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महाराजा सयाजीराव : चरित्रसंपन्न, अनासक्त और संप्रभु राजा लेखक - बाबा भांड अनुवादक - डॉ. विजय शिंदे

महाराजा सयाजीराव : चरित्रसंपन्न, अनासक्त और संप्रभु राजा

लेखक - बाबा भांड

अनुवादक - डॉ. विजय शिंदे

पिछले ढाई साल से इस प्रोजेक्ट के प्रमुख के नाते बाबा भांड काम कर रहे हैं और फिलहाल 26 खंड प्रकाशित हुए हैं। मराठी, हिंदी और अंग्रेजी भाषा के भीतर महाराजा सयाजीराव की साधन सामग्री प्रकाशित हो रही है। इसमें हिंदी के खंडों को लेकर डॉ. विजय शिंदे की जिम्मेदारी है। इस महीने के अंत तक हिंदी के 12 खंड प्रकाशित हो रहे हैं और एक-एक खंड 500 से 600 पन्नों का है। 'महाराजा सयाजीराव - गौरवगाथा युगपुरुष की' इस ग्रंथ में कई विद्वानों के आलेख हैं। यह आलेख महाराजा सयाजीराव की चरित्रसंपन्न, अनासक्त और संप्रभुता पर प्रकाश डालता है। 11 मार्च को महाराजा की जयंती थी।


छत्रपति शाहू महाराजा के कालखंड में बड़े बाजीराव की मराठी सेना ने दिल्ली तक कूच किया था। उस समय मराठी सेना के सेनापति खंडेराव दाभाडे ने गुजरात में मौजूद मोगलों को सीधे काठीवाड तक पीछे धकेलने की शूरता दिखाई थी। उस समय उनके साथ दमाजीराव गायकवाड एक मराठा सरदार थे। वे पुणे जिले हवेली तहसील के भरे गांव के थे। आगे चलकर वे खेड तहसील के दावडी गांव में रहने के लिए गए। उनके वंश के आरंभिक पुरुष का नाम नंदाजी था। वे भोर रियासत में किलेदार थे। सन 1720 को राक्षसभुवन की लड़ाई में मराठों ने निजाम को पराजीत किया था। मराठी सेना के साथ नंदाजी का पोता दमाजी गायकवाड भी था। दमाजी की बहादुरी को देखकर महाराजा शाहू ने दमाजी को शमशेर बहादुर किताब बहाल किया। इसके बाद खंडेराव दाभाडे इस मराठी सेना के सेनापति ने गुजरात के मोगलों का पराजय करते हुए उन्हें काठीवाड तक भागने के लिए मजबूर किया। इस जीत में उनके साथ दमाजीराव गायकवाड के बेटे पिलाजी की मौजूदगी थी। सन 1720 में पिलाजीराव ने मोगलों के कब्जेवाले सोनगढ़ पर जीत हासिल की। पहाड़ पर किला बनाया और यहीं से गायकवाड परिवार की सत्ता की स्थापना गुजरात में हुई। आगे चलकर पिलाजीराव ने गुजरात में बडोदा तक मराठी सत्ता का विस्तार किया। और बडोदा रियासत में गायकवाडों के राज्य का आरंभ हुआ।

उस कालखंड में विदेशों से अंग्रेजी व्यापारी हिंदुस्तान में व्यापार करने के लिए आ रहे थे। उनके द्वारा व्यापार हेतु ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापन की गई और कंपनी ने हिंदुस्तान के तटीय इलाकों में धीरे-धीरे पैर फैलाना शुरू किया। वैसे ही उनका विस्तार गुजरात में भी होने लगा। गायकवाडों की भी सत्ता गुजरात में विस्तारीत हो रही थी। समय-समय पर इन दो सत्ताओं के बीच संघर्ष भी होता रहा। सन 1779 में पेशवों की गुजरात में अंग्रेजों के ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ लड़ाई हो गई। उस समय बडोदा के तत्कालीन महाराज फत्तेसिंह गायकवाड ने ब्रिटिश जनरल गार्ड के साथ दोस्ती का एक कदम आगे बढ़ाया था। पेशवों के विरोध में एक मराठी सरदार हमें मदद कर रहा है यह ईस्ट इंडिया कंपनी के चालाक अधिकारियों ने पहचान लिया। ब्रिटिशों ने एक देशी मछली हमारे जाल में फंस रही है यह देखकर इस मौके का तुरंत लाभ उठाते हुए बडोदा रियासत की ओर दोस्ती और सहयोग हेतु पहल की।

बडोदा और इंडिया कंपनी में दोस्ती के समझौते का अनुबंध –

बडोदा के महाराजा आनंदराव गायकवाड और ईस्ट इंडिया कंपनी में 6 जून 1802 में दोस्ती का अनुबंध बनाया गया। इस समय बडोदा में दीवान के नाते रावजी अण्णाजी फणसे कार्य देख रहे थे। इस अनुबंध से बडोदा शासन और ईस्ट इंडिया कंपनी दोस्त बन गए। आगे पानीपत की लड़ाई के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार ब्रिटिश शासन के हाथों में आ गए। इसमें मूल सन 1802 के अनुबंध को जैसे के वैसे मान्यता दी गई। मुंबई के गर्वनर माऊंट स्टूअर्ट एल्फिस्टन स्वयं 2 अप्रैल 1820 में बडोदा आए। उस समय दूसरे सयाजीराव को गर्वनर ने कहा था कि "मैं आपको स्वतंत्रता के साथ राजकाज करने का संपूर्ण अधिकार देने हेतु आया हूं।" इसके पहले 1818 में मराठा साम्राज्य की पराजय हुई और संपूर्ण देश में ब्रिटिश सत्ता का अमल शुरू हुआ था। सन 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी की संपूर्ण सत्ता ब्रिटिश सरकार के पास सपूर्द की गई। भारत की छोटी-बड़ी 565 रियासतें ब्रिटिश शासन के अधीनस्थ हो गई थी। लेकिन सन 1802 और सन 1818 में बडोदा और ब्रिटिश शासन के बीच दोस्ती के मूल अनुबंध को जैसे के वैसे स्वीकारा गया था; अतः इसका अर्थ यह होता है कि बडोदा रियासत ब्रिटिशों शासन की दोस्त थी।

बडोदा राजगद्दी के उत्तराधिकारी की खोजबिन –

बडोदा में महाराजा खंडेराव का शासन था। महारानी जमनाबाई को कोई बच्चा नहीं था। दुर्भाग्य से छोटी बीमारी के चलते सन 1870 में महाराजा खंडेराव का स्वर्गवास होता है। उनके भाई मल्हारराव राजगद्दी पर विराजमान हो जाते हैं। लेकिन महाराजा खंडेराव के स्वर्गवास के समय महारानी जमनाबाई गर्भवती थीं। मल्हारराव में राजकाज के गुण मौजूद नहीं थे। उन्होंने खंडेराव के नजदीकी और भरोसेमंद लोगों को तकलीफ़ देना आरंभ किया। राज्य की प्रजा का जुल्म और शोषण करना शुरू किया। अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार और अराजकता बढ़ती गई। इसी दौरान महारानी जमनाबाई की प्रसूति हुई और उन्हें कन्या पैदा हो गई तो मल्हारराव अत्यधिक खुश हुए। चार सालों के भीतर ही भीतर बडोदा में अराजकता का माहौल बना था। महारानी जमनाबाई बार-बार ब्रिटिश गर्वनर जनरल के पास इसकी शिकायत करती रही। आखिरकार 13 जनवरी 1875 में मल्हारराव को ब्रिटिशों ने पदच्यूत किया। महारानी जमनाबाई को दत्तक पुत्र लेने की इजाजत दी गई। लेकिन शर्त यह रखी गई थी कि वह दत्तक पुत्र गायकवाड वंश का हो और किशोरावस्था का हो। बडोदा में गायकवाडों के वंश में चार बच्चे थे; लेकिन उनमें से एक तीस, दूसरे दो अठ्ठाईस और चौथा पच्चीस वर्ष का था। महारानी जमनाबाई की उम्र उस समय बाईस साल की थी। इसलिए बडोदा के बाहर गायकवाड वंश की खोजबिन शुरू हुई। मालेगांव के नजदीक कवलाने गांव में पानिपत के युद्धोपरांत प्रतापराव गायकवाड वंश के काशीराव खेती कर रहे थें। यह जानकारी नासिक के कलेक्टर ने प्राप्त की थी। कवलाने के चार बच्चों में से गोपाल (गोपाळ) का दत्तक पुत्र के नाते चुनाव हो गया। 27 मई 1875 को गुरुवार के दिन दत्तक विधि और राज्य का उत्तरराधिकारी विधि संपन्न होकर तीसरे सयाजीराव के नाते महाराजा राजगद्दी पर विराजमान हो गए।

निरक्षर राजा का लिखना, पढ़ना और राजनीतिक शिक्षा का आरंभ हो गया। केशवराव पंड़ित और भाऊ मास्तर ने राजा की शिक्षा का आरंभ किया। दीवान टी. माधवराव ने अंग्रेजों के पास अंग्रेजी अध्यापक की मांग की। वर्‍हाड प्रांत के शिक्षा विभाग के संचालक मिस्टर एफ. ए. एच. इलियट इस युवा अधिकारी की अध्यापक के नाते नियुक्ति हो गई। उन्होंने 10 दिसंबर 1875 में कार्यग्रहण किया। इलियट उत्साही व्यक्ति थे। उनके प्रसन्न चेहरे पर बुद्धिसंपन्नता की झलक थी। आते ही उन्होंने साथी अध्यापकों के सहयोग से सयाजीराव के लिए सुनियोजित पाठ्यक्रम का निर्माण किया। ब्रिटिश पब्लिक स्कूल के प्रणाली की योजना तैयार की गई। बारह वर्ष उम्रवाले सयाजीराव की नया सीखने की संकल्पनिष्ठता और समझने की दृढ़ता देखकर इलियट को अत्यधिक खुशी हुई। इस हीरे को चमकाने का और विविध आयामों से विकसित करने का कार्य आगे छः सालों तक लगातार जारी रहा। अक्षर-अंक की पहचान करते-करते एक संवेदनशील किशोर उम्र का राजा निर्माण होता रहा।

बडोदा साम्राज्य की संप्रभुता का बीजारोपण –

अठारवें साल में बडोदा का राजकाज अपने हाथ में लेने के पश्चात सयाजीराव को गुरु इलियट ने बडोदा राज्य के इतिहास का अच्छे से आकलन करवाया। पेशवों के विरोध में मदत करनेवाले गायकवाडों के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी ने बडोदा रियासत के साथ दोस्ती और सहयोग की प्रथम पहल की थी। इससे आगे चलकर 6 जून 1802 में ईस्ट इंडिया कंपनी और बडोदा के राजा आनंदराव गायकवाड के बीच दोस्ती का अनुबंध हुआ था। इस अनुबंध से ब्रिटिश कंपनी और बडोदा मित्र हुए थे। इस अनुबंध में दो-तीन बार सुधार करके सन 1818 में उसे स्थायी स्वरूप दिया गया था। इसमें दो बातें अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। बडोदा की संप्रभुता संपन्न होना लेकिन ब्रिटिशों की मित्रता के साथ। हिंदुस्तान की छोटी-बड़ी 565 रियासतें ब्रिटिश शासन के अधीनस्थ बन गई थी; लेकिन बडोदा शासन मूल अनुबंध के तहत ब्रिटिशों के लिए संप्रभु स्वतंत्र मित्र रहे। यह बात इलियट ने महाराजा सयाजीराव के दिलों-दिमाग पर अंकित की थी; अतः इस महाराजा ने इसे हमेशा याद रखा और ताकतवर ब्रिटिश शासन के साथ संघर्ष करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों के समर्थक बन गए। महाराजा सयाजीराव स्वतंत्र और संप्रभु राजा है यह आगे चलकर सन 1912 लंदन हायकोर्ट और वहां के सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय में घोषित किया था, यह अत्यधिक अहं बात महाराजा सयाजीराव के चरित्र संपन्नता राजा होने के दूसरे पहलू को उजागर करती है।

जनसेवा और जरूरतमंदों को दान करके मोक्ष प्राप्ति खोजनेवाला राजा –

आजादी के पूर्व जनता की मेहनत पर अपने शौक और धन-संपत्ति का मजा लूटने वाले राजाओं की बहुत अधिक संख्या थी; लेकिन उसके लिए अपवाद सयाजीराव थे। इस राजा ने अबकारी (महसूल) विभाग की ओर जिस प्रकार से ध्यान दिया उससे कई गुना अधिक ध्यान राजमहल और उसके आस-पास के खानगी विभाग के खर्चे में कटौती करके राज्य के कोषागार को मजबूत किया। इसलिए कुछ लाखों में नुकसान में चल रहा बडोदा राज्य पच्चीस वर्षों के भीतर ही भीतर दुनिया के चुनिंदा अमीर राज्यों में गिना जाने लगा। दुनियाभर में सातवें नंबर का अमीर राज्य के नाते उसकी गिनती हो गई। इस संपन्नता के उपयोग से जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य कृषि और उद्योग में जितनी मदद की जा सकती है उससे कहीं अधिक देशभर के जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति देकर की है। इसमें डॉ. बाबासाहब आंबेडकर, विट्ठल रामजी शिंदे जैसे हजारों विद्यार्थियों का समावेश होता हैं। इन विद्यार्थियों को उस कालखंड में 89 कोटी रुपयों की छात्रवृत्तियां देनेवाले अकेले दानवीर महाराजा सयाजीराव थें। इतना ही नहीं तो वे अपने अछूत-पीछड़े समाज के उत्थानार्थ हिंदुस्तान में कानून बनाकर अमल करनेवाले सुप्रशासक भी थे। साहित्य, कला, संगीत, शिल्पकला यह राष्ट्र की संपत्ति है। इस संपत्ति का संवर्धन-संरक्षण करना राजा का ही कर्तव्य हैं मानकर सैकडों कलाकार, साहित्यकार और प्रतिभासंपन्न लोगों की मदद करके वे सांस्कृतिक विरासत के पोषणकर्ता भी बने हैं। राजा स्वयं साक्षर और शिक्षित बनकर लोककल्याण के जुनून से अगर प्रयासरत है तो ही जनता का भला कर सकता है, मदत कर सकता है इसको पहचाननेवाले सयाजीराव स्वयं प्रज्ञावंत राजा थे। लक्ष्मी और सरस्वती का इकट्ठा निवास हो और उन दोनों का बड़ी शांति के साथ जहां निवास रहा ऐसे छत्रपति शिवाजी महाराजा के बाद वे अकेले राजा थें।

सयाजीराव : चरित्रसंपन्न, अनासक्त और संप्रभु राजा

महाराजा सयाजीराव अनासक्त और चरित्रसंपन्न राजा थे। जिस कालखंड में राजा का राजमहलों में जनता के पैसों और सत्ता के नशे में चूर होकर अनैतिक कार्यों के साथ शराब और ऐशोआराम से मौजमस्तीवाली शानोशौकत भरे जीवन का दौर था उस समय सयाजीराव इन आकर्षणों, मोह-माया से दूर रहकर जनसेवा में ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ने लगे थे। लंदन में मनोरंजन और मजा करने के लिए आनेवाले राजाओं को ऐसे ऐशो-आराम, मौजमस्ती के मोह में फंसाने का कार्य ईमेस्ट इमैन्यूअल स्टैथम पत्नी की मदद से कर रहा था। उसने अपनी पत्नी को सयाजीराव के पीछे लगा दिया था। लेकिन सयाजीराव स्त्री के लालच में फंसे नहीं और एक ग्राहक अपने हाथ से फिसलते देख गुस्से में आग-बबूला हो चुके स्टैथम ने सयाजीराव के वकील के मार्फत नोटिस भेजा। उसमें लिखा कि "आपके मेरी पत्नी के साथ अनैतिक संबंध है इसलिए मैं सिविल न्यायालय में अर्जी करके डाइवोर्स (तलाक) की मांग करनेवाला हूं। इस मामले में अगर आप अपनी बदनामी नहीं चाहते हैं तो कुछ हजार पाउंड मुझे देकर मामले पर उपाय कर सकते हैं।" महाराजा सयाजीराव चरित्रहनन की ऐसी धमकी से नहीं डरे। उन्होंने कहा कि "तुम्हें जो करना है वह कर सकते हो।" स्टैथम ने लंदन के सिविल न्यायालय में पत्नी के विरोध में डाइवोर्स का मामला दाखिल किया। मेरी पत्नी और सयाजीराव के अनैतिक संबंध है इसलिए मुझे उससे डाइवोर्स मिलना चाहिए। न्यायालय ने सयाजीराव को नोटिस भेजी। जैसे ही महाराजा को नोटिस प्राप्त हो गई तो तुरंत अपने वकील को कहा कि "न्यायालय में अर्जी करो कि बडोदा गायकवाड यह संप्रभु राजा है और उनके विरुद्ध दुनिया के किसी भी कोर्ट में दावा दर्ज नहीं किया जा सकता।" महाराजा के वकील ने वैसी अर्जी दी। सिविल न्यायाधीश ने इस डाइवोर्स के मामले को उच्च न्यायालय के पास भेज दिया। लंदन हायकोर्ट ने ब्रिटिश शासन और गायकवाड के नाम से नोटिस निकाली। महाराजा सयाजीराव के वकीलों ने हायकोर्ट में अर्जी की, "महाराजा सयाजीराव संप्रभु राजा है लंदन के नागरी कानून से उनकी संप्रभुता और स्वतंत्रता में बाधा उत्पन्न नहीं की जा सकती है, अतः आगे किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा सकती।"

लंदन न्यायालय केस क्रमांक 92 से ब्रिटिश शासन को आदेश देकर लंदन के इंडिया ऑफिस में मौजूद बडोदा और ब्रिटिश शासन से संबंधित कागजातों को प्रस्तुत करने का आदेश दिया। इंडिया ऑफिस ने भारत के वाइसराय सलाहकार समिति के पास कागजातों की मांग की लंदन से कलकत्ता कार्यालय की ओर लगातार तारे भेजी गईं और बडोदा से जुड़े राजनीतिक तूफान से हड़कंप मचा। लंदन और भारतीय कार्यालय के पास कागजात पहुंचे। ब्रिटिश शासन लंबे कालखंड में कोई राजा और ब्रिटिश सत्ता के संबंध में यह अनोखा मामला निर्माण हो गया गया था। महाराजा सयाजीराव ने उनके पास जो कागजात थे वह कोर्ट के सामने प्रस्तुत किए। एक सो बयानब्बे वर्षों के ऐतिहासिक कालखंड में पहली बार बडोदा और ब्रिटिश शासन के संबंधों को लेकर ऐसा मामला निर्माण हुआ था। ब्रिटिश शासन के निःस्पृह न्यायदेवता की वह कसौटी ही थी। लंदन हायकोर्ट के न्यायाधीश सी. मौन्टेग्यू लश ने तटस्थता के साथ सभी कागजातों की जांच की और निर्णय दिया, "बडोदा के गायकवाड संप्रभु राजा है, उनके विरुद्ध लंदन हायकोर्ट में नागरी कानून के अंतर्गत कार्रवाई नहीं की जा सकती है।" इस निर्णय से वाइसराय और लंदन के वरिष्ठ कार्यालय को जबरदस्त चोट पहुंची। ब्रिटिश शासन ने वरिष्ठ न्यायालय में बिनतीस्वरूप अर्जी पेश की। अपेलिएट जज, न्यायमूर्ति बारग्लेअर डीन ने हायकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।

बडोदा के सयाजीराव गायकवाड संप्रभु राजा हैं –

छत्रपति शिवाजी महाराजा के बहादुर मावलाओं ने 75 फिसदी हिंदुस्तान पर शिवाजी महाराजा के हिंदवी स्वराज्य की पताका को बड़ी शूरता के साथ फहराया था; लेकिन आपसी भाई-भतीजावाद के चलते शत्रुओं को मदद की और मराठा साम्राज्य का एक सौ अड़तीस वर्षों के अंतराल के बाद अस्त हो गया। छत्रपति शिवाजी महाराजा का हिंदवी स्वराज्य का सपना बिखर गया। शिवाजी महाराजा ने अनेक मराठा सरदारों की मदद से स्वराज्य निर्माण किया था। उसमें बडोदा के गायकवाड भी एक थे। सन 1720 में उन्होंने मराठा साम्राज्य के एक सुभा के नाते नींव रखी थी। वह किला स्वतंत्रता तक मतलब 227 वर्षों तक शान से खड़ा रहा था। इसी सुनहरे सफर में एक मील के पत्थर के नाते साफ-सुथरे, चरित्रसंपन्न, अनासक्त और संप्रभु राजा थे सयाजीराव गायकवाड़। वर्तमान समय में इस इतिहास को जानना अत्यधिक आवश्यक है।

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महाराजा सयाजीराव गायकवाड

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