हिंदी का पहला 'ध्वनि व्याकरण' (Hindi's first Sound Grammar) : डॉ. सदानंद पॉल

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हिंदी का पहला 'ध्वनि व्याकरण' (Hindi's first Sound Grammar) ■लेखक : डॉ. सदानंद पॉल जब मैंने 2000-2001ई. में हिंदी शब्द 'श्री...

हिंदी का पहला 'ध्वनि व्याकरण' (Hindi's first Sound Grammar)

■लेखक : डॉ. सदानंद पॉल

जब मैंने 2000-2001ई. में हिंदी शब्द 'श्री' को 2,05,00,912 तरीके से लिखा । मूलरूप से उनमें 30,736 (कैलीग्राफी सहित) शब्दों को 666 चिह्नों/प्रतीकों से जोड़ते हुए उनके ध्वन्यात्मक-अर्थ के साथ 'श्री' का सार्थक उच्चारण कराया, तो 'ध्वनि-व्याकरण' की प्रत्यर्थ अवधारणा मानस - पटल पर आयी, जिनके विन्यसत: संलग्न-दस्तावेज़ में 16 ('श्री' के लिए लिखा) संकेत-विस्तार को और आगे बढ़ाते हुए हिंदी का संभवत: पहला 'ध्वनि-व्याकरण' लिख डाला । पं. कामता प्रसाद गुरु ने 'हिंदी व्याकरण' में लिखा है--- " ध्वनि को पहचानने के लिए एक-एक चिह्न नियत किये जाते हैं...एक ही मूल ध्वनि के लिए उनमें भिन्न-भिन्न अक्षर होते हैं" । 'ध्वनि-व्याकरण' पर नियम अग्रांकित है:-

★1. "..." ( माना 'इ' के बाद तीन बिंदु पर 'इ' के रफ़्तार को पकड़ाकर अंग्रेजी 'E' ध्वनि के
पूर्ण पर आगे की ध्वनि-निर्माण अर्थात् खिंचाव-सा और संतुलित कम्पन बरकरार)

★2. ".." ( तीन बिंदु पर बोलने के रफ़्तार की एक ध्वनि निकलती, जबकि दो बिंदु पर 2/3 ध्वनि ही आकृष्ट होती, हालांकि इसमें लय नहीं, बल्कि शब्द के अंतिम वर्ण ही ध्वन्यात्मक-आकृष्ट कराया)

★3. "-" (योजक, किंतु हल्का ध्वनि - रफ़्तार / जो पूर्णत: "," कॉमा-चिह्न के विपरीत ध्वनि- विस्तार करते हैं, क्योंकि "," चिह्न वर्णोच्चारण को विरमित करते हैं)

★4. "- -" ( तीन योजक-चिह्न तीन ध्वनि - अंतराल को आकृष्ट करती है, जबकि दो योजक-चिह्न इस अंतराल को COMBINAT करता है)

★5. " ._ /-.0 / _. / .0 / - -- / (..), / | .. | / ॥:॥ / (- -) ( सिर्फ एक "." बिंदी या बिंदु ध्वनि को Full stop कर देता है, पुनः "-" योजक के सहारे हल्का ध्वनि लिए आगे बढ़ता है, योजक के बाद "बिंदु" स्तब्धित करता है और ".0" चिह्न जहां बिंदु के बाद शून्य को सूचित करता है, जबकि दशमलव के बाद शून्य को "0.0" लिखा जाना ही सही है। बिंदु के बाद शून्य (0) उच्चारण को हालांकि वो शून्यायत करता है, किन्तु आवर्त-रेख "----.0" उच्चारण को उसी में एकमेव कर देता है, फिर बिंदु से पहले "0" Full stop के आगे की ध्वनि-उत्पन्न की स्थिति में उन्हें नवजात-खिंचाव देता है । छोटा "-" योजक चिह्न के बाद बड़ा "---" योजक चिह्न ध्वनि-रफ़्तार को उद्वेलित करता है। ".." द्वय बिंदु के रफ़्तार को विभिन्न कॉलम में डालकर उच्चारण को जहाँ सीमित करता है, वहीँ "-" योजक चिह्न भी उच्चारण को सीमित करता है, परंतु "हलंत" चिह्न की स्थिति ध्वनि को मुख से निकलने से पहले ही समाप्त कर देता है , जहाँ निर्देशक - चिह्न (:) ध्वनि के हौलेपन को निर्देशित करता है , वहीँ (:)विसर्ग चिह्न को 'अः/अहः' उच्चारण लिए हल्का ध्वनि प्रस्तुताक्षर के साथ बोला जाता है । फिरतो हलंत लगाकर उच्चारणात्मक-ध्वनि को सीमित किया जाता है।

★6. " अ÷2/अ×1/2 / s / _s_ / अ में हलन्त और अर्द्ध चंद्र " ( आधा अ का चिह्न, फिर अ का आधा यथोक्त स्थिति में जहाँ अधूरा स्थिति है, वहीँ पूर्व मात्रा व अक्षर ध्वनि को विस्तार देता है । अ की सभ्यता को अर्द्ध चंद्र से दबाव डालकर हलंत चिह्नांकन लिए आधा उच्चारण पर ग़लतफ़हमी पैदा किया जाता है । वहीँ आधा अ के लिए अन्य सहित s , फिर s का कई style उसी भांति प्रयुक्त होंगे , जैसा कि अंग्रेजी वर्णमाला के capital और small letter के साथ होता है। जैसे:- 'राम' लिखने के लिए, यथा:-Ram,ram,rAM, raM, ram, Ra M, r A m, RR am, R aam, Ra mm, RR amm, RR aam, RR aa mm, R ham, R h ha m, rhame, RR R am, R h aam, R aa am, raam e, Ra hm, Ra mh, Ramh h, Ra mmH,R aaa mh, Ra hme , Rh aa -mm, Ra hhm, Raa hmm , RR amm , Raa hm = राम)

★7. " इ चिह्न /अनुस्वार चिह्न / चंद्र-बिंदु चिह्नांकन " (ह्रस्व 'इ' चिह्न के ऊपर बाँयें स्थान पर अर्द्ध चंद्र चिह्न का प्रयोग अजूबा और नवीन है , किन्तु ह्रस्व इ चिह्न से अर्द्ध-चंद्र चिह्न का उच्चारण पहले होगा । इनसे पहले अक्षर /मात्रा के सीमित दबाव को कुछ आगे बढ़ाकर उच्चारित करना । यहां "अर्द्ध-चंद्र =2/3 AU, न ×1/2= अनुस्वार, न×1/4= चंद्र-बिंदु" है)

★8. "अर्द्ध-चंद्र चिह्न/चंद्र बिंदु चिह्न पर हलंत/दो योजक पर अर्द्ध चंद्र/दो अर्ध चंद्र/.. पर अर्द्ध चंद्र/ तीन अर्द्धचंद्र /.पर अर्द्धचंद्र /तीन योजक पर अर्द्धचंद्र और हलंत /अर्द्ध चंद्र और अनुस्वार पर हलंत" (अनुस्वार और चंद्रबिंदु ध्वन्यात्मक-रूप में न कार {नाक से आवाज} पैदा करते हैं ।चूंकि तृतीया के चाँद को चंद्र चिह्न, फिर इस चिह्न पर हलंत लगने पर अर्द्ध चंद्र और चाँद पर तारा बिंदु रहने पर चंद्रबिंदु कहलाता है । हलंत की स्थिति ध्वनि को भी आधा कर देता है। वहीँ अर्द्ध चंद्र , जो चंद्र चिह्न के लिए 2/3 AU का ध्वनि देकर दबाव के परिप्रेक्ष्य में तीन योजक चिह्न तक क्रमिक ध्वनि-अंतराल के साथ COMBINAT करता है । अनुस्वार चिह्न, चंद्र चिह्न "." / ".." / ";" इनके साथ नासिका-स्पर्श होकर अर्द्ध विराम लगवाकर ध्वनि को स्तब्ध - ध्वनि में परिणत करता है)

★9. "¢ 0 या फ़ाइ शून्य हलंत / √¢¢ हलंत / 0 हलंत / ¢ हलंत / √० /√¢ " (यहां शब्द के भेद कर्ता में शून्य चिह्न, फाइ चिह्न आदि BLANK ध्वनि को सूचित करता है। गणितीय भाषा में भी शून्य और फाइ शब्द का अर्थ रिक्ति से है ,¢ (0 को ऊपर से एक रेखा से उदग्र काटना), रिक्त समुच्चय में भी ऐसी स्थिति है । शून्य में हलंत हो या फाइ को √ के अंदर रखना -- इन सभी स्थतियों में ध्वनि उच्चारित नहीं होता है यानी " ")

★10. " '!' पर हलंत/ ! पर अर्द्ध चंद्र और हलंत / ओ ,आ , ए, अर्द्धचंद्र लिए ऐ, इ, इ ई, आ इ, इ अनुस्वार , आ पर दो हलंत, ई के बांये-दांये अर्द्धचंद्र,बिंदु और अर्द्धचंद्र इ , इ इ , ई ई के चिह्न या प्रतीक पर हलंत"( ! ÷2 = वही उच्चारण होगा, जो पहले वाले अक्षर की ध्वनि है । ऐसे चिह्नों के बाद जहाँ ')}]' बंद - कॉलम अध्वनि की सूचना देती है ।इसलिए एक समान चिह्नात्मक-ब्यौरे इस परिप्रेक्ष्य में है । तभी तो अर्द्धचंद्र का चिह्न एतदर्थ दबाव डालकर उन्हें हलंत चिह्न से सीमित करता है । 'ओ' कार में 'ए' कार के लिए अलग हलंत तथा 'अ' कार के लिए अलग हलंत मिलकर भी ध्वनि-विस्तार को सीमित करता है , यही वस्तुस्थिति 'आ' कार और 'ऐ' कार में हलंत साथ है । inverted comma में ' ' (अर्द्धावतरण) और " " (पूर्णावतरण) चिह्न बंद-ध्वनि की स्थिति है, जो कि ख़ास है । अंग्रेजी E, Ee, Eee, ∑ में अनुस्वार का प्रयोग 'न' कार का प्रयोग भर है , फिर इस पर हलंत ध्वनि पर नकेल कसना जो है । अन्य चिह्न उच्चारण - परम्परा के निहित है। हालांकि इनमें कई प्रतीक हाथ से लिखा जाने में ही संभव है, जो बहरहाल कंप्यूटर के ये 'टाइप' बोर्ड पर नहीं है)

★11. " 0 × 0 " (अँग्रेजी 'ओ' / 'O' न होकर यह गणितीय '0' शून्य है , अर्थात् 0×0=0 होकर यह शब्दों के बाद/साथ लगकर उच्चारण को शून्य तक सीमित कर देता है , आगे कुछ नहीं पैदा करता । उसी तरह से 0-0=0, 0+0=0, 0 पर आवर्त्त घटा 0 पर आवर्त्त की स्थिति लिए '-' और '.' भी उच्चारण को शून्य कर देता है , जो कि solution के बाद उच्चरित है)

★12. " ., / । / ,` / ; / -; / अर्द्धचंद्र के साथ कॉमा , फिर हलंत भी " ( अल्प विराम ' , ' या कॉमा का उच्चारण हालांकि ध्वनि को लघुत्तर करता है , किन्तु इनके पहले ' . ' Full stop या पूर्ण विराम '।' चिह्न ध्वनि को विराम देकर पूर्ण विराम लगाता है । जहां ' ; ' में उच्चारण अर्द्ध और पूर्ण विराम के बीच की ध्वनि निकलती है । फिर ऐसे प्रतीकों के बाद अर्द्धचंद्र की स्थिति प्रतीकोच्चारण में 2/3 ही बल डालता है । विदित हो, यहाँ योजक - चिह्न वैसे प्रतीकों में आकर एकसाथ ध्वनि केन्द्रित करता है)
★13. " √ / √0 / √० में शून्य पर अर्द्धचंद्र / √० पर वर्ग / (√०) पर वर्ग / √० पर अर्द्धचंद्र / √० पर हलंत " ( गणितीय-अनुशासन में '√' प्रतीक वर्गमूल का है , जो अंकों में लगकर अंकों को बराबर अंकीय गुणन से कम करता है , उसमें √ पर हलंत चिह्न के साथ 1/2 होता ही है, जहाँ √० पर हलंत का उच्चारण भी शून्य है , किन्तु अर्द्धचंद्र का उच्चारण ध्वनि में 2/3 AU का दबाव देता है । फिर √० का वर्ग भी शून्य उच्चरित करता है । शून्य का उच्चारण 'अहसास' भर है । यह भाषा और गणित के बीच सामंजस्यता लाना है । तभी तो 0 का वर्ग =1 या ≠ 1, फिर 0 का घन = 0, 0 पर ० वर्ग = 1 एक अलग रिसर्च है)

★14. " 0×∞ / ∞ पर हलंत / 0×0 और ∞ पर आवर्त चिह्न सहित हलंत / 0×[∞] पर आवर्त चिह्न सहित हलंत चिह्न / ∞ . . ×0 पर आवर्त सहित दो हलंत चिह्न" ( ∞ को 'अनंत' चिह्न के तौर पर लिया गया है , हिंदी भाषा में अनंत उसी के परिप्रेक्ष्यत: है । हल् चिह्न वास्तविक उच्चारण को सीमित करता है तथा उच्चारण 'E......' से लंबी ध्वनि ध्वनित कराये जाते हैं, किन्तु शून्य के साथ गुणित होकर 'अहसास' ध्वनि अथवा ध्वनि को BLANK कर देता है । रोमन लिपि ने ढेर सारे नव वर्णचिह्न अपने लिपि में शामिल किए । यहां 666 प्रतीक गणित-सांख्यिकी से लिए ध्वनि उत्प्रेरित करती है)

★15. " 0 पर अर्द्धचंद्र पॉवर ÷ 0-0 / आधा य् और 0 पर हलंत/ 0.0 पर आवर्त्त / 0×0 पर आवर्त और × / 0 और इ चिह्न पर अर्द्धचंद्र और हलंत / 0-- पर हलंत / आधा अ और 0 पर अर्द्धचंद्र तथा हल् / आधा अ में 0 हल् सहित / इ का अलग type और 0 सहित हल् / इ 0 ई चिह्न पर हल् / 0 पर अनुस्वार और हल् / 0 और आधा अ हल् सहित संयुक्त / आधा अ पर 0 पर अर्द्धचंद्र / 0×अर्द्ध चंद्र ÷आधा अ / [० चंद्रबिंदु पर हलंत ] पर हलंत / [(∞)] पर वर्ग / [{(0) पर हलंत / - - × 0 पर आवर्त्त / [० - - ] / इ चिह्न और 0 पर हल् और आवर्त्त / 00 दोनों पर हलंत / चवर्ग का अंतिम वर्ण का आधा पर दो हलंत × 0 / 0.0 × 0.0 दोनों पर आवर्त / (0 : ) के अंदर-बाहर हलंत / style में आधा अ के साथ 0 में हलंत सहित " (जैसा कि नियम-15 में स्थिति- वर्णन किया है । शून्य ध्वनि को लेकर जहाँ power , चंद्रबिंदु हलंत, अर्द्धचन्द्र , 2/3 AU के लिए उच्चारण शून्य अथवा BLANK जाता है । अँग्रेजी E के उच्चारण में खिंचाव ें खिंचाव के साथ श्री के लिए लंबा तान वही उच्चरित करता है । शून्योच्चारण के बाद आधा अ बोलना है । चूंकि शून्य किसी भी चिह्न के साथ गुणन होकर '0' में तब्दील हो जाता है । कॉलम चिह्नों के साथ शून्य ध्वनि अटक जाती है, परन्तु यह हलंत के साथ Blank sound हो जाता है । '- -' भी घ्वनि-अंतराल को combination लिए है । कैलिग्राफी type भर है । 'श्री + 0' = श्री । 'श्री - 0' = श्री । यहां कर्त्ता के 'ने' चिह्न है तो '0' चिह्न भी है । 'राम ने कहा' और 'राम कहा' -- दोनों सही है)

★16. "चवर्ग का अंतिम वर्ण के मुख के अंदर अर्द्धचंद्र पर हलंत चिह्न / अ का अन्य type / आधा इ और आधा अ पर हलंत / इ हलंत और s को इ चिह्न के साथ / आधा अ आधा य सहित हलंत / चवर्ग के 'ञ् ' वर्ण में दो हलंत / आधा अ आधा इ पर प्लुत ध्वनि के साथ / s आधा य s पर हलंत / 1÷4 य पर हलंत और इ चिह्न / इ में ए कार पर हलंत /s में ए कार और हलंत / आधा इ आधा अ पर अलग-अलग हल् चिह्न / 1÷4 अ और 1÷2 अ पर हलंत सहित अर्द्धचंद्र चिह्न / style में ऍ हल् चिह्न / आधा अ पर हलंत और अर्द्ध चंद्र / आधा s पर हलंत और अर्द्धचंद्र / आधा s दो अर्द्ध चंद्र/आधा अ के अंदर 1÷2 य् / चंद्रबिंदु और आधा अ / आधा s और 1÷4 य पर हलंत और अर्द्धचंद्र / चंद्रबिंदु और 1÷4 य् / style में इ चिह्न और 1÷4 अ / अलग-अलग style में अ, इ, s ,फाइ, अर्, एर्, इर्/ [{आधा अ} पर हल् चिह्न " (प्रस्तुत प्रयोग भी एक शैली है , वर्ण के आधा /चौथाई उच्चारण सहित कई हलंत, विविध प्रतीक , स्वर चिह्न इत्यादि को नए सिरे से परिभाषित और ध्वनित करता है। तभी तो अंगिका भाषा में ए कार के लिए अलग चिह्न (उल्टा ` ) निर्धारित है , तो कैथी लिपि में 'रेख' नहीं होता है, बावजूद ध्वनि उत्पन्न होता है)

★17. " र' ध्वनि" (जो कि volume के आवरण पर निर्भर है , यथा:-- ऱ, र्, र्र, रेफ, र और s संयुक्त , रफ्ला, नीचे ओर ^ सहित ड़= हलंतयुक्त आधा अ आधा ह 0 ड÷2 पर हलंत र पर दो हलंत .., ढ़= हलंतयुक्त आधा अ आधा ह् 0 ढ र्... और र =र् 0 ह् पर हलंत 0 आधा s...। इसके साथ ही अन्य विवेचन स्वतंत्र ध्वनि लिए भी है । )
18. "स' ध्वनि "( श् = ष पर हलंत = श्र - र् = सॅ = स्स =श् s
में + के बाद 'आधा ह् आधा s 00 ..' की ध्वनि है। उदाहरणस्वरूप श्री में सिर्फ श्री उच्चारण नहीं, बल्कि आगे की तान भी है , जिनमे कई वर्ण-प्रतीक ऊपर-नीचे, दायें-बाएँ चिह्नांकित हुए ध्वनित है । वृहद् व्याख्या में श =श् श पर हलंत=सः, ष=ष और ष में अलग-अलग हलंत, स=स् स पर हलंत, स् ह् =श =स्स भी अलग-अलग स है, किन्तु उच्चारण इस दृष्टि में सामान है)
★19. " अ' ध्वनि " (अ=ह् हलंत आधा अ 0 .. /अं=अनुस्वार ÷ ह् हलंत आधा अ 0 .. / अः=ह् हलंत आधा अ 0 s ह् ******** इसी भाँति क़= क्+ह् हलंत आधा अ 0 ..। इसके साथ ही अं को लेकर स्वतंत्र ध्वनि है तो अः का उच्चारण + 's ह् ' है)

★20. " ह' ध्वनि " ( ह= आधा s ह् 0 ../ आ = आधा s ह् 0 आ के लिए चिह्न .../ इसतरह से 'ह' उच्चारण संकेत चिह्नों के साथ इ, ई, उ,ऊ, ख़, घ,छ,झ,ठ, ढ, थ,ध, फ़ भ के उच्चारण भी होंगे / '३' प्लुत चिह्न= जोरदार ध्वनि लिए 'अ.0' या 'अ दशमलव शून्य', फिर 'ह.0' या 'ह दशमलव शून्य ' सही है / ह्=1÷2 ह)

★21. "य और व ध्वनि" (य=आधा य पर आवर्त्त '0' आवर्त्त 0 में हलंत 0 आधा s / व=आधा व पर आवर्त '0' आवर्त्त 0 में हलंत 0 आधा s / ए=आधा s आधा य् 'ए ' कार चिह्न 0 .. = आधा s आधा य् 'ए' कार चिह्न आधा s / इस तरह से सबके लिए निर्धारित संकेत-चिह्नों के साथ इन वर्ण-संधि के साथ ऐ, ओ,औ के लिए यही सूत्र निर्धारित होंगे । जहाँ आधा य = 1/2 य, आधा य् = 1/4 य । शून्य स्वयं में 0 का उदग्र से पेट कटा चिह्न फाइ है)
★22.  " ऋ' ध्वनि " (र= र् 0 आधा ह् 0 आधाs 0 / ल=ल् 0 आधा ह् 0 आधा s 0/ ri = ह्री हलंत और इ कार का चिह्न / ree= हृ हलंत और ई कार चिह्न / दीर्घ ऋ = लृ =ळ् ऋ /दीर्घ लृ =लृ ई पर हलंत । उदाहरण:-- अमरीका= अमेरिका= अमऋइका =अमेऋका । विदित है, हलंत का प्रयोग भी अद्भुत स्थिति लिए है)

★23.  "श्र / क्ष/ त्र/ ज्ञ ध्वनि " (श्र= श् 0 र् 0 ह् s 0 ../ क्ष= ह्s 0 .क् 0 च् 0 छ पर हलंत / त्र=त 0 र् 0 ह् s 0.. / ज्ञ=ग् 0 य् 0 ह् s 0.. । जैसे:--ग्यारह =' ज्ञ + आरह ' भी उच्चरित हो सकता है)

★24.  " पंचमाक्षर ध्वनि " ( ङ् = s ग् अनुस्वार / कवर्ग का मध्य वर्ण 'ग'***  ञ= s ज् अनुस्वार / चवर्ग का मध्य वर्ण 'ज'***  ण= s आधा ड सानुस्वार / टवर्ग का मध्य वर्ण 'ड'***  न = s आधा द सानुस्वार / तवर्ग का मध्य वर्ण 'द'***  म=s ब् अनुस्वार / पवर्ग का मध्य वर्ण 'ब'*** ............लिए सही उच्चारण है)

★25.  "नवजात शिशु या बछड़े के मुख से निकला पहला आवाज 'आं' से ही सभी वर्ण-संगत ध्वनियां निकली हैं। यथा:-
आं~~~आ_अ_s / अ इचिह्न_अ ईचिह्न / सभी स्वर वर्ण ।
व्यंजन वर्ण के लिए 'माँ' कहा जाने के साथ इसतरह के वर्ण उभरे।

★26.  "अँग्रेजी वर्णमाला में capital(A to Z ) और small(a to z) वर्ण-स्थिति को लेकर  '52' वर्ण हैं । अंतिम शोध के अनुसार हिंदी में भी '52' वर्ण हैं, यथा:-
स्वर:-अ,इ,उ=3/ संयुक्त स्वर:-आ,ई,ऊ,ओ,औ,ए,ऐ,ऋ=8/ व्यंजन:-'क' से 'म' तक =25/ व्यंजन-स्वर:-य,ल,व,स,श,ष,ह=7/ स्वर-व्यंजन:-र,ड़,ढ़=3/ संयुक्त व्यंजन:-क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,ॐ=5/अन्य:-अं=1 (कुल=52)
इनके अलावा ध्वनियाँ एवम् प्रतीकार्थ चिह्न ही हैं ।

*"सार्थक शब्दों के लिए बहस"*
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'साहित्य अमृत' (पृष्ठ-61, जनवरी 2001):-- "......भाषा-प्रयोग में श्री रमेश चंद्र मेहरोत्रा की कुछ बातें गलत है कि 'निम्न उदाहरण' का अर्थ 'तुच्छ उदाहरण' होता है, जो पूर्णतः भ्रामक तथ्य है । यहां 'निम्न' शब्द को 'क्वालिटी' के सन्दर्भ में न लेकर अगर 'नीचे' के सन्दर्भ में ले तो ज्यादा ही सार्थ-पहल होगा। 'तुम से' और 'तुम-से ' दोनों सही हैं, बशर्तें हमें यह देखना है की इन दोनों का प्रयोग कहाँ हो रहा है ? दोनों में 'जैसे' की प्रधानता है, विशेषत: 'तुम-से' में जोरदार-जैसे है । 'सारे जहाँ से' से अधिक 'सारे जहाँ में' में अर्थ की यथेष्ट प्रबलता है ।"
----- इसके साथ ही हिंदी मे द्विलिंगी शब्दों की संख्या बहुतायत में है । दो या दो से अधिक सार्थक शब्द/शब्दों के संधि-शब्द अलग-अलग लिंग -स्थिति के चलते द्विलिंगी होते हैं । 'विद्यालय ' द्विलिंगी शब्द के उदाहरण हैं । वहीँ 'पटने ' कहने से पटना के लिए कोई बहुवचन-बोध नहीं होता है । शब्दों के पीढ़ीगत-सन्ततिनुमा शब्द को 'अपत्यवाचक संज्ञा ' कहते हैं , जैसे:-- दधरथ से उनके पुत्र 'दाशरथी' कहलाये। दीर्घान्त शब्दों के बहुवचन बनाते समय ह्रस्वान्त के बाद 'याँ' जोड़ें । चंद्रबिंदु तो अब अनुस्वार हो गया है.... कई प्रयोग समयावसर होते हैं। यही तो भाषा की ग्राह्य-विविधा है।●

भारतीय संविधान में 'हिंदी' नहीं है 'राष्ट्रभाषा' !
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1949 के 14 सितम्बर को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में अपनाया, इसलिए इस तिथि को 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाये जाने का प्रचलन है । भारतीय संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप उल्लेख कहीं नहीं है । परंतु हिंदी के लिए देवनागरी लिपि का उल्लेख संवैधानिक अवस्था लिए है, किन्तु भारतीय संविधान में अँग्रेजी लिखने के लिए किसी लिपि का उल्लेख नहीं है । गृह मंत्रालय, भारत सरकार ने भी एक RTI जवाब में अँग्रेजी की ऐसी स्थिति को लेकर मुझे (सदानंद पॉल) पत्र भेजा है । बुरी स्थिति हिंदी के लिए नहीं अँग्रेजी के लिए है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार उसकी कोई लिपि नहीं है । इसतरह से अंतरराष्ट्रीय अँग्रेजी और भारतीय अँग्रेजी में अंतर है । चूँकि भारत से बाहर अँग्रेजी रोमन लिपि में है और भारत में यह किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है। (अँग्रेजी के 'लिङ्ग' पर मैंने ध्यान नहीं दिया है!)

ये लिङ्ग, ये वचन, ये संज्ञा, ये सर्वनाम, ये क्रिया-कर्म, संधि-कारक (अलंकार और समास की बात छोड़िये ) ने तो हिंदी के विकास को और चौपट किया है, इनमें संस्कृतनिष्ठ शब्द उसी भाँति से पैठित है, जिस भाँति से जो-जो आक्रमणकारी भारत आये, वे अपनी भाषा को भी कुछ-कुछ यहाँ देते गए, तो यहाँ की भाषा को कुछ-कुछ ले भी गए । 'आधुनिक हिंदी व्याकरण और रचना' (23 वाँ संस्करण) में लिखा है कि हिंदी,हिन्दू और हिन्दुस्तान जैसे शब्दों को पारसियों ने लाया है, ये तीनों शब्द 'जेंदावस्ता' ग्रन्थ में संकलित हैं । अमीर ख़ुसरो और मालिक मुहम्मद जायसी ने इसे 'हिन्दवी' कहा । इस हिन्दवी के पहले की हिंदी को कोई आरंभिक हिंदी कहा, तो प्रो0 नामवर सिंह ने 'अपभ्रंश' कहा, जबकि कई ने कहा - ऐसी कोई हिंदी नहीं है, जब अपभ्रंश का अर्थ बिगड़ा हुआ रूप होता है, तो उस लिहाज़ से संस्कृत का बिगड़ा रूप हिंदी हो, किन्तु जिस भाँति के संस्कृत के वाक्य-विन्यास है, उससे नहीं लगता कि वर्तमान हिंदी 'संस्कृत' से निकला हो । हाँ, अच्छा लिखा जाने के लिए संस्कृत के शब्दों को लिया गया । इसके साथ ही मुझे यह भी कहना है, पारसियों की भाषा-विन्यास से यह कतई नहीं लगता कि हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्तान जैसे शब्द-त्रयी पारसियों की देन हो सकती है ! क्योंकि सिंधु-सभ्यतावासियों की अबूझ लिपि, महात्मा बुद्ध काल के पालि भाषा या ब्राह्मणत्व संस्कृत से विलग हो संस्कृत की गीदड़ी लोकभाषा लिए समाज से बहिष्कृत पार्ट दलित और बैकवर्ड की भाषा के रूप में 'हिंदी' निःसृत हुई , जैसा मेरा मानना है । क्या यह आश्चर्य नहीं है, दलित-बैकवर्ड की भाषा 'हिंदी' पर भी भारत के कथित सवर्ण व  'ब्राह्मण' की नज़र गड़ गया-- पंडित कामता प्रसाद गुरु ने 'हिंदी व्याकरण' को संभाला, तो पंडित रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य के इतिहास' को सरकाने का ठीका ले लिया , आज इसी ठीकेदारों की प्रस्तुत तथाकथित ठीकेदारी को मॉडर्न आलोचक, समीक्षक अपनाने का एवेरेस्टी बीड़ा उठा रखे हैं । हाँ, उर्दू के लिए कुंजड़िन की बोली- 'भिवरु ले लई' से आगे बढ़कर मोमिन, राईन आदि ने शेखु, सैय्यद आदि को पछाड़ते हिंदी के समानांतर जहाँ आबद्ध हुई । हाँ, दोनों में अंतर सिर्फ लिपि का रहा ।

भारतीय आज़ादी से पूर्व हिंदी स्वतंत्रता प्राप्तार्थ एक आंदोलन के रूप में था, आज की हिंदी स्वयं में एक त्रासदी है । तब पूरे देश को हिंदी ने मिलाया था , आज हम चायवाले की हिंदी, खोमचेवाले की हिंदी, गोलगप्पेवाले की हिंदी के स्थायी और परिष्कृत रूप हो गए हैं । हमें 'नेकटाई' वाले हिंदी के रूप में कोई नहीं जानते हैं । हम अभी भी जनरल बोगी के यात्री हैं... कुंठाग्रस्त और अँग्रेजी कमिनाई के वितर । क्लिष्ट हिंदी में पंडित कहाओगे, सब्जीफरोशी उर्दू के बनिस्पत कोइरीमार्का हिंदी के प्रति अंग्रेजीदाँ लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं ! हिंदी से असमझ लोग वैसे ही हैं, जैसे कोई नर्स की स्टैंडर्डमार्का को देख उन्हें माँ कह उठते हैं । आज़ादी से पहलेे हिंदी के लिए कोई समस्या नहीं थी, आज़ादी के बाद हिंदी की कमर पर वार उन प्रांतों ने ही किया, जिनके आग्रह पर वहाँ हिंदी प्रचारिणी सभा गया था - मद्रास हिंदी सोसाइटी, असम हिंदी प्रचार सभा, वर्धा हिंदी प्रचार समिति, बंगाल हिंदी एसोसिएशन, केरल हिंदी प्रचार सभा इत्यादि । मेरा मत है, भारत की 80 फ़ीसदी आबादी किसी न किसी प्रकार या तो हिंदी से जुड़े हैं या हिंदी अथवा सतभतारी हिंदी जरूर जानते हैं , बावजूद 80 फ़ीसदी कार्यालयों में हिंदी में कार्य नहीं होते हैं । अब तो हिंदी के अंग एकतरफ ब्रज, अवधी, तो मैथिली, भोजपुरी, मगही, बज्जिका इत्यादि अलग भाषा बनने को लामबंदी किए हैं । संविधान की 8 वीं अनुसूची की भाषा भी हिंदी के लिए खतरा है । हमें हिंदी के लिए खतरा नामवर सिंहों से भी है, जो सिर्फ नाम बर्बर हैं या नाम गड़बड़ हैं । हिंदी में मोती चुगते 'हंस' निकालने वाले भी हिंदी के लिए भला नहीं सोचते हैं । ये सरकारी केंद्रीय हिंदी संस्थान भी मेरे शोध-शब्द 'श्री' को हाशिये में डाल दिए हैं । 10 सालों की मेहनत के बाद लिखा 2 करोड़ से ऊपर तरीके से लिखा 'श्री' और 'हिंदी का पहला ध्वनि व्याकरण' को हिंदी गलित विद्वानों ने एतदर्थ इसके लिए अपने विधर्मी रुख अपनाये रखा । ... और हिंदी में भी फॉरवर्ड हिंदी है, तो बैकवर्ड हिंदी।●

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●लेखक :- डॉ. सदानंद पॉल

●लेखकीय परिचय :-

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकार्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकार्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000 से अधिक रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. सबसे युवा समाचार पत्र संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में qualify. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी

●संपर्क :-  s.paul.rtiactivist75@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: हिंदी का पहला 'ध्वनि व्याकरण' (Hindi's first Sound Grammar) : डॉ. सदानंद पॉल
हिंदी का पहला 'ध्वनि व्याकरण' (Hindi's first Sound Grammar) : डॉ. सदानंद पॉल
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