कोरोना लॉक डाउन पर....... एकांत श्राप नहीं, सृजन की झंकार है - डॉ. सूर्यकान्त मिश्रा

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कोरोना लॉक डाउन पर.......     एकांत श्राप नहीं, सृजन की झंकार है    ******************************* लॉक-डाउन को वरदान में बदलना मुश्किल नहीं...

कोरोना लॉक डाउन पर.......

    एकांत श्राप नहीं, सृजन की झंकार है

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लॉक-डाउन को वरदान में बदलना मुश्किल नहीं..........

                सदियों बाद एक बड़ी आपत्ति ने हम सभी को घरों में कैद कर दिया है । पूरी दुनिया इस समय एकांतवास में चली गई है ।बाहर का हो- हल्ला और दौड़ती- भागती जिंदगी से हम सभी बे- खबर हो चले हैं । जो व्यक्ति अपने कर्तव्य की प्रतिपूर्ति में दिन भर यहाँ- वहाँ भागता फिरता है ,उसे यह एकांतवास किसी जेल से कम नही लग रहा है । खुद के साथ ही अन्य लोगों के जीवन को सुरक्षित रखने घरों पर बने रहना हम सबके लिए सुकून भरा भी हो सकता है । जरूरत है समय के अनुसार खुद के विचारों में परिवर्तन लाने की । हम चाहें तो इस अकेलेपन को सृजनात्मकता के मार्ग में प्रशस्त कर अपने जीवन के स्वर्णिम पलों के रूप में सँजो सकते हैं । हमेशा नकारात्मकता में उलझे रहना हमारी सृजन शक्ति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता रहा है । सकारात्मक विचारों के साथ अकेले कमरे में बैठे हम अपनी भावनाओं को नए पंख प्रदान कर उड़ान भर सकते हैं । हो सकता है हमारी यही उड़ान हमारे जीवन के सबसे अच्छे समय के रूप में इतिहास लिख जाए । समय बेशकीमती होता है । कालांतर में ही इसके मूल्य एवम महत्व को समझा जा सकता है । समय अपने साथ अनूठे अवसर लेकर आता है । यदि एक क्षण भी व्यर्थ चला गया तो वह अमूल्य अवसर सदा के लिए हमसे दूर चला जाता है । समय का महत्व समझने वाला ही आसमान की बुलंदियों को छू पाता है ।

                  कोरोना वायरस नामक जानलेवा बीमारी के संक्रमण से देश वासियों को बचाने के सबसे बड़े उपाय के रूप में "लॉक - डाउन " जैसी प्रक्रिया को अंजाम देना हम सबके लिए एक संकट के रूप में सामने आया है । इसका दूसरा पहलू इस तरह भी समझा जा सकता है कि कुछ लोग कुछ लोग इसे एकांतवास से जोड़कर देख रहे हैं ,तो कुछ लोग अकेलापन भी मान रहे हैं । सवाल यह उठता है कि एकांत और अकेलापन भला अलग कैसे हो गए ? दोनों का अर्थ तो एक ही होता है । जहाँ तक मैं मानता हूँ ये दोनों शब्द एक समान होते हुए भी अलग मायने रखते हैं ।अकेलापन तब होता है ,जब हम अपने अकेले रहने से व्यथित रहते हैं , दुःखी होते हैं अथवा परेशान होते हैं । हमारा मन उस अकेलेपन से भागने लगता है और अपनों की भीड़ में समा जाना चाहता है । अकेलेपन में दुखद और कष्टप्रद अनुभव होने लगते हैं ।इसके विपरीत एकांत हमें शांति एवम सुकून प्रदान करता है ।एकांत में हमारे जीवन का संगीत फुट पड़ता है । यह संगीत किसी भी सृजन से संबंधित हो सकता है । हम अपने अच्छे विचारों को कलमबद्ध कर साहित्य की सेवा कर सकते हैं । ऐसे समय में हम अपने आस- पास की समस्या पर चिंतन करते हुए उस पर अपने सुझाव कार्यपालिका और न्यायपालिका तक पहुंचाकर अपनी समाज के प्रति जवाबदारी को पूरा कर सकते हैं ।

                   वास्तव में देखा जाए तो एकांत एक वरदान है तो दूसरे रूप में यह एक अभिशाप भी है । एकांत को हम अपने मन की प्रवृति  के अनुरूप परिभाषित कर सकते हैं । एक साधक के लिए एकांत का क्षण समाधि का सोपान है । एक भक्त के लिए भगवान से मिलन का मधुर अनुभव और एक वैज्ञानिक के लिए शोध तथा विचार का क्षण है । यदि हमारा मन स्वस्थ ,सुदृढ़ और शांत रहता है तो एकाकीपन हमारे लिए सबसे बड़ा मित्र एवम शुभेच्छु बन जाता है । इसके विपरीत रुग्ण एवम दुर्बल मन के लिए अकेलापन किसी दुःस्वप्न के समान भीषण एवम डरावना लगता है । सच्चाई के आईने में देखें तो जिससे हम डर रहे हैं या जो हमें डरा रहा है, वह कोई और नहीं बल्कि हमारे नकारात्मक कर्मों का परिणाम ही है । इन सारे विकारों से बचने के लिए जरूरत है -- सकारात्मक सोच की , रचनात्मक चिंतन की एवम सद्व्यवहार या सदाचरण की । अकेलेपन को दूर करने में अच्छी एवम शिक्षाप्रद किताबें सबसे बड़ा औजार बनकर हमारे समक्ष आती हैं । इनका साथ मिलते ही हमारा मन सदविचारों से अभिप्रेरित होने लगता है । हमें ऐसे समय का सदुपयोग करने की नियत से रचनात्मक एवम अच्छे कार्यों की एक सूची तैयार कर लेनी चाहिए ताकि हमारा मन किसी भी स्थिति में अनियंत्रित न होने पाए । मन यदि मजबूत हो तो अकेलेपन में ही सर्वश्रेष्ठ कार्य का संपादन किया जा सकता है । हमारे ऋषि- मुनियों द्वारा रचित ग्रंथ इसके जीवित प्रमाण हैं ।

                हमारा मन यदि मजबूत है तो अकेलेपन में ही सर्वश्रेष्ठ कार्य का संपादन किया है सकता है । इतिहास इस वात का साक्षी रहा है कि विश्व के श्रेष्ठतम कार्य एकांत में ही सम्पन्न हो पाए हैं । जिस एकांत से लोग भागते रहे ,उसी एकांत में महान विचारकों ने दुनिया को अचंभित करने वाले आविष्कार एवम अनुसंधान कर दिखाए । जीवन के प्रति गंभीर दृष्टि रखने वाले संत - महात्मा जीवन को सर्वोच्च ग्रंथ मानते रहे हैं । जिन ग्रंथों एवम आविष्कारों का जन्म केवल एकांत में हो पाया ,वह जनसभाओं अथवा भीड़- भाड़ में संभव नहीं था । शायद इसी एकांतपन के सकारात्मक एवम सृजनात्मक परिणाम को देखते हुए कविवर रबिन्द्रनाथ टैगोर ने --" एकला चलो रे ! एकला चलो रे !! " का नारा बुलंद किया था । हमारा देश ऋषि- मुनियों का देश रहा है । आध्यात्म हमारी आत्मा का मुख्य अंग रहा है । हमारे ऋषियों ने कभी अकेलापन महसूस नहीं किया । जंगलों में कई - कई वर्षों तक तप करते हुए अपने अंदर अद्भुत शक्ति का संचय किया । दूसरा अकेलेपन के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद जी ने उपदेश देते हुए कहा था --" अकेले रहो ! अकेले रहो !!" जो अकेला है ,न तो वह दूसरों को परेशान करता है और न ही दूसरों से परेशान रहता है । जीवन में अकेलेपन को वरदान बनाओ न कि अभिशाप । अतः हमें अकेलेपन में श्रेष्ठ विचार, पवित्र भाव एवम सदाचरण की संगति करते हुए उसे मूल्यवान क्षण में परिवर्तित करना चाहिए ।

                   अकेलेपन की तन्हाई एकांत के सरगम में बदलकर एक दिव्य संगीत की सृष्टि करती है और संगीत के स्वर में अकेलापन बुलबुले के समान विलीन हो जाता है । एकांत में अनगिनत रहस्यों से सिमटा हुआ जीवन परत- दर - परत खुलने लगता है और अज्ञात के विविध आयाम प्रकट होने लगते हैं ।            

                      डॉ. सूर्यकान्त मिश्रा

            न्यू खंडेलवाल कॉलोनी ममता नगर

            प्रिंसेस प्लैटिनम ,हाउस नंबर 05,

            राजनांदगाँव, (छ. ग.)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: कोरोना लॉक डाउन पर....... एकांत श्राप नहीं, सृजन की झंकार है - डॉ. सूर्यकान्त मिश्रा
कोरोना लॉक डाउन पर....... एकांत श्राप नहीं, सृजन की झंकार है - डॉ. सूर्यकान्त मिश्रा
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