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ग़ाज़ी मिया का मेला - डॉ एस एन वर्मा

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ग़ाज़ी मिया का मेला डॉ एस एन वर्मा वाराणसी उत्तर प्रदेश। मेरे घर से उत्तर पूर्व दिशा में एक किमी से भी कम दूरी पर एक मस्जिद है। इसके पास पांच ...

ग़ाज़ी मिया का मेला

डॉ एस एन वर्मा

वाराणसी उत्तर प्रदेश।

मेरे घर से उत्तर पूर्व दिशा में एक किमी से भी कम दूरी पर एक मस्जिद है। इसके पास पांच छः घरों में चुड़िहार पेशे के मुस्लिम रहते हैं। उनके पूजा स्थल के रूप में यह मस्जिद शायद ही वर्ष में कभी इतनी चहल पहल भरी होती है जितना कि मई जून में लगने वाले रात्रि कालीन मेले के समय रहती है। इस मेले को हम लोग 'गुरखेत 'का मेला कहते हैं। गेहूं की फसल कट चुकने के बाद मस्जिद के पास खाली खेत में ही यह मेला लगता है। शाम तक उन खेतों को वीरान देखा जा सकता है, लेकिन शाम होते ही देशी गैस, पेट्रोमैक्स, अब जेनरेटर की लाइट जलने लगती है। दूर के गांवों से 'निसान ' लिए लोग इस ओर आते दिखाई पड़ने लगते हैं। 'निसान :अमूमन बांस का होता है उसमें हरे झंडे लगे रहते हैं। लोग जमीन पर रखे बिना कंधे पर लेटाकर ले आते हैं। आगे -आगे निसान, पीछे बच्चों और स्त्रियों का समूह। रात दस बजे तक 'निसान' रस्सी के सहारे खड़े कर दिए जाते हैं। इसके आसपास 'सिन्नी' जो आमतौर पर बतासे की मिठाई होती है, रख दी जाती है। लोग अपनी समस्या के अनुरूप 'सिन्नी 'रखते जाते हैं। फिर वाद्य यंत्र वाले विशेष ध्वनि उत्पन्न करते हैं । मौलवी लोग, गाज़ी मियां का आह्वान करते हैं। रोग ग्रस्त, प्रेत बाधा की शिकार औरतें आदमी 'खेलते' है। अन्ततः गाज़ी समस्या का समाधान कर देते हैं। समाधान होने पर 'सिन्नी 'बांट दी जाती है। बचपन में मैंने भी कई 'निसान 'के पास से सिन्नी खाई है। रात के तीन चार बजे तक मेला उठने लगता है। जिनकी समस्याएं बड़ी होती वे लोग बहराइच में लगने वाले मेले के लिए रवाना हो जाते हैं। मेरा घर सुल्तानपुर जिले के लंभुआ विकास खंड के अर्जुनपुर गांव में है। बहराइच वहाँ से लगभग 200 किमी दूर है। मेरी जानकारी में यह मेला यहाँ आरंभ हुआ। पहले यह मेला कहीं और लगता था। मस्जिद के पास रहने वाले किफ़ायत उल्लाह जो अभी भी जीवित हैं, ने इस मेले का आयोजन यहाँ कराना आरम्भ किया। उनकी पत्नी से गाज़ी मिया के बारे में प्रारम्भिक जानकारी मिली थी। गाज़ी मिया के कुंवारे होने, मृत्यु के बाद बियाह, असाध्य रोगों को ठीक करने की क्षमता, योद्धा होने, हिन्दू मुस्लिम सब में पूज्य होने की छोटी छोटी बातें उन्होंने बताई थी। वे कहती है कि बहराइच में 12-13दिन मेला चलता है इसमें बड़ी संख्या में लोग देश के कोने कोने से आते हैं। तीर्थ यात्रियों के इन दलों को मदैनी या बारात कहा जाता है। बाराती उपहार(दहेज)लाते हैं और दूल्हे सालार मसूद गाज़ी मियां की मजार पर चढ़ाते हैं। इतनी सब जानकारी मेले के आयोजकों से मिलकर और मेला देखकर लग गयी थी। परंतु गाज़ी मिया के बारे में यह उत्सुकता बनी हुई थी कि उनके बारे में और जानकारी मिले तो अच्छा होगा।

2014 में भारतीय इतिहास कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नई दिल्ली में हुआ था। इस अधिवेधन में जाने का अवसर मिला तो मैं ओरियंट ब्लैक स्वान प्रकाशन के स्टॉल पर जाने से अपने को न रोक सका। यहाँ मैंने प्रोफेसर एन आर फारूकी द्वारा लिखी "सूफीवाद, कुछ महत्त्वपूर्ण लेख"पुस्तक देखी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक करते समय से मैं तत्कालीन, इतिहास विभाग अध्यक्ष प्रो फारूकी को जानता था और उनके विचारों से प्रभावित भी रहता था। इसलिए उनके द्वारा लिखित पुस्तक की ओर सहज ही आकर्षित हुआ और बिना कुछ देखे खरीद लिया। जब इस पुस्तक को आद्योपांत पढ़ने का अवसर मिला तो वर्षों से अपूर्ण ज्ञान क्षुधा को तृप्ति मिली। इस पुस्तक के दूसरे अध्याय में सालार मसूद ग़ाज़ी के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। उसे पढ़कर किफ़ायत उल्लाह और उनकी पत्नी द्वारा दी गयी जानकरी का सूत्र व्यापक होकर इस आलेख का मजमून बन गया।

भारतीय सूफीवाद के इतिहास में एक प्रसिद्ध नाम सिपहसालार मसूद गाज़ी का है, जिन्हें गाज़ी मियां या बाले मियाँ के नाम से जाना जाता है। उनका समय 11 वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। लेकिन उनके जीवन और कार्यों का कोई समकालीन इतिहास मौजूद नहीं है। उनकी मृत्यु के 600 वर्ष बाद चिश्ती सिलसिले के सूफ़ी संत अब्दुर्रहमान नें 'मिरात-ए -मसूदी 'नामक पुस्तक लिखी। अब्दुर्रहमान ने अपनी सूचना का स्रोत 'तारीख़-ए-मुल्ला -मुहम्मद गजनवी 'को माना इसके लेखक कथित रूप से सालार मसूद और गज़नी के सेवक थे। यह पुस्तक अब मौजूद नही है, शायद उस समय भी नही थी। इसलिए अब्दुर्रहमान यह दावा करते हैं कि वे दिवंगत सालार के सहयोग से पुस्तक लिख सके, वे सपने में आते थे और अपने बारे में बताते थे और घटनाओं की सत्यता की पुष्टि करते थे। इससे यह लगता है कि 'मिरात -ए -मसूदी 'के विवरण ऐतिहासिक नही हैं। इसमे कल्पना का मिश्रण है, सम्भव है कि दूसरे के महान कार्यों को भी सालार के साथ जोड़ दिया गया हो। फिर भी जो विवरण 'मिरात -ए -मसूदी 'में है उसके अनुसार गज़नी के सुल्तान महमूद के साले का नाम सालार साहू था जिसे उसने अज़मेर पर आक्रमण के लिये मुजफ्फर खान का सहयोगी बनाकर भेजा था। उसे अज़मेर में सफलता मिल गयी इसलिए सुल्तान ने साहू को वहां का शासक बना दिया। 14 फ़रवरी 1015 को साहू को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम सालार मसूद रखा गया। बहुत कम समय में ही यह बालक सैनिक प्रतिभा से युक्त हो गया। 12 वर्ष की उम्र में उसने पहली विजय हासिल की। सुल्तान महमूद उस समय सोमनाथ के मंदिर को लूट चुका था। भारत से हिन्दू प्रतिनिधि मंडल गया था जो सोमनाथ की मूर्ति के बदले दो गुना सोना देने को तैयार था। सुल्तान इस मांग को मानने के लिये तैयार भी था लेकिन सालार मसूद ने ऐसा करने से रोक दिया। इसे मसूद के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा गया और इसके चलते दूसरे तुर्क सरदार उसे भारत वापस भेजने की कामयाब चाल चलने लगे। भारत आकर मसूद ने मुल्तान दिल्ली मेरठ पर अधिकार जमाते हुए आधुनिक बाराबंकी जिले के सतरिख को अपना केंद्र बनाया। कुछ समय बाद उसके पिता भी वहीं आ गए। मसूद ने यही रहते हुए बहराइच को जीतने का प्रयास किया और अपने सेनापति को आक्रमण के लिये भेजा। उधर बहराइच के राजा सोहिलदेव ने भी बड़ी सेना तैयार कर ली थी जिसे हरा पाना आसान नही था। अतः मसूद स्वयं भी बहराइच के लिये निकल पड़ा । 1032 के जुलाई माह तक वह वहां पहुंच भी गया और एक महुए के पेड़ के नीचे कैम्प करने लगा। इसी बीच उसे पिता की मृत्यु की सूचना मिली जिससे वह मूर्ति पूजको के खिलाफ दुगुने उत्साह से युद्ध करने निकल पड़ा। तीन दिन तक चली लड़ाई में मसूद मारे गए। रजब की 14 वीं तिथि हिजरी424(15जून 1033)को मसूद को उसी महुए के पेड़ के नीचे दफना दिया गया। उस समय उनकी उम्र केवल 19 वर्ष थी और वे अविवाहित थे। आज इसी स्थान पर ग़ाज़ी मिया का मेला लगता है।

प्रो फारूकी ने 'मिरात -ए -मसूदी 'के विवरण पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि इस प्रकार के दूसरे स्रोत उपलब्ध नहीं है जो घटना की सत्यता प्रमाणित कर सकें। महमूद के सोमनाथ व कन्नौज आक्रमण के विवरण उपलब्ध हैं लेकिन साहू या मसूद के अभियान का कोई उल्लेख नही है। 12वीं शताब्दी में पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण से पूर्व अजमेर में मुस्लिम सत्ता का प्रमाण भी नही मिलता है। गजनी के सुल्तान का कोई भांजा नहीं था उसके पुत्र का नाम मसूद अवश्य था। अतः यह लगता है इसी वंशावली ने कहानीकार को नायक को यह नाम देने के लिए प्रेरित किया होगा। Iइल्तुतमिश ने अपने शासनकाल में नासिरुद्दीन महमूद को बहराइच का गवर्नर बनाया था जो बाद में सुल्तान भी बना। इससे लगता है कि उसी समय बहराइच में मुस्लिम शासन स्थापित हुआ। नासिरुद्दीन के समय का इतिहास तबकात-ए-नासिरी में मिलता है लेकिन वहां भी सालार मसूद का उल्लेख नहीं है।

किसी ठोस ऐतिहासिक प्रमाण की अनुपस्थिति में सालार मसूद और उनसे जुड़ी घटनाओं की सत्यता पर प्रश्नचिन्ह अवश्य लगा रहेगा।

16 वीं सदी के बुद्धिजीवी और सूफी दोनों मसूद पर यकीनी राय नही रखते हैं। मुन्तख़ब -उल- तवारीख के लेखक अब्दुल कादिर बदायूँनी ने लिखा है कि खैराबाद के एक प्रमुख सूफी शैखुल हिदाया ने मसूद को एक अफगानी माना था जो युद्ध में शहीद हो गया था। इधर हाल 1978 में रिचर्ड ईटन ने :सूफ़ीज ऑफ बीजापुर 'नामक पुस्तक लिखी है जिसमें उन्होंने सूफियों के विकास को रेखांकित किया है। उनके अनुसार सल्तनत काल में सूफी संतों की सैनिक भूमिका नगण्य थी, हां सूफी संतों के अनुयायी सेना में हिस्सा लेते रहते थे। प्रो फारूकी कहते हैं कि आधुनिक काल के आरंभ में भारत में सालार मसूद जो एक सैनिक थे, की सूफी संत बनने की विपरीत प्रक्रिया की कल्पना की गई। 14 वीं सदी में कल्पित शाह डोला की कहानी भी इसी तरह की है। अतः यह कहा जाना चाहिए कि मसूद की कहानी भी अधिकांश संदर्भों में कल्पित ही है।

ताहिर महमूद ने 1989 में 'द दरगाह ऑफ सैयद सालार महमूद ग़ाज़ी इन बहराइच:लीजेंड, ट्रेडिशन एंड रियलिटी' नामक लेख लिखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाही है। वे लिखते हैं कि सालार मसूद के रिश्तेदार उनकी कब्र की देख रेख करते थे। धीरे धीरे उस क्षेत्र के लोग श्रद्धा में शीश नवाने आने लगे। किन्तु इस कब्र ने उस समय लोकप्रिय श्रद्धा स्थल का रूप ले लिया जब एक ग्वाले जासू अहीर की बांझ पत्नी ने कब्र पर प्रार्थना के बाद पुत्र को जन्म दिया। वर्ष 1062-63 में सैयद जमालुद्दीन की नेत्रहीन पुत्री जोहरा ने रुदौली बाराबंकी से आकर मज़ार पर पूजा की तो उसकी आंखें ठीक हो गयी। उसने शेष जीवन कब्र के पास ही बिता दिया। उसने विवाह नहीं किया था इसलिये उसे मसूद की कब्र के पास ही दफना दिया गया। इसी घटना से ग़ाज़ी मिया के विवाह की परंपरा चल निकली। आज भी रुदौली से रज्जब की 12 वीं को जोहरा की बारात जाती है और औपचारिक रूप से गाज़ी का विवाह होता है। ताहिर महमूद उनकी लोकप्रियता का वर्णन करते हैं ऐतिहासिक महत्व का नही। इतिहासविद आई एच सिद्दीकी ने अमीर खुसरो की रचना ''इजाज -ए -खुशरावी ' के हवाले से लिखा है कि'बहराइच नगर में सिपहसालार शहीद के मकबरे की सुगंध पूरे हिंदुस्तान को महका रही थी। ''जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि सालार तेरहवीं सदी के कोई सैनिक थे। इसके बाद घटनाओं का क्रमबद्ध रूप मिलने लगता है। मुहम्मद तुगलक ने बहराइच की यात्रा की और दरगाह के सेवको को बड़ी मात्रा में धन दिया। इस यात्रा के दौरान विदेशी यात्री इब्नबतूता उनके साथ था जिसने कब्र पर जुटने वाली भीड़ का उल्लेख किताब- उल -रहला में किया है। उसने 300 यात्रियों के जहाज के नदी में डूबने का उल्लेख किया है जो मसूद की कब्र का दर्शन करने जा रहे थे। वह स्वयं भी दरगाह का दर्शन नही कर सका क्योंकि भक्तो की भीड़ ने उसे रोक दिया था। फिरोज तुगलक के कार्य काल में मसूद के लोकप्रिय होने का वर्णन मिलता है। सुल्तान स्वयं सर्वप्रिय पुत्र शहजाद फतह खान की मृत्यु के बाद मजार पर गया था। तारीख- ए -फ़िरोजशाही के लेखक शम्स -ए-सिराज अफीफ ने लिखा है कि एक दिन सालार सुल्तान के सपने में आये और उसे धार्मिक रीति रिवाजों को दृढता से पालन करने की सलाह दी। अगले दिन से सुल्तान ने सूफी तौर तरीके अपना लिये। 14 वीं सदी की एक अन्य ऐतिहासिक कृति सीरत ए फ़िरोजशाही में भी सालार ग़ाज़ी को कुष्ठ रोगियों के इलाज हेतु प्रसिद्ध होते दिखाया गया है। बंगाल का सुल्तान हाजी इलियास इसी उद्देश्य से दरगाह पर आया था, क्योंकि उसने सुल्तान फिरोज से अनुमति नही ली थी, इसलिये सुल्तान ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया।

सोलहवीं सदी में सालार मसूद की कथाएँ उत्तरी और पूर्वी भारत में पूजा पद्धति का रूप ले लीं। जगह जगह उर्स आयोजित किये जाने लगे। जोहरा बीबी और ग़ाज़ी के विवाह के आयोजन किये जाने लगे। साथ ही मसूद की सेना के प्रतीक के रूप में, भालों में लाल और हरे कपड़े, ध्वज बांधकर ले आये जाने लगे। अबुलफजल के अनुसार अब मेला बहराइच के बाहर भी लगने लगा था। ऐसा ही मेला 1561 में आगरा में लगा था। लेकिन ग़ाज़ी के मूल स्थान के रूप में बहराइच ही प्रसिद्ध रहा। आगरा से भी लोग बहराइच जाते थे। मेले में अच्छे -बुरे दोनों तरह के लोग हिस्सा लेते थे। मुग़ल राजवंश के ही 19 वीं सदी के शासक अकबर के हमनाम अकबर -द्वितीय भी मसूद की दरगाह पर जाने और उसकी देखरेख के लिए सिंघा परासी की जमींदारी देने के लिए प्रसिद्ध हैं।

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भी इस मेले की लोकप्रियता बनी रही। अंग्रेज इस मेले में हिंदुओं की संख्या को देखकर आश्चर्य चकित रहते थे। डब्ल्यू एच स्लीमन की पुस्तक 'जर्नी थ्रू द किंगडम ऑफ अवध इन 1849' के हवाले 1913 में एक अंग्रेज एन आई रॉकी ने कहा है कि मेले में 50 प्रतिशत से अधिक हिन्दू होते थे। स्लीमन स्वयं यह देखकर दंग रह गए थे कि हिन्दू और मुस्लिम दोनों मिलकर गाज़ी की मजार पर फूल और चढ़ावा चढ़ा रहे थे, 'जिसकी केवल यही विशेषता ज्ञात थी कि उसने हिंदुओं के प्रदेश पर अकारण हमला किया था और हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था। ' उन्होने गाज़ी मियां के प्रति हिंदुओं की भक्ति को स्वर्ग में उनके प्रभाव के संदर्भ में समझा था।

प्रो फारूकी अपने निष्कर्ष में कहते हैं कि सालार मसूद की वास्तविक पहचान अभी भी अनसुलझी ही है। यह लगभग तय है कि वे गजनी के सुल्तान के भांजे नहीं थे। मिरात- ए -मसूदी' के विवरण काल्पनिक अधिक हैं। संभव है कि तेरहवीं सदी में बहराइच क्षेत्र में तुर्क सेनाओं के साथ लड़ते हुए मसूद नामक सैनिक ने अपनी जान गंवा दी थी। उसकी शहादत के साथ रोगियों को ठीक करने की क्षमता ने धीरे धीरे ईश्वरीय शक्ति का विधान बना डाला। नव- मुस्लिम समुदाय ने इस अंध विश्वास को इस्लाम के लोकप्रिय ढांचे में मिला दिया। फिर इसे चिश्ती सिलसिले से जोड़कर तर्कसंगत बना दिया । अजमेर से सालार को जोड़ देने से मोइनुद्दीन चिश्ती की उदारता स्वयम सन्नद्ध हो गयी। कुल मिलाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचना सुगम है कि ग़ाज़ी मियां का मेला भारतीय जनता की उस आस्था का प्रतीक है जो सैनिक शक्ति, नैतिकता, चमत्कारी शक्ति, रोगों से मुक्ति, मुकदमों में विजय, और दुनियावी समस्याओं के समाधान हेतु उपजती रही है। प्राचीनता के आवरण में आस्था के संरक्षण का प्रतीक है।

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ग़ाज़ी मिया का मेला - डॉ एस एन वर्मा
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