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व्यंग्य - राजनीतिक शुचिता - हनुमान मुक्त

राजनीतिक शुचिता

टी वी चैनल पर राजनीतिक शुचिता को लेकर बहस चल रही थी। राजनीतिक पार्टी के एक नेता कह रहे थे।

विरोधियों ने उनके अंदाज को लपक लिया है और लपक कर उनके ही अंदाज में वे उन्हें बोल्ड कर रहे हैं।

विरोधियों का कार्य हमेशा दूसरी पार्टी का विरोध करना ही रहा है। चाहे कोई भी पब्लिक इंटरेस्ट का कार्य हो। मुद्दा हो या अन्य कोई भी कार्य।

हम भी तो पुरजोर तरीके से उनके कार्यों का विरोध कर विपक्ष का कार्य बखूबी से कर रहे हैं।

यह सब राजनीतिक शुचिता के खिलाफ है।

जिन राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के प्रतीकों को आगे कर हमने अपनी जगह बनाई है, उनको हड़पना सरासर अन्याय है ।

हमारा ही अंदाज ,हमारे ही प्रतीक, हमारी ही चाल, सब कुछ हमारा।

फिर वे इसे हड़प कर हमें कैसे चित्त कर सकते हैं। हम इसकी शिकायत चुनाव आयोग से करेंगे। समूचे देश में आंदोलन करेंगे। सत्याग्रह करेंगे। राष्ट्रवादी लोगों को समझाएंगे। यह सब स्वच्छ लोकतंत्र के खिलाफ है। इससे लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। पक्ष और विपक्ष घालमेल हो जाएगा।

जब सरकारी संस्थाओं जैसा नाम अपनी कंपनी/ संस्था का रखकर बेरोजगारों को भरमाने वाली कंपनी/ संस्थाओं पर सजा का प्रावधान है तो ऐसी पार्टियों पर क्यों नहीं?

हम कानून बनाएंगे। जिन मुद्दों, प्रतीकों को एक पार्टी उठाती है तो दूसरी पार्टी के लोगों को उन्हें उठाने या चुनाव के समय उनका इस्तेमाल करने पर पूर्णतया पाबंदी होनी ही चाहिए।

कुछ तो राजनीतिक शुचिता हो।

ऐसा होने लगेगा तो लोगों का राजनीति से विश्वास ही उठ जाएगा फिर लोकतंत्र कैसे कायम रहेगा।

दूसरी पार्टी के नेता उनके द्वारा गोलमोल दिए जा रहे तर्कों को समझ रहे थे‌ ।समझ तो दर्शक भी रहे थे।

वे बोले ",हनुमान जी किसी पार्टी विशेष के नहीं है और ना ही उनके द्वारा उछाले जा रहे प्रतीक।

हम भी इस देश के नागरिक हैं। उसी धर्म को मानने वाले जिसे बहुसंख्यक भारतीय मानते हैं। फिर वे किसी के कैसे हो गए?

इसमें राजनीतिक शुचिता कहां से आ गई?

हनुमान जी को अपनी बपौती मानकर उनका कद छोटा करना सरासर नाइंसाफी है ।

उनका कद और सामर्थ्य नापना नामुमकिन है ।

सूक्ष्म रूप धारी सियहिं दिखावा। विकट रुप धरि लंक जरावा।

चौपाई स्पष्ट करती है कि हनुमान जी चाहे जब जैसा रूप, कद, ग्रहण कर सकते हैं ।

नेताजी शुचिता से निकलकर सीधे चौपाई पर आ गये। वे

यहीं नहीं रुके, आगे बढ़ते हुए बोले ।

रामचरितमानस के सुंदरकांड में तुलसीदास जी कहते हैं जब हनुमान जी की परीक्षा लेने के लिए देवताओं ने सर्पों की माता को उनके पास भेजा तब भी हनुमान जी ने अपने बदन को उसी के अनुसार बढ़ा लिया था।

जस जस सुरसा बदन बढ़ावा। तासु दून कपि रूप दिखावा ।

सत जोजन तेहि आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।

यह सब सिद्ध करते हैं कि हनुमान जी किसी की बपौती नहीं है।

वे तो उन सब की बपौती है जो उन्हें मानते हैं क्योंकि हम उन्हें मानते हैं इसलिए वे हमारी भी बपौती है।

सच्चा लोकतंत्र यही है। सच्ची राजनीतिक शुचिता भी यही है। विरोधियों का इस प्रकार से शिकायत करना ।आंदोलन करना। सत्याग्रह करना ।सरासर लोकतंत्र के खिलाफ है ।

बल्कि हम तो यह कहेंगे यह सब हनुमान जी के खिलाफ है।

कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा।

नेताजी ,शुचिता को हनुमान जी से जोड़कर और हनुमान जी को विरोधियों के खिलाफ लेकर चले गए ।

चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए बहस में अल्पसंख्यक समुदाय से भी नेताजी को लिया गया था ।

वे कहने लगे ,"मैं तो कहता हूं हनुमान किसी पार्टी विशेष के ही नहीं बल्कि किसी धर्म विशेष के भी नहीं है बल्कि वे तो सब धर्मों के हैं।

वे हमारे भी है। हमारे तो नाम ही हनुमान टाइप होते हैं। इरफान, सलमान, फरमान ,उस्मान, इमरान इसी तरह हनुमान ।

इससे बड़ा प्रूफ क्या हो सकता है। यदि ज्यादा बहस करोगे तो हम हनुमान को आप से हड़प लेंगे।

सिर्फ अपना ही मान लेंगे। फिर लड़ते रहना आपस में। सार्वजनिक मंच से इस प्रकार की बात करना सांप्रदायिक सौहार्द के खिलाफ है। लोकतंत्र के खिलाफ है। हमारे संविधान के खिलाफ है। राजनीतिक शुचिता के खिलाफ है।

टीवी पर बहस जारी है। राजनीतिक शुचिता क्या होनी चाहिए ?इसका निर्णय नहीं हो सका है और ना ही इसके कोई मानदंड तय की जा सके हैं।

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#हनुमान मुक्त

93,कान्ति नगर

गंगापुर सिटी (राज.)

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