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उत्तराखण्ड की लोककथा - जीवन कथा - डॉ. उमेश चमोला

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उत्तराखण्ड की लोककथा जीवन कथा - डॉ. उमेश चमोला आम का एक बडा पेड़ था। उस पर नर एवं मादा पक्षी घोंसला बनाकर रहते थे। उनके दो छोटे-छोटे बच्चे ...

उत्तराखण्ड की लोककथा

जीवन कथा

- डॉ. उमेश चमोला

आम का एक बडा पेड़ था। उस पर नर एवं मादा पक्षी घोंसला बनाकर रहते थे। उनके दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे। एक बार मादा पक्षी बीमार पड गई। उसने नर पक्षी से कहा, ’’ मुझे लगता है इस दुनियाँ में मेरा समय पूरा हो गया है। मौत पर किसका बस चला ? परन्तु तुम्हें मुझे वचन देना होगा।’’

’’क्या’’ ? - नर पक्षी उत्सुकता से बोला।

’’हमारे दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं। मुझे इनकी चिन्ता है। मेरे मरने के बाद तुम दूसरा ब्याह नही

रचाओगे। हो सकता है दूसरी मादा इन बच्चों को मार दे।’’ - मादा पक्षी ने अपने हृदय की व्यथा को प्रकट किया।

’’भगवान पर विश्वास रखो। तुम कुछ दिन में ठीक हो जाओगी। तुम ऐसा कहती हो तो मै वचन देता हूँ ‘‘- नर पक्षी ने कहा।

कुछ दिनों के बाद मादा पक्षी मर गई। नर पक्षी को कुछ समय तक अपने दिए वचन याद रहे लेकिन एक दिन उसने सोचा - ’’अब हमारे बच्चे बड़े हो गए हैं। कुछ दिनों में ये घोंसला छोडकर फुर्र उड जाएंगे। तब मैं अकेले कैसे जीवन बिताऊंगा ?’’ उसने दूसरी मादा पक्षी से ब्याह रचा दिया। मादा से उसने यह वचन भी ले लिया कि वह उन दो बच्चों का पूरा ध्यान रखेगी। नई मादा पक्षी दुष्ट थी। वह सोचने लगी -’’मैं इस उम्र में दूसरों के बच्चों की देखभाल कर रही हूँ। मुझे तो अपने बच्चों की देखभाल करनी चाहिए थी।’’

एक दिन नर पक्षी दाना लेने बाहर गया हुआ था। मादा पक्षी ने उन बच्चों को मारकर झाड़ी में फेंक दिया। नर पक्षी जब घर आया वह रोते हुए बोली -

’’आज बाज पक्षी यहाँ आया था। उसने मुझ पर हमला किया। मैं जान बचाकर भागी तभी उसने हमारे दो बच्चों को मार दिया।’’

जिस आम के पेड़ पर यह घटना हुई वह राजमहल के नजदीक था। इस कारूणिक दृश्य को राजा अक्षत की रानी सुमेधा ने देखा। वह फफक कर रो पड़ी। रात को सुमेधा ने अपने पति को पूरा वृतान्त सुनाया। वह सोचने लगी -’’पक्षी दंपति की तरह हमारे भी दो बच्चे हैं। यदि मेरी असमय मौत हो

गई। मेरे मरने के बाद अक्षत ने दूसरा विवाह कर लिया तो कही दूसरी रानी उस मादा पक्षी की तरह ही मेरे बच्चों को मार न दे।’’ यह सोचकर रानी सुमेधा सुबकने लगी। राजा के पूछने पर उसने अपने दिल की बात राजा को बता दी। राजा ने रानी की भावुकता को मजाक में लेते हुए दूसरा ब्याह न करने का उसे वचन दिया।

कुछ समय बाद रानी सुमेधा बीमार पड़ गई। दैवयोग से वह दुनिया से चल बसी। अक्षत ने सुमेधा को दिए वचनों को याद करते हुए दूसरी शादी न करने का निश्चय किया।

समय बीतता गया। राजा अक्षत के दो बच्चे सूर्यप्रकाश और चन्द्रप्रकाश भी कुछ बड़े हो गए थे। राजा के वजीर एवं अन्य दरबारी राजा पर दूसरा विवाह करने का दबाव बनाने लगे। राजा सुमेधा को दिए वचनों पर दृढ़ रहा।

एक दिन वजीर ने राजा से कहा - ’’महाराज ! स्वर्गीय रानी ने आपके बच्चों के लालन-पालन एवं सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही आपसे दूसरा ब्याह न करने का वचन लिया होगा। अब राजकुमार बड़े हो गए हैं। अब आपको दूसरा ब्याह कर लेना चाहिए। ’’ राजा ने वजीर की सलाह मान ली किन्तु अपने ब्याह के लिए शर्त रखी कि वह उसी राजकुमारी से विवाह रचाएगा जिसके बाल सोने के हों।

वजीर को मछली खाने का शौक था। एक बार मछली के मुंह में सोने का बाल वजीर को दिखाई दिया। उसे राजा की शर्त याद आ गई। उसने सोचा हो सकता है किसी सोने के बाल वाली कन्या ने नदी में अपना सिर धुला हो। इसी से यह बाल मछली के मुहँ में आया हो। वजीर ने मछुआरे से मछली पकड़ने की जगह का पता किया।

मछुआरे की बताई हुई जगह पर वजीर पहुँच गया। थोडी देर में वहाँ पर एक कन्या अपने बालों को धुलने लगी। उसके बाल सोने जैसे थे। वजीर ने उस कन्या से परिचय पूछा। वह बोली - ’’ मैं पड़ोस के राजा शिवनाथ की लड़की हूँ। मेरा नाम स्वर्णकन्या है।’’

बजीर ने राजा अक्षत को स्वर्णकन्या के बारे में बताया। राजा शिवनाथ की सहमति से अक्षत का विवाह स्वर्णकन्या से हो गया। स्वर्णकन्या खूबसूरत थी। राजा अक्षत स्वर्णकन्या के रूप माया जाल में उलझ गए थे। रानी स्वर्णकन्या जितनी सुन्दर थी उतनी ही चंचल और दुश्चरित्रा भी।

एक दिन चन्द्रप्रकाश और सूर्यप्रकाश गेंद खेल रहे थे। खेलते-खेलते गेंद राजा-रानी के निवास कक्ष में चली गई। बड़ा राजकुमार सूर्यप्रकाश गेंद लेने गया। उस समय वहाँ स्वर्णकन्या अकेले ही थी। ’’माँ ! हम गेंद खेल रहे थे। गेंद इस ओर आ गई थी। क्या आपने देखी ?’’ - सूर्यप्रकाश ने स्वर्णकन्या से पूछा।

’’सूर्यप्रकाश ! इधर बैठो। तुम बहुत अच्छे हो। मुझे माँ मत कहो मेरा नाम स्वर्णकन्या हैं। मुझे इसी नाम से पुकारो‘‘ - स्वर्णकन्या बोली’’

’’माँ ! बाबू (पिता) की लाई हुई ब्वे (माता) और ठाकुर (राजा) की लगाइ स्ये (मुहर,स्याही ) अमिट होती है। तुम मेरी पूज्या माता हो। मैं तुम्हें नाम लेकर कैसे पुकार सकता हूँ ?‘‘- सूर्यप्रकाश ने कहा।

’’देखो ,सूर्यप्रकाश ! तुम्हारी और मेरी आयु में काफी कम अन्तर है। हम दोनो जवान हैं। मैं तुमसे प्यार करती हूँ।’’

स्वर्णकन्या की इस बात को सुनकर सूर्यप्रकाश वहाँ से बाहर दौड़ पड़ा। सूर्यप्रकाश ने चन्द्रप्रकाश को भी यह बात बताई। शाम को जब अक्षत अपने निवास कक्ष में आया तो स्वर्णकन्या ने सूर्यप्रकाश की झूठी शिकायत की - ‘‘ महाराज ! सूर्यप्रकाश मुझे बुरी दृष्टि से देखता है। आज उसने मुझसे प्रणय निवेदन किया। आपने उसे मृत्युदण्ड नहीं दिया तो मैं आत्महत्या कर लूंगी।‘‘

राजा अक्षत स्वर्णकन्या के मोहपाश में बंध चुका था। उसने उसके कथन पर विश्वास कर लिया। राजा ने कहा - ’’महारानी ! मै सूर्यप्रकाश को कोई और सजा दे सकता हूँ किन्तु मृत्युदण्ड नहीं।’’

’’तो राज्य से निकल जाने का आदेश तो दे सकते हो।’’- स्वर्णकन्या बोली।

राजा ने दूसरे दिन सूर्यप्रकाश को राज्य से निकल जाने का आदेश दे दिया। चन्द्रप्रकाश भी उसके साथ चला गया। रास्ते में चलते-चलते वे थककर चूर हो गए थे। दोनों को नींद आने लगी। उन्होंने तय किया बारी-बारी से एक भाई उठा रहेगा दूसरा सो जाएगा। सबसे पहले सूर्यप्रकाश सो गया और चन्द्रप्रकाश उठा रहा। इस समय आसमान में शिव और पार्वती की सवारी चलने लगी। पार्वती ने शिव से कहा - ’’महादेव! नीचे देखो। राज परिवार में जन्म लेने के बाद भी वे दोनो भाई दुर्भाग्यवश भटकने को मजबूर हैं। तुम तो करूणा के सागर हो। इन पर दया करो।‘‘

’’ देवी ! इस जीवजगत में हर प्राणी पूर्व जन्मकृत पाप-पुण्यों के बन्धन से बंधा हुआ है। इसी के अनुरूप फल भोगने को मजबूर है। अभी पेड़ से एक फल गिरकर चन्द्रप्रकाश के सामने गिरने वाला है। इन दो भाइयों में जो फल की गुठली खाएगा उसके जीवन में कम संघर्ष रहेगा। वह पहले राजा बनेगा। जो फल का गूदा खाएगा उसे अभी बहुत संघर्ष करना होगा। वह भी राजा बनेगा किन्तु देर

से।’’

थोड़ी देर में चन्द्रप्रकाश के सामने एक फल गिरा। उसने शिव-पार्वती की बातें सुन ली थी। उसने जानबूझकर फल का गूदा खाया और गुठली सूर्यप्रकाश के लिए रख दी जिससे सूर्यप्रकाश राजा बन सके।

सूर्यप्रकाश के उठने पर चन्द्रप्रकाश ने उसे पूरी बात बता दी। उसने चन्द्रप्रकाश को खाने को फल की गुठली दी और सो गया। चन्द्रप्रकाश को गहरी नींद आ गई। सूर्यप्रकाश को जोर की भूख लगी हुई थी। उसने सोचा चन्द्रप्रकाश ने लालच में आकर फल का गूदा तो स्वयं खा दिया। झूठी कहानी उसे सुना दी। सूर्यप्रकाश को गुस्सा आया। चन्द्रप्रकाश को गहरी नींद में छोड़कर वह वहाँ से चला

गया।

चलते चलते सूर्यप्रकाश एक राजा के दरबार में पहुँचा। राजा ने उसे अपना नौकर रख दिया। वह उसकी बुद्धिमानी और चातुर्य से प्रभावित हुआ। राजा बूढ़ा हो गया था। उसका कोई पुत्र नहीं था। उसने अपनी इकलौती लड़की का ब्याह सूर्यप्रकाश से कर दिया। उसने सूर्य प्रकाश को अपने राज्य की बागडोर सौंप दी। सूर्यप्रकाश के राज्य में एक राक्षस ने आतंक मचा रखा था। उस राज्य के हर निवासी को बारी-बारी से राक्षस के पास जाना पडता था। राक्षस उसे खा जाता था।

इधर चन्द्रप्रकाश सोकर उठा। उसे अपना भाई दिखाई नहीं दिया। वह अपने दुर्भाग्य को कोसने लगा। वह कई वर्षो इधर-उधर भटकता रहा। एक दिन रास्ते में उसे दूर एक झोपड़ी दिखाई दी। वह वहीं पहुंच गया। उसमें झोपड़ी में एक बुढ़िया थी। वह रो रही थी। चन्द्रप्रकाश ने बुढ़िया से रोने का कारण पूछा। बुढ़िया बोली- ’’मेरा एक ही बेटा है। इस इलाके में एक राक्षस ने आतंक मचा रखा है। यहाँ के हर निवासी को बारी-बारी से राक्षस के पास जाना पड़ता है। राक्षस उसे खा जाता है। आज रात को मेरे लड़के की बारी है।’’

’’मै भी तुम्हारे बेटे के समान हूँ। आज तुम्हारे बेटे की जगह पर मैं उस राक्षस के पास  जाऊँगा।‘‘ - चन्द्रप्रकाश ने बुढि़या से कहा।

रात को उस बुढि़या के बेटे की जगह चन्द्रप्रकाश राक्षस के पास गया। चन्द्रप्रकाश को उसके राज पुरोहित ने अभिमन्त्रित बभूत दी थी। चन्द्रप्रकाश ने उस बभूत को राक्षस की ओर फेंक दिया। चीखते-चिल्लाते राक्षस की मौत हो गई।

राक्षस को मारकर जब चन्द्रप्रकाश बुढि़या की झोपड़ी की ओर वापस आ रहा था। राज्य के कुछ दरबारियों ने उसे देख लिया। ’’इतनी रात गए तुम कहाँ जा रहे हो ?’’ - उन्होंने चन्द्रप्रकाश से पूछा। चन्द्रप्रकाश ने उन्हें राक्षस को मारने वाली बात बता दी। राज दरबारियों ने सोचा -’’जब राजा को पता चल जाएगा कि राक्षस को इस राहगीर ने मारा है तेा इसे इनाम मिलेगा। इसलिए इस राहगीर को ही मार देना चाहिए।’’ उन्होने चन्द्रप्रकाश को पकड़कर मिटटी की खाणी (खान) मे दबा दिया। वे राजा के पास गए। उन्होंने राजा को बताया - ’’ महाराज! हमने मिलकर उस राक्षस को मार दिया है।’’

राजा सूर्यप्रकाश ने उन दरबारियों को इनाम दिया। उन्हें पदोन्नत भी किया गया। सुबह एक कुम्हार मिट्टी लेने जैसे ही खाणी पहुँचा। उसे खाणी की मिट्टी हिलती हुई दिखाई दी। उसने वहाँ से मिट्टी हटाई तो उसे चन्द्रप्रकाश दिखाई दिया। वह बेहोश हो गया था। कुम्हार उसे अपने घर ले

गया। उसने उसे होश में आने की जड़ी दी। वह होश में आ गया। अब चन्द्रप्रकाश कुम्हारे के साथ रहने लगा। एक दिन चन्द्रप्रकाश कुम्हार के साथ नाव में घड़े ले जा रहा था। राजा के उन्हीं दरबारियों ने उसे देख लिया जिन्होने उसे मिटटी की खाणी में दबा दिया था। चन्द्रप्रकाश के पास आकर वे बोले - ’’भाई ! हमें क्षमा कर दो। हमसे भूल हो गई थी। हमारे साथ राजदरबार चलो। हम तुम्हें राजा से इनाम दिलवाएंगे । ‘‘ उन्होने चन्द्रप्रकाश पर चोरी का झूठा आरोप लगाया और उसे जेल में डलवा दिया। जेल डालने से संबन्धित फैसले राजा का वजीर करता था। इसलिए सूर्यप्रकाश को चन्द्रप्रकाश के जेल में होने की जानकारी नहीं थी।

राक्षस के मारे जाने के बाद सूर्यप्रकाश का राज्य निर्विघ्न चल रहा था। एक दिन सूर्यप्रकाश ने महल के आंगन में पेड़ से एक फल गिरते हुए देखा। उसे चन्द्रप्रकाश की याद आ गई। उसे यह भी याद आया कि उसके भाई ने फल का गूदा स्वयं खा लिया था और सूर्यप्रकाश के लिए यह कहकर गुठली दे दी थी कि महादेव शिव के अनुसार जो गुठली खाएगा उसके जीवन में कम संघर्ष रहेगा। वह पहले राजा बनेगा। आज उस भविष्यवाणी के सच साबित होने पर सूर्यप्रकाश की आंखों में आँसू आ

गए। सूर्यप्रकाश ने स्वयं को धिक्कारा कि उसके भाई ने उसके लिए कितना त्याग किया था और एक वह है जिसने क्रोध में आकर उस भाई को अकेले ही छोड़ दिया था। सूर्यप्रकाश के मन में चन्द्रप्रकाश से मिलने की तीव्र इच्छा पैदा हो गई। उसने सोचा -’’ इतने सालों बाद पता नहीं वह कहाँ होगा ? सूर्यप्रकाश ने राज्य भर में घोषणा करवा दी कि जो भी व्यक्ति चन्द्रप्रकाश का पता लगाएगा, उसे मनचाहा इनाम दिया जायेगा। इनाम के लालच में राज्य कर्मचारियों और प्रजा ने चन्द्रप्रकाश को ढूंढने की कोशिश की। कोई भी व्यक्ति चन्द्रप्रकाश का पता नहीं लगा पाया।

राजा सूर्यप्रकाश को कथा सुनने का शौक था। साल में एक बार उसके राज्य में कथा सुनाने की प्रतियोगिता की जाती थी। इसमें राज्य का कोई भी व्यक्ति, कर्मचारी, यहाँ तक कि जेल में बन्द कैदी भी भाग ले सकते थे। राजा को जो कहानी पसन्द आती राजा उसे सुनाने वाले को पुरस्कार देता। इस बार भी कथा सुनाने की प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। कैदियों की ओर से चन्द्रप्रकाश ने भी कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की। चन्द्रप्रकाश की लंबी दाढ़ी उग गई थी। उसे सूर्यप्रकाश नहीं पहचान पाया। चन्द्रप्रकाश ने महल के आँगन में गेंद खेलने से फल की गुठली अपने भाई को देने तक की पूरी कहानी सूर्यप्रकाश को सुना दी। इसके बाद राक्षस को मारने, मिट्टी की खाणी में दबाए जाने और झूठे आरोप में जेल में बन्द होने तक की कहानी भी सुना डाली।

सूर्यप्रकाश ने अपने छोटे भाई चन्द्रप्रकाश को पहचान लिया। उसे आधे रास्ते में छोड़कर आने के लिए क्षमा मांग दी। चन्द्रप्रकाश को मिट्टी की खाणी में दबाने और झूठा आरोप लगाकर जेल में डालने वालों को कठोर सजा दी गई। सूर्यप्रकाश ने अपने राज्य का आधा भाग चन्द्रप्रकाश को दे दिया। दोनो सुखपूर्वक राज करने लगे।

- डॉ. उमेश चमोला , शिक्षक – प्रशिक्षक राज्य शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् उत्तराखंड , राजीव गांधी नवोदय विद्यालय भवन नालापानी रायपुर देहरादून , उत्तराखंड

ई मेल - u.chamola23@gmail.com

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रचनाकार: उत्तराखण्ड की लोककथा - जीवन कथा - डॉ. उमेश चमोला
उत्तराखण्ड की लोककथा - जीवन कथा - डॉ. उमेश चमोला
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