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मन का फूल - नाथ गोरखपुरी

01- हिसाब होगा

मेरा क्या कसूर है इसका भी हिसाब होगा
तेरे लफ्जों का मेरे जलवों से जवाब होगा

तुम पढ़ना , दिल खोलके मेरे किस्से को
तेरे सामने , मेरे जीवन का किताब होगा

सियासत को तो होना , पड़ेगा ही शर्मिंदा
जिस दिन नस्लों में ,मुद्दे का शबाब होगा

जिस दिन रोटी के ख़्वाब से वो ऊपर उठेगा
उस दिन उसके चेहरे पर भी , रुआब होगा

बंद कर देगी आवाम , धर्म के नाम पे लड़ना
उस दिन से उनकी थाली में, ना कबाब होगा


02-मन का फूल


मोह मार्ग में मर मर जीना
मन ने सारा चैन है छीना
ध्यान भंग कर भेद रहा है
अंतस हृदय अभेद रहा है

स्नान गंग चित्तशुद्ध न कीन्हा
ध्यान प्रभु मन निर्मल कीन्हा
निर्मल मन प्रभु प्रीति निभावा
संगति सन्त में हरि को पावा

चित में कपट तो ना अनुरागी
लोभ बसे मन ना बैरागी
जगत लोभ में जीव बिलाई
मिथ्या जगत ब्रह्म ना पाई

मन ना फिरै जगत से मोरा
मन अर्पित चरनन में तोरा
मनका फेर ही तो तर्पण है
मन का फूल तुम्हें अर्पण है

03-

मैं तेरे जंगें जूनून से वाकिफ़ हूँ
मैं तेरे दिलके सकूँ से वाकिफ़ हूँ
मैं खामोश मग़र तेरी हदें जानता
क्यूँकि मैं तेरे खून से वाकिफ़ हूँ

मुख़ालिफ़ होले झुठ की कमाई से
मुखातिब होले रूह की दुहाई से
उतर जायेगी सारी मर्दानगी तेरी
मुक़ाबिल तो होले जरा सच्चाई से

तेरी औकात क्या है? जरा गुमनाम होके पूछ।
अक्सर लोग सामने   , सच नही बोला करते।।

04-


चांदनी के चमक में ,बिजली की कड़क में
चाय की प्याली में ,सूरज की लाली में
गुमनाम सड़क पे , उसकी रखवाली में
मैंने उसे छुप-छुपकर देखा....

गगन की ऊंचाई में, धरा की गहराई में
ऊँचे ऊँचे कोट में , दीवारों की ओट में
शरमाई हुई शाम में, अक्सर अपने नाम में
मैंने उसे छुप-छुपकर देखा....

दिन के सारे पहर में ,दुख के सारे कहर में
गांव के गलियों में, शहर की रंगरलियों में
नदियों और घाटों में,काली काली रातों में
मैंने उसे छुप-छुपकर देखा....

05-

पथ प्रीति पे पार भयो वहि है, जो जान की बाजी लगावेके जानो
वोही बढ़े इस पथ पे सदा ,जो प्रीति की रीति निभावेके जानो
उस जन को बियाधा मिले है यहाँ,जो पथ पर कांटा बिछावेके जानो
वोहि हिय हिय को संभाल सको,जो रूठे हिय को मनावेके जानो

चलि चाल चहकि कै जो भी यहाँ, कुछ कदम बढ़ाइके टोअत है
फूलि ही फूल पे जो बढ़ियो, मिली कंटक तो वहि रोअत है
नेह मिले आ सनेह मिले , जो नेह ही जग में बोअत है
जो पावे बदे ही प्रीति करो, उ सब कुछ आपन खोवत है

प्रीति की बात करो ना यहाँ , सब स्वारथ है सब स्वारथ है
आजु सब कुछ आपन जो है कहा,पल में कल सब कुछ डारत है
तोसे नेह करो तब तक ही कोई, जब तक तू उका सम्हारत है
संजोग बने नए लोग मिले , तो नेह पुरान बिगारत है

येही जग कै हालि हौ जानत है, तब तक ही साथ तोहार निभाई
जब तक तोरा हाथ चलि जग में,आदर सै कहि सब भाई भाई
जब काम कै कुछु रहो ना जगे, जग क्षन में तोहरा कै देइ भुलाई
यहाँ जाड़ कै जाड़ कहे ह तबे, जब सबकर हाड़ उ देला हिलाई

यहु राह पे धावन से बढ़ियों, हिय को पहिले ही टूक करो
दुर्गम पथ प्रीति की पाहन सु,चलने की ना इसपर चूक करो
बैरी जग प्रीति सदा ही रहयो , प्रेमीजन हिय में हुक भरो
इस राह पे वोही है पार भयो, जग के कटुता से जो नेकु डरो

06-

गुमशुदा थी जिंदगी , जिंदगी की तलाश में।
जिंदगी लिपटी मिली है मौत के लिबास में।।

हमको परायों में मिला,एक अनुभव है नया।
सुकून तुम न ढूंढना कभी भी अपने खास में।।

हरदम भरोसा तोड़ के , है उन्होंने यह कहा।
खैर छोड़ो जाने दो, रखा है क्या विश्वास में।।

मौत की औकात क्या, जो खड़ा हो सामने।
उसको खबर थी मेरी,गद्दारी छिपी है सांस में।।

07-


सबकी अपनी इक है दुनिया
सबका अपना इक है कोना
सब ही नजर उतारेंगें तो
कौन करेगा जादू-टोना

माना तू है घणी सुंदरी ,जुल्फ घनेरे बादल है
पूरनमासी चेहरा तेरा ,रात अमावस काजल है
पर कौन उठाएं नखरे तेरे ,कौन करेगा चोना मोना
सब ही नजर उतारेंगें तो
कौन करेगा जादू-टोना

हिरनी जैसी तूँ बलखाती , सागर सी लहराती है
भौंरो जैसा मैं आऊँ तो, फूलों सा इठलाती है
ना रे बाबा अब ना होगा , तेरे पीछे रोना धोना
सब ही नजर उतारेंगें तो
कौन करेगा जादू-टोना

देख के सूरत प्यारी तेरी , लाखो सूली चढ़ जाते
सब कुछ अपना खो देते, जब तेरे पीछे पड़ जाते
खाना पीना भूल चुके हैं , भूल गए हैं जगना सोना
सब ही नजर उतारेंगें तो
कौन करेगा जादू-टोना

तुझको चाहिए चांद औ तारे, मैं मिट्टी बोने वाला
तू सपनों की राजकुमारी , मैं मिट्टी सोने वाला
मैं मिट्टी का घणा पुजारी, कैसे कहूंगा बाबूसोना
सब ही नजर उतारेंगें तो
कौन करेगा जादू-टोना

तेरे ख़्वाब हैं महलों वाले, मैं आदी हूँ गरीबी का
तुं दूर दिखावा करने वाली,मैं आशिक हूँ करीबी का
पास नही है कभी तूं आती,खाली कहती मेले छोना
सब ही नजर उतारेंगें तो
कौन करेगा जादू-टोना

08-

कभी कागज कलम से भी कमाल कीजिए
झूठ तिलमिला जाए , जरा सवाल कीजिए

आप देख रहे हैं , गुनाह फैलते हुए
कभी अपनी ख़ामोशी पे भी मलाल कीजिए

सच अगर कहने को , हिम्मत नहीं जनाब
तो झूठ की भी दोगुनी , ना चाल कीजिए

क्यों मारे गए मासूम , कुर्सी के ख्वाब पे
सियासत सियासतदां का, बुरा हाल कीजिए


09-

जी भर के रोने को, जी चाहता है
उम्र भर सोने को , जी चाहता है

अंधेरे के पनाहगाह में, ठहरा रहा
अब सुबह होने को, जी चाहता है

उम्र भर समेटा है जो कुछ भी मैंने
झटके से खोने को , जी चाहता है

हो कोई बारिश , की तन ना भीगे
मन को भिगोने को , जी चाहता है

इक नाम तेरा ,जब है जग में सच्चा
तो क्यों चांदी सोने को,जी चाहता है?

कर पद के पांचों को, योगी बनाके
ना जग में बोने को , जी चाहता है

मन का हिमालय , जो है मेरे अंदर
कोई शिव संजोने, को जी चाहता है

कोई राम तो, मेरे तट पर भी आए
'नाथ' चरण धोने को, जी चाहता है

         - नाथ गोरखपुरी

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