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कहानी - मेरे बच्चे की माँ! धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आजाद"

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मेरे बच्चे की माँ ! ​​ तारीख तो याद नहीं, लेकिन अप्रैल की गर्मियों की सुबह थी वो। टेलीविजन के खेल समाचारों में वेस्टइंडीज के खिलाफ सचिन तेंद...

मेरे बच्चे की माँ !

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तारीख तो याद नहीं, लेकिन अप्रैल की गर्मियों की सुबह थी वो। टेलीविजन के खेल समाचारों में वेस्टइंडीज के खिलाफ सचिन तेंदुलकर का लगातार दूसरी बार शून्य पर आउट होनेवाला वीडियो बार-बार दिखाकर यह बताने की कोशिश की जा रही थी कि अम्पायर ने उसे गलत आउट दिया है।

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इसी बीच रिमोट के जरिये टेलीविजन की आवाज को कम करते हुये मेरी बीवी ने कहा- 'उस लड़की का पता ठिकाना आखिर मालूम हो ही गया।'

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समाचारों से ध्यान हटाये बगैर मैंने पूछा-'किस लड़की का?'

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उसने कहा-'वही जो माँ बनने वाली थी।'

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शहर में कौन सी कुँवारी लड़की माँ बन गई है, ऐसे विषय पर सुबह-सुबह चर्चा करने का मूड नहीं था। इसलिये मजाकिया लहजे में कहा-'लड़कियों को दो काम तो आते ही हैं। एक तो माँ बनना और दूसरा... ।'

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मैंने जब अपनी बात पूरी नहीं की तो अर्पणा ने पूछा-'दूसरा?'

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मैंने कहा-'यह मत पूछो वर्ना ये तुम्हारे नारी संगठन वाले या वालियां मेरे पीछे पड़ जायेंगे। खैर! तुम किस लड़की की बात कर रही हो?'

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उसने बताया-'वही मुस्लिम लड़की।'

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यह सुनते ही अचानक मेरी धड़कनें तेज हो गईं और पल भर में कई सवाल मेरे जेहन में कौंध गये- मैंने जब अपने अतीत के पन्नों को अर्पणा के सामने खोला ही नहीं तो उसे कैसे मालूम कि किसी मुस्लिम लड़की का मेरे साथ... ? अब सच्चाई जानकर क्या वो मुझे माफ कर पायेगी? ऐसे कई सवाल मुझे अन्दर तक हिला गये। लेकिन जल्दी ही मैंने अटल बिहारी टाइप मुखौटा ओढ़कर संभलने की कोशिश की-'तुम किस मुस्लिम लड़की की बात कर रही हो?'

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अर्पणा ने बताया-'तुम भी! वही जिस पर कल संसद में हंगामा हो रहा था, और विपक्ष नरेन्द्र मोदी के इस्तीफे पर अड़ा था!'

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मैंने पूछा- लेकिन तुम्हें कैसे मालूम? तब वह देशबंधु अखबार का वो हिस्सा मुझे सौंपकर चाय बनाने के लिए चली गई, जिसमें 'गुजरात: खत्म न होनेवाली हॉरर फिल्म ' शीर्षक से एक रिपोर्ट छपी थी। अंडर लाईन किया हुआ हिस्सा मैंने पढ़ना शुरु किया- " उस रोज सत्तर वर्षीय खालिद रोज का काम शुरु करने वाले थे कि राम नाम का जाप करने वाली उग्र भीड़ ने उनके घर पर हमला बोल दिया। जान बचाने को सब भागे-दौड़े, किन्तु दंगाईयों ने एक-एक को पकड़कर जलाना शुरु कर दिया। रुंधे हुये गले से खालिद बताते हैं कि मेरी बेटी कैसरबानो को पहला बच्चा होनेवाला था। दंगाइयों ने त्रिशूलों और तलवारों से उसका पेट चीरकर आठ महीने का बच्चा निकालकर आग में फेंक दिया... !"

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अखबार के आधे पेज में छपी यह रिपोर्ट पूरी पढ़ना चाह रहा था, लेकिन कई कोशिशों के बाद भी ऐसा नहीं कर पा रहा था । बार-बार मेरे दिमाग में एक ही दृश्य आ-जा रहा था- जैसे मेरे सामने ही तलवारों से पेट चीरकर ...!

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मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि कैसरबानो वही है , जिसके पेट में मेरा बच्चा ... हाँ! मेरे बच्चे को ही पेट चीरकर निकाला उन्होंने , मेरे बच्चे को! लेकिन वह तो सकीना थी, फिर यह कैसरबानो मेरी सकीना कैसे हो सकती है? निकाह के बाद कहीं वह सकीना से कैसर तो नहीं हो गई? लेकिन उससे बिछड़े हुये तो एक जमाना गुजर गया, फिर अब तक उसके पेट में वही गर्भ कैसे रह सकता है? अगर ये सकीना है तो क्या उसने भी मेरे बच्चे को...? नहीं!!

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दिल और दिमाग के अन्तर्द्वन्द्व के बीच अर्पणा ने चाय की ट्रे टेबिल पर रखते हुये कहा- 'हुजूर ये रही चाय, और मैं चली । धूप निकल आई और पौधों को अभी तक नहीं सींचा ।'

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वह चाय बनाते-बनाते गुजरात वाली खबर को शायद भूल बैठी थी, इसलिये उसके चेहरे पर पहले सी संजीदगी नहीं थी। मैंने भी थोड़ा हल्का होकर मौसम का फायदा उठाने की फिराक़ में बिना कुछ बोले इशारे से उसे रोका , ताकि दूसरे कमरे में बैठे लोगों तक आवाज न जा सके। उसके पास जाकर मैंने उसे पीछे से आगोश में भरते हुये फुसफुसाया- वह दूसरा काम नहीं पूछोगी? उसने भी फुसफुसाया- कौन सा? मैंने कुछ शरारत करते हुये उसके कान में कहा- वही, बच्चे पैदा करने के अलावा! उसने कमरे में किसी के अचानक न आने का अनुमान लगाते हुये पूछा- बताओ तो सही? मैंने एक हाथ उसके उभरे हुये पेट पर फेरते हुये कहा- ' सींचना! उजाले में पौधों को सींचती हो, और अंधेरे में झाड़ों को!'

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इतना सुनते ही उसे शायद पिछ्ली रात का कोई मंजर याद हो आया था, इसलिये वह झेंपते हुये बोली- ' धत्! बहुत बदमाश हो तुम!' और धीरे-से वह अपने आपको छुड़ाकर चली गई ।

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सोफे में धंसकर चाय की चुस्कियां लेते हुये मैं काफी देर तक अर्पणा के बारे में सोचता रहा । कैसे हम दो अजनबी अचानक ही एक दूसरे के सबकुछ हो गये ! लेकिन अपनी बीवी के ख्यालों के बीच में सकीना की यादें पाकिस्तानी तर्ज पर घुसपैठ कर रही थीं । सकीना ! वही सकीना, जिसे मैं बहुत पीछे छोड़ आया था !

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हाँ! उन दिनों मैं कालेज की पढ़ाई के लिये इन्दौर गया हुआ था। वहीं एक कोचिंग सेन्टर में मुलाकात हुई थी उससे। दरअसल हम दोनों ही बी कॉम प्रथम वर्ष में थे, लेकिन दोनों के कालेज अलग-अलग थे। मैं इस्लामिया करीमिया डिग्री कालेज में था, और वह गुजराती गर्ल्स कालेज में थी।

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मैं एक छोटे-से गाँव का था, इसलिये महानगरीय रहन-सहन में जल्दी सेट नहीं हो पा रहा था। वैसे मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी। इसी सिलसिले में सोल्जर कट बाल और क्लीन शेव करवा चुका था, जबकि हमारे यहाँ तो पिता की मृत्यु पर ही मूँछ मुड़ाई जाती है। गाँव में विशेष अवसरों पर ही बेल्ट लगाया, लेकिन यहाँ तो डेढ़ इंची काला बेल्ट मेरी कमर से चिपका ही रहता। मगर सारी कोशिशों के बावजूद शहरीपन नहीं आ सका था। मेरी सबसे बड़ी मुश्किल थी मेरी बोली। जब भी मुझे किसी से बात करनी होती तो काफी संभलकर बोलना पड़ता था। क्योंकि खड़ी हिन्दी के बीच में अनायास ही बुन्देली शब्द मेरी पोल खोल दिया करते थे ।

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मैं जब भी कोचिंग में सर के किसी सवाल का जवाब दिया करता तो बुन्देली का शब्द सुनकर सहपाठी हँस दिया करते थे। मैं समझता था कि ये लोग मेरी बोली का मजाक उड़ा रहें हैं, इसलिये मुझे उन पर बहुत गुस्सा आया था । लेकिन मेरी यह गलतफहमी जल्दी दूर हो गई, जब सकीना से मेरी नजदीकी बढ़ी । दरअसल उसे मेरी बुन्देली बहुत पसंद थी, और वह बार-बार मुझे अपनी ही बोली में बात करने के लिए कहती थी। हालांकि बहुत सारे शब्द उसकी समझ में नहीं आते थे, इसलिये वह बार-बार 'क्या' 'क्या' कहती थी। जब मैं कोचिंग से लौटकर अपने रूम पर आता तो सकीना का वह धीरे-से 'क्या' 'क्या' कहना मेरे कानों में गूँजता रहता था।

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एक दिन जब हम दोनों कोचिंग से लौट रहे थे तो मेरे आग्रह पर मेरा रूम देखने के लिये मेरे साथ आई। मेरे रूम पर उसे एक स्पेशल चीज मिल गई थी। मेरी माँ शुद्ध घी से बनाये गये मगद के लड्डू भेजती थीं। मैं तो ये सोचकर कम खाता था कि कहीं वो जल्दी खत्म न हो जायें, लेकिन सकीना ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह मेरी माँ के हाथ के उन लड्डुओं की ही महिमा थी कि अब सकीना मेरे रूम पर अक्सर आने लगी थी। और अब हम दोनों अच्छे अन्तरंग हो गये थे।

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हमारी मित्रता को अन्तरंगता तक पहुंचाने में शहर की लड़कियों को अपने परिजनों से मिलने वाली आजादी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हमारे गाँव में तो लड़कियाँ स्कूल से लौटने में यदि पाँच-दस मिनिट लेट हो जाती हैं तो पूछताछ शुरु हो जाती है। लेकिन सकीना के साथ शायद ही कभी ऐसा हुआ हो। दूसरी बात, हमारे गाँव में भाई-बहिन को छोड़कर अन्य लड़का-लड़की साथ-साथ घूमते नहीं देखे जा सकते। जबकि यहाँ सकीना के साथ शहर घूमते हुये हमें न तो किसी ने टेढ़ी नजर से देखा, और न ही फटे में टांग दी। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि सकीना मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी; जबकि गाँव में तो हर लड़की चाहे वह छोटी हो या बड़ी , किसी भी परिचित या अपरिचित को भैया कहकर बात करती हैं। इसी कारण अंतरंगता तो दूर, मित्रता भी नहीं हो पाती।

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अन्तरंगता के इस दौर में हमने एक दूसरे को काफी करीब से जाना। मैंने जाना कि मुसलमान होते हुये बुर्के में कैद रहना उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं। वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही सम्वेदनशील थी। एक दिन अनायास ही मेरे यह पूछने पर कि तुमने कॉमर्स सबजेक्ट ही क्यों चुना ? तब वह बोली थी- 'लोग डिग्री के लिये या इनकम टैक्स या घपले-घोटालों पर लीपा-पोती करना सीखने के लिए कॉमर्स चुनते हैं। लेकिन मैं यह समझना चाहती हूँ कि देश की अर्थ व्यवस्था कैसे सँवारी जा सकती है ।' उसकी ये खूबियाँ मुझे अपनी तरफ खींच रही थीं।

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कभी-कभी तो उसकी साफगोई इतनी बेबाक हुआ करती थी कि मैं भी झेंप जाता था। जैसे एक दिन गाँव की लड़की बनाम शहर की लड़की पर बातचीत करते समय, जब मैंने कहा कि गाँव की लड़कियाँ भोली भाली ज़रूर होती हैं, लेकिन खूबसूरत तो शहरी लड़कियाँ ही होती हैं। तब उसने बड़ी सहजता से कहा था- देखो तुम मेरे जैसी किसी शहरी के झांसे में न आ जाना, यह खूबसूरती बिल्कुल बनावटी है, नेचुरल तो गाँव की लड़कियाँ ही होती हैं। वो कैसे? मेरे पूछने पर वो बोली थी- ' साफ-सुथरे कपड़े, लिपिस्टिक क्रीम शैम्पू जैसी चीजें, और सही नाप की ब्रा... ' यह कहकर वो जोर से हँसी थी। उसके हंसने का कारण जो भी रहा हो, लेकिन उसके साथ मुझे भी हँसना पड़ा था।

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सकीना के ऐसे व्यवहार पर मुझे शहरी अनुभव वाले अपने गाँव के एक दोस्त की बात याद आई थी- 'अधिकांश शहरी लडकियाँ बहुत चालू हुआ करती हैं, ये उनकी चाल से ही पता चल जाता है ।' शायद यही कारण था कि अब मैं सकीना की चाल पर बारीकी से ध्यान देने लगा था। वैसे ये मेरा शक नहीं था, बल्कि संभावना को सफलता में बदल देने की तीव्र आतुरता थी।

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इसी सिलसिले में जब एक दिन मेरे रूम पर मैंने उसकी कापी के पहले पेज पर एक कोटेशन 'लव इज बेटर देन लाइफ' पढ़ा तो 'बेटर देन' पर कलम चला दी। बचा रह गया 'लव इज लाइफ' । बेशक़ वह मुझसे ज्यादा साहसिक और समझदार थी, इसलिये उसने लव के ऊपर 'आई' और नीचे 'यू' लिखकर इस बुझी-बुझी सी प्रेम कहानी को हसीनतर मोड़ दिया। अब हम लोग कोचिंग टाईम के अलावा कालेज से गोल मारकर भी मिलने लगे थे। इस तरह के गोल तभी मारे जाते थे, जब 'डी डी एल जे' टाइप कोई नई फिल्म रिलीज़ होती थी।

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हम सिर्फ़ मौज मस्ती में ही लगे रहते हों , ऐसा भी नहीं। पढाई के समय पढाई भी खूब करते थे। परीक्षा का समय नजदीक आ जाने पर तो तैयारी और भी तेज कर दी थी। अक्सर हम दोनों मेरे रूम पर पढते थे।यहाँ पर मौका देखकर पढाई के अलावा कुछ और भी हो जाता था।

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यह नशा तो उस वक़्त उतरा, जब थोड़े दिनों बाद याने तीन पेपर हो जाने के बाद सकीना ने आकर मुझे बताया कि उसकी एमसी नहीं आ रही है। मुझे लगा था कि वो मजाक कर रही है, लेकिन जब वह आँसू बहाने लगी तो लगा कि वाकई कोई गड़बड़ हो गई है। मैंने अपनी घबराहट छिपाकर उसे धीरज बंधाया और आगे सोचने समझने के लिए समय मांगा ।

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उसके घर लौटने के बाद मैं काफी देर सोचता रहा। यहाँ तक कि मेरा सिर चकराने लगा। काफी विचार करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि अब किसी तीसरे आदमी की मदद ली जाना चाहिये। लेकिन ऐसी संवेदनशील बात चार दिन के दोस्तों को तो बताई नहीं जा सकती, इसलिये मैंने तय किया कि कोचिंग वाले सर की मदद ली जाये। क्योंकि इतने बड़े शहर में सिर्फ वही विश्वसनीय जान पड़े।

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आखिरकार मैंने अपने सर को हमराज बनाया। लेकिन उन्होंने मेरी इस जानलेवा समस्या को बेहद हल्के में लेकर कहा- 'इतना परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, एम सी रुकने का मतलब यह कतई नहीं है कि गर्भ धारण हुआ है। लड़कियों में एम सी अनियमित होंने की शिकायत... । मैंने सर की बात पूरी होने के पहले ही कहा- सर वह बता रही थी कि आज पन्द्रहवां दिन है। तब सर ने बताया- यह अनियमितता पन्द्रह से बीस दिनों तक की भी हो सकती है। मेरी बेचैनी को भाँपते हुये उन्होंने जोड़ा- हाँ! उसकी सुबह की पहली यूरिन से ये जाना जा सकता है कि वह प्रेगनेंट है कि नहीं। सर का ये सुझाव मुझे उपयुक्त लगा, और कल यूरिन लाने का कहकर लौट आया।

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शाम को जब सकीना कोचिंग आई तो मैंने उसे यूरिन टेस्ट के बारे में समझा दिया था। वह दूसरे दिन एक छोटी-सी शीशी में सुबह की यूरिन ले आई थी। उसके जाने के बाद मैं सर के साथ सर के एक डॉक्टर मित्र के पास गया, और यूरिन टेस्ट कराया। डॉक्टर ने जल्दी ही बता दिया- शी इज प्रेगनेंट! यह जानकर मेरा सिर चकरा गया। मेरी स्थिति को समझकर सर मुझे धीरज बंधाते हुये मेरे रूम पर ले आये। यहाँ पर उन्होंने इस समस्या का जो एक मात्र हल बताया था, वह था इवार्शन! अभी तक ये सुना भर था, और सुनने में ही ये डरावना लगता रहा। लेकिन अब इससे सबका पड़ा तो अक्ल ठिकाने पे आई।

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मैंने जब सर से कोई और विकल्प जानना चाहा तो उन्होंने इसे बहुत ही सहज बताते हुये कहा- 'इसमें ज्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है। यह तो पाँच-दस मिनट में हो जाता है। लड़की को एकाध घन्टे थोड़ी कमजोरी महसूस होगी, लेकिन यह कमजोरी ऊपर से देखकर कोई नहीं भाँप सकता।और चौबीस घंटे बाद तो सबकुछ सामान्य।' उन्होंने शायद मेरी एक दूसरी परेशानी को समझकर अपनी बात में यह भी जोड़ दिया- यह इवार्शन मेरा डॉक्टर मित्र नहीं, बल्कि उसकी पत्नी डॉ हेमलता करेंगी।

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मैंने सर से आनेवाले खर्च की जानकारी चाही तो उन्होंने बताया- 'इस तरह का केस यदि एक नम्बर का हो तो हजार ग्यारह सौ में हो जाता है। लेकिन जब यही केस दो नम्बर का हो तो पाँच से दस हजार तक। मगर तुम चिन्ता मत करो, नम्बर दो का यह काम नम्बर एक में ही हो जायेगा!'

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अगले दिन दोपहर में जब वो आई तो मैंने उसे ये सब बताया।जिसे उसने खारिज कर दिया। मैंने उसे समझाया कि इसमें कोई जोखिम नहीं है। तब वह तमतमाकर बोली- 'मैं जोखिम से नहीं डरती, यह मेरे बच्चे का सवाल है।मैं अपने बच्चे को पैदा होने के पहले ही कत्ल नहीं कर सकती।' मैंने लगभग गिड़गिड़ाते हुये कहा- 'देखो ये अपना बच्चा है ज़रूर, लेकिन हमने जो भी किया, वह इसके लिये तो नहीं किया था।' अब वो झल्लाकर बोली थी- 'तो किसलिए किया था? अपनी हवस बुझाने के लिये ? सारे मर्द यही तो करते आये हैं। कोई भी बच्चे पैदा करने के लिये नहीं करता ये सब... इसलिये देश व दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जिनका होना न होने की तरह है ।'

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उसकी इस गुडलेंथ पर मैंने डिफेन्स ही बेहतर समझा- ' सकीना प्लीज! यह उलझने का समय नहीं है, क्योंकि हमारे पास अभी दूसरा विकल्प नहीं है ।' वह तपाक से बोली- 'विकल्प नहीं है? क्या हम शादी नहीं कर सकते?' उसकी इस बात पर मैंने अपनी अभिनय कला का प्रदर्शन करते हुये कहा- ' ओफ्फो! तुम क्या पागल हो गई हो? यह कोई शादी करने की उम्र है क्या? और कर भी लूँगा तो क्या तुम्हें घास खिलाउँगा?

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सीधा क्यों नहीं कहते कि तुम कायर हो या पूरा हो चुका है मक़सद! उसका ऐसा कहने पर मैंने अपना स्वर बदला- ' देखो अब ज्यादा बहस की ज़रूरत नहीं है। मैं तुमसे प्यार करता हूँ और शादी करने के लिये भी तैयार हूँ, लेकिन इसके लिये अभी काफी समय है। हमें इंतज़ार करना होगा।'

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मेरी बात पूरी होने के पहले ही वह पलकों में रुके हुये आँसुओं को पोंछकर जाने लगी। तब मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा- 'देखो सकीना! जहाँ तक इवार्शन की बात है तो हमारे सर भी इसके पक्ष में हैं।' यह सुनते ही उसने मुझे धकियाते हुये कहा- 'अच्छा! अब ये और रह गया था? याने मेरे प्यार को तमाशा बनाना चाहते हो तुम? ठीक है, तुम शादी करो न करो, लेकिन मैं इसे जन्म दूँगी ।' यह कहकर वह रूम से बाहर निकल गई । मैंने उसे काफी रोका, लेकिन वह नहीं रुकी। परेशान होकर मैं सीधा सर के पास पहुँचा, और उन्हे सारी बात बताई।तब उन्होंने मुझसे कहा-' देखो टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है, अभी पर्याप्त समय है, हम कोई न कोई हल खोज लेंगे। फिलहाल तुम पेपर की तैयारी करो।'

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मैंने सोचा था कि जब वो कोचिंग आयेगी तो सर ही उसे समझाने की कोशिश करेंगे। लेकिन उसने कोचिंग आना भी बन्द कर दिया था। यह देखकर एक दिन मैं उसके घर पहुँच गया। उसके पापा तो ऑफ़िस गये हुये थे, और भाई पड़ोस में क्रिकेट खेल रहा था। उसकी अम्मी ने मुझे देखते ही शिकायत की- 'क्यों बेटा, बहुत दिनों में आ रहे हो?' मैंने सहज रहते हुये कहा- पेपर चल रहे हैं ना अम्मी! तब अम्मी ने कहा- 'चार पांच दिनों से न जाने क्यों ये अनमनी सी है। न खाने-पीने का होश है और न पढाई लिखाई का खयाल। ऊपर से कुछ बताती भी नहीं । अगर कोई पेपर बिगड़ गया है तो इसमें रोने-धोने से क्या होने वाला है। छुप छुपकर रोती रहती है। बेटा तुम अच्छे आ गये। अब तुम्हीं समझाओ , जब तक मैं चाय बनाकर लाती हूँ ।' अम्मी यह कहकर किचिन की ओर चली गईं , और मैंने भी चाय के लिये मना करने की कोशिश नहीं की। क्योंकि मैं खुद ऐसा ही कुछ सोचकर आया था।

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एकांत पाकर मैंने सकीना से बहुत धीरे-से कहा- तुमने ये क्या लगा रखा है? उसने जवाब में कुछ भी नहीं कहा। मैंने फिर कहा- 'क्या तुम्हें अपने बाकी पेपर की चिन्ता नहीं है?' जवाब में उसने मुझे बिना कुछ कहे केवल तरेरकर देखा। अबकी बार मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा- 'तुम कुछ बोलती क्यों नहीं हो?' इस बार उसने रूखी सी आवाज में सवाल के बदले सवाल किया- 'तुम मुझे अपने साथ गाँव ले जाने को तैयार हो या नहीं?' उसका यह सवाल मुझे एक धमकी की तरह लगा। मुझे लगा कि मना करने पर यह कोई उल्टा सीधा कदम न उठा ले। इसलिये मैंने कहा-'ठीक है, पेपर हो जाने दो।' मेरी इस बात पर वह झूमकर मुझे गले लगाना चाह रही थी, लेकिन अम्मी बड़े जल्दी चाय बनाकर ले आईं । उनसे कुछ और यहाँ-वहां की बातें करके मैं लौट आया।

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रूम पर लौटने के बाद मेरे दिमाग में काफी उथल-पुथल मची रही। समझ में नहीं आ रहा था कि सकीना को अपने परिवार के सामने एकदम से कैसे पेश करूँगा। आखिरकार मैंने एक योजना बनाई। आखिरी पेपर के ठीक एक दिन पहले मैंने गाँव लौटने की सारी तैयारियाँ कर ली थीं। कोई मेरी हेंड राइटिंग न पहचान सके , इसलिये रात को ही सकीना के अब्बा के नाम एक लाईन का पत्र टाइप करवाया- 'सकीना माँ बनने वाली है।' यह खत उनके ऑफ़िस के पोस्ट बॉक्स में रात को ही डाल आया, और सुबह पेपर खत्म होते ही किसी को भी कुछ बताये बिना मैं अपने गाँव लौट आया। मेरा खयाल था कि अब सकीना के अब्बा ही इस समस्या को हल कर सकते हैं।

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गाँव में गर्मियों की छुट्टियाँ बड़ी बेचैनी में कटी। हमेशा सकीना का चेहरा साथ-साथ रहा। कई बार चाहा कि इंदोर जाकर उसकी खबर ले आऊँ। लेकिन सकीना के अब्बा के हाथ में चमचमाती तलवार और उग्र भीड़ का खयाल आते ही मैं सहम जाता।

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आखिरकार अपना रिजल्ट जानने के लिये एक दिन मैं इन्दौर पहुँचा। किसी अनजाने डर के कारण अपने रूम पर न जाकर सरवटे बस स्टैंड के पास बजरंग लॉज में ठहरा। दोपहर में कालेज गया, और अपना रिजल्ट पता किया- सैकेण्ड डिवीजन! अब सकीना के बारे में काफी सोचने के बाद मैंने फैसला किया कि चाहे जो भी हो, आखिरी बार उसके घर हो आऊँ।

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मैं काफी सहमा-सहमा उसके मकान के सामने पहुँचा तो पड़ोसियों ने बताया-' वह अपनी प्राइवेट नौकरी छोड़कर पूरे परिवार के साथ बड़ौदा लौट गये। यहाँ तो वह किराये से रहते थे।' मैंने जब इन पड़ोसियों से उनका पता जानना चाहा तो किसी को भी जानकारी नहीं थी। अब मैं सीधा अपने रूम पर गया, यह सोचकर कि जाते-जाते सकीना ने अपना कोई सन्देश दरवाजे के नीचे से खिसकाया हो शायद! लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं पाकर मैं सर के पास गया।

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मैंने उन्हें बताया कि सकीना बड़ौदा चली गई है, और मैं उसे खोजने जा रहा हूँ। तब सर ने कहा-'बड़ौदा कोई छोटी जगह नहीं है। कहाँ खोजोगे उसे? और ज़रूरी नहीं कि वो बड़ौदा की ही हो। क्योंकि जिस तरह तुम किसी के पूछने पर तेन्दुखेड़ा या नरसिंहपुर की बजाय जबलपुर बताते हो, उसी तरह हो सकता है कि वो खास बड़ौदा की न होकर आस-पास की हो।' सर की यह बात मानकर मैंने अपना इरादा बदल दिया और पूछा- जाने से पहले उसने आपके पास मेरे लिये कोई मैसेज छोड़ा है? उन्होंने बताया- एक दिन सकीना आई थी। मैंने उससे कुछ और बात करना चाही, लेकिन वो सिर्फ ये पत्र देकर चली गई।

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मैंने सर से वो पत्र लिया और अपने रूम पर आकार खोला। जिसमें एक ही लाईन लिखी थी- 'माय लव! मैं तुम्हें भूल नहीं सकती- तुम्हारी सकीना।' सकीना की यह एक लाईन मेरी उस एक लाईन पर कई गुना भारी थी। इतनी भारी थी कि मैंने रो दिया! खूब रोया! अपनी गलतियों को धो डालने के लिये रोया! सकीना को याद कर करके रोया! सकीना का नाम ले लेकर रोया!

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इतने में अर्पणा ने आकर टोका- 'अरे! सुनिये तो सही, आप खोये कहाँ हैं?' मैं अचानक हड़बड़ाया- सकीना से बिछड़े हुये तो एक जमाना गुजर गया। लेकिन ऐसा लगता है कि कल ही की बात हो!

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इसी बीच अर्पणा ने फिर टोका- 'आपको आज ये हो क्या गया है? क्या गुजरात की रिपोर्ट पढ़वाकर मैंने आपका मूड अपसेट कर दिया?'मैं देख रहा था कि मेरी बीवी मुझे असामान्य देखकर औपचारिकतावश तुम से आप पर आ गई थी।इसलिये मैंने भी सहज होने की कोशिश करते हुये कहा- बस यूँ ही ! और ऐसा कहकर । मैं ऑफ़िस जाने की तैयारी में जुट गया। ऑफ़िस में भी मन नहीं लगा। जानबूझकर घर देर से लौटा। काफी देर तक टीवी देखता रहा, जब आँखें थक गईं तो नींद आ गई ।

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रात के दो बजे किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। मैंने उठकर दरवाज़ा खोला तो सामने छोटे से बच्चे की परछाई देखकर पूछा- कौन हो तुम और इतनी रात को दरवाज़ा क्यों खटखटाया? वह बोला- क्यों बेटा, इतनी जल्दी भूल गये? वैसे इसमें तुम्हारी गलती नहीं है। यह तो सारे हिन्दुस्तानियों की आदत है । तुम लोग जब शम्बूक को भूल सकते हो तो मुझे क्यों नहीं ! उसके इस पहेलीनुमा जवाब पर मैंने फिर पूछा- सीधा-सीधा बताओ कि तुम हो कौन? तब उसने बताया कि मैं कैसर बानो की अजन्मी संतान हूँ । मैंने चौंककर कहा- लेकिन तुम्हें तो कुछ लोगों ने त्रिशूलों से छेद दिया था? वह फौरन बोला- हाँ! मुझे कुछ भगवा गुंडों ने पैदा होने के पहले ही कत्ल कर दिया था, लेकिन आत्मा मरती कहाँ है, मैं तो आत्मा हूँ । मैंने कहा- अच्छा! तो अब तुम प्रेत बनकर हिन्दुओं को परेशान करोगे? उसने कहा- तुमने यह कैसे मान लिया?

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मैंने कहा- तेरे जैसे कटुओं को मैं अच्छी तरह जानता हूँ, हिन्दुओं को नुकसान पहुँचाना ही तुम लोगों का गुप्त एजेंडा है । मेरी इस बात पर वह झल्लाकर बोला- अबे तिलकधारी ! हमारी हिन्दुस्तानियत पर बेबुनियाद इल्जाम लगाता है!! मैंने कहा- इतिहास उठाकर देख लो बेटा! मौहम्मद गजनवी, बाबर.... वह बीच में ही बोला- लगता है कि तुम्हारी इतिहास की जानकारी काफी सीमित है । उसमें यह भी जोड़ लो- " मथुरा-वृंदावन के लगभग पैन्तीस मन्दिरों के लिए अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ ने एक हजार बीघा ज़मीन की व्यवस्था की थी। नवाब सफदरजंग और आस्फुदौला के दीवान ने अयोध्या में हनुमान गढ़ी पर मन्दिर बनाने के लिए; मैसूर में टीपू सुल्तान ने वेंकटरमण, श्रीनिवास और श्रीरंगनाथ के मन्दिरों के लिए जमीनें दान दी थीं । कश्मीर के राजा जैनुल अब्दीन और वुडशाह ने हिन्दू त्योहारों पर सार्वजनिक उत्सव मनाये । इब्राहीम आदिल शाह द्वितीय ने अपने गीतों में सरस्वती की वन्दना की। शेख निजामुद्दीन औलिया की सभाओं में हिन्दी का भक्ति काव्य सुनाया जाता रहा ।"

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उसके इतिहासज्ञान में उलझने की वजाय मैंने बहस को जारी रखा- "देखो बेटा! मंदिरों के लिए ज़मीन दान देने, हिन्दू त्योहारों को मनाने या भक्ति काव्य सुनने से कोई हिन्दुओं का हितैषी नहीं हो जाता । सच तो ये है कि तुम लोगों ने हिन्दुओं पर सदियों तक शोषण-अत्याचार किये और उनका खून बहाया । और जब भी तुम लोगों ने राणा प्रताप, शिवाजी, राणा साँगा एवं पृथ्वीराज चौहान जैसे हिन्दू राजाओं को मजबूत होता देखा तो उन्हें रास्ते से हटाने के लिए सारी चालाकियाँ अपनाई । जबकि हिन्दुओं ने मुगल शासकों को अपना संरक्षण दिया। ना मानो तो हुमायूँ से पूछ लेना; उसे जब शेरशाह सूरी ने हराया तो अमरकण्टक के राणा ने शरण दी थी और यहीं अकबर पैदा हुआ था।"

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मेरे इस इतिहास ज्ञान पर अजन्मे मुस्लिम शिशु की वो आत्मा कसमसाकर बोली- " तुम कहना क्या चाहते हो ? सत्ता के लिए जितनी भी लड़ाईयाँ हुई हैं, क्या वह दो धर्मों की लड़ाईयाँ थीं? ये खूनी संघर्ष यदि दो धर्मों के बीच था तो हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर की ओर से राजा मानसिंह , राणा प्रताप की ओर से हकीम खाँ सूर , गुरु हरगोविन्द की सेना में पैडा खान, मराठा सरदार जाधव राय कुछ समय निजाम शाह के साथ और उनके दामाद शाहजी भौंसले याने शिवाजी के पिता कुछ समय तक मुगलों के साथ क्यों रहे ? राणा साँगा का साथ महमूद लोदी और हसन खां मेवाती तथा झाँसी की रानी का साथ कुंवर गुलाम गौस खान ने क्यों दिया? क्या ये लोग अपने-अपने धर्मों के प्रति ईमानदार नहीं थे?"

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मैंने कहा- देखो बच्चे! ये सब सियासत का खेल है । क्या मैं अकबर जैसों को जानता नहीं हूँ । अरे उसने अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिये क्या नहीं किया ? जगह जगह हिन्दुओं से रिश्तेदारियां कर डालीं । निजी स्वार्थों के लिये रिश्ते जोड़ने और तोड़ने की कला तो कोई तुम्हारे इन शासकों से सीखे। और तुम्हारे औरंगजेब ने तो हद ही कर दी, उसने तो सत्ता के लिये अपने भाई दाराशिकोह को मौत के घाट उतार दिया था ।"

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वह तमतमाकर बोला- " क्या अजातशत्रु ने अपने पिता विंबशाह को नहीं मारा था? और महाभारत उठाकर देख लो, तुम लोगों ने तो भरी सभा में अपनी माँ बहिनों तक को नहीं छोड़ा! अपने धर्म पर हुये इस प्रहार से मैं तिलमिलाकर बोला- ए डेढ़ इंची के! अपनी औकात में रह के बात कर!! साले तू क्या समझे रामायण-महाभारत को! उनके प्रतीकों को समझना तो तेरे बुखारी के वश की बात नहीं है, फिर तू क्या है?

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मुझे आहत देखकर वह मुस्कराया- "अच्छा! अपनी बीवी बीवी और दूसरे की लुगाई? अब कहोगे कि नेपाल राज परिवार का हत्याकांड आई एस आई की साजिश है!" अल्बर्ट पिंटो की तरह मुझे भी गुस्सा आया- " साजिश नहीं तो और क्या है? तुम लोग हिन्दू राष्ट्रों में अस्थिरता फैलाना चाहते हो और देवयानी के बहाने नेपाल से भारत के सम्बंध खराब करना चाहते हो । और तो और, पूरी दुनिया को गोधरा बना देना चाहते हो ।"

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वह दाँत किसमिसाकर चिल्लाया- हम सारी दुनिया को गोधरा बनाना चाहते हैं? अरे यह तो तेरे जैसे बजरंगियों की करतूत है जो गुजरात में नरसंहार हुआ! मैंने शांत रहकर वैज्ञानिक अंदाज में कहा- देखो बच्चे, यह तो क्रिया की प्रतिक्रिया थी। मेरी बात पूरी होने के पहले ही वह बोला- क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं थी यह ! यह तो प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया थी। क्योंकि क्रिया तो आडवाणी की रथयात्रा से शुरु हुई थी , और मुख्य क्रिया तो 6 दिसंबर 92 को बाबरी विध्वंस था! लेकिन इसके बाद के दंगों से तुम लोगों ने कोई सबक नहीं लिया, और फिर अयोध्या में पूरी गुण्डागर्दी से शिलादान कराया । और सहायक क्रियायें गिनाऊँ ? तेरे आडवाणी ने सिमी जैसे इस्लामी कट्टरपंथी संगठन पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन आरएसएस और विहिप जैसे हिन्दू कट्टरपंथियों को छोड़ दिया।

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उसके इतिहास और विज्ञान के इस मिश्रण का जवाब मैंने उसी के अंदाज में दिया- देखो बेटा, क्या क्रिया थी और क्या प्रतिक्रिया थी, ये मुझे तुमसे समझने की जरुरत नहीं है । चाहो तो दंगों का इतिहास उठाकर देखो- " 23 नवम्बर 1979 को तुम लोगों ने हैदराबाद के भाग्यलक्ष्मी मंदिर को तोड़ा, तब दंगे हुये! और ऊपर से कुतर्क ये कि अरब सरकार ने मक्का में काबा को अधिग्रहित किया , इसलिये नाराज मुसलमानों ने यह मंदिर तोड़ा ! यह तो सरासर बेहूदगी है, आखिर अरब सरकार की कार्यवाही से हिन्दुओं का क्या सम्बंध? इसी तरह 31 अगस्त 1969 को जेरूसलम की अलअक्सा मस्जिद पर इस्राइलियों द्वारा कब्जा कर लिये जाने के विरोध में तुम लोगों ने हिन्दू बस्तियों और मंदिरो पर हथियारबन्द हमले किये । अब बताओ तुम्हारी यह क्रिया थी या प्रतिक्रिया..?

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मेरी बात पूरी होने के पहले ही उसने बोलना चाहा- यह सब .... । लेकिन मैंने उसे डांटकर कहा- चुप ! और मेरी पूरी बात सुन- " थाणे जिले के भिवन्डी कस्बे में 07 मई 1970 को शिवाजी जयंती के जुलूस पर , अप्रैल 1979 में जमशेदपुर रामनवमी के जुलूस पर और अक्तूबर 1983 में हजारीबाग बिहार में दुर्गा पूजा के दौरान प्रतिमा विसर्जन के लिये जाती हुई हिन्दुओं की भीड़ पर तुम लोगों के हथियारबंद हमलों से दंगों की शुरुआत हुई । फरवरी 1983 में कर्नाटक के बीजापुर एवं बेल्लोरी में एक हरिजन महिला के साथ तुम लोगों के द्वारा सामूहिक बलात्कार किये जाने के बाद ही दंगे हुये । यह मैं नहीं कहता , बल्कि ऐसे दंगों की जाँच के लिये गठित लगभग तीन दर्जन जांच आयोगों की रिपोर्ट कहतीं हैं ।"

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वह तपाक से बोला- यह तुम जैसे हिन्दुओं के पूर्वाग्रही निष्कर्ष हैं । जबकि सच तो ये है कि थाने में दंगों की रिपोर्ट लिखानेवाला हिन्दू, लिखनेवाला हिन्दू, जाँच कमीशन बैठानेवाला हिन्दू और उसमें भी हिन्दू ! क्या ऐसे में आयोग की रिपोर्ट... उसके इस खतरनाक बयान को पूरा होने के पहले ही मैंने टोका- अच्छा बेटा! तुम्हारे पक्ष में नहीं हैं तो ये रपटें संदिग्ध हो गईं ? तो भारत-पाक मैच में पाकिस्तान की जीत पर तुम लोग जो जश्न मनाते हो वो ? और जेहाद के नाम पर लादेन जैसे आतंकवादी के समर्थन में जुलूस निकालते हो? क्या इसके लिये किसी जाँच कमीशन की जरुरत है?

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तब वह खीजकर बोला- वाह गुरु! फिजी में भारतीय मूल के महेन्द्र चौधरी के प्रधान मंत्री बनने पर तुम लोग जश्न मना सकते हो ! वेस्टइंडीज में जन्मे और इंग्लैंड में रह रहे बी एस नायपाल जैसे विदेशी को नोबेल पुरस्कार मिलने पर तुम लोग अखबारों के पन्ने रंग सकते हो! बंगलादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों का विरोध अपनी हिन्दू कट्टरता के कारण करते हो ! और जब यही हम लोग करते हैं तो तेरे जैसे कुत्ते हिन्दू.... । उसकी इस गाली का जवाब मैंने अपनी दहाड़ से दिया- ए कटुये! मैं कोई गाँधी-वांधी नहीं हूँ कि अश्लील गाली को सहन कर सकूँ । तब वह बोला- ए पाखंडी! शिव का लिंग पूजने वालों को श्लील अश्लील की बातें शोभा नहीं देती ।

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उसकी इस बात से जब मेरी धार्मिक भावनायें आहत हुईं तो मैंने कहा- लगता है कि तू मरने के बाद जिन्ना की आत्मा से मुलाकात कर आया है, इसलिये इस तरह की बाहियात दलीलें दे रहा है! वह आवेश में आकर बोला- दंगाईयों के हाथों क्रूर और अकाल मौत पाने के बाद कौन सेकुलर बना रह सकता है? लेकिन तू तो साले जिन्दा है तब भी आडवाणियों, कटियारों, सुदर्शनों, ठाकरौं और मोदियों जैसी घटिया मानसिकता पाले हुये है! इसलिये तू इसी के लायक है... उसने ऐसा कहकर मुझे जोर से एक लात मारी और मैं धड़ाम से गिर पड़ा !!

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गिरने के बाद जब मेरी नींद खुली तो पता चला कि यह सब एक सपना था और मैं पलंग से नीचे गिर पड़ा हूँ । अपने साथ नीचे गिरे हुये तकिये को उठाकर जब मैं पलंग पर आया तो देखता हूँ कि अर्पणा अपने पैरों को पेट तक सिकोड़े हुये है, और उसके दोनों हाथ भी उसके उभरे हुये पेट पर फैले हुये हैं । शायद कैसर बानो वाली खबर उसके अचेतन में बैठ गई है, इसलिये वह अपने होनेवाले बच्चे के लिये अपने हाथों एवं पैरों से सुरक्षा का घेरा बनाने की कोशिश कर रही है !

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नींद में भी अपने बच्चे की फिक्र में डूबी हुई अपनी बीवी को देखकर भावुक होते हुये मैंने जैसे ही उसके पेट को छूने की कोशिश की , वैसे ही वह सकपकाकर उठी और बोली- क्या? मैंने उसे इशारे से कहा- कुछ नहीं! और फिर उसे बाहों में लेकर बच्चे का सुरक्षा घेरा और भी मजबूत कर दिया। लेकिन नींद आने तक मेरे कानों में 'क्या' 'क्या' गूंजता ही रहा !

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@धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आजाद"

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रचनाकार: कहानी - मेरे बच्चे की माँ! धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आजाद"
कहानी - मेरे बच्चे की माँ! धर्मेन्द्र तिजोरीवाले "आजाद"
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