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माँ कामाख्या शक्ति पीठ का रहस्य - संध्या चतुर्वेदी

माँ कामाख्या शक्ति पीठ का रहस्य

माँ कामाख्या शक्तिपीठ देवी के 51 शक्तिपीठ में से 1 शक्तिपीठ है जो असम राज्य की राजधानी दिसपुर से 8 किलोमीटर दूर गोवाहाटी  के नीलांचल पर्वत पर  स्थित है।

पुराणों के अनुसार मान्यता है कि एक बार राजा दक्ष ने अपने दामाद शिव को अपमानित करने के लिए अपने महल में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया।

जिस में अपनी पुत्री सती और दामाद शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। जब माता सती को यज्ञ की जानकारी हुई तो उन्होंने शिव को साथ चलने के लिए आग्रह किया। परन्तु शिव जी ने बिना न्यौते के जाने से मना कर दिया और देवी सती को भी न जाने की सलाह दी,पर सती जी ने सोचा अपने मायके जाने के लिए आमंत्रण की क्या आवश्यकता और बिना बुलाये जब महल में गयी तो वहाँ शिव के लिए कोई स्थान नहीं देखा।

इस से क्रोधित हो पति का अपमान बर्दाश्त नहीं किया और हवन कुंड में आहुति दे दी। जब शिव को सती की भस्म होने की खबर मिली  तो मोह बस क्रोधित हो सती का शरीर ले तांडव नृत्य करने लगे।

शिव को बेकाबू देख भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी के शरीर के 51 टुकड़े कर दिये। जो धरती पर नीचे गिरे, वही 51 शक्ति पीठ बन गये।

माँ का योनि भाग नीलांचल पर्वत पर गिरा। यही कामख्या शक्ति पीठ है। माँ का योनि भाग गिरा इसलिए यहाँ कोई मूर्ति नहीं है। एक कुंड है जो सदैव पुष्प से ढका रहता है।

साल में एक बार जून के महीने में अम्बुबाची मेला लगता है। कहते हैं कि यह मेला देवी के रजस्वला होने की खुशी में होता है। मान्यता यह है कि देवी रजस्वला होती है। तब तीन दिन मंदिर के पट बंद रहते हैं और मंदिर को सफेद कपड़े से ढक दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के पट खुलते हैं तब यह सफेद वस्त्र माँ के रक्त से लाल हो जाता है। इसे भक्तों में प्रसाद रूप में दिया जाता है।

मान्यता है कि यह सभी सिद्धि देने वाला पवित्र वस्त्र है और इसे मंदिर में रखा जाता है। इस दौरान कुंड का जल भी लाल हो जाता है।

कामख्या मंदिर तांत्रिक साधना के लिए विशेष जाना जाता है। भक्तों की सभी मुराद पूरी होती है।

संध्या चतुर्वेदी

मथुरा उप

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