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होली का परिचय - ज्ञानदेव मुकेश

रंगोत्सव होली के पावन पर्व पर विशेष रचना -


होली का परिचय

शर्मा जी दरवाजे की कील चढ़ाकर घर के अंदर दुबके हुए थे। बाहर होली के हुड़दंगियों की टोली शोर मचा रही थी। वे ढोल बजाते हुए चिल्ला रहे थे, ‘‘बाहर आओ! बहर आओ!!’’

आवाज सुनकर शर्मा साहब की घिग्घी बंधने लगी थी। पत्नी ने यह देखा तो उन्हें झकझोरा, ‘‘बच्चों वाला हाल क्यों किए हुए हो ? आज होली है। रंग में डूबने बाहर जाओ।’’

मगर शर्मा जी से टस-से-मस नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने खिड़की से उन्हें देखा है। मैं उनमें से किसी को भी नहीं जानता। मुझे और भी डर लग रहा है।’’

पत्नी नाराज होने लगा, ‘‘बाहर निकलो तो सही। सारा डर निकल जाएगा।‘‘

वे पति को जबरदस्ती दरवाजे तक ले गयीं और हुड़दंगियों के सामने दरवाजा खोल दिया। कुछ हुड़दंगी अंदर घुस आए और शर्मा जी को खींचकर बाहर ले गए। वे बाहर लॉन में पहुंचे नहीं कि उनपर कई दिशाओं से रंगों की वर्षा होने लगी। वे तुरंत सर से पांव तक रंगों में सराबोर हो गए। शर्मा जी अभी भी एक अजनबी की तरह खड़े थे। उन्होंने पूछा, ‘‘भाइयों, आप लोग कौन हैं ? मैंने किसी को पहचाना नहीं। अपना परिचय तो दीजिए।’’

इसपर सभी ठठाकर हंसने लगे। एक हुड़दंगी ने कहा, ‘‘अरे भाई, आज होली है। आज कोई छोटा है न कोई बड़ा। न कोई पास का, न कोई दूर का। आज हम सभी एक ही रंग में रंगे प्रेमी-हृदय मनुष्य मात्र हैं। समझ लीजिए, आज का इतना ही परिचय काफी है।’’

सभी में रंगों का एकापन पाकर शर्माजी का डर अब निकल चुका था।


- ज्ञानदेव मुकेश

पता-

फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,

अल्पना मार्केट के पास,

न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी,

पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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