विजय अल्पावधिक रही पर इससे जहाँ इंग्लैण्ड में बैठी रानी के भाल पर भी चिंता की लकीरें खिंच गईं वहीं भारतीयों का विश्वास और सुदृढ़ हुआ। इसके बाद भी रामोशी द्वारा अंग्रेज़ों के प्रति गोरिल्ला युद्ध चलाता रहा, इन आक्रमणों से अंग्रेज़ी राजस्व का भारी नुकसान हुआ। वासुदेव के शस्त्र समृद्ध दल को पकड़ना अंग्रेज़ों के लिए लोहे के चने चबानें जैसा काम हो गया था।

एक घटना और इस क्रांतिवीर के अदम्य सहस का उद्धरण है। रामोशी के खात्मे के लिए विश्राम बाग़ में अंग्रेज़ों की बैठक चल रही थी। किसी भी तरीक़े से वासुदेव वध इस चंडाल-चौकड़ी का मक़सद था। अचानक धांय-धांय गोली की आवाज़ से अँग्रेज चौंक गए। बाहर खड़े प्रहरी अब शव-रूप में धरती पर श्रीहीन-से पड़े थे। तभी एक विस्फ़ोट से कंपनी की सवारियों के भी परखच्चे उड़ गए। पलटन द्वारा जल्दी से मोर्चा ले जवाबी कार्यवाही की गयी, परंतु न जानें कब रामोशी के जाँबाज़ों नें तेल छिड़क कर बैठक भवन को आग लगा दी। इस भीषण मंजर को देख बाहर मोर्चा लिए अंग्रेज़ी सैनिक ऐसे भागे जैसे वन में अग्नि-दर्शन कर लड़इये भागते हैं। मेरठ छावनी की घटना के बाद शायद इस प्रकार से ब्रिटिश-पोस्ट का विध्वंस फड़के द्वारा ही किया गया, ऐसा मेरा विचार है। यह घटना अंग्रेज़ों के लिए कल्पना-से परे थी। उन्होंने फड़के के ऊपर पचास हज़ार का इनाम घोषित कर ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने का लालच भरा इश्तेहार नगर के भीड़-भाड़ वाले इलाकों में लगा दिया। अगली सुबह जब अंग्रेज़-छावनी में चहल-पहल शुरू हुई तो वासुदेव बलवंत फड़के के हस्ताक्षर युक्त एक इश्तेहार को चस्पा देख इंग्लैंड की रानी द्वारा विशेष रूप-से वासु के अंत के लिए भेजे गए अंग्रेज़ कप्तान रिचर्ड के होश उड़ गए ; उसकी साँसें मानो हलक में अटक गई। फड़के के इश्तेहार में अंग्रेज़ सैनिकों को प्रलोभन दिया गया था कि जो भी रिचर्ड का कटा शीश लाएगा उसे पचहत्तर हज़ार रुपयों का इनाम दिया जाएगा !

रिचर्ड समझ चुका था कि जिसे वह एक लुटेरा समझ रहा था वह आम भारतीयों का नायक है और उसका दमन इतना आसान नहीं। नगर, गाँव हर जगह उसे वासुदेव का अदृश्य साम्राज्य दिखा। हैरानी की बात तो यह थी कि फड़के को अंग्रेज़ी गतिविधियों का पता रहता पर फड़के की कोई जानकारी रिचर्ड को न मिलाती। मुझे बहुत दुःख होता है जान के कि कई तत्कालीन भारतीय राजघरानों में आराम फ़रमाते राजवंशी खानदानों ने स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले फड़के का ज़रा भी साथ न दिया। बहुत बड़ा आम आदमियों का समूह तब भी वैसे ही न्यूट्रल था जैसे आज भी राष्ट्रीय सोच के प्रति कई अकर्मण्य लोग दिख जाते हैं। इसी प्रकार एक बार जब महाराष्ट्र, कोंकण क्षेत्र में आए अकाल के समय अंग्रेजों के भंडारण को लूट कर फड़के ने आम जनों को वितरित किया तो परिणामतः घबरा के अंग्रेज़ों नें भी इस और ध्यान दिया। कालांतर में इस वीर योद्धा की सेना विपरीत वातावरण में लगातार युद्ध करते-करते थक चुकी थी, उनके पास रसद, असला-बारूद सभी समाप्त हो रहा था। पुणे के समीप के आदिवासी क्षेत्रों में वे सभी छिप कर रहते। खुले आसमान के नीचे रहते-रहते फड़के सहित कई सैनिकों का स्वस्थ बिगड़ गया। ऐसे में जब वे एक मंदिर में विश्राम कर रहे थे, एक ग़द्दार प्रवृत्ति के ग्राम वासी ने चंद सिक्कों के लिए अंग्रेज़ों को इस शेर की जानकारी दे दी। जिसकी गर्जना-से ब्रिटिश आर्मी सहम जाती आज उसी को शयन काल के समय धोखे से पकड़ लिया गया। यह बीस जुलाई अठारह सौ उन्यासी की बात है।

जैसा हमेशा क्रांतिकारियों के साथ होता है, फड़के पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया। इस देश भक्त सैनिक का मुक़दमा सिर्फ़ दिखावा था यहाँ न्यायाधीश अंग्रेज़, वकील अंग्रेज़, गवाह अंग्रेज़, मुंशी अंग्रेज़ थे। निर्णय तो पूर्व निर्धारित था, प्राण दंड...फाँसी ! इस रिपु चक्रव्यूह में महादेव आप्टे एक ऐसे व्यक्ति थे जो वासुदेव की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। आप्टे के तर्कों के समक्ष विवश अंग्रेज़ों को मजबूरी में फाँसी की सजा को काला पानी में तब्दील करना पड़ा। आप्टे की नज़रों ने फड़के से कुछ कहा। काला पानी के लिए वासुदेव को एडन यमन भेज दिया गया। धीरे-धीरे यह क्रांति युद्ध भी नेतृत्व विहीनता के चलते शाँत होते चला गया। जन वाणी से पता चलता है कि काला पानी के जेल की सलाखों को वासुदेव ने अपने भुजबल से तोड़ कर भागने का प्रयास किया। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे की सत्रह मील भागने के बाद मार्ग भ्रम के कारण वह पकड़ा गए और बेड़ियों में जकड़ दिए गए। सत्रह फ़रवरी अठारह सौ तिरासी के दिन दुर्बल स्थिति में यह राष्ट्र दीपक जीवन ज्योत विहीन हो गया।

वासुदेव बलवंत फड़के वो क्रांतिवीर थे जिन्होंने अठारह सौ संतावन के संग्राम की विफ़लता के बाद पुनः भारतीयों में क्रांति ज्वाला प्रज्ज्वलित की ; उन्हें संगठित किया ; उनका संकेत थाली बजाना क्रांति की पहचान बन गया था। वह महान क्रांतिवीर माँ भारती की गोद में आराम से चिर निद्रा में सोने चला गया। ऐसे क्रांतिकारी और उसकी साथियों के विषय में हर भारतीय को जानकारी होनी ही चाहिए। बरतानिया शासन वासुदेव के कार्यों को अपराध मानती थी पर तत्कालीन भारतीय परिस्थिति के चलते वह हमारे लिए वंदनीय है और वंदनीय हैं वासुदेव बलवंड फड़के।

वंदे...!

अखिलेश सिंह श्रीवास्तव (कथेतर लेखक )

दादू मोहला, संजय वार्ड, सिवनी 480661 मध्यप्रदेश

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.