श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग - तेलुगु कवि गोन बुद्धा रेड्डी विरचित श्री रंगनाथ रामायण तथा इसके अल्पज्ञात प्रसंग - डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

SHARE:

डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग तेलुगु कवि गोन बुद्धा रेड्डी विरचित श्री रंगनाथ रामायण तथा इसके अल्पज्ञात प्रस...

डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग
तेलुगु कवि गोन बुद्धा रेड्डी विरचित
श्री रंगनाथ रामायण तथा इसके अल्पज्ञात प्रसंग
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुसां महापातकनाशनम्।।
(श्री रामरक्षास्तोत्रम्।।१।।)


श्रीरघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तारवाला है और उसका एक-एक अक्षर भी मनुष्यों के महान् पापों को नष्ट करने वाला है।
श्रीराम का जीवन और कृतित्व भारतीय आध्यात्मिक सम्पत्ति का मूलाधार है। श्री रंगनाथ रामायण तेलुगु भाषा का सबसे पहला रामकाव्य है। गोनवंश के राजा विट्ठलनाथ के पुत्र बुद्धनाथ या बुद्धा रेड्डी ने अपने पिता की इच्छा के अनुसार इस रामायण की रचना की और उन्हीं के नाम पर अपने ग्रंथ का नाम श्री रंगनाथ रामायण रखा। यह तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की रचना है। इस तरह श्रीरामचरितमानस से तीन सौ वर्ष पुरानी यह रचना है। श्री गोन बुद्धा रेड्डी संस्कृत एवं तेलुगु भाषा के मर्मज्ञ थे। संस्कृत के बाण भट्ट की शैली की तरह श्री रंगनाथ ने भी लम्बे-लम्बे वर्णन और स्थलों, ऋतुओं आदि का मनोरम वर्णन किया। कवि ने श्रीराम को श्री विष्णु और शिव का सम्मिलित रूप माना है। इस रामायण की भाषा सरल होने के कारण तेलुगु जन-जन में लोकप्रिय और प्रचारित है। श्रीरंगनाथ रामायण द्विपद नामक छन्द में है। इस रामायण के कुछ प्रसंग वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। रामायण को छ: काण्डों में विभाजित किया गया है। श्रीराम के चौदह वर्षों में से उसका अधिक भाग दण्डकारण्य में आंध्रप्रदेश के गोदावरी नदी के तटीय प्रदेशों में व्यतीत हुआ है। उस पावन स्मृति को जाग्रत करने वाले अनेक स्थान और स्मृति चिह्न आज भी आंध्रप्रदेश में आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।

विश्वामित्र का राम को ताड़का का वृत्तान्त बताना


श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्र महर्षि के साथ नाव पर चढ़कर सरयू नदी पार कर रहे थे तब सरयू के मंझधार में पहुँचने पर अत्यधिक आश्चर्य से श्रीराम ने विश्वामित्र से पूछा-
यिवे महाध्वनुलु वेल्लेसगुचुन्नवियु। दिविनुब्बि, यिदियेमितेलुपवेयनुडु
गर मोप्युमीरुचु गैलासशिखरि। सरयुवु मानस सरसि जन्मिचि
पोन्गारि साकेतपुरिचुट्टु गविसि। गंगतो गूडेडुकरडुल म्रोत
यनि मुनि सोप्पिन नर्थितां म्रोक्कि। यनघुलन्नदि दाटियरुगुचोद्रोव
तेलुगु श्री रंगनाथ रामायण बालकाण्ड ७३१-७३२


ये कुछ महाध्वनियाँ आकाश तक किसकी व्याप्त हो रही है? बताइए यह सब कुछ क्या है? श्रीराम के प्रश्नों को सुनकर विश्वामित्रजी ने कहा, 'बड़ी शोभा से कैलास पर्वत के शिखर पर मानसरोवर में जन्म लेकर समृद्ध हो साकेत नगर को चारों तरफ से घेरकर गंगा नदी में मिलने वाली सरयू नदी की लहरों की यह गर्जना है। श्रीराम-लक्ष्मण जब नदी पार करके एक निर्जन वन में पहुँचे तब श्रीराम ने इस निर्जन वन भूमि में एक आश्रम के बारे में पूछा कि यह आश्रम किसका है? विश्वामित्रजी ने श्रीराम से कहा कि एक समय की बात है कि इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया, जिससे उससे बड़ा पाप हो गया। देवता और ऋषि-मुनि इन्द्र को पाप से मुक्त कराने के लिए उसे यहाँ ले आए और पवित्र जल को मंत्र से अभिमंत्रित कर उसे दे दिया। इन्द्र उस पवित्र जल के प्रभाव से पाप मुक्त हो गया। ये दो स्थान हैं इनमें पहला स्थान मलयुक्त है। यह मलद कहलाता है तथा दूसरा स्थान जो कलुष-कलित है वह करुश कहलाया। तत्पश्चात् विश्वामित्रजी ने श्रीराम को ताड़का राक्षसी के बारे में इस प्रकार बताया-
धरणि दाटक यनुदानवुरालु। करुलु वेयिंटिकि गल लावु गलिगि
पोलपोन्दु नी रेण्डु पुरमुलु सोच्चि। यलवुमै बाघिचु ननुडु राघवुडु
तेलुुगु श्रीरंगनाथ रामायण बालकाण्ड ७५०


इस पृथ्वी पर ताड़का नामक एक दानवी हजार हाथियों का बलवाली इन दो नगरों में प्रवेश कर अपनी सारी शक्ति से सबको सताती थी। यह सुनकर श्रीराम ने विश्वामित्रजी से पूछा कि इस दानवी को इतनी शक्ति किसने प्रदान की है। यह दुष्ट बुद्धिवाली दानवी किसकी पुत्री है? इतना पूछने पर विश्वामित्रजी ने कहा- प्राचीनकाल में इस पृथ्वी पर सुकेत नामक यक्ष ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की थी। उस यक्ष ने ब्रह्माजी के प्रसन्न होने पर एक पुत्र मांगा। ब्रह्माजी ने कहा मैं तुम्हें पुत्र नहीं दूँगा किन्तु हजार हाथियों का बल रखने वाली पुत्री का वर प्रदान करता हूँ। ब्रह्माजी के वरदान से उस यक्ष के यहाँ एक पुत्री (कन्या) का जन्म हुआ। कन्या के बड़ी होने पर उस यक्ष ने सुन्द नामक व्यक्ति से उसका विवाह कर दिया। उस स्त्री को दो भयंकर शक्तिशाली, मारीच और सुबाहु नामक पुत्र हुए। कुछ वर्षोपरान्त सुन्द की मृत्यु हो गई। तब वह सुकेत की पुत्री अगस्त्य के आश्रम में जाकर बार-बार ऋषि-मुनियों को भयभीत कर तथा उनके कार्यों में विघ्र पैदा कर उन्हें सताने लग गई। कलराज (अगस्त्य) ऋषि ने उस पाप कर्म करने वाली को देखकर क्रुद्ध होकर शाप दिया कि तू राक्षसी बन जा।
उस समय से ही यह राक्षसी का रूप धारण कर निर्दयता से मानवाहार कर रही है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर रहने वाले इससे बड़ा कष्ट प्राप्त कर रहे हैं। विश्वामित्रजी ने श्रीराम से कहा- हे राम! तुम्हारे अतिरिक्त इसका कोई अन्य वध नहीं कर सकता है। पूर्व काल में सारे संसार को मार डालने का विचार करने वाली मंथरा नामक प्रगल्भा स्त्री को जो कि सम्पन्न जाति के विरोचन की पुत्री थी क्या इन्द्र ने उसे नहीं मार डाला? पूर्व में दृढ़ व्रत वाली भृगु पत्नी ने लोकों को दु:खी एवं अशान्त बनाकर नष्ट करने का मन में विचार किया तो क्या विष्णु ने स्वयं ईर्ष्यालु होकर उसे नहीं मारा था? हे राम! लोकहित के लिए ताड़का वध पुण्य ही है। इतने में ताड़का (दानवी) अधिक भयंकर बनकर उन सब पर पत्थरों की वर्षा करने लगी। यह देखकर श्रीराम ने उन पत्थर शिलाओं के साथ-साथ उसके दोनों हाथ दिव्य शस्त्रों से काट डाले। उसी समय लक्ष्मणजी ने ताड़का की नाक और कान काट डाले मानो वह यह संकेत देना चाहते थे कि मैं असुरेश (रावण) की बहन की यही दुर्दशा करूँगा। ताड़का माया रूप धारण कर अपने अस्त्रों की वर्षा करने लगी तब विश्वामित्रजी ने श्रीराम से कहा- हे अनध! संध्याकाल निकट आ रहा है, संध्या के समय राक्षसों को जीता नहीं जा सकता। अब तुम दया की भावना त्याग कर सबके हितार्थ इसे मार डालो। अन्त में श्रीराम ने शब्दवेधी बाणों से उस राक्षसी की तुच्छ माया का दमन कर अंत में एक महान अस्त्र से उसका वध कर दिया।
गिलहरी (चिकुरी-तरुमूषिक) द्वारा सेतुबंध में
सहायता तथा उसे श्रीराम का आशीर्वाद

श्रीराम लंका विजय हेतु समुद्र पर सेतु निर्माण का कार्य करवा रहे थे। वानर बड़े-बड़े पहाड़ों से शिलाखण्ड उठा-उठा कर तथा बड़े-बड़े वृक्षों को लाकर नल के हाथ में दे रहे थे। नल के हाथ का स्पर्श होते ही पत्थर समुद्र पर तैरने लगते थे सेतु का कार्य बड़ी ही कुशलता तथा शीघ्रता से आगे बढ़ रहा था। श्रीराम और लक्ष्मण सेतु के पास खड़े होकर इस निर्माण का बड़ी सूक्ष्मता से निरीक्षण कर रहे थे कि-
गोब्बुन सेतुव गोनसागवलयु:। निब्बल्लिदुलकु दोडेनु गाविंतु
ननुचु श्रीरामुनि यडुगुदामरलु। मनमुन जेर्चि यामनुजेशुनेदुर
तेलुगु श्रीरंगनाथ रामायण युद्धकाण्ड ११००


इस अवसर पर एक गिलहरी यह सोचकर कि 'शीघ्रता से सेतु बंधन का कार्य हो जाना चाहिए। इन बलवानों की मैं भी सहायता करूँगी।Ó श्रीराम के चरण-कमल को मन में रख कर मनुजेश्वर श्रीराम का स्मरण कर उस गिलहरी ने बड़ी श्रद्धा-आस्था के साथ समुद्र में गोता लगाया और फिर समुद्र तट पर आकर बालु रेत पर लौट लगाने लग गई फिर सेतु के पास गई और अपने शरीर पर लगी हुई बालु रेत को झटका देकर गिराने लगी। गिलहरी ने ऐसा बार-बार किया। श्रीराम की दृष्टि उस गिलहरी पर गई तो उन्होंने कहा- देखो लक्ष्मण! यह नन्ही सी गिलहरी अपनी शक्ति के अनुसार सेतु निर्माण में सागर तट की बालु रेत को सेतु तक पहुँचाकर मेरी सहायता कर रही है। श्रीराम ने सुग्रीव से कहा कि-
देम्मन्न वेगंबेतेच्चि सुग्रीवु। डम्माहत्युनि चेतिकंदियिच्चुटयु
बलुतेरंगुल दानि ब्रस्तुति सेसि। कलित दक्षिण कराग्रमुन दुव्वुटयु
तेलुगु श्रीरंगनाथ रामायण युद्धकाण्ड १११३-१११४


बड़े प्रेम से इस गिलहरी को मेरे पास ले आओ। सुग्रीव उस गिलहरी को पकड़कर श्रीराम के पास ले आए और उनके हाथों में दे दिया। श्रीराम ने गिलहरी की प्रशंसा की और अपना दाहिना हाथ उसकी पीठ पर फेरा। उसके पश्चात् उसे वहाँ सुन्दर स्थान पर छोड़कर आने का कहा।
आज भी श्रीराम के आशीर्वाद फलस्वरूप गिलहरी की पीठ पर तीन अँगुलियों के चिह्न (निशान) तीन श्वेत रेखाओं (धारियों) के रूप में दिखाई देते हैं।
गिलहरी के कथा-प्रसंग से हमें हमेशा दूसरों की निस्वार्थ सहायता करने का संकल्प लेना चाहिए। नि:स्वार्थ सहायता का फल ईश्वर हमें भविष्य में किसी न किसी रूप में दे देता है।
भरत का विचित्र स्वप्न
यह प्रसंग उस समय का है जब रावण के शक्ति के आघात से लक्ष्मणजी मूर्च्छित हो गए थे तथा उनके लिए हनुमानजी संजीवनी औषधि पहाड़ सहित लेकर आकाश मार्ग से अयोध्या नगरी के ऊपर से जा रहे थे।
भूचर खेचराद्भुतवेगुडगुचु। नाचंदमुन बोवना मध्यरात्रि
भामित्र-मित्रुलु भरतु स्वप्नमुन। रामसौमित्रुलु रणमध्यमुननु
दलनूनियल तोड दनुवलुऽस्सि। बलहीनुलै क्रुस्सि पॅकमध्यमुन
बडि पलविचुचु बहुरोदनंबु। लुडुगक काविंचुचुन्न बिट्टुलिकि
तेलुगु श्रीरंगनाथ रामायण युद्धकाण्ड ६८४०


भूधर तथा खेचरों के लिए अद्भुत वेग वाला होता हुआ उस प्रकार जा रहा था। उस मध्य रात्रि के समय, भरत को स्वप्न में श्रीराम और लक्ष्मण रण मध्य में सिर पर तेल लगाए हुए, शरीर से थककर, शक्तिहीन होकर कीचड़ के बीच में पड़े होकर बुरी तरह रोते-बिलखते हुए दिखाई पड़े तो भरतजी चौंक पड़े तथा इस दु:ख स्वप्न से चिन्तित हो गए। स्वप्न में यह दृश्य देखकर वे श्रीराम-लक्ष्मण के विधि के विधान के बारे में सोचकर आकुल-व्याकुल हो गए। जागने पर उनको इन अपशकुन (दुश्शकुनों) को देखकर भयभीत हो गए तथा उन्हें लगा कि यह कैसा पाप है? यह कैसा विधि का विधान है। अब आगे यहाँ होने वाला है। पता नहीं कि अरण्यमध्य में श्रीराम-लक्ष्मण को क्या हुआ होगा? जानकीजी का क्या हुआ होगा? गणना करने पर चौदह वर्ष पूर्ण होने को आ रहे हैं किन्तु श्रीराम के बारे में एक भी समाचार सुनने में नहीं आया।
उन सत्यघनों का, उन उदार (पुरुषों) का, उन सदाचार सम्पन्नों का, उन कृतार्थों का कोई बुरा न हो, ऐसा मैंने अपना पुण्यफल आज देता हूँ। ऐसा सोच विचार कर भरतजी ने वेदपाठी ब्राह्मणों को अतिशीघ्र बुलाकर विधि-विधान से दान, यज्ञ और विघ्र की शान्ति हेतु अनेक कर्म कराएं।


इतने में हनुमान्जी आकाश मार्ग से बाल सूर्य के सम आकर बड़ी निष्ठा से भरतजी के नन्दिग्राम में आ पहुँचे। हनुमान्जी को भरतजी घने जटाधारी तथा वल्कलों से युक्त घनश्याम वर्ण में श्रीराम की भाँति दिखाई पड़े। अति चकित होकर हनुमान्जी ने सोचा कि 'लक्ष्मण को मृत अवस्था में होने पर तथा जानकीजी को अकेला छोड़कर श्रीराम इधर कैसे आ सकते हैं? यह पूछूँ फिर नहीं पूछना ऐसा धैर्यपूर्वक वे मन में विचार करने लगे। बहुत सोच विचार के बाद यह विचार आया कि श्रीराम शरणागत प्राण संद्धर्भ-निरत है, अभिराम बलवान है। अपने सत्य (सूनृत) को छोड़कर, अपने नाम यश को छोड़कर प्लवग-पुंगव-कोटियो (समूहों) को युद्ध के मैदान में अकेला छोड़, रावण को प्राणों के साथ अर्थात् जीवित छोड़कर श्रीराम अपने सशरीर यहाँ कैसे हो सकते हैं?
हनुमान्जी के मन में अन्तर्द्वन्द्व हो उठा कि मानव सामान्य (साधारण मानव के समान) बुद्धिवाला जानकर मैंने श्रीराम को छोटी या अत्यन्त ही संकीर्ण दृष्टि से क्यों देखा। संभवत: श्रीराम से मिलता-जुलता कोई अन्य दूसरा तपोधनी यह है। लगता है ऐसा ही है। ऐसा सोच विचार करते हुए अतिवेग से लंका के मार्ग पर अतुल-बलोदात्त हो जाते रहने पर स्वप्न से जागे भरतजी ने आकाश की ओर देख अलघु हो जाते हुए हनुमान्जी को देख यह सोचा कि न जाने यह दुष्टग्रह ऐसा क्यों दिखाई पड़ा? पटु बाणों से इसे गिरा देना चाहिए। आटोप के बढ़ने पर शरचापों को उस धन सत्व वाले भरत को हाथ में लेते देख, काकुत्स्थकुल तिलक सुने ऐसी एक आकाशवाणी (अशरीरी) आकाश से हुई- 'इसकी ओर तुम हित-बुद्धिकरो (मित्रभाव रखो) यह तुम्हारा बन्धु (हितचिन्तक) है। तुम क्रुद्ध मत हो। ऐसी सुन्दर आकाशवाणी को सुनकर उस महान् भरतजी ने शरचाप छोड़ दिए।--


डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता
'मानसश्री’, मानस शिरोमणि, विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर
सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर,
ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)
Email : drnarendrakmehta@gmail.com
पिनकोड- ४५६ ०१०

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग - तेलुगु कवि गोन बुद्धा रेड्डी विरचित श्री रंगनाथ रामायण तथा इसके अल्पज्ञात प्रसंग - डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता
श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग - तेलुगु कवि गोन बुद्धा रेड्डी विरचित श्री रंगनाथ रामायण तथा इसके अल्पज्ञात प्रसंग - डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता
https://3.bp.blogspot.com/-6fzC7FQBOU4/XE7VT__dkvI/AAAAAAABG0Q/j2fnXXdK1CQw2CPBkE9sfk9ZH7tUa_2wQCLcBGAs/s200/%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25BE.png
https://3.bp.blogspot.com/-6fzC7FQBOU4/XE7VT__dkvI/AAAAAAABG0Q/j2fnXXdK1CQw2CPBkE9sfk9ZH7tUa_2wQCLcBGAs/s72-c/%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%25AE%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2587%25E0%25A4%25B9%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25BE.png
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2020/02/blog-post_78.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2020/02/blog-post_78.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content