उत्तराखण्ड की लोककथा - चार लड़कियाँ - डॉ. उमेश चमोला

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उत्तराखण्ड की लोककथा चार लड़कियाँ - डॉ. उमेश चमोला किसी देहात में एक गड़रिया रहता था । वह बहुत गरीब था । उसकी एक के बाद चार लड़कियाँ हुई । ग...

उत्तराखण्ड की लोककथा

चार लड़कियाँ

- डॉ. उमेश चमोला

किसी देहात में एक गड़रिया रहता था । वह बहुत गरीब था । उसकी एक के बाद चार लड़कियाँ हुई । गड़रिया और उसकी पत्नी चाहती थी उनके घर पुत्र का जन्म हो । इसलिए वे अपनी लड़कियों को अच्छा नहीं मानते थे । एक दिन गड़रिया की पत्नी ने उससे कहा, ’’घर में थोडा आटा पड़ा है, घी भी है । हलवा खाने का मन कर रहा है । क्यों न आज हलवा बना दें ।‘‘

गड़रिया राजी हो गया । गड़रिया और उसकी पत्नी चाहते थे जब उनकी लड़कियाँ सोई रहें तभी हलवा खाया जाए । उसकी पत्नी हलवा बना ही रही थी उसी बीच एक-एक कर वे चारों लड़कियाँ उठ गई । गड़रिया ने अपनी बेटियों से कहा, ’’चलो हम दूर जंगल में बेर खाने

चलें ।’’ उन लड़कियों को बेर बहुत अच्छे लगते थे । वे तुरन्त तैयार हो गई । गड़रिया उन चारों लड़कियों के साथ बेर के जंगल चला गया । वहाँ बहुत सारी बेर की झाडियाँ थी । गड़रिया अपने साथ ओढ़ने के लिए एक बडा कम्बल ले गया था । उसने उन चारों लड़कियों से कहा, ’’तुम उधर बेर खाती जाओ । मैं यहीं पर बैठा रहूगां । जब तुम ढेर सारे बेर खा लोगे तो तुम मुझे यहीं पर मिलना ।‘‘

लड़कियाँ बेर निकालते-निकालते काफी आगे चली गई । गड़रिया ने वहाँ एक झाडी के ऊपर अपना कम्बल डाल दिया । दूर से कम्बल को देखकर लग रहा था कि वहाँ कोई आदमी बैठा हुआ है । गड़रिया को हलवा खाने की पड़ी थी । वह उन लड़कियों को छोड़कर घर वापस आ गया । घर आकर उसकी पत्नी और उसने हलवा खाया ।

इस घटना को बीते कई दिन, महीने और वर्ष हो गए । लड़कियों के कारण गड़रिये के घर में चहल पहल रहती थी । उन लड़कियों को जंगल छोड़ने के बाद गड़रिया और उसकी पत्नी को घर काटने को दौड़ने लगा । एक दिन गड़रिया अपनी पत्नी से बोला, ’’हमने अपनी मासूम बच्चियों को जंगल में छोड़कर बहुत बड़ा पाप किया है । इतने साल बीत गए । पता नहीं वे कहाँ किस हाल में होगी ?

कहीं उन्हें रात को जानवरों ने ......................................................

’’ऐसा मत कहो । मेरा मन कहता है हमारी लड़कियाँ कहीं अच्छे ठिकाने में हैं । ’’ गड़रिया की बात पूरी होने से पहले उसकी पत्नी बोली ।

अपनी पत्नी से विचार विमर्श कर गड़रिया अपनी लड़कियों को ढूंढने जंगल चला

गया । वहाँ उसने आस-पास के लोगों से लड़कियों के बारे में पूछा परन्तु कोई भी उन्हें नहीं बता पाया ।

एक दिन बेर के जंगल में एक आदमी गड़रिया को मिला । गड़रिया के पूछने पर वह बोला, ’’इस बेर के जंगल के आस-पास कोई बस्ती नहीं है । यहाँ रात को खतरनाक जानवर घूमते रहते हैं ।’’

गड़रिया आगे बढ़ता गया । कुछ दूर चलने पर उसे कुछ हड्डियाँ पडी हुई दिखाई दी । उसे पक्का विश्वास हो गया कि उसकी लड़कियों को जंगली जानवरों ने ही मारकर खाया होगा । वह रोने लगा । थोडी देर बाद उसे उस रास्ते में घोड़े पर सवार एक सुन्दर युवती दिखाई दी । गड़रिया को रोते हुए देखकर उसने पूछा, ’’आप कौन हो ? क्यों रो रहे हो ?’’

गड़रिये ने उसे पूरी बात बता दी । गड़रिये की बात को सुनकर वह मुस्कराई । वह बोली मैं आपको एक कहानी सुनाती हूँ ।

गड़रिया बोला, ’’सुनाओ ।’’

युवती ने कहानी को सुनाना शुरू किया -

’’एक बार चार लड़कियों को उसके पिता जंगल ले गए । उन्होंने एक झाड़ी के ऊपर कम्बल रखा । लड़कियाँ दूर से उस कम्बल को ही अपना पिता समझती रही । उन लड़कियों ने खूब बेर खाए और कुछ अपने माता-पिता के लिए भी रखे थे । जब उन्हें घर चलने का ध्यान आया तो उन्होंने देखा उनके पिता उन्हें छोड़कर जा चुके थे । उन्हें घर का रास्ता मालूम नहीं था । रात गहरी हो गई थी । वे जोर जोर से रोने लगी । तभी उन्हें घोडे पर एक सवार दिखाई दिया । उन्होंने घुड़सवार को अपनी परेशानी बता दी । वह घुड़सवार बोला, ’’मैं इस क्षेत्र का राजा हूँ’’ । उसने उन चारों बहिनों को घोड़े में बिठा दिया । वह उनको अपने राजमहल ले गया । उस राजा के चार बेटे थे । उसने अपने चारों बेटों की शादी उन लड़कियों से कर दी ।

’’बेटी ! मैंने भी अपनी चार लड़कियों को जंगल में छोड़ दिया था । तुम्हारी कहानी की लड़कियों का तो राजकुमारों से विवाह हो गया । मेरी बेटियाँ पता नहीं कहाँ , किस हाल में

होगी ? वे जीवित होंगी भी या नहीं ?‘‘

भर्राती हुई आवाज में गड़रिया बोला । ‘‘मेरे साथ घोड़े में बैठो । मैं आपको एक जगह ले चलूंगी । क्या पता आपको अपनी खोई हुई बेटियों के बारे में पता चल जाए ।‘‘

गड़रिया उस युवती के साथ घोड़े पर बैठ गया । वे दोनों एक राजमहल में पहुँचे । उस युवती ने गड़रिये को अतिथि विश्राम गृह में पहुँचा दिया । थोडी देर बाद उस युवती के साथ तीन और युवतियाँ विश्राम गृह में पहुंची । उन युवतियों को देखकर गड़रिया सोचने लगा, ’’ मेरी लड़कियाँ अगर जीवित होती तो इन्हीं की उम्र की होती । इन चारों युवतियों की शक्ल-सूरत मेरी बेटियों से मिल भी रही है । हो सकता है ये मेरी ही बेटियाँ हों । मुझ गरीब की बेटियाँ और इस राजमहल में ? नहीं-नहीं , ये मेरी बेटियाँ नहीं हो सकती ।‘‘

’’पिताजी ! जिस हलवा को खाने के लिए आपने हमें बेर के जंगल में छोड़ दिया था, क्या वह हलवा अभी भी बचा है ?‘‘ - सबसे छोटी लड़की की कही इस बात से गड़रिया अपनी सोच की दुनिया से बाहर आ गया ।

’’है ! मुझ गरीब की बेटियाँ इस महल में ?’’ - गड़रिया ने आश्चर्य व्यक्त किया ।

’’पिताजी ! इस संसार में जो भी स्त्री या पुरूष जन्म लेता है वह पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार अपना भाग्य साथ लेकर आता है । आपने अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए हमें बेर के जंगल में छोड़ दिया था किन्तु हमारे भाग्य में इस राज परिवार की बहू होना लिखा था ।’’ सबसे बडी लड़की बोली ।

गड़रिया अपनी बेटियों को पाकर बहुत खुश हुआ । अपने दुष्कर्मों के लिए उसने अपनी बेटियों से क्षमा मांगी ।

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-डॉ . उमेश चमोला, शिक्षक -प्रशिक्षक राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् उत्तराखण्ड, राजीव गांधी नवोदय विद्यालय भवन नालापानी देहरादून, उत्तराखण्ड

ई मेल – u.chamola23@gmail.com

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उत्तराखण्ड की लोककथा - चार लड़कियाँ - डॉ. उमेश चमोला
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