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लघुकथाएँ - ठकुरी की होली - डॉ आर बी भण्डारकर

* बेटी मान है सम्मान है *

                      -डॉ आर बी भण्डारकर

सुमतिराय की बिटिया बड़ी शालीन ; किसी भी परिस्थिति में किसी भी बात पर कभी भी पिता को पलट कर जवाब नहीं दिया। बिटिया के इस स्वभाव पर पिता निहाल।

शादी की बात चली,उपयुक्त घर ,वर की तलाश होने लगी। घर में बातें चलतीं,राय मशविरा होता ;बिटिया सब सुनती पर कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं की। इसी बीच एक संयोग यह हुआ कि सुमतिराय को बिटिया के लिए सामाजिक-आर्थिक स्तर की दृष्टि से एक अच्छा घर,वर मिल गया। बिटिया के होने वाले ससुर पूर्व परिचित थे सो वह जानते थे कि सुमतिराय मेरी प्रतिष्ठा के अनुसार दहेज नहीं दे पाएँगे इसलिए उन्होंने एक तरकीब निकाली कि वे तिलक के समय सुमतिराय को पाँच लाख रुपये दे देंगे वही रकम सुमतिराय तिलक पर रख दें। इससे दोनों की प्रतिष्ठा रह जायेगी।

दहेज के सख्त विरोधी सुमतिराय को यह पेशकश अच्छी नहीं लगी पर उनके होने वाले समधी अड़ गए- "आपको यह तो करना ही पड़ेगा राय साहब।...देखिए इसमें आपको तो कोई नफा-नुकसान है नहीं पर मेरी तो प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।"

पिता को कई दिनों से से चिंता में डूबा देखकर बेटी ने एक दिन पिता से इसका कारण जानना चाहा तो अवसाद-ग्रस्त हो चुके पिता ने सम्पूर्ण हकीकत बयाँ कर दी।

आक्रोशित बेटी ने कहा कि "पिता जी मेरे लिए मेरे पिता की प्रतिष्ठा और उनके सिद्धांतों की मर्यादा सर्वोपरि है। जो परिवार अपनी झूठी प्रतिष्ठा के लिए मेरे पिता की मर्यादा का हनन करे मुझे ऐसे परिवार का सदस्य बनना कतई स्वीकार नहीं ;आप उन लोगों तुरन्त यह बात सूचित कर दीजिए।"

कभी किसी बात का प्रतिकार न करने वाली अपनी बिटिया के मुँह से यह सुनकर पिता अवाक होकर बेटी को ताकने लगते हैं।


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    * ठकुरी की होली *

                             - डॉ आर बी भंडारकर

गाँव में चलन ही हो गया था कि धुलेंडी के दिन फगुआरे सुबह गाँव भर में घूम घूम कर होली-स्थल की राख, धूल, कीचड़ की होली खेलते फिर दोपहर में नहा-धोकर सबसे पहले मुखिया जी के दरवाजे के चबूतरे पर एकत्रित होते ,वहाँ ढोलक, झींका, मंजीरा बजा बजा कर दो-चार फागें(होली- गीत)गाते फिर पूरा दल निकल पड़ता।हर दरवाजे पर जाते,बैठते,एक दो फाग गाते। फिर अगले घर के लिए चल देते।प्रत्येक घर के दरवाजे फाग गा आने तक यह क्रम चलता रहता,चाहे भले ही कितनी रात हो जाये।

फगुआरे घर के बाहर जब फाग गा रहे होते तब उस घर का मुखिया निकल कर सबके ऊपर पहले रंग डालता ,फिर गुलाल लगाकर सबका यथायोग्य अभिवादन करता। इसके बाद अपनी सामर्थ्य या व्यवस्था के अनुसार फगुआरों को गुड़ या बतासे या पकवान खिलाता। किसी किसी घर के लोग शर्बत भी पिलाते। शर्बत सादा ही पिलाया जाता था पर एकाध बार ऐसा भी हुआ कि दूसरे शहर में रह कर आये एक घर के युवा ने इन हुरआरों को भाँग वाला शर्बत पिला दिया।बाद में खूब किरकिरी हुई उसकी।

"ऎसा नहीं करना चाहिए था। पूरे गाँव में कोई भी किसी नशे का सेवन करता ही नहीं है।" नारायन कक्का कह रहे थे अपने घर में।

"भई कम से कम बता तो देना चाहिए था कि यह कोरा शर्बत नहीं है,इसमें ठंडाई मिली हुई है। जिसको पीना होता वह पीता, जिसको न पीना होता वह हाथ जोड़ लेता;यों धोखे में क्यों भाँग पिला दी।" हल्कू चाचा हाथ फटकार फटकार कर दहाड़ रहे थे अपने दुआरे।

परम्परा के हिसाब से हर वर्ष ठकुरी के दरवाजे भी फाग पहुँचती। अत्यंत निर्धन प्रौढ़ ठकुरी फगुआरों को केवल गुलाल लगाते थे,उन पर न रंग डाल पाते न उन्हें गुड़, बतासे या पकवान ही खिला पाते।

दर-असल साधन-हीन ठकुरी मेहनत- मजूरी करके जो कमा पाते थे उसमें बमुश्किल उनके परिवार की गुजर बसर ही हो पाती थी;इतना पैसा न बचता कि 50,60 की संख्या में जुटे फगुआरों पर डालने लायक रंग खरीद सकें।

रंग डालने का बहुत मन करता था ठकुरी का पर मन मार कर रह जाते।

अबकी बार नजारा कुछ बदला बदला था। दरवाजे पर फाग आते ही ठकुरी ने सब पर पहले बाल्टी भर हरा रंग डाला फिर दूसरी बाल्टी उठा लाये और सबको लाल रंग से सराबोर कर दिया।

सब खुश पर आश्चर्य चकित भी कि एक बाल्टी रंग भी न जुटा पाने वाले ठकुरी ने आज अलग अलग प्रकार का दो बाल्टी रंग डाला। वाह भई वाह, अबके ठकुरी ने तो कमाल ही कर दिया।

इधर ठकुरी अपने मनमीत रग्घू को बता रहे थे।"रग्घू भैया,पिछले हफ्ते ग्राम सेवक जी ने सबको बताया था न कि रंगों में हानिकारक केमिकल मिले होते है सो अबकी बार सब लोग प्राकृतिक रंगों से ही होली खेलें। मेरी समझ में तो कुछ आया नहीं था। मैंने एक दिन पुरहत के लड़के से इसका मतलब पूछ लिया था। सो मेरी अकल में एक जुगाड़ आयी। मैंने ढेंकरा के फूलों को कुचल कर कपड़छन कर लिया,थोड़ा पानी मिलाया ; बन गया लाल रंग। इसी तरह आम के पत्तों से हरा रंग बना लिया। हरियाइंद मेंटने के लिए मैंने इनमें पुरहत के बगैचा में से तोड़ कर गुलाब के फूल डाल दिये थे।......मेहनत जरूर करनी पड़ी पर काम बन गया।

रग्घू अपना मुँह फाड़े ठकुरी को ताक रहे थे।

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सी-9,स्टार होम्स

रोहितनगर फेस-2

भोपाल 462039

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