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कुमारी पिंकी प्रथम की मातृदिवस विशेष रचनाएँ

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कुमारी पिंकी प्रथम     मां तुम्हें कहीं अन्यत्र खोजने  ,         की आवश्यकता नहीं ।  दुर्लभ , दुर्गम होते हुए, हर कण में सुलभ हो। तुम...

कुमारी पिंकी प्रथम
 
  मां


तुम्हें कहीं अन्यत्र खोजने  ,        
की आवश्यकता नहीं । 
दुर्लभ , दुर्गम होते हुए,
हर कण में सुलभ हो।

तुम्हारी बदौलत दुनिया में हूं।
तुम्हारी अनुपम छवि:-
गीता के श्लोकों में,
कुरान की आयातों में,
बाइबिल की शिक्षाओं में,
गुरु ग्रंथ के शबदों में ,
तुलसी की चौपाइयों में,
                                                
सूर के छन्दों में,                           

मीरां के गीतों में,
सूर्य की किरणों में,                

तापों में, रौशनी में,
चंद्रमा की अमृत शीतल  शान्त
  चांदनी रातों में,
शीतकालीन शीतलहर में,
बांसुरी की तान में,
वीणा के तार बंधे संवेदनशील झंकार में,
ईश्वर की आराधना में,
विराट सभ्यता संस्कृति
विरासत में,
दुःख में, सुख में,
  खुशी में,गम में,
संगीतमय सुर संगम में,
हास्य-व्यंग्य में
तब सोचता हूँ कि
तू सब रिश्तों में,           
सबसे बड़ी क्यों है?
क्यों मां सदियों से
  उपहारस्वरूप वरदान है।
सपना संजोए तमन्नाओं से,
मंत्रमुग्ध होकर!
तुझ पर कविताएं रचूं,
कहानियां लिखूं ,
  वन्दनाओं में लीन रहूं।
क्यों तू मेरे लिए उस से भी झगड़ पड़ती है ,
जो तेरा परमेश्वर है |
  मंथन  में मग्न हूं!
     उलझन अनसुलझी।
  प्रश्न का उपाय *खोजते ,                           
तेरा आँचल ही क्यों सुकूं देता है ?
तेरी स्नेहिल स्पर्श ।            
मुझे परख लेती है,
क्योंकि तेरी ही गोद में ,   
सुकुन *मिलता है।
तेरे सानिध्य जन्नत हर पल,
अंश  मात्र हूँ उऋण असफल |                      

तू इस सृष्टि में लाने का हेतु है,
और तू ही सहारा।
ऐसे सवालों के जवाब ढूंढते-ढूंढते!
क्यों गुजरती हैं ,कई सदियां ?

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मदर्स डे


मातृ दिवस पर मां का संकेत संकट में है """"मां"" (उपेक्षित)


उपेक्षित क्यों-?
जागृति संकलन


विराट सभ्यता और महान संस्कृति का जनक भारत देश में आज भी ह्रदय विर्दिण एवं दुखदाई घटनाओं के रूप में'"मां""' की उपेक्षा प्रश्नचिंह अंकित है।

समाज में मातृ दिवस के शुभ अवसर पर:-
*
चेतनाओं , जागृति एवं समर्पण के द्वारा मां को मातृ दिवस पर शुभकामनाएं एवं सुखद अहसास।


यही होगी मां के प्रति सच्ची भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम।
मदर्स डे मां को सह्स्त्र कोटि-कोटि नमन।


भाषा विज्ञानियों के लिए भले ही पहला शब्द ‘ए’ अथवा ‘अ’ या फिर ‘अलीफ’ या ‘बे’ होता होगा। लेकिन व्यावहारिक जीवन  में यह अलग ही स्वरूप में विद्यमान है।
दुनिया में किसी बच्चे के कंठों से फूटने वाली पहली किलकारी में ‘मां’ शब्द गुंजन रहता है।
मां के अभिव्यक्ति अभिवादन का माध्यम होता है।
संसार में कोई भीशब्द  मां की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है।
पहले भी नहीं और मां से बड़ा भी नहीं।*
मां को परिभाषित करने का किसी भी कलम में ना स्याही,ना सामर्थ है।

*माँ को समर्पित
लफ्ज-लफ्ज ही अनूप और प्यारा है।*


मां सरस्वती के रूप में जीह्ववा पर निवास करती हैं।
मां गीता के श्लोकों में,
कुरान की आयातों में,
बाइबिल की शिक्षाओं में ,
गुरु ग्रंथ के शबदों में ,
तुलसी की चौपाइयों में
सूर के छन्दों में, मीरां के गीतों में छिपा अनुपम रहस्य है।

दुनिया के सभी रिश्तों में सबसे बड़े महान रिश्तों में हैअवव्ल मां का रिश्ता।
मां को महान दर्जा सदियों से प्राप्त है।
  मां को परिभाषित करते हुए
सबसे बड़ा बताया गया है।


मां पर कविताएं रची गई है।
कहानियों में मां ममत्व एवं त्याग वर्णन है।
एक मां ही है जो बच्चों के लिए ईश्वर से झगड़ पड़ती है  मां में परमेश्वर व्याप्त है।
जितना सोचते हैं मां का स्वरूप उतना ही निर्मल है।
जब हम किसी भी उलझन का उपाय खोजते-खोजते
थक जाता हैं तो
मां काआँचल  हल और सुकूं देता है।

मां हमें परख लेती है,
क्योंकि उसकी ही गोद से जन्में हैं।
हमार हर बात का मां को एहसास है।


कई जन्मों तक हम मां कर्ज चुकाने में असमर्थ हैं।

इस सृष्टि में लाने का मां का श्रेय है, मां ही सहारा है।
ऐसे अनेक सवालों के जवाब ढूंढते-ढूंढते
क्यों सदियां गुजर जाती है।सवाल अनसुलझी पहेली है।

शायद इसलिए क्योंकि  दुनिया की सबसे सुन्दर कृति है मां।
मां कीक्षमताओं ,भावनाओंऔर प्रेम को
समझ पाना मुश्किल है।
सब के बस की बात नहीं है।

मां उस शक्ति का स्वरूप है,
जो इस सृष्टि का कारण है
इसलिए तो
शक्तिस्वरूपा  मां है।

 
 
    मां तब भी रोती थी जब बेटा खाना नहीं खाता था,
    मां आज भी रोती है जब बेटा खाना नहीं देता  है।

दामन में दर्द है, बद्दुआ नहीं।
जो हम चाहते हैं पर कह नहीं पाते तो आंसू भाषा बनकर बह जाते हैं ।
और सब कुछ कह जाते हैं।
इन्हीं आंसुओं की भाषा में परिलक्षित नजर आती है मां की अनिर्वचनीय उपेक्षा जो न तो उनकी ज़ुबां से फूट पाई और न हमारी कलम समेट पाए
।     
हमारे समाज में आज से पहले पेड़ों, पत्थरों से लेकर जानवरों तक को पूजा जाता था।  व्याख्या मिलती है।

आज सि्थति बदलाव के कगार पर है।
आज बुजुर्गों को दरकिनार कर उपेक्षित किया जाता है।
मात पिता को उचित मान सम्मान नहीं मिल पा रहा है।
भले ही देश के युवाओं की सोच बदल गई है  ,लेकिन माता-पिता के प्रति सोच बदलना बाक़ी है।
भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों का हमेशा एक सम्मानीय स्थान रहा है।
सि्थति बदल गई है ।
बुजुर्गो को तिरस्कार, वित्तीय परेशानियों सहित शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।
भारतीय संस्कृति में पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था भी मुख्य भूमिका में उत्तरदाई कारण है।
वृद्धाश्रम में अपनों से बिछडक़र अलग रह रही मांओं के दामन में दर्द तो बहुतेरे हैं, लेकिन दर्द देने वालों बेटों के प्रति बद्दुआ एक भी नहीं।

इस मिसाल से बड़ी मां शब्द की परिभाषा की उम्मीद करना शायद कठिन एवं बेमानी होगा।
वृद्धा आश्रम की माताओं ने के अपना अतीत बयां किया।
अतीत बताती इन माताओं के आंसू छलक पड़े, लेकिन इस स्थिति के लिए दोष केवल किस्मत को ही दिया।
पल्लू से आंसू पोंछती सभी माताओं ने अपने बच्चों के लिए में कुछ गलत नहीं कहती केवल आशीर्वाद देती हैं।
वृद्धाश्रम में रहने वाली ये सभी महिलाएं बड़े और अभिजात्य परिवारों से हैं।
लगभग सभी के बच्चे अच्छे ओहदों पर हैं, लेकिन ये उपेक्षित सी रहती हैं।
  घर में पोते-नातियों की अठखेलियों के बजाए टी.वी. देखकर वृद्धा आश्रम मेंसमय गुजारने पर मजबूर हैं।
इनका मकान बेच दिया ।
  जीवन यापन के लिए वृद्धाश्रम ही सहारा बचा।
सभी माताओं की सूरत को देखकर उर्दू के अजीम शायर मुनव्वर राणा की पंक्तियां सटीी बैठती है :-
*उसके दामन में कभी
बद्दुआ नहीं होती,
एक मां ही है जो
हमसे खफा नहीं होती*।

वृद्धों के शरीर में तकलीफ है और दिल का दर्द भी बड़ा दुखदाई है।
अपनी स्थिति के लिए कहती हैं बेटा बेचारा क्या करे बहू का स्वभाव ही थोड़ा ऐसा है।
सि्थति बदलाव की जरूरत बयां करती है।
मां कहती है
बेटा बात नहीं करता ।
पति जीवित थे तब बच्चों की किलकारियों से आंगन आबाद था।
उनके जाने के बाद विकट परिस्थितियों के चलते यहां वृद्ध आश्रम आना पड़ा।
बच्चों की आवाज  सुनने की इच्छा होती है।
  जिनके बेटे व्यापार करते हैं वो भी मां को खुश नहीं रख सकते हैं।
आंसू पौंछते हुए उनके कुछ अस्पष्ट से शब्द वर्तमान स्थिति के लिए किस्मत को ही कोसते रहे, लेकिन बेटों के लिए तो मां का दिल दुआ ही देता रहा।
अस्सी वर्ष की उम्र में तरोताजा एवं खुशमिजाज रहने वाली अतीत बताते हुए एकबारगी खामोश हो गर्ईं।

उनकी आंखें दर्द बयान करती नजर आई, लेकिन
  वे कहती हैं गलतियां हो जाती हैं।
कहती हैं कारणों पर नहीं जाऊंगी, लेकिन अब उनके साथ रहना नहीं चाहती।
  बच्चे फोन करते हैं।
मिलने के लिए आते हैं, लेकिन अब यह वृद्धाश्रम ही परिवार है और इस परिवार की मां वे स्वयं हैं।

सब किस्मत का खेल
ईश्वर ने हमें कोई संतान नहीं दी।
यदि दी होती तो आज वह यहां नहीं ब्लकिअपने बच्चों के साथ होती।
यह कहना है वृद्धाश्रम में नहीं रह रही होती।
कहना है कि बेटे अपनी मां को दूसरे परिजनों के बुलाने पर वह मिलने के लिए जाती हैं।
उनका कहना है सब किस्मत का खेल है।
कर्मों का फल तो खुद को ही भोगना पड़ता है।
परिवार में संवेदनहीनता में आज के दौड़ में बढ़ोतरी हुई है।
माता-पिता का बच्चों से संवाद नहीं हो पा रहा है।
परिवार के सदस्यों में माता पिता की सि्थति उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।
फलस्वरूप हमारे *सांस्कृतिक मूल्यों के छिन्न -भिन्न की स्थिति होती जा रही है।
बच्चें घर में बिना टीवी चैनल को देखे बिना खाना नहीं खा सकते हैं लेकिन एक छत के नीचे परिवार के सदस्यों को एक साथ खाने पीने का समय नहीं है।
इसी कारण से परिवार प्रभावित  होकर परिवारों में एकाकीकरण, उदासीनता, मानसिक तनाव और संवदेनहीनता जैसी समस्याओं का तीव्र गति से विस्तार हो रहा है।


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आज आवश्यकता है परिवा, समाज और राष्ट्र के प्रति संवेदनशील एवं जागरूकता के साथ अपनी भूमिका निर्वाह करने का संकल्प लें।
बच्चों को संस्कार से पोषित किया जाय संस्कार विकसित किया जाए जिससे वे देश के अच्छे नागरिक बन सकें।
कुछ माताओं ने कहा कि उनका बेटा उनसे
नौ साल से नहीं बोला।बेटा बात नहीं करता है।
उनका कहना है बड़ा बेटा-बहू के आने के बाद बदल गया।
अच्छा कमाता है, लेकिन घर में रखना नहीं चाहता।
ठंडी नि:श्वास छोड़ते हुए मां कहती है सब किस्मत और समय के लेखे हैं।
जो ईश्वर ने लिखा है वह सब भोगना ही पड़ेगा।
किसी को दोष देन से क्या फायदा। मां का यह बयां करती बातें वेदों में वर्णित मां की महिमा को उजागर करता है।


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माँ के चरणों में युग- युग से मिलते हैं विधाता।

के लिए कोई शब्द ही नहीं, जिसके माध्यम से उसके बारे में कुछ भी कहा जायें। ना उसकी उपमा दी जा सकती है और न ही उसे किसी शब्द में बांधा जा सकता है।
लोग जो अक्षर की शुरुअात अ  स से करते है।
  बच्चे के मुंह से निकलने वाला पहला शब्द तो मां ही होता है।
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सूर के छन्दों में, मीराबाई के गीतों में मां न वर्णन विघमान है।
मां का स्पर्श ही दुनिया में दुर्लभ है।
मां का नाम लेने मात्र से रूस को सुकून मिलता है।
मां के बारे में जितना लिखा जाए कम है।
आज आवश्यकता है मां की पूरी  सुरक्षा की, जिम्मेदारी और जवाबदेही कीओर ध्यान आकर्षित किया जाए।
इस ओर ध्यान आकर्षित किया जाए ताकि वर्षों से मां दामन में पलतें आए समय आने पर मां को पाल सकें। और वृद्धों को वृद्ध आश्रम में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और विश्व में नया कीर्तिमान स्थापित किया जा सके।
मां को चोट और ठेस नहीं पहुंचे।
आहत करने वाली बात है कि सभी माताओं ने वृद्धा आश्रम में रहने पर भी दोषी होने कारण अपने किस्मत को बताया।
आखिर दोषी किसे ठहराया जाय।
भारत अनूप सभ्यता, संस्कृति और विराट परंपरा को या मां-बेटी के खत्म हो रहें रिश्ते को।
यूं कहें तो नैतिकता की कमी भी माताओं के प्रति उपेक्षा की जिम्मेदार हैं।


आज के भागदौड़ भरी जिंदगी में नैतिकता के आधार पर अपने बच्चों को सही दिशा देने से समाज में मातापिता* के प्रति आदर भाव और सेवा भाव की जागृति उत्पन्न की जा सकती है।
  त्याग  उपेक्षित ना होकर आदर-सम्मान से माता पिता और परिवार के सदस्य एक समान मिलकर रहें।


वृद्धों को प्रेम-भाव, भव्य विभोर होकर अपनी छवि में जीने में नया कीर्तिमान स्थापित करने मेंऔर सक्षम बनाने में सहयोग करने का संकल्प लें।


*इस विकट परिस्थितियों की जिम्मेंदार कुछ हद तक माताओं को स्वयं भी माना गया है।
  क्योंकि आजकल हमारे समाज में मां बहु, बेटियों को एकल परिवार में रहने की सलाह देती है।*
जिसके कारण पारिवारिक जीवन* में आपसी सहयोग खत्म होने के कगार पर है।
मां बहु बेटियों को सही जानकारी दें और संस्कारों की सच्ची सीख दें तो बच्चों को सही जानकारी प्राप्त होगी।


अपनी जिम्मेदारी का अहसास होगा।

यही माताओं को समर्पित मातृ दिवस पर सच्ची शुभकामनाएं एवं *बधाई होगी।


मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।


  मां के लिए सादर मेरी रचना


             अनुभूति
            

लगता है मनहर"
ये सुनकर कि मैं !
  मैं तुम्हारी छवि हूं।
  लगा क्या खुद को ,
खो दिया है?
 
फिर जाना!
मैं तुमसे अलग थी ही कहां?
तुम पृथ्‍वी सी मेरा ग्रह
मैं चंद्रमा सी तुम्हारा उपग्रह,
दूर रहकर भी तुम्हारे इर्द-गिर्द
तुम्हारी ही सीखों की,
  राह पर प्रदक्षिणा नित्य,
आरूढ़ निश्चित गति से।                              
तुझी में बसी मेरीआत्मा  | 
तुम्हारी तरह रिश्ते निभाने,
  और सौंधी रोटियां सेंकने के
अभ्यास में  प्रयासरत हूं।                                   
तुम्हारी बदौलत हूं।           
तुम्हारी पहचान हूं।   
   तुम मेरी जिन्दगी मैं!
  तुम्हारा अभिमान हूं।          
प्यारी जग से न्यारी "मां",
दोषी मैं अनदेखा तेरे नैन|
  पुलकित   हर्षित दिन रैन  |                          
  क्षमा,त्याग, ममत्व मूरत  "मां"।               
जन्नत की सूरत है "मां"।                             

प्रारंभ और अंत जरूरत है "मां"।                    
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मातृ दिवस के शुभअवसर पर माँ के लिए रचना




      विश्व कोरोना त्रासदी के संग मदर्स डे उमंग
   


  मातृ दिवस


विश्व की माताओं को समर्पित



माँ शब्द अनूप है।
जन्मदात्री या भारत माँ भविष्य का आश्रय है|


दुनिया में कोई ऐसी क़लम नहीं बनीं है जिसमें मां शब्द की व्याख्या करने की सर्मथ हो।

पृथ्वी जगत की धूरी है,
सृष्टि मां बिना अधूरी है।
बालक एक शब्द है, मां पूरी परिभाषा है।
बालक कुंठित है,तो मां अभिलाषा है।
यही मां की सरल परिभाषा है।
बच्चें दूनिया के अंग हैं।
मां अनुक्रमणिका है।

---

विश्व के विभिन्न देशों में मातृ दिवस अलग -अलग तरीके से अलग -अलग तारीखों पर मनाया जाता है।
मातृ दिवसआधुनिक समय का उत्सव है। जिसकी उत्पत्ति उत्तरी अमेरिका में माताओं को सम्मान देने के लिये हुई थी। बच्चों से माँ के रिश्तों में प्रगाढ़ता बढ़ाने के साथ ही मातृत्व को सलाम करने के लिये इसे मनाया जाता है।
समाज में माँ का प्रभाव बढ़ाने के लिये इसे मनाया जाता है।
पूरे विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग तारीखों पर हर वर्ष मातृ दिवस को मनाया जाता है।
भारत में, इसे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है।
मां को सम्मान और आदर देने के लिए हर वर्ष एक वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मातृ दिवस मनाया जाता है।
आधुनिक समय में उत्सव है।
जिसकी उत्पत्ति उत्तरी अमेरिका से माताओं को सम्मान देने के लिए हुई थी। बच्चों से मां के रिश्तो में प्रगाढ़ता बढ़ाने के साथ माताओं के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मातृ दिवस मनाया जाता है ।
समाज में मां का प्रभाव बढ़ाने के लिए इसी मनाया जाता है। पूरे विश्व में विभिन्न देशों में अलग-अलग तारीखों में मातृ दिवस मनाया जाता है ।
भारत में इसे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है ।
और इस बार 10 मई को संपूर्ण लाक डाऊन में भी मंत्रमुग्ध होकर मातृ दिवस मनाया जाएगा।
सूचना और क्रांति के इस युग में मातृ दिवस को आधुनिक तरीके से मनाया जाता है ।
और वर्षों के पुराने तरीकों की तरह अलग -अलग तरह से लोग खुश होकर अपनी मां को भावभीनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
यह दिन सभी बच्चों के लिए बड़ा उत्सव का दिन है।
और अपनी मां को अपना प्रेम वह व्यक्त करते हैं।
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मातृ दिवस 2020

मातृ दिवस 2020भारत में 10 मई, रविवार को मनाया जायेगा। ये हर वर्ष मई महीने के दूसरे रविवार को पड़ता है।

विश्व में हर साल मदर्स डे मनाया जाता है ।
मां अंम्मा, माता ,मम्मी ,अम्मी चाहे कितने भी नाम हो सभी नामों में अद्भुत शक्ति है।
मां का नाम आते ही हमारे आंखों में अलग चमक छा जाती है ।
इस नाम से प्यार और ममता में ख़ुशी छुपी रहती है ।
भगवथामा दूसरा नाम मां है।
और वह कहावत है कि ईश्वर ने मां को इसलिए बनाया ताकि अपने रूप में हर जगह उपस्थित रहे ।
मां के रूप में उपस्थित रहे।
और उसकी जरूरत हमेशा एहसास दिलाती रहे ।
मां ऐसा नाम है जो सारे गुनाहों को माफी देती है ।
हमें अपनी छवि निखारने में मदद करती है।
बहुत गुस्से में होती है तो केवल रो देती है ।
मां के रूप में अपने गमों को धो देती है।

दुनिया में कई रिश्ते हैं लेकिन मां का रिश्ता सबसे अनूप और प्यारा होता है |
सभी हम मदर्स डे के अवसर पर एक छोटी सी खुशी अपनी मां को देकर भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं।
चलती फिरती आंखों से खुदा देखी है।
ए विधाता हमने जन्नत तो नहीं देखी ।
पर जन्नत के रूप में मां और मां की दुआ देखी है।


---

मातृ दिवस क्यों मनाया जाता है :-(भारत में मातृ दिवस का इतिहास):-
*प्राचीन काल में ग्रीक और रोमन के द्वारा पहली बार इसे मनाने की शुरुआत हुयी। हालाँकि, ‘ममता रविवार’ के रुप में यूके में भी इस उत्सव को मनाया गया थामम

मातृदिवस का उत्सव सभी जगह आधुनिक हो चुका है।
इसे बेहद आधुनिक तरीके से मनाया जाता है।
ना कि पुराने वर्षों के पुराने तरीकों की तरह।
अलग-अलग तारीखों पर दुनिया के लगभग 46 देशों में इसे मनाया जाता है।
ये सभी के लिये एक बड़ा उत्सव है जब लोगों को अपनी माँ का सम्मान करने का मौका मिलता है।
हमें इतिहास को धन्यवाद देना चाहिये जो मातृ दिवस की उत्पत्ति का कारण था।

--
मदर्स डे का इतिहास:-


पूर्व में, ग्रीक के प्राचीन लोग वार्षिक वसंत ऋतु त्योहारों के खास अवसरों पर अपनी देवी माता के लिये अत्यधिक समर्पित थे।
ग्रीक के लोगों को देवी माता के प्रति समर्पित भाव से मां दिवस मनाया गया।
प्राचीन रोमन लोग हिलैरिया के नाम से एक वसंत ऋतु त्योंहार को भी मनाते थे जो सीबेल (अर्थात् एक देवी माता) के लिये समर्पित था।
उसी समय, मंदिर में सीबेल देवी माँ के सामने भक्त चढ़ावा चढ़ाते थे।
पूरा उत्सव तीन दिन के लिये आयोजित होता था, जिसमें ढ़ेर सारी गतिविधियाँ जैसे कई प्रकार के खेल, परेड और चेहरा लगाकर स्वाँग रचना होता था।
एवं प्रकारे मातृ दिवस मनाया गया।

कुँवारी मैरी (ईशु की माँ) को सम्मान देने के लिये चौथे रविवार को ईसाईयों के द्वारा भी मातृ दिवस को मनाया जाता है।
1600 इंसवी के लगभग इंग्लैण्ड में मातृ दिवस मनाने उत्सव का एक अलग इतिहास है।
ईसाई कुँवारी मैरी की पूजा करते हैं, उन्हें कुछ फूल और उपहार चढ़ाते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
यह मदर्स डे मनाने का अजूबा तरीकों में से एक है।


वर्ष 1972 में जूलिया वार्ड हौवे जो कि(एक कवि, कार्यकर्ता और विचारक हैं।) उनके के विचारों के द्वारा आधिकारिक कार्यक्रम के रुप में यू एस में मातृ दिवस को मनाने का फैसला किया गया था।
जून के दूसरे रविवार को मातृ शांति दिवस और जून दिवस को मनाने के लिये एक शांति कार्यक्रम के रुप में उन्होंने मातृ दिवस की सलाह दी थी।
तभी से शुरुआत हुई।*

अन्ना जारविस, यूएस में मातृ दिवस के अवसर अविवाहित रहने के वावजूद(मातृ दिवस की माँ के रुप में प्रसिद्ध) के संस्थापक के रुप में जाने जाती हैं।
यद्यपि वो अविवाहित महिला थी और उनको बच्चे नहीं थे।
अपनी माँ के प्यार और परवरिश से वो अत्यधिक प्रेरित थी।
और उनकी मृत्यु के बाद दुनिया की सभी माँ को सम्मान और उनके सच्चे प्यार के प्रतीक स्वरुप एक दिन माँ को समर्पित करने के लिये कहा।
ये उनके लिए अपूर्व गौरवशाली सम्मान और श्रृद्धा अर्पण है।
ईश्वर हर जगह मौजूद रहे इसलिए मां के रूप में उपस्थित हैं।


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आज के सूचना एवं जनसंपर्क क्रांतियुग में मातृ दिवस  कई देशों में मनाया जाता है :-
जैसे:- यूके, चाईना, भारत, यूएस, मेक्सिको, डेनमार्क, इटली, फिनलैण्ड, तुर्की, ऑस्ट्रेलिया, कैनेडा, जापान और बेल्जियम आदि।
अपनी माँ को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिये लोग हर्षोल्लास एवं उत्साह पूर्वक कई प्रकार के क्रिया-कलापों को आयोजित कर के मनोयोग द्वारा बहुत ही उत्साह और खुशी के साथ लोग इस दिन को मनाते हैं।

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मातृ दिवस कैसे मनाया जाता है:-
सभी के लिये मातृ दिवस वर्ष का एक बहुत ही खास दिन होता है।
जो लोग अपनी माँ को बहुत प्यार करते हैं और ख्याल रखते हैं वो इस खास दिन को कई तरह से मनाते हैं।
ये साल एकमात्र दिन है जिसे दुनिया की सभी माँ को समर्पित किया जाता है।
विभिन्न देशों में रहने वाले लोग इस उत्सव को अलग -अलग तारीखों पर मनाते हैं साथ ही अपने देश के नियमों और कैलेंडर का अनुसरण इस प्यारे त्योंहार को मनाने के लिये करते हैं।
  मनोयोग एवं मनोरंजनपूर्ण माहौल में मातृ दिवस मनाया जाता है।

भारत में इसे हर साल मई के दूसरे रविवार को देश के लगभग हर क्षेत्र में मनाया जाता है।


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सभ्यता और संस्कृति का वाहक भारत:- में आज के आधुनिक समय में इस उत्सव को मनाने का तरीका बहुत बदल चुका है।
ये अब समाज के लिये बड़ा जागरुकता कार्यक्रम बन चुका है।
सभी अपने तरीके से इस उत्सव में भाग लेते हैं ।
और इसे मनाते हैं।
विविधता से भरे इस देश में ये विदेशी उत्सव की मौजूदगी का इशारा है।
भारतीय संस्कृति की बात ही निराली है।
लोग किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है।
विश्व पटल पर कंधे से कन्धा मिलाकर हर क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं।
ये एक वैश्विक त्योहार है जो कई देशों में मनाया जाता है।
जो कुछ भी है या होने या बनने की आशा करते हैं यह सब मां की कृपा का फल है।
ईश्वर को हमने कभी नहीं देखा। और हमें देखने की जरूरत भी क्या होगी यदि मां के सूरत के रूप में भगवान की छवि नजर आएगी ।
मां तेरी सूरत से भला भगवान की मूरत क्या होगी।
कहा गया है जिस घर में मां होती है सब कुछ सही होता है।
और जन्नत का सुख होता है|


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समाज में एक विशाल क्रांति कम्प्यूटर और इंटरनेट जैसी उच्च तकनीक ले आयी है।
जो आमतौर पर हर जगह दिखाई देता है।
आज के दिनों में, लोग अपने रिश्तों के बारे में बहुत जागरुक रहते हैं ।
और इसे मनाने के द्वारा सम्मान और आदर देना चाहते हैं।
भारत एक महान संस्कृति और परंपराओं का देश है जहाँ लोग अपनी माँ को पहली प्राथमिकता देते हैं।
इसलिये, हमारे लिये यहाँ मातृ दिवस का उत्सव बहुत मायने रखता है।
  ये वो दिन है जब हम अपनी माँ के प्यार, देखभाल, कड़ी मेहनत और प्रेरणादायक विचारों को महसूस करते हैं।
हमारे जीवन में वो (मां)एक महान इंसान है जिसके बिना हम एक सरल जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
वो एक ऐसी व्यक्ति हैं जो हमारे जीवन को अपने प्यार के साथ बहुत आसान बना देती है।

इसलिये, मातृ दिवस के उत्सव के द्वारा, हमें पूरे साल में केवल एक दिन मिलता है, अपनी माँ के प्रति आभार जताने के लिये।
उनके महत्व को समझने के लिए ये खुशी मनाने का दिन है और उन्हें सम्मान देने का है।
माँ एक देवी की तरह होती है ,जो अपने बच्चों से कुछ भी वापस नहीं पाना चाहती है।
नि:स्वार्थ बच्चों की सेवा में लीन रहती है|

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छोटे बच्चों के द्वारा स्कूलों में आयोजित मातृ दिवस उत्साह


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माँ के महत्व और इस उत्सव के बारे में उन्हें जागरुक बनाने के लिये ,बच्चों के सामने इसे मनाने के लिये शिक्षकों के द्वारा स्कूल में मातृ दिवस पर एक बड़ा उत्सव आयोजित किया जाता है।
इस उत्सव का हिस्सा बनने के लिये खासतौर से छोटे बच्चों की माताओं को आमंत्रित किया जाता है।
इस दिन, हर बच्चा अपनी माँ के बारे में कविता, निबंध लेखन, भाषण करना, नृत्य, संगीत, बात-चीत आदि के द्वारा कुछ कहता है।
कक्षा में अपने बच्चों के लिये कुछ कर दिखाने के लिये स्कूल के शिक्षकों के द्वारा माताओं को भी अपने बच्चों के लिये कुछ करने या कहने को कहा जाता है।
आमतौर पर माँ अपने बच्चों के लिये नृत्य और संगीत की प्रस्तुति देती हैं।
उत्सव के अंत में कक्षा के सभी विद्यार्थियों के लिये माताएँ भी कुछ प्यारे पकवान बना कर लाती हैं और सभी को एक-बराबर बाँट देती हैं।
बच्चे भी अपनी माँ के लिये हाथ से बने ग्रीटींग कार्ड और उपहार के रुप में दूसरी चीजें भेंट करते हैं।


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इस दिन को अलग तरीके से मनाने के लिये बच्चे रेस्टोरेंट, मॉल, पार्क आदि जगहों पर अपने माता-पिता के साथ खुशी  के पल बांटने के लिये जाते हैं।
इस अवसर पर परिवार के साथ सभी लोग खुशी एक साथ मिलकर मनाते हैं।
और मां के प्यार की अनुपम छटा को दर्शाते हैं।

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ईश्वर सभी वर्गों, धर्मों में मां के रूप में उपस्थित है।
विश्व में हर धर्म संप्रदाय के लोग हैं।
सभी में अपने सभ्यता, संस्कृति और धरोहर के संरक्षण के प्रति जागरूक एवं संवेदनशील जागृति व्याप्त है।
मातृ दिवस पर ईसाई समुदाय से जुड़े लोग इसे अपने तरीके से मनाते हैं।
अपनी माँ के सम्मान के लिये चर्च में भगवान की इस दिन खास पूजा करते हैं।
उन्हें ग्रीटिंग कार्ड और बिस्तर पर नाश्ता देने के द्वारा बच्चे अपनी माँ को आश्चर्यजनक उपहार देते हैं।
इस दिन, बच्चे अपनी माँ के सुबह उठने का बेसब्री से इंतजार करतें हैं । साथ ही उनके लिये लजीज व्यंजन बनाकर खुश करते हैं।


अपनी माँ को खुश करने के लिये कुछ बच्चे रेडीमेड उपहार, कपड़े, पर्स, सहायक सामग्री, जेवर आदि खरीदते हैं। रात में, सभी अपने परिवार के साथ घर या रेस्टोरेंट में अच्छे पकवानों का आनन्द उठाते हैं।
मदर्स डे मनाते हैं।

परिवार के साथ खुशी मनाने और माताओं के प्रति आदर व्यक्त
करने के लिये बच्चों को इस दिन अच्छे से मनाने का पूरा मौका देने के लिये कुछ देशों में मातृ दिवस एक अवकाश होता है।
ये सभी माँओं के लिये एक बहुत ही सुंदर दिन है, इस दिन उन्हें घर के सभी कामों और जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाता है।

दुनिया के किसी भी साहित्य किसी भी कविता या रचना के माध्यम से मां पर कोई व्याख्या नहीं की जा सकती।
क्योंकि दुनिया में किसी कलम में इतनी ताकत नहीं है कि वह मां को परिभाषित कर सके।
वह मूरत है प्यार की सूरत है जिसका कर्ज कभी नहीं चुकाया जा सकता ।
एक मां ही है जो सब का ख्याल रखती है ।
एक मा ही है जिसके बुलाने पर भगवान भी दौड़े चले आते हैं ।
हमने जन्नत तो नहीं देखी लेकिन जन्नत की सूरत में मां देखी है।
हमारी पहली धड़कन, पहली जरूरत हमारी मां है ।
हमारी आंखें जब खुली पहली दफा मां का चेहरा ही नजर आया ।
और जिंदगी का हर लम्हा हर पल में ही जीना सिखाया। सुख -दुख , हर खामोशी की दुआ है मां।
मां आशाओं में रंग भरी दुआ है ।
मां अपना निवाला छोड़कर, हमारी खातिर अपने भंडारे खोल देतीहै।
कामयाबी ,हमारे हौसले को तारों से भरा और जिंदगी के कठिन डगर में चलने का रास्ता दिखाया मां ने।
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विश्व कोरोना त्रासदी में विश्व में कइयों ने अपनी माँ को खोया है|
उनकी याद में ह्दय से भावभिव्यक्ति भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित ही उनके मां के लिए इस दिवस पर भेट होगी|

सब कुछ पता है हमारी मां को हमारी भूख का पता, हमारी खुशी का पता, हमारी गम का पता |


खो जाना चाहती हूं!
फिर उस बचपन में जहां मां के गोद में सोया करती थी ।
जब लालसा हो कोई मेरे मन में तो रोया करती थी ।
  जब मेरे माथे पर मां का स्पर्श होता था ।
तब खुशी से सोया करती थी। 


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मातृ दिवस की अनंत शुभकामनाएं

कुमारी पिंकी प्रथम

*दरभंगा बिहार

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रचनाकार: कुमारी पिंकी प्रथम की मातृदिवस विशेष रचनाएँ
कुमारी पिंकी प्रथम की मातृदिवस विशेष रचनाएँ
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