ग़ाज़ी मिया का मेला - डॉ एस एन वर्मा

SHARE:

ग़ाज़ी मिया का मेला डॉ एस एन वर्मा वाराणसी उत्तर प्रदेश। मेरे घर से उत्तर पूर्व दिशा में एक किमी से भी कम दूरी पर एक मस्जिद है। इसके पास पांच ...

ग़ाज़ी मिया का मेला

डॉ एस एन वर्मा

वाराणसी उत्तर प्रदेश।

मेरे घर से उत्तर पूर्व दिशा में एक किमी से भी कम दूरी पर एक मस्जिद है। इसके पास पांच छः घरों में चुड़िहार पेशे के मुस्लिम रहते हैं। उनके पूजा स्थल के रूप में यह मस्जिद शायद ही वर्ष में कभी इतनी चहल पहल भरी होती है जितना कि मई जून में लगने वाले रात्रि कालीन मेले के समय रहती है। इस मेले को हम लोग 'गुरखेत 'का मेला कहते हैं। गेहूं की फसल कट चुकने के बाद मस्जिद के पास खाली खेत में ही यह मेला लगता है। शाम तक उन खेतों को वीरान देखा जा सकता है, लेकिन शाम होते ही देशी गैस, पेट्रोमैक्स, अब जेनरेटर की लाइट जलने लगती है। दूर के गांवों से 'निसान ' लिए लोग इस ओर आते दिखाई पड़ने लगते हैं। 'निसान :अमूमन बांस का होता है उसमें हरे झंडे लगे रहते हैं। लोग जमीन पर रखे बिना कंधे पर लेटाकर ले आते हैं। आगे -आगे निसान, पीछे बच्चों और स्त्रियों का समूह। रात दस बजे तक 'निसान' रस्सी के सहारे खड़े कर दिए जाते हैं। इसके आसपास 'सिन्नी' जो आमतौर पर बतासे की मिठाई होती है, रख दी जाती है। लोग अपनी समस्या के अनुरूप 'सिन्नी 'रखते जाते हैं। फिर वाद्य यंत्र वाले विशेष ध्वनि उत्पन्न करते हैं । मौलवी लोग, गाज़ी मियां का आह्वान करते हैं। रोग ग्रस्त, प्रेत बाधा की शिकार औरतें आदमी 'खेलते' है। अन्ततः गाज़ी समस्या का समाधान कर देते हैं। समाधान होने पर 'सिन्नी 'बांट दी जाती है। बचपन में मैंने भी कई 'निसान 'के पास से सिन्नी खाई है। रात के तीन चार बजे तक मेला उठने लगता है। जिनकी समस्याएं बड़ी होती वे लोग बहराइच में लगने वाले मेले के लिए रवाना हो जाते हैं। मेरा घर सुल्तानपुर जिले के लंभुआ विकास खंड के अर्जुनपुर गांव में है। बहराइच वहाँ से लगभग 200 किमी दूर है। मेरी जानकारी में यह मेला यहाँ आरंभ हुआ। पहले यह मेला कहीं और लगता था। मस्जिद के पास रहने वाले किफ़ायत उल्लाह जो अभी भी जीवित हैं, ने इस मेले का आयोजन यहाँ कराना आरम्भ किया। उनकी पत्नी से गाज़ी मिया के बारे में प्रारम्भिक जानकारी मिली थी। गाज़ी मिया के कुंवारे होने, मृत्यु के बाद बियाह, असाध्य रोगों को ठीक करने की क्षमता, योद्धा होने, हिन्दू मुस्लिम सब में पूज्य होने की छोटी छोटी बातें उन्होंने बताई थी। वे कहती है कि बहराइच में 12-13दिन मेला चलता है इसमें बड़ी संख्या में लोग देश के कोने कोने से आते हैं। तीर्थ यात्रियों के इन दलों को मदैनी या बारात कहा जाता है। बाराती उपहार(दहेज)लाते हैं और दूल्हे सालार मसूद गाज़ी मियां की मजार पर चढ़ाते हैं। इतनी सब जानकारी मेले के आयोजकों से मिलकर और मेला देखकर लग गयी थी। परंतु गाज़ी मिया के बारे में यह उत्सुकता बनी हुई थी कि उनके बारे में और जानकारी मिले तो अच्छा होगा।

2014 में भारतीय इतिहास कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नई दिल्ली में हुआ था। इस अधिवेधन में जाने का अवसर मिला तो मैं ओरियंट ब्लैक स्वान प्रकाशन के स्टॉल पर जाने से अपने को न रोक सका। यहाँ मैंने प्रोफेसर एन आर फारूकी द्वारा लिखी "सूफीवाद, कुछ महत्त्वपूर्ण लेख"पुस्तक देखी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक करते समय से मैं तत्कालीन, इतिहास विभाग अध्यक्ष प्रो फारूकी को जानता था और उनके विचारों से प्रभावित भी रहता था। इसलिए उनके द्वारा लिखित पुस्तक की ओर सहज ही आकर्षित हुआ और बिना कुछ देखे खरीद लिया। जब इस पुस्तक को आद्योपांत पढ़ने का अवसर मिला तो वर्षों से अपूर्ण ज्ञान क्षुधा को तृप्ति मिली। इस पुस्तक के दूसरे अध्याय में सालार मसूद ग़ाज़ी के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। उसे पढ़कर किफ़ायत उल्लाह और उनकी पत्नी द्वारा दी गयी जानकरी का सूत्र व्यापक होकर इस आलेख का मजमून बन गया।

भारतीय सूफीवाद के इतिहास में एक प्रसिद्ध नाम सिपहसालार मसूद गाज़ी का है, जिन्हें गाज़ी मियां या बाले मियाँ के नाम से जाना जाता है। उनका समय 11 वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। लेकिन उनके जीवन और कार्यों का कोई समकालीन इतिहास मौजूद नहीं है। उनकी मृत्यु के 600 वर्ष बाद चिश्ती सिलसिले के सूफ़ी संत अब्दुर्रहमान नें 'मिरात-ए -मसूदी 'नामक पुस्तक लिखी। अब्दुर्रहमान ने अपनी सूचना का स्रोत 'तारीख़-ए-मुल्ला -मुहम्मद गजनवी 'को माना इसके लेखक कथित रूप से सालार मसूद और गज़नी के सेवक थे। यह पुस्तक अब मौजूद नही है, शायद उस समय भी नही थी। इसलिए अब्दुर्रहमान यह दावा करते हैं कि वे दिवंगत सालार के सहयोग से पुस्तक लिख सके, वे सपने में आते थे और अपने बारे में बताते थे और घटनाओं की सत्यता की पुष्टि करते थे। इससे यह लगता है कि 'मिरात -ए -मसूदी 'के विवरण ऐतिहासिक नही हैं। इसमे कल्पना का मिश्रण है, सम्भव है कि दूसरे के महान कार्यों को भी सालार के साथ जोड़ दिया गया हो। फिर भी जो विवरण 'मिरात -ए -मसूदी 'में है उसके अनुसार गज़नी के सुल्तान महमूद के साले का नाम सालार साहू था जिसे उसने अज़मेर पर आक्रमण के लिये मुजफ्फर खान का सहयोगी बनाकर भेजा था। उसे अज़मेर में सफलता मिल गयी इसलिए सुल्तान ने साहू को वहां का शासक बना दिया। 14 फ़रवरी 1015 को साहू को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम सालार मसूद रखा गया। बहुत कम समय में ही यह बालक सैनिक प्रतिभा से युक्त हो गया। 12 वर्ष की उम्र में उसने पहली विजय हासिल की। सुल्तान महमूद उस समय सोमनाथ के मंदिर को लूट चुका था। भारत से हिन्दू प्रतिनिधि मंडल गया था जो सोमनाथ की मूर्ति के बदले दो गुना सोना देने को तैयार था। सुल्तान इस मांग को मानने के लिये तैयार भी था लेकिन सालार मसूद ने ऐसा करने से रोक दिया। इसे मसूद के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा गया और इसके चलते दूसरे तुर्क सरदार उसे भारत वापस भेजने की कामयाब चाल चलने लगे। भारत आकर मसूद ने मुल्तान दिल्ली मेरठ पर अधिकार जमाते हुए आधुनिक बाराबंकी जिले के सतरिख को अपना केंद्र बनाया। कुछ समय बाद उसके पिता भी वहीं आ गए। मसूद ने यही रहते हुए बहराइच को जीतने का प्रयास किया और अपने सेनापति को आक्रमण के लिये भेजा। उधर बहराइच के राजा सोहिलदेव ने भी बड़ी सेना तैयार कर ली थी जिसे हरा पाना आसान नही था। अतः मसूद स्वयं भी बहराइच के लिये निकल पड़ा । 1032 के जुलाई माह तक वह वहां पहुंच भी गया और एक महुए के पेड़ के नीचे कैम्प करने लगा। इसी बीच उसे पिता की मृत्यु की सूचना मिली जिससे वह मूर्ति पूजको के खिलाफ दुगुने उत्साह से युद्ध करने निकल पड़ा। तीन दिन तक चली लड़ाई में मसूद मारे गए। रजब की 14 वीं तिथि हिजरी424(15जून 1033)को मसूद को उसी महुए के पेड़ के नीचे दफना दिया गया। उस समय उनकी उम्र केवल 19 वर्ष थी और वे अविवाहित थे। आज इसी स्थान पर ग़ाज़ी मिया का मेला लगता है।

प्रो फारूकी ने 'मिरात -ए -मसूदी 'के विवरण पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि इस प्रकार के दूसरे स्रोत उपलब्ध नहीं है जो घटना की सत्यता प्रमाणित कर सकें। महमूद के सोमनाथ व कन्नौज आक्रमण के विवरण उपलब्ध हैं लेकिन साहू या मसूद के अभियान का कोई उल्लेख नही है। 12वीं शताब्दी में पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण से पूर्व अजमेर में मुस्लिम सत्ता का प्रमाण भी नही मिलता है। गजनी के सुल्तान का कोई भांजा नहीं था उसके पुत्र का नाम मसूद अवश्य था। अतः यह लगता है इसी वंशावली ने कहानीकार को नायक को यह नाम देने के लिए प्रेरित किया होगा। Iइल्तुतमिश ने अपने शासनकाल में नासिरुद्दीन महमूद को बहराइच का गवर्नर बनाया था जो बाद में सुल्तान भी बना। इससे लगता है कि उसी समय बहराइच में मुस्लिम शासन स्थापित हुआ। नासिरुद्दीन के समय का इतिहास तबकात-ए-नासिरी में मिलता है लेकिन वहां भी सालार मसूद का उल्लेख नहीं है।

किसी ठोस ऐतिहासिक प्रमाण की अनुपस्थिति में सालार मसूद और उनसे जुड़ी घटनाओं की सत्यता पर प्रश्नचिन्ह अवश्य लगा रहेगा।

16 वीं सदी के बुद्धिजीवी और सूफी दोनों मसूद पर यकीनी राय नही रखते हैं। मुन्तख़ब -उल- तवारीख के लेखक अब्दुल कादिर बदायूँनी ने लिखा है कि खैराबाद के एक प्रमुख सूफी शैखुल हिदाया ने मसूद को एक अफगानी माना था जो युद्ध में शहीद हो गया था। इधर हाल 1978 में रिचर्ड ईटन ने :सूफ़ीज ऑफ बीजापुर 'नामक पुस्तक लिखी है जिसमें उन्होंने सूफियों के विकास को रेखांकित किया है। उनके अनुसार सल्तनत काल में सूफी संतों की सैनिक भूमिका नगण्य थी, हां सूफी संतों के अनुयायी सेना में हिस्सा लेते रहते थे। प्रो फारूकी कहते हैं कि आधुनिक काल के आरंभ में भारत में सालार मसूद जो एक सैनिक थे, की सूफी संत बनने की विपरीत प्रक्रिया की कल्पना की गई। 14 वीं सदी में कल्पित शाह डोला की कहानी भी इसी तरह की है। अतः यह कहा जाना चाहिए कि मसूद की कहानी भी अधिकांश संदर्भों में कल्पित ही है।

ताहिर महमूद ने 1989 में 'द दरगाह ऑफ सैयद सालार महमूद ग़ाज़ी इन बहराइच:लीजेंड, ट्रेडिशन एंड रियलिटी' नामक लेख लिखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाही है। वे लिखते हैं कि सालार मसूद के रिश्तेदार उनकी कब्र की देख रेख करते थे। धीरे धीरे उस क्षेत्र के लोग श्रद्धा में शीश नवाने आने लगे। किन्तु इस कब्र ने उस समय लोकप्रिय श्रद्धा स्थल का रूप ले लिया जब एक ग्वाले जासू अहीर की बांझ पत्नी ने कब्र पर प्रार्थना के बाद पुत्र को जन्म दिया। वर्ष 1062-63 में सैयद जमालुद्दीन की नेत्रहीन पुत्री जोहरा ने रुदौली बाराबंकी से आकर मज़ार पर पूजा की तो उसकी आंखें ठीक हो गयी। उसने शेष जीवन कब्र के पास ही बिता दिया। उसने विवाह नहीं किया था इसलिये उसे मसूद की कब्र के पास ही दफना दिया गया। इसी घटना से ग़ाज़ी मिया के विवाह की परंपरा चल निकली। आज भी रुदौली से रज्जब की 12 वीं को जोहरा की बारात जाती है और औपचारिक रूप से गाज़ी का विवाह होता है। ताहिर महमूद उनकी लोकप्रियता का वर्णन करते हैं ऐतिहासिक महत्व का नही। इतिहासविद आई एच सिद्दीकी ने अमीर खुसरो की रचना ''इजाज -ए -खुशरावी ' के हवाले से लिखा है कि'बहराइच नगर में सिपहसालार शहीद के मकबरे की सुगंध पूरे हिंदुस्तान को महका रही थी। ''जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि सालार तेरहवीं सदी के कोई सैनिक थे। इसके बाद घटनाओं का क्रमबद्ध रूप मिलने लगता है। मुहम्मद तुगलक ने बहराइच की यात्रा की और दरगाह के सेवको को बड़ी मात्रा में धन दिया। इस यात्रा के दौरान विदेशी यात्री इब्नबतूता उनके साथ था जिसने कब्र पर जुटने वाली भीड़ का उल्लेख किताब- उल -रहला में किया है। उसने 300 यात्रियों के जहाज के नदी में डूबने का उल्लेख किया है जो मसूद की कब्र का दर्शन करने जा रहे थे। वह स्वयं भी दरगाह का दर्शन नही कर सका क्योंकि भक्तो की भीड़ ने उसे रोक दिया था। फिरोज तुगलक के कार्य काल में मसूद के लोकप्रिय होने का वर्णन मिलता है। सुल्तान स्वयं सर्वप्रिय पुत्र शहजाद फतह खान की मृत्यु के बाद मजार पर गया था। तारीख- ए -फ़िरोजशाही के लेखक शम्स -ए-सिराज अफीफ ने लिखा है कि एक दिन सालार सुल्तान के सपने में आये और उसे धार्मिक रीति रिवाजों को दृढता से पालन करने की सलाह दी। अगले दिन से सुल्तान ने सूफी तौर तरीके अपना लिये। 14 वीं सदी की एक अन्य ऐतिहासिक कृति सीरत ए फ़िरोजशाही में भी सालार ग़ाज़ी को कुष्ठ रोगियों के इलाज हेतु प्रसिद्ध होते दिखाया गया है। बंगाल का सुल्तान हाजी इलियास इसी उद्देश्य से दरगाह पर आया था, क्योंकि उसने सुल्तान फिरोज से अनुमति नही ली थी, इसलिये सुल्तान ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया।

सोलहवीं सदी में सालार मसूद की कथाएँ उत्तरी और पूर्वी भारत में पूजा पद्धति का रूप ले लीं। जगह जगह उर्स आयोजित किये जाने लगे। जोहरा बीबी और ग़ाज़ी के विवाह के आयोजन किये जाने लगे। साथ ही मसूद की सेना के प्रतीक के रूप में, भालों में लाल और हरे कपड़े, ध्वज बांधकर ले आये जाने लगे। अबुलफजल के अनुसार अब मेला बहराइच के बाहर भी लगने लगा था। ऐसा ही मेला 1561 में आगरा में लगा था। लेकिन ग़ाज़ी के मूल स्थान के रूप में बहराइच ही प्रसिद्ध रहा। आगरा से भी लोग बहराइच जाते थे। मेले में अच्छे -बुरे दोनों तरह के लोग हिस्सा लेते थे। मुग़ल राजवंश के ही 19 वीं सदी के शासक अकबर के हमनाम अकबर -द्वितीय भी मसूद की दरगाह पर जाने और उसकी देखरेख के लिए सिंघा परासी की जमींदारी देने के लिए प्रसिद्ध हैं।

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भी इस मेले की लोकप्रियता बनी रही। अंग्रेज इस मेले में हिंदुओं की संख्या को देखकर आश्चर्य चकित रहते थे। डब्ल्यू एच स्लीमन की पुस्तक 'जर्नी थ्रू द किंगडम ऑफ अवध इन 1849' के हवाले 1913 में एक अंग्रेज एन आई रॉकी ने कहा है कि मेले में 50 प्रतिशत से अधिक हिन्दू होते थे। स्लीमन स्वयं यह देखकर दंग रह गए थे कि हिन्दू और मुस्लिम दोनों मिलकर गाज़ी की मजार पर फूल और चढ़ावा चढ़ा रहे थे, 'जिसकी केवल यही विशेषता ज्ञात थी कि उसने हिंदुओं के प्रदेश पर अकारण हमला किया था और हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था। ' उन्होने गाज़ी मियां के प्रति हिंदुओं की भक्ति को स्वर्ग में उनके प्रभाव के संदर्भ में समझा था।

प्रो फारूकी अपने निष्कर्ष में कहते हैं कि सालार मसूद की वास्तविक पहचान अभी भी अनसुलझी ही है। यह लगभग तय है कि वे गजनी के सुल्तान के भांजे नहीं थे। मिरात- ए -मसूदी' के विवरण काल्पनिक अधिक हैं। संभव है कि तेरहवीं सदी में बहराइच क्षेत्र में तुर्क सेनाओं के साथ लड़ते हुए मसूद नामक सैनिक ने अपनी जान गंवा दी थी। उसकी शहादत के साथ रोगियों को ठीक करने की क्षमता ने धीरे धीरे ईश्वरीय शक्ति का विधान बना डाला। नव- मुस्लिम समुदाय ने इस अंध विश्वास को इस्लाम के लोकप्रिय ढांचे में मिला दिया। फिर इसे चिश्ती सिलसिले से जोड़कर तर्कसंगत बना दिया । अजमेर से सालार को जोड़ देने से मोइनुद्दीन चिश्ती की उदारता स्वयम सन्नद्ध हो गयी। कुल मिलाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचना सुगम है कि ग़ाज़ी मियां का मेला भारतीय जनता की उस आस्था का प्रतीक है जो सैनिक शक्ति, नैतिकता, चमत्कारी शक्ति, रोगों से मुक्ति, मुकदमों में विजय, और दुनियावी समस्याओं के समाधान हेतु उपजती रही है। प्राचीनता के आवरण में आस्था के संरक्षण का प्रतीक है।

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: ग़ाज़ी मिया का मेला - डॉ एस एन वर्मा
ग़ाज़ी मिया का मेला - डॉ एस एन वर्मा
http://4.bp.blogspot.com/-GurwPnQS3OE/XoH1i3V5wuI/AAAAAAABRQY/2aLXKKf4GvM4GAwxFlClFnYiW50oe9FSQCK4BGAYYCw/s320/akckngjfiehgchdk-704315.png
http://4.bp.blogspot.com/-GurwPnQS3OE/XoH1i3V5wuI/AAAAAAABRQY/2aLXKKf4GvM4GAwxFlClFnYiW50oe9FSQCK4BGAYYCw/s72-c/akckngjfiehgchdk-704315.png
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2020/03/blog-post_56.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2020/03/blog-post_56.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content