कोरोना - आत्मकथ्य - गुरदीप सिंह सोहल

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मैं एक कण हूं। जिसे विज्ञान की भाषा में अणु कहा जाता है। बिना सूक्ष्मदर्शी के मुझे देखा और समझा नहीं जा सकता। यहां पर मेरे और भी कई रुप हैं ...

मैं एक कण हूं। जिसे विज्ञान की भाषा में अणु कहा जाता है। बिना सूक्ष्मदर्शी के मुझे देखा और समझा नहीं जा सकता। यहां पर मेरे और भी कई रुप हैं जो जीवाणु, विषाणु, परमाणु और शुक्राणु के नाम से जाने जाते हैं। मुझसे मिलकर ही सबका निर्माण होता है। कुछ कुदरत के अनुसार और कभी कभी कुछ मानव की जरुरत के अनुसार। निर्माण की इस विधि को कोई फीजिक्स बोलता है, कोई कैमिट्री बोलता है और कोई बायोलोजी बोलता है। मुझ से कुछ न कुछ बनाने की बहुत विधियां है।

अपनी समझ के अनुसार मानव मुझ से कुछ न कुछ बनाता ही रहता है। हमेशा मुझ पर सवारी करता रहता है लेकिन अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। ये सब सांप-सीढ़ी के खेल जैसा है। कभी मानव सफलता की सीढ़ियां चढ़ता है और कभी घमण्डी मानव को मैं बेरहमी से नीचे फैंक देता हूं। डसने की बजाय मैं केवल अपनी दहशत से ही यानि कस कर मारने की कला से ही काम चला लेता हूं। अब मैं इसके नियन्त्रण से बाहर इसी मानव पर सवार एक विषाणु हूं यानि वायरस। अपने हर समय का शैतान खिलाड़ी मतलब दुनियां का सबसे खतरनाक विषाणु। अच्छा हो या बुरा सब कुछ मेरे मार्फत ही किया जाता रहा है।

कुदरत के अनुसार काम करे तो मैं भगवान के समान हूं सबके लिए लाभदायक हूं और अगर मानव अपनी इच्छा के अनुसार काम करे तो शैतान का भी बाप। मानव के साथ मेरा सम्बन्ध कब से है साफ साफ कोई नहीं जानता। जब जब मानव कुदरत से खिलवाड़ करता है अपनी औकात भूल जाता है। भगवान बनने की कोशिश करने लगता है तब तब मैं अलग अलग समय पर, अलग अलग स्थानों पर अलग नामों से धरती पर विचरण करता रहता हूं और मानव को उसकी औकात याद करवाता रहता हूं। समय ही भगवान है बहुत बलवान है और बार बार एक ही बात का समर्थन करता है कि धरती की भीड़, धरती का वजन, धरती का पाप कब और किस प्रकार से कम करना है वो चाहे सुनामी के माध्यम से हो, चाहे भूकम्प के माध्यम से हो, ज्वालामुखी के माध्यम से हो चाहे महामारी के माध्यम से हो या किसी अन्य माध्यम से हो ये समय या मैं ही तय करता हूं।

मैं साम दाम दण्ड भेद वाली नीति बरतने से कभी नहीं चूकता। थोड़ी सी लापरवाही करते ही मैं मानव को ढा लेता हूं उस पे सवारी करता हूं। वो मानव जिस किसी के भी सम्पर्क में आता है मैं सबको एक साथ ढा लेता हूं। जैसा वक्त होता है मैं वैसी ही कूट नीति का उपयोग करता रहता हू। जब जब धरती पर मानवता मर जाती है पापों का वजन बढ़ता है, मानव कुदरत के नियमों को तोड़कर बाहर जाने की कोशिश करता है पालन नहीं करता तब तब मैं किसी न किसी रुप में धरती की रक्षा करता हूं। इसका भार हल्का करता रहता हूं। मैं कल भी मानव के साथ था आज भी हूं और आगे भी रहूंगा। अलग अलग समय में मेरी अलग अलग पहचान होती रही है लेकिन इक्कीसवीं सदी में मेरी पहचान कोविड- 2019 कोरोना के रुप में की गई है।

हर बार मैं ज्यादा भयानक और दुगुनी शक्ति के साथ दस्तक देता हूं। अब मेरी दहशत इतनी भयानक और ज्यादा खतरनाक हो गई है कि मानव ने अपने चारों तरफ सख्त नियमों का ताना बाना बुन लिया है। जैसे कि अभिमंत्रित ताबीज पहन लिया हो लेकिन ताबीज की भी एक सीमा होती है वो स्थाई रुप से कभी भी कायम नहीं रहता। मानव ने लम्बे समय के लिए लाॅक डाउन अपना लिया है लेकिन कब तक। लक्ष्मण रेखा खींच ली है लेकिन मानव नहीं जानता मैं दानव हूं मैं रावण हूं। इसे बाहर निकालना मुझे आता है। मानव अतिविश्वास में रहता है सोचता है कि इससे ज्यादा चतुर कोई नहीं है लेकिन इसी चतुराई में चक्कर खा जाता है। मैं घात लगाकर बैठा हूं तैयार बैठा हूं कभी तो लाॅक डाउन खुलेगा। कभी तो मानव लापरवाही करेगा। सुरक्षा हटी दुर्घटना घटी।

कभी तो मानव लक्ष्मण रेखा पार करेगा घर से बाहर निकलेगा। जो इंसान कभी घर में नहीं टिकता था वो पिंजरे का पंछी हो घर में कैदी हो गया है। मंदिर में सन्नाटा, मस्जिद में सन्नाटा, यहां तक कि हर धर्मस्थान में सन्नाटा। यहां सन्नाटा वहां सन्नाटा। हर तरफ सुन्नसान है मौत का सन्नाटा। जहां मानव सबसे पहले प्रार्थना करने जाता था जो सबसे विश्वसनीय स्थान था अब वहां पर भी कोई नहीं दिखता। केवल औषधालय में ही मानव भाग-दौड़ कर रहा है। मरने वालों को बचाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है। नियमों की दुहाई दे रहा हैं। घर में दुबक गया है। एक दूजे से दूरी बना ली है। बार बार हाथ धो रहा है। स्नान कर रहा है। बार बार डाक्टर के पास जा रहा है। एक दूसरे को घर में रहने को मजबूर कर रहा है पिटाई कर रहा है डण्डे मार मार सख्ती कर रहा है।

मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा है लेकिन अपनी विवशता अपना गुस्सा किसी और पर डण्डे बरसा कर निकाल रहा है। स्वच्छता को बढ़ावा दे रहा है। जनता भूख से बीमारी से या अन्य किसी भी कारण से मर रही है लेकिन बदनाम मुझे किया जा रहा है। मानव ने कुदरत की सभी हदें पार कर ली हैं इसने जीव जंतुओं को भी भोजन बनाना शुरु कर दिया है नतीजतन मैंने मानव को ही अपना घर बना लिया है। मैं हवा में, मिट्टी में, पानी में, आकाश में यानि हर समय हर स्थान पर उपलब्ध रहता हूं, मैं सर्व व्यापक हूं। मुझ से किसी भी तरह बचा नहीं जा सकता। नियमों का पालन करने पर ही मुझ पर काबू पाया जा सकता है। सबसे प्रार्थना करता हूं कि मैं इतना बुरा कभी भी नहीं था जितना समझ लिया गया हूं। अपनी कमी निकालने की बजाय मुझे बदनाम किया जा रहा है। मुझसे मानव इतना भयभीत हो गया है कि पूछो मत। मैं कभी भी मानव का दुश्मन नहीं था, न कभी हो सकता हूं और न कभी भविष्य होने की संभावना होगी।

मैं तो हमेशा तटस्थ रहता हूं किसी की संगत नहीं करता। हमेशा भलाई का काम ही करना चाहा था लेकिन मानवजाति ने अति महत्वाकांक्षा के चक्कर में सदा से ही मेरा दुरुपयोग किया है। जो जैसा चाहे मुझे वैसा बना दे। आप जैसा चाहें मुझसे काम ले सकते है। अच्छे काम में ले लो तो मैं जीवाणु हूं, शुक्राणु हूं। जीवन की आस हूं। मानवता के विकास का सूचक हूं। बुरे काम मैं वायरस हूं मानव का विनाश हूं। मैं बार बार चेतावनी भी देता हूं कि संभल जाओ। मेरा दुरुपयोग ठीक नहीं लेकिन ज्ञानवान होकर भी मानव समझना नहीं चाहे तो मैं क्या कर सकता हूं ये इतना भी नासमझ नहीं है।

मैं बार बार प्रार्थना करता हूं कि कृपया कुदरत के बनाये हुए नियमों की पालना सख्ताई से करें उनके विपरीत कोई भी काम न करें। मानव ही बने रहें भगवान बनने की कोशिश न करे तो मुझे बार बार आनें की जरुरत कहां पड़ती है। अगर आप कुदरत के कानून की पालना करोगे तो मैं पूरी मानव जाति से वायदा करता हूं कि मैं हमेशा के लिए मानव से दूर चला जाउंगा। दुबारा लौट कर वापस नहीं आउंगा। कृपया सतर्क रहें, सावधान रहें सुरक्षित रहें और हमेशा कुदरत के नियमों का पालन कड़ाई से करें।

मानवता का सदा शुभेच्छु (कोविड-2019-कोरोना)

गुरदीप सिंह सोहल

हनुमानगढ़ जंक्शन

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रचनाकार: कोरोना - आत्मकथ्य - गुरदीप सिंह सोहल
कोरोना - आत्मकथ्य - गुरदीप सिंह सोहल
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