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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग - तेलुगु कवि गोन बुद्धा रेड्डी विरचित श्री रंगनाथ रामायण तथा इसके अल्पज्ञात प्रसंग - डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग
तेलुगु कवि गोन बुद्धा रेड्डी विरचित
श्री रंगनाथ रामायण तथा इसके अल्पज्ञात प्रसंग
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुसां महापातकनाशनम्।।
(श्री रामरक्षास्तोत्रम्।।१।।)


श्रीरघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तारवाला है और उसका एक-एक अक्षर भी मनुष्यों के महान् पापों को नष्ट करने वाला है।
श्रीराम का जीवन और कृतित्व भारतीय आध्यात्मिक सम्पत्ति का मूलाधार है। श्री रंगनाथ रामायण तेलुगु भाषा का सबसे पहला रामकाव्य है। गोनवंश के राजा विट्ठलनाथ के पुत्र बुद्धनाथ या बुद्धा रेड्डी ने अपने पिता की इच्छा के अनुसार इस रामायण की रचना की और उन्हीं के नाम पर अपने ग्रंथ का नाम श्री रंगनाथ रामायण रखा। यह तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की रचना है। इस तरह श्रीरामचरितमानस से तीन सौ वर्ष पुरानी यह रचना है। श्री गोन बुद्धा रेड्डी संस्कृत एवं तेलुगु भाषा के मर्मज्ञ थे। संस्कृत के बाण भट्ट की शैली की तरह श्री रंगनाथ ने भी लम्बे-लम्बे वर्णन और स्थलों, ऋतुओं आदि का मनोरम वर्णन किया। कवि ने श्रीराम को श्री विष्णु और शिव का सम्मिलित रूप माना है। इस रामायण की भाषा सरल होने के कारण तेलुगु जन-जन में लोकप्रिय और प्रचारित है। श्रीरंगनाथ रामायण द्विपद नामक छन्द में है। इस रामायण के कुछ प्रसंग वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। रामायण को छ: काण्डों में विभाजित किया गया है। श्रीराम के चौदह वर्षों में से उसका अधिक भाग दण्डकारण्य में आंध्रप्रदेश के गोदावरी नदी के तटीय प्रदेशों में व्यतीत हुआ है। उस पावन स्मृति को जाग्रत करने वाले अनेक स्थान और स्मृति चिह्न आज भी आंध्रप्रदेश में आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।

विश्वामित्र का राम को ताड़का का वृत्तान्त बताना


श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्र महर्षि के साथ नाव पर चढ़कर सरयू नदी पार कर रहे थे तब सरयू के मंझधार में पहुँचने पर अत्यधिक आश्चर्य से श्रीराम ने विश्वामित्र से पूछा-
यिवे महाध्वनुलु वेल्लेसगुचुन्नवियु। दिविनुब्बि, यिदियेमितेलुपवेयनुडु
गर मोप्युमीरुचु गैलासशिखरि। सरयुवु मानस सरसि जन्मिचि
पोन्गारि साकेतपुरिचुट्टु गविसि। गंगतो गूडेडुकरडुल म्रोत
यनि मुनि सोप्पिन नर्थितां म्रोक्कि। यनघुलन्नदि दाटियरुगुचोद्रोव
तेलुगु श्री रंगनाथ रामायण बालकाण्ड ७३१-७३२


ये कुछ महाध्वनियाँ आकाश तक किसकी व्याप्त हो रही है? बताइए यह सब कुछ क्या है? श्रीराम के प्रश्नों को सुनकर विश्वामित्रजी ने कहा, 'बड़ी शोभा से कैलास पर्वत के शिखर पर मानसरोवर में जन्म लेकर समृद्ध हो साकेत नगर को चारों तरफ से घेरकर गंगा नदी में मिलने वाली सरयू नदी की लहरों की यह गर्जना है। श्रीराम-लक्ष्मण जब नदी पार करके एक निर्जन वन में पहुँचे तब श्रीराम ने इस निर्जन वन भूमि में एक आश्रम के बारे में पूछा कि यह आश्रम किसका है? विश्वामित्रजी ने श्रीराम से कहा कि एक समय की बात है कि इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया, जिससे उससे बड़ा पाप हो गया। देवता और ऋषि-मुनि इन्द्र को पाप से मुक्त कराने के लिए उसे यहाँ ले आए और पवित्र जल को मंत्र से अभिमंत्रित कर उसे दे दिया। इन्द्र उस पवित्र जल के प्रभाव से पाप मुक्त हो गया। ये दो स्थान हैं इनमें पहला स्थान मलयुक्त है। यह मलद कहलाता है तथा दूसरा स्थान जो कलुष-कलित है वह करुश कहलाया। तत्पश्चात् विश्वामित्रजी ने श्रीराम को ताड़का राक्षसी के बारे में इस प्रकार बताया-
धरणि दाटक यनुदानवुरालु। करुलु वेयिंटिकि गल लावु गलिगि
पोलपोन्दु नी रेण्डु पुरमुलु सोच्चि। यलवुमै बाघिचु ननुडु राघवुडु
तेलुुगु श्रीरंगनाथ रामायण बालकाण्ड ७५०


इस पृथ्वी पर ताड़का नामक एक दानवी हजार हाथियों का बलवाली इन दो नगरों में प्रवेश कर अपनी सारी शक्ति से सबको सताती थी। यह सुनकर श्रीराम ने विश्वामित्रजी से पूछा कि इस दानवी को इतनी शक्ति किसने प्रदान की है। यह दुष्ट बुद्धिवाली दानवी किसकी पुत्री है? इतना पूछने पर विश्वामित्रजी ने कहा- प्राचीनकाल में इस पृथ्वी पर सुकेत नामक यक्ष ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की थी। उस यक्ष ने ब्रह्माजी के प्रसन्न होने पर एक पुत्र मांगा। ब्रह्माजी ने कहा मैं तुम्हें पुत्र नहीं दूँगा किन्तु हजार हाथियों का बल रखने वाली पुत्री का वर प्रदान करता हूँ। ब्रह्माजी के वरदान से उस यक्ष के यहाँ एक पुत्री (कन्या) का जन्म हुआ। कन्या के बड़ी होने पर उस यक्ष ने सुन्द नामक व्यक्ति से उसका विवाह कर दिया। उस स्त्री को दो भयंकर शक्तिशाली, मारीच और सुबाहु नामक पुत्र हुए। कुछ वर्षोपरान्त सुन्द की मृत्यु हो गई। तब वह सुकेत की पुत्री अगस्त्य के आश्रम में जाकर बार-बार ऋषि-मुनियों को भयभीत कर तथा उनके कार्यों में विघ्र पैदा कर उन्हें सताने लग गई। कलराज (अगस्त्य) ऋषि ने उस पाप कर्म करने वाली को देखकर क्रुद्ध होकर शाप दिया कि तू राक्षसी बन जा।
उस समय से ही यह राक्षसी का रूप धारण कर निर्दयता से मानवाहार कर रही है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर रहने वाले इससे बड़ा कष्ट प्राप्त कर रहे हैं। विश्वामित्रजी ने श्रीराम से कहा- हे राम! तुम्हारे अतिरिक्त इसका कोई अन्य वध नहीं कर सकता है। पूर्व काल में सारे संसार को मार डालने का विचार करने वाली मंथरा नामक प्रगल्भा स्त्री को जो कि सम्पन्न जाति के विरोचन की पुत्री थी क्या इन्द्र ने उसे नहीं मार डाला? पूर्व में दृढ़ व्रत वाली भृगु पत्नी ने लोकों को दु:खी एवं अशान्त बनाकर नष्ट करने का मन में विचार किया तो क्या विष्णु ने स्वयं ईर्ष्यालु होकर उसे नहीं मारा था? हे राम! लोकहित के लिए ताड़का वध पुण्य ही है। इतने में ताड़का (दानवी) अधिक भयंकर बनकर उन सब पर पत्थरों की वर्षा करने लगी। यह देखकर श्रीराम ने उन पत्थर शिलाओं के साथ-साथ उसके दोनों हाथ दिव्य शस्त्रों से काट डाले। उसी समय लक्ष्मणजी ने ताड़का की नाक और कान काट डाले मानो वह यह संकेत देना चाहते थे कि मैं असुरेश (रावण) की बहन की यही दुर्दशा करूँगा। ताड़का माया रूप धारण कर अपने अस्त्रों की वर्षा करने लगी तब विश्वामित्रजी ने श्रीराम से कहा- हे अनध! संध्याकाल निकट आ रहा है, संध्या के समय राक्षसों को जीता नहीं जा सकता। अब तुम दया की भावना त्याग कर सबके हितार्थ इसे मार डालो। अन्त में श्रीराम ने शब्दवेधी बाणों से उस राक्षसी की तुच्छ माया का दमन कर अंत में एक महान अस्त्र से उसका वध कर दिया।
गिलहरी (चिकुरी-तरुमूषिक) द्वारा सेतुबंध में
सहायता तथा उसे श्रीराम का आशीर्वाद

श्रीराम लंका विजय हेतु समुद्र पर सेतु निर्माण का कार्य करवा रहे थे। वानर बड़े-बड़े पहाड़ों से शिलाखण्ड उठा-उठा कर तथा बड़े-बड़े वृक्षों को लाकर नल के हाथ में दे रहे थे। नल के हाथ का स्पर्श होते ही पत्थर समुद्र पर तैरने लगते थे सेतु का कार्य बड़ी ही कुशलता तथा शीघ्रता से आगे बढ़ रहा था। श्रीराम और लक्ष्मण सेतु के पास खड़े होकर इस निर्माण का बड़ी सूक्ष्मता से निरीक्षण कर रहे थे कि-
गोब्बुन सेतुव गोनसागवलयु:। निब्बल्लिदुलकु दोडेनु गाविंतु
ननुचु श्रीरामुनि यडुगुदामरलु। मनमुन जेर्चि यामनुजेशुनेदुर
तेलुगु श्रीरंगनाथ रामायण युद्धकाण्ड ११००


इस अवसर पर एक गिलहरी यह सोचकर कि 'शीघ्रता से सेतु बंधन का कार्य हो जाना चाहिए। इन बलवानों की मैं भी सहायता करूँगी।Ó श्रीराम के चरण-कमल को मन में रख कर मनुजेश्वर श्रीराम का स्मरण कर उस गिलहरी ने बड़ी श्रद्धा-आस्था के साथ समुद्र में गोता लगाया और फिर समुद्र तट पर आकर बालु रेत पर लौट लगाने लग गई फिर सेतु के पास गई और अपने शरीर पर लगी हुई बालु रेत को झटका देकर गिराने लगी। गिलहरी ने ऐसा बार-बार किया। श्रीराम की दृष्टि उस गिलहरी पर गई तो उन्होंने कहा- देखो लक्ष्मण! यह नन्ही सी गिलहरी अपनी शक्ति के अनुसार सेतु निर्माण में सागर तट की बालु रेत को सेतु तक पहुँचाकर मेरी सहायता कर रही है। श्रीराम ने सुग्रीव से कहा कि-
देम्मन्न वेगंबेतेच्चि सुग्रीवु। डम्माहत्युनि चेतिकंदियिच्चुटयु
बलुतेरंगुल दानि ब्रस्तुति सेसि। कलित दक्षिण कराग्रमुन दुव्वुटयु
तेलुगु श्रीरंगनाथ रामायण युद्धकाण्ड १११३-१११४


बड़े प्रेम से इस गिलहरी को मेरे पास ले आओ। सुग्रीव उस गिलहरी को पकड़कर श्रीराम के पास ले आए और उनके हाथों में दे दिया। श्रीराम ने गिलहरी की प्रशंसा की और अपना दाहिना हाथ उसकी पीठ पर फेरा। उसके पश्चात् उसे वहाँ सुन्दर स्थान पर छोड़कर आने का कहा।
आज भी श्रीराम के आशीर्वाद फलस्वरूप गिलहरी की पीठ पर तीन अँगुलियों के चिह्न (निशान) तीन श्वेत रेखाओं (धारियों) के रूप में दिखाई देते हैं।
गिलहरी के कथा-प्रसंग से हमें हमेशा दूसरों की निस्वार्थ सहायता करने का संकल्प लेना चाहिए। नि:स्वार्थ सहायता का फल ईश्वर हमें भविष्य में किसी न किसी रूप में दे देता है।
भरत का विचित्र स्वप्न
यह प्रसंग उस समय का है जब रावण के शक्ति के आघात से लक्ष्मणजी मूर्च्छित हो गए थे तथा उनके लिए हनुमानजी संजीवनी औषधि पहाड़ सहित लेकर आकाश मार्ग से अयोध्या नगरी के ऊपर से जा रहे थे।
भूचर खेचराद्भुतवेगुडगुचु। नाचंदमुन बोवना मध्यरात्रि
भामित्र-मित्रुलु भरतु स्वप्नमुन। रामसौमित्रुलु रणमध्यमुननु
दलनूनियल तोड दनुवलुऽस्सि। बलहीनुलै क्रुस्सि पॅकमध्यमुन
बडि पलविचुचु बहुरोदनंबु। लुडुगक काविंचुचुन्न बिट्टुलिकि
तेलुगु श्रीरंगनाथ रामायण युद्धकाण्ड ६८४०


भूधर तथा खेचरों के लिए अद्भुत वेग वाला होता हुआ उस प्रकार जा रहा था। उस मध्य रात्रि के समय, भरत को स्वप्न में श्रीराम और लक्ष्मण रण मध्य में सिर पर तेल लगाए हुए, शरीर से थककर, शक्तिहीन होकर कीचड़ के बीच में पड़े होकर बुरी तरह रोते-बिलखते हुए दिखाई पड़े तो भरतजी चौंक पड़े तथा इस दु:ख स्वप्न से चिन्तित हो गए। स्वप्न में यह दृश्य देखकर वे श्रीराम-लक्ष्मण के विधि के विधान के बारे में सोचकर आकुल-व्याकुल हो गए। जागने पर उनको इन अपशकुन (दुश्शकुनों) को देखकर भयभीत हो गए तथा उन्हें लगा कि यह कैसा पाप है? यह कैसा विधि का विधान है। अब आगे यहाँ होने वाला है। पता नहीं कि अरण्यमध्य में श्रीराम-लक्ष्मण को क्या हुआ होगा? जानकीजी का क्या हुआ होगा? गणना करने पर चौदह वर्ष पूर्ण होने को आ रहे हैं किन्तु श्रीराम के बारे में एक भी समाचार सुनने में नहीं आया।
उन सत्यघनों का, उन उदार (पुरुषों) का, उन सदाचार सम्पन्नों का, उन कृतार्थों का कोई बुरा न हो, ऐसा मैंने अपना पुण्यफल आज देता हूँ। ऐसा सोच विचार कर भरतजी ने वेदपाठी ब्राह्मणों को अतिशीघ्र बुलाकर विधि-विधान से दान, यज्ञ और विघ्र की शान्ति हेतु अनेक कर्म कराएं।


इतने में हनुमान्जी आकाश मार्ग से बाल सूर्य के सम आकर बड़ी निष्ठा से भरतजी के नन्दिग्राम में आ पहुँचे। हनुमान्जी को भरतजी घने जटाधारी तथा वल्कलों से युक्त घनश्याम वर्ण में श्रीराम की भाँति दिखाई पड़े। अति चकित होकर हनुमान्जी ने सोचा कि 'लक्ष्मण को मृत अवस्था में होने पर तथा जानकीजी को अकेला छोड़कर श्रीराम इधर कैसे आ सकते हैं? यह पूछूँ फिर नहीं पूछना ऐसा धैर्यपूर्वक वे मन में विचार करने लगे। बहुत सोच विचार के बाद यह विचार आया कि श्रीराम शरणागत प्राण संद्धर्भ-निरत है, अभिराम बलवान है। अपने सत्य (सूनृत) को छोड़कर, अपने नाम यश को छोड़कर प्लवग-पुंगव-कोटियो (समूहों) को युद्ध के मैदान में अकेला छोड़, रावण को प्राणों के साथ अर्थात् जीवित छोड़कर श्रीराम अपने सशरीर यहाँ कैसे हो सकते हैं?
हनुमान्जी के मन में अन्तर्द्वन्द्व हो उठा कि मानव सामान्य (साधारण मानव के समान) बुद्धिवाला जानकर मैंने श्रीराम को छोटी या अत्यन्त ही संकीर्ण दृष्टि से क्यों देखा। संभवत: श्रीराम से मिलता-जुलता कोई अन्य दूसरा तपोधनी यह है। लगता है ऐसा ही है। ऐसा सोच विचार करते हुए अतिवेग से लंका के मार्ग पर अतुल-बलोदात्त हो जाते रहने पर स्वप्न से जागे भरतजी ने आकाश की ओर देख अलघु हो जाते हुए हनुमान्जी को देख यह सोचा कि न जाने यह दुष्टग्रह ऐसा क्यों दिखाई पड़ा? पटु बाणों से इसे गिरा देना चाहिए। आटोप के बढ़ने पर शरचापों को उस धन सत्व वाले भरत को हाथ में लेते देख, काकुत्स्थकुल तिलक सुने ऐसी एक आकाशवाणी (अशरीरी) आकाश से हुई- 'इसकी ओर तुम हित-बुद्धिकरो (मित्रभाव रखो) यह तुम्हारा बन्धु (हितचिन्तक) है। तुम क्रुद्ध मत हो। ऐसी सुन्दर आकाशवाणी को सुनकर उस महान् भरतजी ने शरचाप छोड़ दिए।--


डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता
'मानसश्री’, मानस शिरोमणि, विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर
सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर,
ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)
Email : drnarendrakmehta@gmail.com
पिनकोड- ४५६ ०१०

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