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तारक मेहता का उल्टा चश्मा - ऐसे ही नहीं बन जाती गोकुलधाम सोसायटी - डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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चिंतन........ ऐसे ही नहीं बन जाती गोकुलधाम सोसायटी *********************************** मनोरंजन की दुनिया सजती है "तारक मेहता...." ...

चिंतन........

ऐसे ही नहीं बन जाती गोकुलधाम सोसायटी

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मनोरंजन की दुनिया सजती है "तारक मेहता...." से......

                छोटे पर्दे पर विगत कई वर्षों से चल रहे विशुद्ध मनोरंजक सीरियल " तारक मेहता का उल्टा चश्मा " ने समाज में एक अच्छा संदेश दिया है और लगातार दे रहा है -- कि एक परिसर ने बसायी गयी कॉलोनी के लोगों में किस तरह की समझदारी , प्रेम और स्नेह का संचार होना चाहिए । सभी वर्गों के लोगों द्वारा देखा जाने वाला उक्त सीरियल अपनी सौम्यता और साफ - सुथरे हँसी- मजाक वाले दृश्यों के कारण ही सभी के दिलों में स्थान बनाने में कामयाब हो सका है । मैं एक टीवी शो को लेकर आखिर लेख का स्वरूप देने का प्रयास क्यों कर रहा हूँ यह मेरे पाठकों के लिए बड़ा प्रश्न हो सकता है । जहाँ तक मैंने समझा है वर्तमान में पूरे परिवार के साथ बैठकर देखने लायक यदि कोई टीवी कार्यक्रम है तो वह  " तारक मेहता का उल्टा चश्मा " ही मुझे दिखायी पड़ता है । कुछ सम्मानजनक छेड़छाड़ जैसे दृश्य सीरियल में दिखायी पड़ते हैं । जेठालाल और बबिता का पात्र कर रहे दोनों कलाकारों की हँसी - ठिठोली मेरी सोच में आपत्तिजनक नहीं कही जा सकती है । इस टीवी शो ने आपसी भाई- चारे के जो संदेश दिया है या प्रतिरोज देता आ रहा है ,उसे हमारा मानवीय समाज खुद की सोसायटी में प्रेक्टिकल रूप में अपनाना चाहता है । इस बात को स्वीकार करने में शायद किसी को भी इंकार नहीं होगा कि नई बसने वाली कॉलोनियों में यदा- कदा "गोकुल धाम सोसायटी " का दॄश्य निर्मित किये जाने का प्रयास होता दिखायी पड़ जाता है । गणेश उत्सव पर्व का दृश्य , दही लूट की दही हाँडी , नवरात्रि का गरबा, क्रिकेट का रोमांच ,लुका- छिपी का खेल और सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली " टप्पू की टीम"  अथवा टप्पू सेना के अनोखे करतब ने हम सबको अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने विवश किया है ।

               एक टीवी शो के माध्यम से हमारे मानवीय समाज में यदि एक प्रतिशत भी बदलाव आता है और कॉलोनियों में  " गोकुल धाम " बनने की प्रेरणा जन्म लेती है तो मैं शो के निर्माता से लेकर सभी पात्रों की भूमिका को साधुवाद देना चाहूंगा । छोटे - छोटे विवादों पर बंट और झगड़ रहे मानवीय समाज के लिए किसी कहानी, दृश्य-श्रव्य नाटक के द्वारा उसकी नकल करने का प्रयास क्या सकारात्मक बदलाव नहीं माना जाना चाहिए ? मैं जिस छोटे से जिला स्तरीय शहर का निवासी हूँ ,वहाँ की बहुत नहीं तो कुछ कॉलोनियों में  " गोकुलधाम " बनने की चेष्टा का ऐसा ही दृश्य देख रहा हूँ । बड़ी अच्छी बात है कि हम अपने बच्चों को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि --" तारक मेहता का उल्टा चश्मा " की  " टप्पू सेना " जैसी संगठन क्षमता और परोपकार की भावना उनके अंदर भी विकसित होना चाहिए । कमोबेश कुछ ऐसा ही उन सभी परिवार के सदस्यों से भी कहना चाहते हैं जो कॉलोनियों को  "गोकुलधाम " बनाने की इच्छा रखते हैं - कि सभी के अंदर एक - दूसरे के प्रति मान -सम्मान , दुख- दर्द में साथ खड़े रहने की क्षमता का विकास होना चाहिए जैसा कि हम उक्त सीरियल में देखते आ रहे हैं । जहाँ तक मैं समझता हूँ ,यह उतना आसान नहीं है ,जितना कुछ लोगों द्वारा समझा जा रहा है , और कुछ त्योहारों में छोटे - मोटे आयोजनों द्वारा " गोकुलधाम " का दृश्य निर्मित कीट जा रहा है । कुछ ही घंटों में इन लोगों की एक - दूसरे के प्रति कटुता भी व्हाट्सएप्प में सामने आने लगती है । कथित सीरियल का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी एक की लीडरशिप को स्वीकार करना होगा । फिर उसके लिए किसी को कुछ भी त्याग क्यों न करना पड़े ।

                हमअपने बीच कॉलोनियों में जो वातावरण देख रहे हैं ,उस आबोहवा में  " गोकुलधाम " बनने की तमन्ना दिन के स्वप्न की तरह ही है । सबको साथ लेकर न चलने की हमारी अपनी हठी प्रवृत्ति ऐसी चाहतों पर पहला प्रहार करती प्रतीत होती है ।  "तारक मेहता का उल्टा चश्मा " ने वास्तव में अपनी अलग - अलग कहानियों के माध्यम से वर्तमान समाज की आंख में चढ़े गर्व रूपी चश्में को उतार फेंकने का प्रयास किया है । किसी भी विवाद पर उसका शांतिपूर्ण समाधान निकालने सभी परिवार के छोटे - बड़े सदस्य अपना सर्वस्व लगाने तत्पर दिखायी पड़ते हैं । दूसरी ओर सबसे उम्र दराज ,जेठालाल के पिता को सभी अपना आदर्श मान न केवल चाचा जी जैसे सम्मानजनक संबोधन से पुकारते हैं बल्कि उनकी बात अथवा दिए गए दिशा-निर्देश को लक्ष्मण रेखा मानते हैं । कॉलोनियों की संस्कृति में बदल रही पूरी दुनिया के लिए "तारक मेहता का उल्टा चश्मा " एक मॉडल बन सकता है । यदि हम सभी के हृदय में भी उक्त सीरियल के एक- एक पात्र की भूमिका जन्म ले ले । लड़ाई - झगड़ा, दंगा- फसाद या फिर किसी भी तरह का छोटा अथवा बड़ा विवाद ठीक उसी तर्ज पर सुलझाने हम भी कदम उठा सकते हैं ,किन्तु इस तरह आनंदोत्सव के लिए त्याग सबसे बड़ा शस्त्र है, जिसे सभी को स्थिति के अनुसार स्वीकार करने तैयार होना होगा ।

              हम जब बात करते हैं -" तारक मेहता का...... " तो इस बात का उल्लेख भी जरूरी हो जाता है कि बड़ों की दुनिया से बेफिक्र बच्चों का संसार " टप्पू सेना" के रूप में अपनी जवाबदारियों और कर्तव्यों को किस तरह पूरा कर रहा है । आज जहाँ पूरी दुनिया बच्चों के अंदर पनप रही विकृतियों को लेकर चिंतित है ,वहीं इस सीरियल में शामिल परिवारों के किसी भी सदस्य में इस तरह की परेशानी की छाया दूर- दूर तक भी दिखायी नहीं पड़ती है । यह गहन चिंता का विषय होना चाहिए कि आखिर हमारी वास्तविक दुनिया में ऐसा क्यों नहीं है ? हम अपने बच्चों के भविष्य के साथ ही उनके अंदर जन्म लेने वाले संस्कारों को लेकर भयभीत क्यों हैं ? क्या हम अपने बच्चों पर वैसा विश्वास नहीं कर सकते जैसा कि टीवी के उक्त शो में देख रहे हैं ? कहीं न कहीं माता- पिता और परिवार के अन्य बड़े सदस्यों का व्यवहार ही हमारे बच्चों को दिग -भ्रमित करने या काम तो नहीं कर रहा है ? क्या ये सारे सवाल केवल मेरे ही दिमाग में उठ रहे हैं ? जहाँ तक मैं समझता हूँ इन सवालों का जवाब हर समाज ,हर जाति, हर धर्म तथा हर माता- पिता द्वारा ढूंढा जा रहा है । कोई भी चलचित्र ,नाटक, नृत्य- संगीत और पटकथाओं द्वारा दिखाए जाने वाले दृश्य अथवा कहानियाँ हमें संदेश देने के उद्देश्य से ही तैयार किये जाते हैं । सवाल यह है कि हम उन्हें किन अंशों में स्वीकार करते हैं या फिर अपने जीवन में उन्हें स्थान देते हैं ।  

                    मेरे पाठक यह भी सोच सकते हैं कि मेरे द्वारा केवल  " तारक मेहता....." की ही चर्चा क्यों कि जा रही है । ऐसे और भी कार्यक्रम हो सकते हैं , जिन्हें मैंने अपने लेख का विषय नहीं बनाया । कारण स्पष्ट है -- छोटे पर्दे पर देखे जाने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों में " तारक मेहता ......" ही ऐसा धारावाहिक है जिसे हर उम्र के लोग बड़े मजे के साथ देखते हैं । इस मामले में यदि कोई सर्वे कराया जाए तो शायद प्रत्येक परिवार के बड़े हॉल से लेकर एकांत कमरों में लगे टीवी सर्वाधिक समय इसी सीरियल के ठहाकों से गूंजते सुनाई पड़ेंगे । जर घर से दिन के अधिकांश घण्टे बबिता जी... भिड़े.... पोपटलाल.....डॉ. हाथी......दया बहन......गोकुलधाम का एकमेव सेक्रेटरी....सहित टप्पू बदमाशी नहीं.... आदि आवाजें ही आती रहती हैं । पूरा लेख लिखने का एक ही मकसद --ऐसे ही धारावाहिकों को अनुमति दी जाए ,जो फूहड़ता से दूर परिजनों के साथ हँसी - ठहाकों के बीच देखे जा सकें।

                               डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

            न्यू खंडेलवाल कॉलोनी,ममता नगर

            प्रिंसेस प्लैटिनम, हाउस नंबर 05

            राजनांदगाँव (छ. ग.)

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रचनाकार: तारक मेहता का उल्टा चश्मा - ऐसे ही नहीं बन जाती गोकुलधाम सोसायटी - डॉ. सूर्यकांत मिश्रा
तारक मेहता का उल्टा चश्मा - ऐसे ही नहीं बन जाती गोकुलधाम सोसायटी - डॉ. सूर्यकांत मिश्रा
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