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कोरोना कोरोना - माह की कविताएँ

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निज़ाम- फतेहपुरी दुआ- 212  212  212  212 अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन मुझपे मौला करम की नज़र कीजिए। अब दुवाओं  में  मेरी  असर कीजिए।...

निज़ाम- फतेहपुरी

दुआ- 212  212  212  212
अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

मुझपे मौला करम की नज़र कीजिए।
अब दुवाओं  में  मेरी  असर कीजिए।।

मैं हकीकत  में  कितना  गुनहगार हूँ।
मुझपे नज़रे  इनायत  मगर  कीजिए।।

अब इधर कीजिए या उधर कीजिए।
तेरा  बंदा  हूं  चाहे  जिधर  कीजिए।।

आसरा है फक़त  तेरा  ही बस मुझे।
रहम कुछ तो मेरे हाल पर कीजिए।।

रात ग़म की  अंधेरी  ये कटती नहीं।
जल्द इसकी ख़ुदाया सहर कीजिए।।

अब इधर कीजिए या उधर कीजिए।
तेरा  बंदा  हूं  चाहे  जिधर  कीजिए।।

अर्ज इतनी है या  रब मुझे बख्श दे।
जब मरूँ खुल्द में मेरा घर कीजिए।।

है निज़ाम इस जहाँ का फ़ना होंगे सब।
आगे आसान मौला  सफ़र कीजिए।।

अब इधर कीजिए या उधर कीजिए।
तेरा  बंदा  हूं  चाहे  जिधर  कीजिए।।


निर्गुण- 22122122122

अँखियों से तूने  किए  वो इशारे।
की पड़  गए  फीके  सारे नज़ारे।।

जब से बलम तुमसे लागी लगनियाँ।
लागे न नीक अब ये चंदा चंदनियाँ।।

तूने   नए   रंग   हैं   वो   पसारे।
की पड़ गए  फीके  सारे नज़ारे।।

यूँ ही गइल बीत कोरी उमरिया।
काहे न लीना तु मोरी खबरिया।।

रो रो के हमने ये दिन हैं गुज़ारे।
की पड़ गए फीके सारे नज़ारे।।

होगा मिलन कब बता दे सजनवा।
लागे न तुमरे बिना मोर मनवा।।

दिल में बसे अब तुम्ही तुम हमारे।
की पड़ गए फीके सारे नज़ारे।।

सब बह गये नीर सूखे नयनवा।
दिन रात तुमरे हि गाऊँ भजनवा।।

यादों में  तेरी  हुए  हम तुम्हारे।
की पड़ गए फीके सारे नज़ारे।।

हमरियू निज़ाम अब है अइसन कहनियाँ।
तुमरी हि धुन मा कटी ज़िंदगनियाँ।।

हर पल रहे हम तो  तेरे  सहारे।
की पड़ गए फीके  सारे नज़ारे।।

निज़ाम- फतेहपुरी
ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
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बलजीत सिंह बेनाम


ग़ज़ल 1

मोहब्बत की दुनिया बसाने से पहले
न लेंगे इजाज़त ज़माने से पहले

अमीरों का दिल काँपता ही नहीं है
ग़रीबों की हस्ती मिटाने से पहले

किसी शख्स को खोने का खौफ़ भी है
उसे अपने जीवन में लाने से पहले

बहुत बदतमीज़ी से वो पेश आया
अदब के तरीके सिखाने से पहले

कभी मैं बशर सीधा साधा बहुत था
जहां की निग़ाहों में आने से पहले

ग़ज़ल 2

कैसी फ़ितरत का बता है आईना
बेवफ़ा या बावफ़ा है आईना

फिर किसी मज़लूम ने की ख़ुदकुशी
सामने बिखरा पड़ा है आईना

किसलिए सूरत नहीं देखे कोई
बाद मुद्दत के दिखा है आईना

ज़ुल्म करके मुँह दिखाएगा इसे
तो तेरी ख़ातिर क़ज़ा है आईना

जाने ये किस किस की है मंज़िल मगर
असलियत में रास्ता है आईना
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          जन्म तिथि:23/5/1983
          शिक्षा:स्नातक
          सम्प्रति:संगीत अध्यापक
         उपलब्धियाँ: विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित
आकाशवाणी हिसार और रोहतक से काव्य पाठ
सम्पर्क सूत्र:103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी
हाँसी
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अविनाश ब्यौहार


//--नवगीत--//

--पैरों से थकन बँधी--


कोरोना अजगर बनकर
है इंसानों को
लील रहा।

कितना मुश्किल
जीवन है जीना।
घूंट जहर का
पग पग पर पीना।।

पैरों से थकन बंधी
आगे चलना
कई मील रहा।

है जीने की
इक रिदम टूटती।
किस्मत ओज भरी
यहाँ फूटती।।

खुरपी लेकर
यादों की पर्तों को
कोई छील रहा।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

//--नवगीत--//

--ट्रेन भेड़ दी --

निश्चित कोरोना ने
भीषण जंग
छेड़ दी है।

कोरोना हत्यारा-
कातिल है।
इसीलिए वक्त हुआ
गाफिल है।।

सीधी सी
पटरी पर चलती
ट्रेन भेड़ दी है।

किसी असुर सा
नजर मुझे आता।
'यमदूत बैंक' में
खुलता खाता।।

युवावस्था के
एवज में
उमर अधेड़ दी है।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

//--नवगीत--//

"आपदा हँसती है" 

लाकडाउन है
कर्फ्यू -
लगा हुआ।

सड़कों पर है
पुलिस घूम रही।
खामोशी गली को
चूम रही।।

दिलों मे
भय अनजाना
जगा हुआ।

वीरानी शहर को
डँसती है।
सूबे पर आपदा
हँसती है।।

मनुष्य देखता
भौंचक-
ठगा हुआ।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

//-हिंदी ग़ज़ल-//

"इतने जख्म दिए" 

चमकाया जब घर का कोना।
आता  याद  मुझे  कोरोना।।

आँखों  से  नींदें  गायब  हैं,
फिर कैसा बिस्तर पर सोना।

सच कहना वो भूल गए हैं,
याद रहा बस नफरत बोना।

इतने  जख्म  दिए  हैं  उनने,
शेष  रहा  जीवन  भर  रोना।

जीवन  में  उत्साह  भरेगा,
उनका  केवल उनका होना।

दुःख का कोई पर्वत टूटा,
आँसू से आँखों को धोना।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर


//-व्यंग्य कविता-//

---कोरोना आ गया---

हमने देखा।
देश की
हस्तरेखा।।
राष्ट्रीय समस्याएं
थीं उसकी
तकदीर में।
जो देखा
हमने कबीर में।।
इन समस्याओं ने
वृक्ष की तरह
जमा लीं जड़ें।
फल तोड़ने
इन वृक्षों पर
क्या चढ़ें।।
क्योंकि ये
काँटेदार हैं
जैसे बबूल।
देश मे
बदलाव हो
अमूल चूल।।
देश का किस
जनम का बैर था
कि कोरोना
आ गया।
देश की
बदहाली पर
मुझे रोना
आ गया।।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.


क्षणिका

"रोना है"

जिससे होता
हँसना-मुस्कराना नहीं
रोना है।
वो कोरोना है।।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर

पता--
रायल एस्टेट, कटंगी रोड,
माढ़ोताल, जबलपुर.
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‘नीलम  कुमार नील’


दरकता पुष्प
सुबह उठकर देखा गुलाब ,
दो पंक्तियाँ लिखी थी फूल पर –
“आँसुओं का प्यार से संबंध बहुत पुराना ,
जब तक खिले फूल ,पतझड़ को न बुलाना”
ये पंक्ति नहीं मेरा विछोह था ,
ओस नहीं वो मर्म विरह था ,
आसक्त थी उस सार में मैं,
आँसू बन जो बह गया , मन की पीड़ाओं का मर्म ,
कपोलों पर आकर ठहर गया |
हृदय का बोझ कम , तरुणाई मन में प्यास जगाए ,
प्रतीक्षारत खड़ी उस पार, शायद –
पुष्प में बंद हो जाने के लिए|
मैं भी एक पुष्प समान,
व्याकुल सी खड़ी विभव में ,
कौन जाने कब आहलाद में,
मैं सो जाऊँ उस फूल पर,
थोड़ी देर मेँ जो मुरझा जायेगा
  केवल आंखों का सौन्दर्य बन |            

‘नीलम  कुमार नील’
                             
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आइना                               
यही वो आइना ,   
जो रोज़ साँसों व लम्हों का ,
अहसास दिलाता रहता |
हर प्रतिबिंब में अक्स कुछ भिन्न नज़र आता ,
चेहरे की लकीरों को ,
बारीकी से पढ़ता आइना |
हर लकीर में तिरोहित रहस्य,
शायद यही जानता आइना,
छिपाना भी गर चाहूँ, तो
स्मृति शेष भाँपता आइना |
उम्र दर उम्र कितने बसंत छुए ,
अनगिनत अश्रु कपोलों पर आ ठहरते ,
किन्तु छिपा न सकी
मुस्कानों  से पड़ी लकीरों को ,
उजागर करता आइना |
हर्ष – विषाद से जूझता ,
स्पर्श करता आइना |
काया की सिलवटों का हिसाब माँगता आइना |
जिसे समय की बेड़ियों ने –
अपने बाहुपाश मेँ जकड़ लिया |                                    
                                      नीलम कुमार (अध्यापिका )

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प्रीति शर्मा "असीम "


नव संकल्प .... एक दीया

जला कर.... एक
  दीया विश्वास का,
  हमें मानव सभ्यता में,
  विजयी उद्घोष जगाना है ।
हम हैं भारत की संतान
मिलकर कोरोना को हराना है।

जलाकर दूसरा ... .दीया
  प्रेम का
  हमें आपसी भाईचारा लाना है।
  धर्म से ऊपर है ....मानवता ।
मिलकर कोरोना को हराना है।

जलाकर तीसरा ....दीया
देश हित में लगे ,
असंख्य जनों के प्रति ,
कृतज्ञ हो जाना है ।
जो लड़ रहे कोरोना से,
  दिन-रात उनके लिए,
  दुआ में हाथ उठाना है।

जलाकर चौथा .....दीया
  देश हित का हमें ,
देश का मान बढ़ाना है।
कोरोना से उपजे अंधकार को ,
विजयी प्रकाश के ,
दीयों से जगमगाना है।
  मिलकर कोरोना को हराना है।

जलाकर पांचवां..... दीया
  कुदरत का उपकार मनाना है।   
  बहुत गलतियां कर चुके ,
हम कुदरत के साथ ,
अब समस्त भूले सुधारना है।
मिलकर कोरोना को हराना है।

जलाकर छठा .....दीया
स्वच्छता का वचन निभाना है। 
हम रोकेंगे गंदगी के अंबार को,
जन-जन को स्वच्छ बनाना है।
  मिलकर कोरोना को हराना है।

जलाकर सातवां..... दीया।
सत्य का पथ अपनाना है।
मिलावट, धोखेबाजी, भ्रष्टाचार
  अनैतिकता को हटाना है ।
अपने भीतर से,
  झूठ खत्म कर,
  सत्य का साथ निभाना है।
मिलकर कोरोना को हराना है।

जलाकर आठवां .....दीया
अपनी अमर
सभ्यता का ध्यान कर जाना है।
कितने ही,
  राक्षसों रूपी कोरोना,
  भारत की सभ्यता को हरने आए।
  लेकिन बच नहीं पाए ।
वही संकल्प दोहराना है।
मिलकर कोरोना को हराना है।

जलाकर नौवां .....दीया
आज भारत के हर हाथ में ,
नौ बजके नौ मिनट के लिए ,
जल रहे दीयें को ,
विश्वास दिलाना है।
इस प्रकाश में ,
संकट की घड़ी में ,
मिलकर उस ,
अदृश्य शत्रु पर विजय पाना है।
हम जीतेंगे ,
मिलकर हमने कोरोना को हराना।

स्वरचित रचना
  प्रीति शर्मा "असीम "
नालागढ़ ,हिमाचल प्रदेश

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कौन

        अनगिनत लहरें आती है |
         बहा के मुझे अनंत में ले  जाती है |

         यह  कौन............?
      
         उस शून्य से पुकारता है , मुझे |

         यह कौन...............?
     
          उस  राह  से निहारता है  , मुझे |
     
          यह कौन.................?
          
         गीत के सुरों में  सजाता है, मुझे |

        यह  कौन.................?
         
        हवाओ के ,
        झोंके -सा सहलाता है, मुझे |

       उस ओर से ,
       आने वाले पंछी कुछ  कहते है |

       बादलों के ,
        झुरमुट भी कुछ बुदबुदाते है |

        पपीहे के  इस  दर्द भरे स्वर में,
         किसकी चित्कार है छुपी|
         
         यह कौन किरणों को बिखेर,
         सपनों से  जगा  जाता है ,मुझे |
        
          यह कौन दे-दे के  थपकियां,
          सुला जाता है, मुझे |
          
          यह कौन.....................?
          यह कौन  हाथ पकड़  ,
          मंजिल तक  पहुंचाता है, मुझे

          यह कौन.....................?

          मेरा हो, मुझ में ठहर  जाता है |
           एक धुंध -सी बन समा जाता है |
          
           मेरे भीतर से यह कौन मुझे बुलाता है |
             मेरे भीतर से यह  कौन  मुझे  बुलाता है ||
स्वरचित रचना
    
...प्रीति शर्मा "असीम "नालागढ़ हिमाचल प्रदेश

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देवकरण गंडास "अरविन्द"


शीर्षक - जीवनपथ

अब बदलता जा रहा जमाना
और बदल रहे लोग पल पल,
बस ख़ुद पर कर विश्वास राही
और इस सफ़र में चलता चल।

कौन है अपना, है कौन पराया
अब विभेद करना है मुश्किल,
आज चला संग साथी बनकर
काम बना, छोड़ जाएगा कल।

स्वजन ही दुश्मन बन जाते हैं
जब हो जाता है कोई सफल,
तानों से उसको जीने नहीं देते
जो जीवन में हो जाता विफल।

कर्म की राह पर तू चलता जा
बन कर्म की दरिया तू निकल,
तेरे कर्म ही तेरी पहचान बनेंगे
कीचड़ में फिर महकेगा कमल।

जीवनपथ आसां नहीं अरविन्द
ये है अग्निपथ, यहां तू संभल,
नित नई बाधाएं इसमें मिलेंगी
तुझे पार करनी बाधाएं सकल।

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शीर्षक - पिता

पिता होता सूरज की तरह
जो गर्म, तप्त सा दिखता है ,
लेकिन अपनी किरणों से
वो जीवन संचरित करता है।

होता है पिता पर्वत की तरह
वो कठोर हमेशा ही दिखता है,
लेकिन अपने सीने में वो, कई
भावों की बहती दरिया रखता है।

रखता है पिता समंदर से साम्य
जो खारा नमकीन सा लगता है,
लेकिन अपने गर्भ के भीतर वो,
कई रत्नों का पालन करता है।

पिता हवा के माफिक भी  है,
जो जीवन संजीवनी लाती है,
हट जाए सर से हाथ पिता का
तब उनकी याद बहुत सताती है।

मुझे गर्व हमेशा अपने पिता पर
मैं जब भी टूटा उन्हें याद किया,
हर संकट में और हर विपदा में
उन्होंने हमेशा ही मेरा साथ दिया।

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शीर्षक -  क्या राम फिर से आएंगे

तड़प उठी है नारी
बन रही है पत्थर,
दबा दिया है उसने
अपने अरमानों को,
छुपा लिया है उसने
अपने मनोभावों को,
वो जिंदा तो है मगर
जीती नहीं जिंदा की तरह,
जमाने की निष्ठुरता ने
उसे बना दिया है अहिल्या,
और आज वो इंतजार में है
कि क्या राम फिर से आएंगे।

त्रेता युग में उद्धार किया था
राम ने श्रापित अहिल्या का,
उस पत्थर में उसने डाला था
नया प्राण नव जीवन का,
मगर क्या इस कलयुग में भी
होती शापित नारी को बचाएंगे,
तार तार हो रही इस नारी को
क्या वो भव सागर तार पाएंगे,
हर गली चौराहे बैठे हैं रावण
करने को हरण सीता का यहां,
सुनकर नारी की करुण पुकार
क्या सांत्वना उसे वो दे पाएंगे,
सोच रही है पत्थर की अहिल्या
कि क्या राम फिर से आएंगे।

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परिचय :-

देवकरण गंडास "अरविन्द"
व्याख्याता इतिहास
राजस्थान शिक्षा विभाग

ईमेल - devkaranhistory@gmail.com

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दीपक कुमार शुक्ला

तंज़ भरी है तेरे उड़ानों ने ,
पर फड़फड़ाते हुए साथ दिया है ,
मोहय़्यत मुक़ामात की बात है ,
हौसला अफजाई कर तू हासिल कर ।

*मोहय़्यत  - बड़े ही नाकाम लोग*
*मुक़ामात - आजमाने की बात*
*अफजाई - बढ़ाकर*

न देखा करो हिकारत भरी हुई क्या थी ,
मेरे कल की हालातों में ,
देखना तुम्हें - आज़ कुछ और ही है ,
साहस तदिर खड़ी तादादो में ,

*हिकारत - बेवजह की बातें*
*तदिर - कुछ साथ देने वाले*

रुख़ को लेकर न चिंता कर ,
मोड़ने की काम ही है - हवाओं की ,
बस तुम लड़ते रहो हद तक ,
हर हराने वाली मुकामों से ....

नहीं तो फिर - और आजमाइशें ,
बाकी पड़ी है - आज़माने को ,
बस थोड़ी सब्र की इंतेहा बात है ,
हौसला अफजाई कर तू हासिल कर ।

इंतेहा - बस / कुछ अलग ही प्रकार की प्रक्रिया ।
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ऋचा शर्मा


अच्छी लड़की
  वह अच्छी लड़की है,
नजरें झुका कर चलती है ,
पलट कर किसी को जवाब नहीं देती है|
वह अच्छी लड़की है,
क्रॉप टॉप के जमाने में ,
सूट सलवार पहनती है
  वह अच्छी लड़की है
वो मोबाइल नहीं चलाती ,
घर को सजाती है वह अच्छी लड़की है|
  वह घर से बाहर पार्टी करने नहीं जाती ,
वह अपनों के संग वक्त बिताती है|
  वह अच्छी लड़की है बहु बनाने लायक है |
  ऐसा नहीं नहीं है , कि वह अनपढ़ है
ट्वेल्थ टॉप किया था,उसने,
  वाकई वह अच्छी लड़की है, !
अपने सपनों का गला घोट कर कर ,
अपनों के लिए घुट कर जीती है
वह अच्छी लड़की है |
ऋचा शर्मा
Gorakhpur
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मोहम्मद मुमताज़ हसन


सबको उल्फ़त तले लाने की जरूरत है,
फिर दीये एकता के जलाने की जरूरत है1

हैं बड़े खुशनसीब हम,जमीनें-हिन्द वाले,
इसकी पाकीज़गी को बचाने की जरूरत है1

कहीं हिंदू-मुसलमां, कहीं सिख ईसाई का फ़र्क,
तमाम मखलूक को इंसान बनाने की जरूरत है1

ये जातपात के झगड़े,ये मंदिर मस्जिद की लड़ाई
अब मेरे मुल्क को दोस्ताने की जरूरत है1

अलग हैं रस्मो-रिवाज हमारे तो क्या हुआ,
अनेकता में एकता की रस्में निभाने की जरूरत है1

ख़ुलूस-ओ-मोहब्बत के सिवा न काम आएगा कुछ भी,
'मुमताज़' दिलों से दूरियां मिटाने की जरूरत है !!●


   -मोहम्मद मुमताज़ हसन

रिकाबगंज, टिकारी, गया (बिहार)
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कुलेश्वर जायसवाल


तुम्हारी याद दिल से जाती नहीं


तुम से मिलने की आशा बहुत है मगर,
तुम से मिलने कि रुत है कि आती नहीं|
करूँ कितनी भी कोशिश दिल बहलाने की मगर,
एक तेरी याद दिल से है कि जाती नहीं ||


प्रेम कि राह में मुझको ले चली|
वो हाथ पकड़ के अपनी गली||
मैं तो चलता रहा उसी राह पर मगर,
अब मेरे पीछे वो है कि आती नहीं |
करूँ कितनी भी कोशिश दिल बहलाने की मगर,
एक तेरी याद दिल से है कि जाती नहीं ||


साथ चलने की चाहत तुम्हारी ही थी|
साथ जीने-मरने की कसमें भी तुम्हारी ही थी||
राह तकता हूँ मैं अब तक उसकी मगर,
वो है कि इस राह आती नहीं |
करूँ कितनी भी कोशिश दिल बहलाने की मगर,
एक तेरी याद दिल से है कि जाती नहीं ||


क्या हुई थी गलती हमें समझाओ तो|
दूर जाने की वजह हमें बतलाओ तो ||
हम पूछते रहे उन से मगर,                               
     वो है कि कुछ भी बताती नहीं |
करूँ कितनी भी कोशिश दिल बहलाने की मगर,
एक तेरी याद दिल से है कि जाती नहीं ||
-कुलेश्वर जायसवाल (कवि )
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गजेंद्र जाखड़

गाँव की लड़कियाँ
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घर की घुटन में घुट जाती हैं लड़कियाँ
फिर ढूँढ़ती है फेसबुक पर एक ऐसा दोस्त
जो उनसे बात कर सके ।
शुरू में ही वे डरी हुई
आगाह कर देती है कि हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं
पर उन्हें नहीं मिल पाता अच्छा दोस्त,
यहाँ मिलते हैं भेड़िये, जिस्म के भूखे
जो मौका पाकर करते हैं प्रहार
लगती है गहरी चोट लड़कियों को
फिर यहाँ भी घुटती है लड़कियाँ।
घर में कई बन्धन रोकते हैं उन्हें
उड़ने से
वे ज्यादा नहीं उड़ना चाहती
बस जाना चाहती है खुले आकाश में
अभिव्यक्त करना चाहती है भावनाएं
बताना चाहती है अपनी पीड़ा
जो झेल रही हैं वर्षो से
बस विचरण करना चाहती है
वे जंगल में
स्वतन्त्र हिरणी की तरह
और महकना चाहती है कस्तूरी की तरह
बनना चाहती हैं तितली
जो हर पुष्प पर मंडराती रहे
पता नहीं और
क्या-क्या बनना चाहती है लड़कियाँ
पर घुटन से घुट जाती है मेरे गाँव/घर की लड़कियाँ।।
@गजेंद्र जाखड़

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आलोक कुमार यादव


कैसा मचा ये हाहाकार
आज चारों ओर है।
क्या ये महामारी है
या ये कुछ और है।।
         ना यह कोई महामारी
        ना ही यह कुछ और है।
       है यह एक जैविक हथियार
      इशारे करते चीन की ओर है।।
   चीन के षड्यंत्रों का      
   यह परिणाम रहा है।
  मानवता नष्ट हो रही
  पूरा विश्व कष्ट झेल रहा है।।
             हे विश्व के नेताओं
            अपनी भृकुटी तानो तुम।
            समझो चीन की मंशा
    उसके कृत्यों को पहचानो तुम।।
अभी भी है समय
सबको साथ आने का।
क्या होता है ऐसे कृत्यों का परिणाम
चीन को दिखलाने का।।
          कर दो नेस्तनाबूद
          चीन का मिलकर अब।
         ना होगा जैविक हथियार
   कोई नहीं दुस्साहस करेगा तब।।
अभी नहीं चेते तो
फिर कब तुम चेतोगे।
मानवता का होते विनाश
कब तक तुम सब देखोगे।।
       जो देख रहा है ख्वाब चीन
     उसका मान मर्दन करना होगा।
     मानवता के इस दुश्मन का
     विध्वंस तो करना ही होगा।।
  रचना - आलोक कुमार यादव
             असिस्टेंट प्रोफेसर
              विधि विभाग
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय उत्तराखंड

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महेन्द्र परिहार"माही"

धरती   पर  आये   बन   के   मसीहा
ईश  के दूजे रूप  में  तुम्हें  ही  चाहा
नमन  करता "माही "हर उस माँ  को
अपने   बच्चों   को   डॉक्टर  बनाया।

डॉक्टर  का  पेशा  भी  होता  अज़ब
मरीज़  को पल में  कर  देते   गज़ब
रखते  हैं  ख़ूब  मरीज़ों  से  भाईचारा
दवा  के  रूप में  देते  सबको  सबब।

कोरोना  की  महामारी  से जंग  छिड़ी
मरीज़ों  के संग  डॉक्टरों  ने  भी लड़ी
हार  नहीं  मानी  हैं  सभी  डॉक्टरों  ने
चाहे  आफ़त   कैसी  भी  आके   पड़ी

हर  क्षण  मानव -सेवा  में   लगा  दिया
कोरोना  महामारी  को  भी झुका  दिया
अपने  परिवार  की  चिंताओं  को  छोड़
देशहित  में अपने  प्राण  भी गवां  दिया।

नमन करता हैं "माही " उन  डॉक्टरों  को
जिन्होंने कोरोना से कई जिन्दगियाँ बचाई
कोरोना  मरीज़ों  को  बचाने  की  ख़ातिर
अपनी  ही  अर्थी  को  फ़ूलों  से  सजाई ।
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ठहर जा  जिंदगी तुझे कोई थामता  नहीं
मेरी  तरह  तुझे  भी  कोई  चाहता  नहीं
भूख  का  मारा  अधमरा  पड़ा  कोने  में
रीत  दुनिया की  मरे हुए  को कोई मारता नहीं ।

ठहर जा जिंदगी  तुझे  कोई  रोकता नहीं
मेरी  तरह  तुझे  भी  कोई  टोकता   नहीं
रोटी  के लिए  पल पल बिलखते हैं बच्चे
रीत  दुनिया की  गरीब को  कोई  पालता नहीं

ठहर  जा जिंदगी  तुझे कोई  मानता नहीं
मेरी  तरह  तुझे  भी  कोई  जानता  नहीं
बेघर  बैठे  हैं  आसमाँ  की छत  के  नीचे
रीत  दुनिया  की गरीब के कोई घर बनता नहीं।

ठहर  जा  जिंदगी  तुझे  कोई  कहता नहीं
मेरी  तरह   तुझे  भी   कोई   सहता   नहीं
फट्टे  कपड़ो  में  भी हर  त्योहार बिता देते
रीत  दुनिया  की गरीब  की  कोई  महता नहीं ।

महेन्द्र परिहार"माही"
       व्याख्याता
पीपाड़ शहर ,जोधपुर
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तेजी से भाग रही दुनिया की रफ़्तार
को पल भर में ही थाम दिया कोरोना
चंद पलों का समय नहीं था मानव को
चंद पलों का भी काम न छोड़ा कोरोना।

चाँद मंगल पर पहुँचने वाले मानव को
एक पल में ही घर में बैठा दिया कोरोना
स्वास्थ्य सेवाओं पर दम्भ करने वाले
देशों के घुटने   टिका   दिए कोरोना।

हिंसा बलात्कार चोरी की घटनाओं को
एक पल में ही थाम   दिया   कोरोना
ऊँच -नीच भेदभाव पूर्ण नीतियों को
पल भर में ही भूला दिया है कोरोना।

प्रकृति को जागीर समझने वाले मानव
को पल भर में औकात दिखा दी कोरोना
परिवार वालों के लिए समय न रखने
वालों को परिवार संग कर दिया कोरोना।

        ।।माही परिहार।।

--

क़ुदरत का कहर

  
क़ुदरत  की  गोद में  छिपा  हैं  खजाना
मानव  चाहता    इसको  है  हथियाना
अतृप्त  इच्छाओं  की  पूर्ति  में डूब के
कर  बैठा  जालिम  हरकत  बचकाना।

कुदरत की  गोद  में फैला  बैठा ज़हर
दिख  रहा  है मानव  जाति  पर असर
हर  तरफ  मच  रखा  हैं  त्राहि  त्राहि
बरपाया  है  ऐसा  क़ुदरत  ने   कहर।

झूठा  अभिमान  पाल  रखा  हैं  मानव
क़ुदरत को  दी  चेतावनी  बन के दानव
बाढ़  भूकंप  सुनामी  के  रूप में,लाशों
के   ढ़ेर  पर  किया  क़ुदरत  ने  तांडव।

अभी  भी  वक़्त  है  सँभल  जा  मानव
मत   कर   हरकत   बन   के   दानव
अब की  बार  धरती  से  तेरा,अस्तित्व
ही   मिटा  दूँगा   करूँगा  ऐसा  तांडव।



नाम - महेन्द्र परिहार "माही"
पिता - बाबूलाल परिहार
माता - स्व. सीता देवी
सम्प्रति- "व्याख्याता" शिक्षा विभाग,राजस्थान
शिक्षा - आचार्य, शिक्षा शास्त्री
जन्मतिथि-12/12/1990
पता- पीपाड़ शहर, जिला- जोधपुर
0000000000

धीरज शाहू, ' मानसी ' ,  


ठोकर खाकर संभलना सीख ले,                          
सच की राह पे, चलना सीख ले.                        
किसी छोर तो सूकुं मिलेगा तूझे,                             
ये सोच, पहलू बदलना सीख ले.                  
आफताब बने मुकद्दर में ना सही,                       
चराग बनके ही जलना सीख ले.                      
हालातों का भी होगा नहीं असर,                         
वक़्त के साथ ही ढलना सीख ले.                   
शख्सियत गुलाब की मानिंद रख,                      
खारों में हंस कर पलना सीख ले.            
--
यू ही ना उसके चेहरे पे झुर्रियां पड़ी होगी,                
यकीनन, वो शख़्स, तज़ुर्बे से, बड़ी होगी.              
क्यों ना, थकी थकी सी नज़र आए नज़र,                   
मुद्दतों से इंतज़ार में वो भी तो खड़ी होगी.            
बालों पे सफेदी, कंपकंपाते हुए हाथ पांव,           
  वक़्त औेर हालात से वो भी तो लड़ी होगी.            
  कुछ ना कुछ तो उसने भी खोया ही होगा,             
  ऐसे ही तो ना बुलंदी की सीढ़ी चढ़ी होगी.
    --
   
खूबसूरत चांदनी रात सी तुम,                            
  रूह में रवां, जज़्बात सी तुम.                         
  तुम्हारे अहसास लगते है ऐसे,                         
  किसी ने मिश्री घोली हो जैसे.                             
  हर एक लब्ज़ में निखार है,                               
  जैसे नए मौसम की बहार है.                            
  हाय, लब्ज़ ऐसे महकते हैं,                               
  जैसे जुगनू रात में चमकते है.                      
  बदलती हुई, हालात सी तुम.                             
  रूह में रवां, जज़्बात सी तुम. 
     --
    
तुम क्या हो ? तुम्हें तो, कुछ भी, पता नहीं है,           
  तुमने खुद को मेरी नज़र से कभी देखा नहीं है.      
  हम तो रोज़ ही लिखते है तुम्हें ही सोचकर,       
  मशरूफ हो बड़े, तुमने कभी मुझे पढ़ा नहीं है.     
  हर लम्हे ख्वाबों में आना, तसव्वुर में छाना,              
  क्या अब भी कहोगे हमारा कोई रिश्ता नहीं है.     
  अपने ही चाहने वाले को इस कदर सताना,              
  ए साहब, अब इतना भी गुरूर अच्छा नहीं है.       
 
  --
  चेहरे के फूल, उफ्फ ये जुल्फों के साए,                   
  तेरी यादों की हवा क्या क्या समेट लाए.               
  तेरे ख्वाबों ख्यालों की खुमारी है अभी,                 
  गर होश में रहे दिल तो संभल भी जाए.          
  यकीनन आसमां की हुस्न परी हो तुम,             
  हक़ीक़त में भला, तुम्हें कोई कैसे पाए.             
  उफ्फ, नाज़ुक, कमसिन कली हो तुम,                  
  टूट जाओगे ये सोचकर छूने से घबराए.
 
-धीरज शाहू, ' मानसी ' ,                           
  कलमना, नागपुर.
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मंशूभाई

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                                तू नाराज तो है अपने इंसान से भगवान..
                                नहीं तो मंदिरों के दरवाजे बंद ना करता..
सज़ा दे रहा है कुदरत से खिलवाड़ की..
नहीं तो गुरुद्वारों से लंगर कभी ना उठता..
                               आज उन बारिश की बूंदों से संदेश मिला..
                                रोता तो तू भी है जब इंसान आंसू बहाता..
माफ़ करदे अपने बच्चों के हर गुनाह..
सब कहते हैं, तेरी मर्ज़ी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता
               -
           --


                 आज रात मेरे सपने में आया कोरोना

**आज रात मेरे सपने में आया कोरोना**
उसे देख कर मैं डरा उसने मुस्कुराकर बोला
अपने संस्कृति का पालन करो ना मुझसे डरो ना
कितनी अच्छी थी तुम्हारी संस्कृति
न गले लगाते थे न हाथ मिलाते थे
हाथ जोड़ स्वागत करते थे वही करोना मुझसे डरोना
कहां से है सीखा तुमने बाडी स्प्रे और रूम स्प्रे
पहले तो तुम धूप कपूर अगरबत्ती जलाते थे
वही करोना मुझसे डरोना
कहां से है सीखा तुमने मैकप सैकप
सादा जीवन उच्च विचार यही तो है तुम्हारे संस्कार
इन्हें छोड़ जंक फूड और फास्ट फूड के चक्कर में पड़ोना
अब फिर से तुम यही करोना मुझसे डरोना
शुरू से ही पशु-पक्षियों को तुमने पाला-पोषा
इनकी रक्षक है तुम्हारी संस्कृति भक्षक बनोना मुझसे डरोना

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               ये हवा ले जा संदेशा

ये हवा ले जा संदेशा तू मेरी लीडर के पास
बेचैन निगाहें ,सांसें थम-थम के चल रही है
तेरी बातें सुनने को मैं पागल हुऐ जा रहा हूं
आकर दे दो तू इन सांसों को अपनी सांस
ये हवा ले जा संदेशा तू मेरी लीडर के पास............
                             ऐ मेरे मधुबन की सहेली सुन लो मेरी पुकार
                             कैसी है मेरी मधुवन कहां है मेरी मधुवन
                             किस हाल में है जरा इतना तो बता दो मुझे
                             मेरी निगाहें पल-पल तेरा रास्ता देख रही है
                             बस जाकर इतना कह देना मेरी मधुवन से
                             ऐ मेरे मधुबन की सहेली सुन लो मेरी पुकार........
          
         --


                            मोहब्बत दीवानी मैं दीवाना..
                                
                                मोहब्बत दीवानी मैं दीवाना
                                दिल न लगाना वो दिलवाले
                                   मैं हूं बस दो दिन का मेहमान
                       करता ही क्या मैं ये जिंदगी अधूरी
                       मैं उड़ते गगन का हूं इक परिंदा
                       जीने की तम्मन्ना तो होती है सभी को
                       पर मेरी, प्राण से प्यारी हैं ये जुबान
                                मैं हूं बस दो दिन का मेहमान
                                      तेरे ख्वाबों ख्यालों में खोया रहूं मैं
                                      तुझको पाने के सपने सजाता रहूं
                        तेरी बांहों में मेरा दम निकल जाये
                        यही विनती मैं ईश्वर से करता हूं
                        मैं हूं बस दो दिन का मेहमान
                        
             ---

         जय हो सरदार तुझे सौ-सौ तोपों का सलाम

जय हो सरदार तुझे सौ-सौ तोपों का सलाम....
                                       जय हो पटेल तुझे अखण्ड भारत का सलाम...
मिल-जुलकर गुणगान करें ये सब भारतवासी......…......
लौह पुरुष, सरदार युग का व्याख्यान करें सब नर-नारी....
                                       हिन्दकुश से कन्याकुमारी,अरुणांचल से रण तक...
                                       खण्ड देश को अखण्ड बनाना ये संकल्प तुम्हारा ..
हिन्द देश है, हिन्दू राष्ट्र हो, हिन्दी हमारी भाषा हो...
जाति-धर्म और भेद-भाव से न ही कोई नाता हो.…..
                                       एक देश हो, एक राष्ट्र हो, और एक हमारा नारा हो...
                                       हम सब जय-जयकार करे तुमको शत्-शत् नमन करे
        .........
                             मंशूभाई
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डॉ. रीना रवि मालपानी

कोरोना रक्षक "डॉक्टर"

हार मत देना प्रभु, डॉक्टर रूपी दूत हमारे साथ  है।

इम्तेहान की है घड़ी, पर तेरे प्रत्यक्ष रूप पर हमें पूर्ण विश्वास है।

स्थिति है भयावह मगर, पर डॉक्टर के ज्ञान का खजाना भी लाजवाब है ।

नतमस्तक हो जाएगा इंसान भी, आज तेरे पूर्ण समर्पण का इम्तिहान है।

सफेद कोट में डॉक्टर, रंगमयी जीवन देते भगवान के अवतार है ।

अनंत समस्याएँ है,  पर उपलब्ध संसाधनों में सामंजस्य ही तेरी पहचान है।

दिन रात के काल चक्र में, निरन्तरता ही तेरी अद्वितीय पहचान  है।

कोरोना रूपी भंवर में फँसे है, पर इससे निकलने की पतवार तुम्हारे पास है।

तमाम उलझन है इस समय मन में, पर तेरा अद्वितीय विकल्प एक मिसाल है।

संघर्षमयी इस समय में, तू ईश की प्रत्यक्ष सौगात है।

विराम सी जिंदगी है अभी, पर तेरा श्रम अविराम है।

दुःख के अशुभ घेरे में, उत्साह की आभा तुम्हारे पास है।

शत्रु गले पड़ने आया है, पर तुम्हारा रक्षाकवच बचाने को तैयार है।

कोरोना रूपी अंधकार है सामने, पर प्रकाश रूपी तुम्हारा रूप शिरोधार्य है।

अदृश्य रूप में आया है कोरोना दानव, तेरे दृश्य रूप की जय-जयकार है।

तुम्हारे दृढ़ संकल्पों के साथ, जीतेंगे हम घोषित यह परिणाम है।

     

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शालू मिश्रा

--* कोरोना आया है*

इन चीनी लोगों से ही कोरोना ने ये आमंत्रण पाया है,
सारे देशवासियों को प्रसाद रूप में फिर भिजवाया है।

भारत में भी कोरोना ने तबाही का मकसद बनाया है,
तभी इस विपदा की घड़ी में ऐसा कोहराम मचाया है ।

नापाक इरादों से यह महासंकट हिन्दुस्तान को छल्ली करने आया है,
तभी हर जन के लिए सरकार ने ये कर्फ्यू लगाया है ।

मेडिकल पुलिस प्रशासन ने सख्ती से आदेशों का पालन करवाया है,
जनता को केवल घर पर ही रहना जीवन का मोल बताया है ।

बोर्ड यूनिवर्सिटी की परीक्षाओं को क्षण भर में ही रुकवाया है,
बाजार दुकानें बंद करवाकर सड़कों को सुनसान रखवाया है।

अद्भुत दिवस इस इतवार को ये चला आया है,
अविश्वसनीय ध्वनि तरंगों से हमारे अंबर को सभी ने गुंजाया है ।

सेनिटाइजर मास्क लगा खुद का ध्यान खुद ही रखना सिखाया है,
24 मार्च को सरकार ने फिर से हमें देश का हाल सुनाया है।

रहीस अमीरों का लम्हा छुट्टी का आराम से आया है,
लाचार गरीबों के चूल्हों को कुछ हरीशचंद्रों ने भी चलाया है।

गृहत्याग पर सरकार ने लक्ष्मणरेखा का सा बैन लगाया है,
भीङभाङ से दूर होकर जनता ने घर में ही डेरा जमाया हैं।

21 दिन की तपस्या का बीड़ा सभी ने मिलके उठाया हैं,
ऐसा अद्भुत संकल्प भारतवासियों ने बखूबी से निभाया हैं

कोविड-19 का अभिमान चूर करने को ही तो देश में लाकडाउन लगाया है,
गिनीज बुक में देश के रिकॉर्ड को दर्ज का मानस सभी ने बनाया है।

जय हिन्द जय भारत

शालू मिश्रा
युवा साहित्यकार/ अध्यापिका
रा.बा.उ.प्रा.वि.सराणा
जालोर


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स्मृति झा


,,,,,,,  कोरोना,,,,

कमबख्त कैसी बीमारी ने घेर लिया है।
आदमी ने आदमी से मुंह फेर लिया  है।।

हंसते खिलते चेहरे मंद पडे़ हैं।
आजकल  सबके घरों के दरवाजे बंद पडे़ हैं।।

भीड़ भरी सड़कें वीरान हो गई है।
चहचहाती गलियां भी सुनसान हो गई है।।

शहर  को  गांव  याद  आ  रहा  है।
धूप को छांव याद  आ  रहा  है।

हाय  पेट  गरीबों  के  कंगाल  हो  गए  ।
महंगाई बढा के राशन वाले मालामाल हो गए।।


महंगाई   कमर   पे  कमर तोड़  रही  है।
सरकार  हाथ   पे  हाथ  जोर  रही    है।।

जिसे  देखो आजकल  लाचार   बैठा  है ।
तंदुरूस्त आदमी  भी  बीमार  बैठा  है ।।

कोरोना का खौफ इस कदर छाने लगा है।
रिश्तो में भी मतभेद नजर आने लगा है।।

छींक भी आए तो डर सा लग जाता है।
नासपीटे  कोरोना सर पे मंडराता है।।

स्मृति की अंतिम लाइन पे गौर फरमाइगा।
इक्कीस दिन घर पर ही रह के बिताइएगा।।

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श्रेयांश शिवम्

जन्नत भी यहीं, नरक भी यहीं
जरा बच के रह ,है शक भी यहीं ।।

जो तुझे चाहिए, वो हक भी यहीं
जो तुझे न मिला, वो कसक भी यहीं ।।

होना है सफल,है ठसक भी यहीं
आजमा ले तू खुद को, है ललक भी यहीं ।।

बंजारों का आँगन, है सड़क भी यहीं
न्याय और अन्याय की,झलक भी यहीं ।।

खिल्ली उड़ेगी, भटक तू नहीं ।
संघर्ष से जवाब दे, अटक तू नहीं ।।

                           दो
मैं वर्तमान भी हूँ, मैं अतीत भी हूँ ।
मैं धूप भी हूँ ,मैं शीत भी हूँ ।।

जो करें पुण्य भी, और पाप भी
मैं वो नेक भी हूँ, मैं वो पतित भी हूँ ।।

हो जिसके प्रति नाराजगी और खुशी
मैं वो हार भी हूँ, मैं वो जीत भी हूँ ।।

हो जिससे लोगों को शिकायत और स्नेह
मैं वो मनहूस भी हूँ ,मैं वो मीत भी हूँ ।।

जिसे सुनने पर एहसास हो, मोहब्बत और हकीकत का
मैं वो गजल भी हूँ, मैं वो गीत भी हूँ ।।

--
न मैं पुराण पढ़ता हूँ, न मैं कुरान पढ़ता हूँ ।
मैं लिखता हूँ हकीकत, क्योंकि, मैं गोदान पढ़ता हूँ ।

न किसी को हिंदू, न मुसलमान कहता हूँ ।
मैं देखता हूँ जिस शख्स को ,उसको इंसान कहता हूँ

न मंदिर की पूजा, न मस्जिद का अजान जानता हूँ
नहीं मानता अंधविश्वासों को,क्योंकि, मैं विज्ञान जानता हूँ ।।

न किसी खुदा, न किसी भगवान को मानता हूँ ।
जो देखे सबको एक नजर से,मैं उस संविधान को मानता हूँ ।।


(नाम:-श्रेयांश शिवम्,, जिला:-दरभंगा
राज्य:-बिहार,, स्थायी पता::--बड़ी तरौनी(गांव),
दरभंगा, बिहार,, पिन कोड:--847233
--
00000000

रेखा गुप्ता


    कोरोना नहीं होता
                           .....,.......................................
जैसे हर चमकती चीज का मतलब सोना नहीं होता
वैसे हर एक छींक का मतलब कोरोना नहीं होता
केवल पानी से हाथ धोना, हाथ धोना नहीं होता
बीस सेकेंड साबुन से हाथ धोने पर कोरोना नहीं होता
ऐसे 'खतरनाक वाइरस' का इलाज जादू- टोना नहीं होता
सावधानी , साफ-सफाई रखने से कोरोना नहीं होता
जागरूकता, जानकारी रखने वालों को बाद में रोना नहीं होता
भीड़-भाड़ से दूर रहने पर कोरोना नहीं होता
घर से बाहर जाना और लोगों से हाथ मिलाना नहीं होता
क्योंकि 'नमस्कार" करने वालों को कोरोना नहीं होता
महामारी के दौर में बस हमें धैर्य खोना नहीं होता
'सेनेटाइजर' - 'मास्क ' के प्रयोग से कोरोना नहीं होता
समय रहते सचेत होगें तो अपनो को रोना नहीं होता
रोगी स्वयं 'आइसोलेट' हो जाऐ तो औरों को कोरोना नहीं होता
...................................................................................
                                  रेखा गुप्ता
                            अयोध्या ,उत्तर-प्रदेश
  000000000000000

वैभव खनूजा


      कोरोना - वोरोना

आज कैसा ये वक्त आया है
जहां देखो कोरोना छाया है
बंद सब खिड़की दरवाज़े हैं
ना कोई दिखते बाहर हैं।

ना जाने कैसा ये वक्त आया है
एक डर मन के अंदर छाया है
कोई ना निकलता बाहर है
सब बंद घर के अंदर है।

ना जाने कैसा ये मंजर आया है
जिसमें रुकी सबकी चाल है
रुकी देश की अर्थव्यवस्था है
बंद मंदिर, मस्ज़िद, गिरजाघर है।

ना जाने कैसा ये मुसीबत आया है
परेशान रोता गरीब परिवार है
रोता रिक्शावाला,रोते फुटपाथ वाले हैं
ना मिल रहा रोटी भूखे - प्यासे बेचारे हैं।

साहिब नजर रखना इन गरीबों का
मौला कुछ मदद करना इन गरीबों का
ये भूखे पेट लिए ही सो जाते है
सब अच्छा कर दे भगवान
ये वैभव मांग रहा दुआ है।

ये कैसा समय दिखा रहा है
ये कैसा कहर छा रहा है
ये कोरोना कहां से आया है
पूरे देश को मुश्किल में डाला है।

सब कुछ अच्छा कर दे भगवान
ये तेरा प्रिय वैभव दुआ मांग रहा है।
                                         - वैभव खनूजा
00000000

देव लाल गुर्जर


इस बार तुमसे
मिलने नहीं आना
कहीं दफा़ बेहतर था

एकान्तवास में तुम्हारी
कविता के साथ दिन बिताना

क्योंकि
मैं नहीं चाहता कि
तुम्हें मुझसे कोई दूर करें!!
____

इस बार तुम आए
ना हाथ मिलाया
और ना चूमा तुमने....

यहाँ तक दूर ही रहे..

इसकी वजह थी
जो ऐसा करने पर
मुझे मजबूर करती थी

ताकि तुम्हें संक्रमित
प्रेम के सिवाय कोई रोग ना लगें..!
___

इन दिनों
तुमसे मिलना
केवल तभी हो सकता है

जब कभी उनके साथ
सुख-दुख बिताया जा सकता है

और वो है बस, तुम्हारी यादें
जिनके साथ जीया जा सकता है

इन दुख के दिनों को बुलाते हुए!
____

तुमने कहाँ था
तभी आना जब
तुम्हें मैं ना बुलाऊं...

और तुम्हारे कहने पर
मैं भी नहीं आया तुम्हारी ओर
इसका कारण सिर्फ़ तुम्हीं जानती हो,

और वह कारण है तुम्हारी सलामती..!
______

सुना है किसी से
इश्क़ हमेशा पहले अकेले होता है
और तब जा कर वह सही फलता है

और जब भी फलता है
तब फूल-फल के साथ
आराम और छाया भी देता है!

और तुम्हें प्रतीक्षा है
प्रेम में पड़ जाने की...
प्रेम में ईश्वर होने की..!
_____

--देव लाल गुर्जर
पता-राज्य.राजस्थान, जिला-बूँदी
तहसील-हिण्डोली ग्राम-कुम्हरला-पोस्ट-रोनीजा..
000000

दीपक कुमार त्यागी,


*मिलकर कोरोना को हराना है*

मिलकर कोरोना को हराना है,
घर से हमें कहीं नहीं जाना है,
हाथ किसी से नहीं मिलना है,
चहरे से हाथ नहीं लगाना है,
बार-बार अच्छे से हाथ धोने जाना है,
सेनेटाइज करके देश को स्वच्छ बनाना है,
बचाव ही इलाज है यह समझाना है,
कोरोना से हमकों नहीं घबराना है,
सावधानी रखकर कोरोना को मिटाना है,
देशहित में सभी को यह कदम उठाना है।

दीपक कुमार त्यागी,
स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार,
0000000000

डॉ.सुनील गुलाबसिंग जाधव,


फिर मिलेंगे.....

अमर कर गये वे अपने प्यार को
एक साथ मिले और जीवन को छोड़ा
आज सुना इटली देश का
प्यार  में पागल था एक प्रेमी जोड़ा |

अपने-अपने गालों को भिगोया था
दोनों की आँखों में आँसू थे लबालब
कसमें-वादे सपने टूटने का था दर्द  
जीकर प्रेम ना निभाने की थी पीड़ा  |

उस वक्त एक दूजे को उन्होंने
देखा था विवशता की नजरों से
ओंठों से कुछ फुट नहीं पाया था
था तो काँपता शरीर और रुंधा गला |

आँसू और नजरों के सामने नाचती हुई मौत
जबान से एक ही बात 
उपहार स्वरूप निकली थी
“फिर मिलेंगे ऐ मेरे दोस्त !”

और एक दूसरे के सीने से चिपटे
रूकती हुई सांसों पर संवार होकर
निकल पड़े थे वे दोनों
अगले मिलन के लिए |

उन्हें किसी ने हथियार से मारा नहीं था
उन पर नहीं था किसी का बंधन
किसी ने उनकी भावनाओं का गला नहीं रेता था
नहीं किया था विवश मरने के लिए |

भला कौन चुनता है अपनी मौत ?
उन्होंने स्वयं चुनी थी अपनी मौत !
वे सच्चे प्रेमी थे.... प्रेम के
उदात्त अर्थ को जानते थे |

प्रेम निजी या
स्वार्थी होता नहीं,
प्रेम तो विश्व और
मानव कल्याण के लिए होता हैं |

विश्व मानव की हत्यायें करने
हुँकार भरता, अट्टहास-गर्जन करता
नवम्बर-१९ चीन के वुहान से निकला था
कोविद-१९ नोवेल कोरोना वायरस |

वह फैल गया था विश्व के कोने-कोने में
भयभीत था सम्पूर्ण जनमानस
किसी में इतनी थी नहीं हिम्मत
के वह कोरोना का वध कर जन रक्षा करें |

तब जिसे हम धरती के देवता कहते हैं
उन डॉक्टरों ने सम्हाली थी कमान
जान की बाजी लगाकर शामिल हुए थे घमासान
सभी डटे रहे थे जंग में कोरोना के विरुद्ध |

कुछ युद्ध में लड़ते हुए, हुए थे शहीद
उसी में था इटली का डॉक्टर प्रेमी-पागल जोड़ा 
याद रखेगा उन्हें हमेशा इतिहास
नमन उन्हें बार-बार नमन उन्हें !

डॉ.सुनील गुलाबसिंग जाधव,
नांदेड़,महाराष्ट्र
000000000000000

विशाल श्रीवास्तव


COVIDE-19 ( कोरोना वध)
कोरोना वायरस आया लड़ने,
हमारे      हिन्दुस्तान.        से|
इसे  मिटाओ  मिलकर   सब
ये   हमें   मारेगा   जान     से|

घरों से बाहर   मत.  निकलो,
मत    दिखलाओ     नादानी|
सड़कों      पर.   मत     घूमो,
करो   ना   अपनी   मनमानी|

जो जहाँ है,वहीं  यदि  रहता|
देशहित में थोड़ा ,कष्ट सहता|
वो   ही   है ,  सच   में   महान|
उसका मैं करता  हूँ  ,गुणगान|

करता    है     यदि     कोई,
सच्चा भारत माँ  से   प्यार|
जान ले वो एक जगह रहना,
है कोरोना वध का हथियार|

युक्ति   कोरोना     के      वध      की,
कविता के माध्यम से बताता विशाल
एक.    जगह     रहने     से     ही,
आएगा     कोरोना     का     काल|


कवि:-- विशाल श्रीवास्तव
0000000000000000

अमित राज श्रीवास्तव


मुस्कुराहटें हमारी तो हुनर की बात है।
दर्द तो रहेगा ही ये तमाम उमर की बात है।

Muskurahaten hamari toh hunar ki baat hain.
Dard toh rahega hi ye tamaam umar ki baat hain.


*2
दुश्मनों की बस्ती से बेख़ौफ़ गुजरा मैं।
अब ख़ौफ़ हैं, कुछ दोस्तों का घर रास्ते में हैं।

Dushmanon ki basti se bekhauff gujra main.
Ab khauff hain, Kuchh doston ka ghar raste me hain.


*3
फिर न हो शिकायत तेरे लबों पे हमारे लिए।
गर मिले मौका रुख़्सत हो जान तुम्हारे लिए।

Phir na ho shikayat tere labo pe humare liye.
Gar mile mauka rukhsat ho jaan tumhare liye.


*4
किसी के बहुत करीब से गुजरता हूँ मैं हर दफ़ा।
किसी के नज़रों से बहुत दूर जो रहना है मुझे।

Kisi ke bahut karib se gujarta hun main har daffa.
Kisi ke nazaron se bahut dur jo rahna hain mujhe.


*5
दिल्लगी में हमने एक मुद्दत गुजार दी।
इश्क़ होते होते तक वो बेवफ़ा हो गए।

Dillagi me humne ek muddat gujar di.
Ishq hote hote tak woh bewafa ho gaye.


*6
बख्श दे ऐ मौत उनको, अभी जिनकी बारी है।
इधर आ मैं रातभर तड़पा हूँ, अब दिन की बारी है।

Bakhsh de ai maut unko, Abhi jinaki bari hain.
Idhar aa main raatbhar tadpa hun, Ab din ki bari hain.


*7
हम भी हो जाते ज़रा रूबरू ख़ुद से।
गर मेरी आँखों पे पट्टी और आईना बेज़ुबान न होती।

Hum bhi ho jate jara rubru khud se.
gar meri aankhon pe patti aur aaina bezubaan n hoti.


*8
न गुरूर बड़ा,
न शोहरत और धन।
हैं सबसे बड़ा,
रिश्ता और अपनापन।

Na gurur bada,
Na shoharat aur dhan.
Hain sabse bada,
Rishta aur apnapan.


*9
ख़ुदा पे शक़ हैं मुझे ग़मगीन किस्मत लेकर।
मेरे हिस्से दर्द लिखने बैठा हैं वो रिश्वत लेकर।

khuda pe shaq hain mujhe gamgin kismat lekar.
Mere hisse dard likhne baitha hain woh rishwat lekar.


*10
तेरे देहलीज़-ऐ-इश्क़ के सिवा,
अब कोई भी राह नहीं हो।
दिखे कितने भी मंजिले उम्दा,
मगर पाने की चाह नहीं हो।

Tere dehleez-e-ishq ke siva,
Ab koi bhi raah nahi ho.
Dikhe kitani bhi manzile umda,
Magar pane ki chah nahi ho.


*11
हम ही थे जो इश्क़ बेपनाह कर गए।
वो तो मेरा दिल भी संभाल न सके,
और हमे ही लापरवाह कह गए।

हाँ में हाँ मिलाने वाले वो शख़्स,
क्या हमें छोड़ जाओगे?
इसके जवाब में भी हाँ कह गए।
हम ही थे जो इश्क़ बेपनाह कर गए।

Hum hi the jo ishq bepanah kar gaye.
Wo to mera dil bhi sambhal na sake,
Aur hume hi laparbah kah gaye.

Han me han milane wale wale wo shakhs,
Kya hume chhod jaoge?
Iske jawab me bhi han keh gaye.
Hum hi the jo ishq bepanah kar gaye.


*12
रहे न फिर सफ़र तन्हा,
साथ जो तू मेरे आए।
गम न हो राहों में,
चाहे मंजिल ही बिछड़ जाए।

बिन तेरे दिल में कुछ नहीं होता हैं।
हर लम्हा मुश्किल सा होता हैं।

Rahe na phir safar tanha,
Sath jo tu mere aaye
Gam na ho raaho me,
Chahe manjil hi bichhad jaye

Bin tere dil me kuchh nahi hota hain
Har lamha mushkil sa hota hain


*13
इश्क़ ने सीखा दिया,
हमें भी मुस्कुराना ग़म में।
हम ऐसे भी न थे,
ऐसा हुनर न था हम में।

Ishq ne sikha diya,
Hume bhi muskurana gam me.
Hum aise bhi n the,
Aisa hunar na tha hum me.


*14
होता है ऐसा भी दर्द मज़ीद बढ़ने पे।
शब्द खुद करता है गुज़ारिश मुझसे,
उतार दो चित्त से मुझे पन्ने पे।
बन जाऊं मैं भी तेरे दर्द का हिस्सा,
एक दर्द-भरी अल्फ़ाज बनने पे।

Hota hain aisa bhi dard mazeed badhne pe.
Shabd khud karta hain gujarish mujhse,
Uttar do chit se mujhe panne pe.
Ban jaoon main bhi tere dard ka hissa,
Ek dard bhari alfaz banane pe.


*15
ऐ वक़्त रुक जा
या चल थोड़ा पीछे,
कुछ भूल आया हूँ मैं।
मंजिल की राह छोड़ कंही पीछे,
आगे बढ़ आया हूँ मैं।

Ai waqt ruk ja
Ya chal thora pichhe,
Kuchh bhul aaya hun main.
Manzil ki raah chhod kahin pichhe,
Aage badh aaya hun main.


*16
मुस्कुरा रहे हैं दिल से ही जरुर
लेकिन चल रही धड़कनें सिसक कर।

मेरे दिल में कहीं बंजर
कहीं हो रही हैं बारिशें जमकर।
रो रहा हैं दर्द भी कहीं
दिल के किसी कोने में घुटकर।

मुस्कुरा रहे हैं दिल से ही जरूर
लेकिन चल रही धड़कने सिसक कर ।

Muskura rahe hain dil se hi jarur
Lekin chal rahi dhadkanen sisak kar

Mere dil me kahin banjar
Kahin ho rahi hain barishen jamkar.
Ro raha hain dard bhi kahin
Dil ke kisi kone me ghutkar.

Muskura rahe hain dil se hi jarur
Lekin chal rahi dhadkanen sisak kar.


*17
ग़म छिप जा कहीं अब तू सारे दर्द समेटकर।
सुबह होने को आई हैं फिर हँसना हैं खुलकर।

Gam chhip ja kaheen ab tu saare dard sametakar.
Subah hone ko aaee hain phir hansana hain khulakar.
Amit Raj Shrivastava
अमित राज श्रीवास्तव
000000000000

हमीरशा जुनेजा

कई खुदा देखे इस जहाँ में
बस देखना अब इंसान है।
न मिला मुझे कोई फरिश्ता
शायद यहाँ सब हैवान है।


कहीं जान नजर नहीं आती
शायद यहाँ सब बेजान हैं।
अपने ही गममें उलझे हैं सब
शायद यहाँ सब परेशान हैं।


अपने ही ज्ञान में सब डूबे हैं
कहाँ गीता और कुरान हैं।
सारे जहाँ में ढूंढ आया मैं,
यह भूल हैं की यहाँ इंसान हैं।

--
मैं अब तकदीर लिखना सिख गया हूं..

इन हालातों के दरिया में डूब डूब कर मैं
तैरना सीख गया हूं।
ठोकरें यह जिंदगी की खा खा कर मैं
जीना सिख गया हूं।


कितनी ही काली रात क्यों न आ जाये
मैं सवेरा होना सीख गया हूं।
मेरे सारे अँधेरे रौशनी हो चुके हैं क्यूंकि
मैं सितारा होना सीख गया हूं।


यह जंग तो मैं अकेला ही जीत सकता हूं
मैं शमशीर बनना सीख गया हूं।
और खुदा से अब कोई शिकवा नहीं मुझे
मैं तकदीर लिखना सीख गया हूं।
 
हमीरशा जुनेजा

0000000000000

ग़ज़ल
       

  *राम नरेश 'उज्ज्वल'


1
हैं विकट हालात मत घबराइए ।
कुछ दिनों की बात मत घबराइए।

2
जान जोखिम में पड़े तो जूझिए,
  शह मिले या मात मत घबराइए।

3
हौसले की छतरियां लेकर चलें,
हो अगर बरसात मत घबराइए।

4
याद अपनों की सताने जब लगे,
कर लीजिए बात मत घबराइए।

5
कर्म के इस वृक्ष को बस सींचिए,
झड़ रहे हैं पात मत घबराइए।

6
जिंदगी में कभी होती है अगर,
कोई वारदात मत घबराइए।

7
खौफ का माहौल है चारों तरफ,
  दिन हो या रात मत घबराइए।

8
हादसे में आप ही केवल नहीं
पूरी कायनात मत घबराइए ।
         -----------------
               मुंशी खेड़ा,
अमौसी एयरपोर्ट
लखनऊ - 226009
ईमेल : ujjwal226009@gmail.com
000000000000000000

- डॉ दीपक कोहली,

(कोरोना जैसी प्राकृतिक आपदा के संबंध में कविता)

रफ्तार करो कम के बचेंगे तो मिलेंगे
-----------------------------------------------

रफ्तार करो कम के बचेंगे तो मिलेंगे ,
गुलशन न रहेगा तो कहां फूल खिलेंगे।

वीरानगी में  रहकर खुद से भी मिलेंगे,
रह जाएं सलामत तो गुल खुशियों के खिलेंगे।

अब वक्त आ गया है कायनात का सोचो,
कि रूठ गई गर तो ये मौके ना मिलेंगे।

जो हो रहा है समझो क्यों हो रहा है ये,
कुदरत के बदन को और अब कितना छिलेंगे।

मौका है अभी देख लो फिर देर ना हो जाए,
जो कुदरत को दिए जख्म वो अब कैसे सिलेंगे।

है कोई तो जिसने जहां हिला के रख दिया,
लगता था  हमारे बिन पत्ते न हिलेंगे।

झांको दिलों के अंदर क्या करना है सोचो,
खाक में वरना सभी हम जाकर मिलेंगे।
खाक में वरना सभी हम जाकर मिलेंगे।

------------------------------------------------------

- डॉ दीपक कोहली,
उपसचिव, पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग,
उत्तर प्रदेश शासन, 5/104, विपुल खंड, गोमती नगर, लखनऊ - 226010( उत्तर प्रदेश
0000000000000

स्मृति ए. कुमार


(तू चल तो सही,, तू चल।)

तू चल तो सही,, तू चल।
मार्ग में है विकट  ,मंजिल भी है निकट
तू चल तो सही ,,तू चल।
कर खुद को इतना कठोर तू
तुझे कोई तोड़ ना पाए
कर खुद को इतना बुलंद तु
तेरी सफलता शोर मचाए
बुरे इरादों को, कर दे विफल
तू चल तो सही,, तू चल।
कभी थके तु , ठहर जरा
पल भर को आराम कर
चलते रहने के लिए
रुक जरा ,,विश्राम कर
कनि धीरज धर मत हो अधीर
कायर नहीं ,,तु है सुरबीर
मन मे मत रख कोई  छल
तू चल तो सही,, तू चल।
नदी भी राह बनाती है
सागर से मिलने जाने को
फूल का रस चुराती  मधुमक्खियां
  अमृत शहद बनाने  को
परिश्रम से खडे़ कर ले
तु अपने सपनो का महल
तू चल तो सही,, तू चल।।
000000000000

मधु वैष्णव

।ठहराव।।
धवल चांदनी को इठलाते हुए देखा,
चांद तारों को खिड़कियों से झांकते देखा।
सुनहरी धूप को हवा के संग गुनगुनाते देखा,
परिंदों के कलरव में सरगम को मुस्कुराते देखा।
छत भी मुस्कुरा उठी जब घर के हर कोने में अपनापन देखा,
भागम - भाग का छूटा बहाना दादा को किस्से कहानियां सुनाते देखा।
धरा पर लौट आया इंसा भी अपनी आसमानी चाहत से,
मधु निरंतर सफर में ठहराव का अर्थ देखा।
                     मधु वैष्णव ( जोधपुर)
000000000000000000000

हरिओम चन्दीर

करोना
क- करोना कहता है, कोई मुझसे न इतराओ।
प्रधानमंत्री की अनुशासन को, पालन कर दिखलाओ।
तुम एक उल्लंघन करोगे तो,
मैं सौ करोड़ कर जाऊँगा।
मेरे दिल में मोह माया नहीं,
सब योंही डकर जाऊँगा।
ऐसी भूल -गलती को, जान कर के न दुहराओ
प्रधानमंत्री के अनुशासन को, पालन कर दिखलाओ।
रो- रोड पर जाकर रो कर के भी,
मेरे क्रोधाग्नि को बुझा न सकते।
मैं अंधा, बहरा भस्मासुर हूँ,
कुछ दिखा न सकते, सुना न सकते।
मेरे कहर का दृश्य, चीन, इटली, अमेरिका का,
देखकर सतर्क हो जाना सीख जाओ।
प्रधान मंत्री की अनुशासन को, पालन कर दिखलाओ।
ना की स्थिति ना आने दो,
अनमोल अवसर हाथ से न जाने दो।
अनसुना कर ना सतर्कता  की बात को,
कवि चन्दीर का कहना मान,
नहीं तो, मैं करोना, मिटा दूँगा कायनात को।
लौकडाउन के पालन से,
संक्रमित लोग चिन्हित  हो जाएगा।
उन लोगों का उपचार होगा,
तब स्वस्थ व्यक्ति परिवार,
समाज, राज्य, राष्ट्र और संसार होगा।

हरिओम चन्दीर की रचना  एम , ए  ,शोधार्थी  एल एन एम यू दरभंगा,  हिन्दी  विभाग  (बिहार )
000000000000000

भवानी


मैं अंधविश्वासी हूँ

बिल्ली रास्ता काटे तो, रुक जाता हूँ
दिखे कोई मंदिर अगर, झुक जाता हूँ

पेड़ो से धागे बाँध, मन्नत माँगता हूँ
नींबू मिर्च मैं दरवाजे पर टाँगता हूँ

अगर कोई कभी पीछे से टोक देता है
या फिर कोई छींक कर रोक देता है

शुभ कार्य से पहले मैं दही खाता हूँ
दिशा शूल हो यात्रा पर नहीं जाता हूँ

गुरुवार को नहीं झाड़ता मकड़ी के जाले
तरह तरह के वहम मैंने हैं मन में पाले

कर टोटके बुरी नजर उतारता हूँ
पाप के डर से मच्छर भी नहीं मारता हूँ

जाने ये सब मुझे किसने है सिखाया
पीढ़ी दर पीढ़ी से ये चलता आया

-
000000

कुमार रवि


मेरी दादी माँ

मेरी दादी मां
बहुत याद आती हो तुम ।
कभी यादों में, तो कभी सपनों में आकर
बहुत रुलाती हो तुम ।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।
तेरे संग बिताये लम्हें को सोच के
आंखें नम कर जाती हो तुम ।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।
बिन तेरे दुनिया अंधकार सा लगता है
काश फिर से लौट आती तुम ।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।
मानो ज़िन्दगी की हर खुशी हो गयी हो गुम ।
मेरे लिए भगवान की मूरत थी तुम ।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।
मेरे हर डगर की  प्रेरणास्रोत  हो
मेरी हर सफलताएं की श्रेय हो तुम।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम।
भुलाये नहीं भूल पाता तुम्हें
मेरी ज़िंदगी की जन्नत थी तुम ।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।
तेरे संग बिताएं हर लम्हे सोच के
मेरी साँसों को महकाती हो तुम।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम।
क्यों तू मुझे छोड़ के चली गयी
क्यों नहीं लौट के आ जाती तुम ।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।
तेरे दिए अनमोल वचन मुझे
मुझे एक अच्छा इंसान बना जाती  हो तुम ।।

मेरी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।
क्या लिखूं तेरे लिए ,कितना लिखूं
कलम को भी निःशब्द कर जाती तुम ।।

मेरी प्यारी दादी माँ
बहुत याद आती हो तुम ।।

कुमार रवि
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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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