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व्यंग्य - कुर्सी पूजा - हनुमान मुक्त

वे सोफे पर अधलेटे थे। सामने टीवी पर कोई फिल्म चल रही थी। वे दत्त चित्त होकर फिल्म का आनंद ले रहे थे।

बीच-बीच में विज्ञापन आने पर वे चैनल बदल लिया करते थे। जिससे उनके कानों में देश में क्या हो रहा है की आवाज पड़ जाती थी ।मजा उन्हें फिल्म देखने में आ रहा था। कभी-कभी कोई विज्ञापन भी फिल्म जैसा दिखता तो भी वे चैनल नहीं बदलते थे।

सामने तश्तरी में ड्राई फ्रूट्स रखे थे उन्हें भी बीच-बीच में खाते जा रहे थे।

मैं चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ गया। टीवी पर विज्ञापन आने पर उनका ध्यान भंग हुआ ।मेरी और देख कर मुस्कुराए। सामने तश्तरी में से काजू और बादाम गिरी उठाकर मुंह में डाली। बोले," क्या बात है ?कैसे कष्ट किया?

मैंने कहा," बस आपके हाल चाल जानने चला आया। उम्र बढ़ती जा रही है इसलिए हाल जानना जरूरी है। चाल कौन सी चल रहे हैं ।यह तो आप जाने और आपका काम।"

मुंह में डाले काजू बादाम हलक से नीचे उतर चुके थे उन्होंने तश्तरी में रखे ड्राइफ्रूट्स उठाए। निगाहें सामने टीवी पर डाली। विज्ञापन खत्म हो चुके थे। फिल्म शुरू हो गई थी ।

बोले ,"आपको करीब डेढ घंटे इंतजार करना पड़ेगा ।डेढ़ घंटे की फिल्म बाकी है। मैं नियम पूर्वक रोजाना दो फिल्में देखता हूं। एक दिन में और एक रात में।

कोई भी फिल्म मैं अधूरी नहीं छोड़ता ।अधूरी छोड़ने से सारा मजा किरकिरा हो जाता है। इसलिए आप शांति से चुपचाप बैठे ।"

वे अपने महत्वपूर्ण कार्यक्रम में लग गए ।मैं उन्हें इस का आनंद लेते देखता रहा ‌फिल्म डेढ़ घंटे की 1 घंटे में ही समाप्त हो गई। उनका आकलन ठीक नहीं था ।आकलन पर बुढ़ापे का असर दिखने लगा था ।

वे फिर से उठे और कहने लगे," माफ कीजिए !आपको इंतजार करना पड़ा ।दरअसल बात यह है कि मैं नियम का बड़ा पाबन्द हूं। रोज सुबह 1 घंटे मॉर्निंग वॉक पर जाता हूं ।आकर योगा करता हूं ।इसके बाद नाश्ता लेता हूं। नाश्ते के बाद अपने जैसे लोगों से मुलाकात करता हूं और मुलाकात के बाद कुर्सी की पूजा करता हूं।"

"कुर्सी की पूजा" मैं समझा नहीं मैंने कहा ।

वे मकान के अंदर ले गए। वहां बाहर से मंदिर नुमा बने कमरे के दरवाजे को खोलकर बोले" देखो मैं इस कुर्सी की रोजाना पूजा करता हूं ।"

कुर्सी अत्यंत भव्य थी। उस पर चंदन ,अक्षत रोली ,मोली आदि पूजोपचार सामग्री पड़ी हुई थी। पास ही आरती की थाली रखी थी। दीपक जल रहा था। अगर बत्तियों की खुशबू से सारा कमरा महक रहा था।

मैंने भी श्रद्धा पूर्वक कुर्सी देवी को हाथ जोड़े। मत्था टेका।

मुझे इस प्रकार मत्था टेकते देख वे हड़बड़ाए

और बोले," तुम ऐसा क्यों कर रहे हो ?कुर्सी की पूजा करने का हक सिर्फ मुझे है। अन्य को नहीं।"

चलो !वहीं चलते हैं। यह कहते हुए वे मुझे ड्राइंग रूम में ले आए।

मैंने कहा," आप अभी तक कुर्सी की पूजा करते आ रहे हैं। बड़े आश्चर्य की बात है‌ आपका बुढ़ापा आ गया है। अब तो कुर्सी मोह छोड़ो।"

मेरी बात सुनकर उनका मुंह का कसैला हो गया ।उन्होंने सामने रखी तश्तरी में से किशमिश उठाकर अपने मुंह में डाली ।मुंह का स्वाद बदला।

बोले," यह कुर्सी मोह नहीं है। यह कुर्सी के प्रति वफादारी है। पार्टी के प्रति वफादारी है। जिस पार्टी को बरसों से सींचकर यहां तक पहुंचाया है। जिस कुर्सी को पाने का जवानी के दिनों से सपना देखता रहा हूं। उस सपने से कैसे अपने आप को अलग करूं। यह मेरी हर सांस में समा चुका है। तुम नहीं समझोगे।"

"वह सब तो ठीक है लेकिन वे कह रहे हैं कि नए लोगों को ही पार्टी में जिम्मेदारी दी जाएगी ।सत्ता में जिम्मेदारी दी जाएगी। इसके बावजूद भी आप आस लगा कर बैठे हैं।"

उन्होंने अपना बाया हाथ अपने गंजे सर पर फेरा ।लंबी गहरी सांस ली।

बोले," जब तक सांस है तब तक आस है ।अभी उनको समझ नहीं है इसलिए ऐसी बातें कर रहे हैं ।वे भी हमारी उम्र के होंगे तब उनके साथ भी ऐसा ही होगा। जैसा हमारे साथ हो रहा है। वे यह क्यों भूलते हैं कि बहू भी कभी सास बनेगी ।"

"बहू भी कभी सास बनेगी "यह कौन सा सीरियल है? मैं बोला।

" मजाक मत करो ।मैं कहावत कह रहा हूं ।उन्हें थोड़ा बहुत समझना चाहिए। नए लोगों के पास सारी जिंदगी पड़ी है ।कभी भी मौका मिल सकता है ।हमारे बारे में थोड़ा बहुत तो सोचना चाहिए। इस प्रकार सब्जी में से मक्खी की तरह बाहर निकाल देना कहां तक ठीक है? हमारा भी जी करता है। स्वाद लेने का ।वैसे भी मैं तो अभी तक पूरी तरह स्वस्थ हूं। मेरी प्रत्येक इंद्रिय पूरी तरह काम कर रही है। किसी में कोई शिथिलता नहीं है रोजाना बेनागा फिल्म देखता हूं। कसरत करता हूं। योगा करता हूं ।"

वे और कुछ कहते उससे पहले ही मैं बात काटते हुए बोला ,"आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं ।आप की कुर्सी की चाहत आपको चुस्त-दुरुस्त बनाए हुए हैं ।आपकी दिनचर्या को नियमित बनाए हुए हैं।"

"अगर आप जैसे उम्रदराज लोगों को कुर्सी पर बैठाया जाएगा तो एंबुलेंस और स्ट्रेचर हमेशा उनके साथ रखनी होगी ।उन्हें गाड़ी से उतारने वाले कंधे पकड़ पकड़ कर धीरे धीरे ले जाने वाले हमेशा साथ रखने होंगे बल्कि इन कामों को करने के लिए अलग से विभाग बनाना पड़ेगा। उन्हें स्पेशल ट्रेनिंग देनी होगी ।यह कहां तक ठीक है ?"

"तुम तो ऐसी ही बातें करोगे। तुमसे अच्छी बातों की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है ?अगर हम जैसे बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ लेने के लिए अलग से विभाग खोलना भी पड़े। लोगों की भर्ती करनी पड़े ।उन्हें ट्रेनिंग देनी पड़े तो इसमें क्या बुराई है? नया नौ दिन पुराना सौ दिन ।"

"मतलब! क्या कहना चाहते हो?" मैं बोला।

"तुम अपने काम से काम रखो मेरे हाल जानने आए हो या मेरा इंटरव्यू लेने। इतनी देर से बकबक कर रहे हो ।मेरे जले पर मरहम लगाने की बजाय नमक छिड़क रहे हो। मेरा अब स्वाध्याय करने का समय हो गया है ।मुझे अकेला छोड़ दो।"

उनको परेशान करने का मेरा कोई मानस नहीं था। मैं तो उनका मन बहलाने आया था। वे ही बहलने लग जाएंगे ।मुझे पता नहीं था ।

बात का विषय बदलते हुए मैं बोला, "आप अपनी आत्मकथा कब लिख रहे हैं ?

सुनकर उन्हें अच्छा लगा।

बोले," उसी पर काम चल रहा है । बायोग्राफी ही पढ़ रहा हूं। कुछ ही दिनों में अपनी शुरू करने वाला हूं ।कोई अच्छा सा डिक्टेशन लिखने वाला चाहिए ।हाथ कुछ कम काम करता है। लिखने पर हिलता है। साफ-साफ लिखने में नहीं आता ।एक ही लाइन को लिखने में बहुत समय लगता है ।कोई अच्छा सा लड़का तुम्हें मिल जाए तो बताना जो अच्छे ढंग से तेजी से काम कर सके।"

" लिखने की जरूरत कहां है ?आजकल तो सब कुछ लैपटॉप पर किया जाता है। आप भी उसी पर कर लीजिए ।"मैं बोला ।

"तुम सही कह रहे हो। यह नए जमाने की चीजें हैं। हम पुराने जमाने के लोग हैं। लैपटॉप पर टाइप करना हमसे नहीं आता। न ही अच्छे से बोलना आता है । लैपटॉप चलाना भी कम ही आता है। हम तो सिर्फ काम चला लेते हैं। यदि तुम मेरी बायोग्राफी लिख सको तो अच्छा रहेगा। वैसे तुम मुझे अच्छी तरह से जानते ही हो।"

" बायोग्राफी तो व्यक्ति स्वयं लिखता है। मैं भला आप की बायोग्राफी कैसे लिख सकता हूं। "

" सब चलता है ।इस उम्र में हमसे यह कैसे लिखी जाएगी। हम डिक्टेट करवाएंगे तो उसके लेखक हम ही तो कहलाएंगे।"

मैं ज्यादा बहस करने के मूड में नहीं था।

" आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूंगा। आप तो अपने अनुभवों को टुकड़ों में लिखना शुरु कर दो। बुजुर्गों के अनुभवों से नई पीढ़ी को लाभ मिलता है ।आपके अनुभवों को मैं सिलसिलेवार जमा कर आपकी बायोग्राफी का नाम दे दूंगा। बस आप तो कुछ ने पुराने पटाखों को इकट्ठा करना शुरू कर दो। मैं बम बना दूंगा।"

पटाखों की बात सुनकर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

" ठीक है अब तुम जाओ। मैं बेतरतीब बिखरे पड़े पटाखों को इकट्ठा करने का काम पूरा करता हूं। जल्दी ही हम मिलकर मेरी बायोग्राफी लिखेंगे।"

मैं उन्हें अभिवादन कर फुस्स पटाखों से बम बनाने का फार्मूला सोचता हुआ घर लौट आया।

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@हनुमान मुक्त

93, कांति नगर

गंगापुर सिटी जिला सवाई माधोपुर

राजस्थान

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