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वो मुझे ख़ार ख़ार कहता है, जिसको फूलों से तौलता हूँ मैं - बलजीत सिंह बेनाम

बलजीत सिंह बेनाम

ग़ज़ल 1
ख़ुद में जब से सिमट गया हूँ मैं
हर नज़र का ही मसअला हूँ मैं

मेरी रेखाओं में ग़ुलामी है
अपनी तक़दीर बेचता हूँ मैं

तू अना से ज़रा निकल बाहर
तेरी मंज़िल का रहनुमा हूँ मैं

सींच कर आरज़ू की शाखों को
अश्क में भीगता रहा हूँ मैं

वो मुझे ख़ार ख़ार कहता है
जिसको फूलों से तौलता हूँ मैं

ग़ज़ल 2

कोई दिलचस्पी नहीं लेता किसी में
लोग हैं मसरूफ़ अपनी ज़िंदगी में

एक सैनिक की शहादत ने सिखाया
मौत लाखों बार आती बुज़दिली में

तँग आकर मुझसे दुनिया ने कहा था
कर वही तू जो भी आए तेरे जी में

हार कर खुशियों से आख़िर कर ली तौबा
तैरने फिर से लगे ग़म की नदी में

प्यार की ताक़त पे है पूरा भरोसा
दुश्मनी तब्दील होगी दोस्ती में

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       जन्म तिथि:23/5/1983
       शिक्षा:स्नातक
        सम्प्रति:संगीत अध्यापक
        उपलब्धियां:विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित
सम्पर्क सूत्र: 103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी, हाँसी

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