कहानी - लड़िकाई को प्रीत अलि - ज्योति झा

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लड़िकाई को प्रीत अलि “ यश ध्यान कहाँ है तुम्हारा ?” “ कहीं नहीं मैं तो सुन रहा हूँ .” “ अच्छा सुन रहे हो तो आओ सोल्व करो इसे .” शिक्षिका ने...

लड़िकाई को प्रीत अलि

“ यश ध्यान कहाँ है तुम्हारा ?” “ कहीं नहीं मैं तो सुन रहा हूँ .” “ अच्छा सुन रहे हो तो आओ सोल्व करो इसे .” शिक्षिका ने क्रोध से लगभग गरजते हुए कहा

यश उठ गया किसी तरह श्याम पट्ट के पास चला भी गया .फिर ? फिर इधर उधर ताकने लगा और कर भी क्या सकता था वह ?

ठीक है यह तुम्हारी पहली गलती है और तुम एक अच्छे छात्र हो इसलिए माफ़ करती हूँ तुम्हें ,जाकर बैठ जाओ, आगे से ध्यान रखना क्योंकि दूसरी गलती मैं माफ़ नहीं करूँगी .तुम्हे मालूम है न कि बहुत सारे बच्चों को मेरे ट्यूशन में दाखिला नहीं मिलता है . “ जी मेरे पेट में दर्द हो रहा है ,इसलिए ...” कहते हुए उसने अजीब सा मुख बनाया उसके बोलने के ढंग से सारे बच्चे हँस दिए वह झेंपता हुआ आकर बैठ गया .

रास्ते में कुछ सोचता हुआ जा रहा था ,उसकी नजरें किसी को ढूँढ रही थी, तभी उसने कियारा को देखा .वह हँसते बतियाते अपनी सहेलियों के साथ जा रही थी और किसी चीज पर उनका ध्यान नहीं था . वह उनके पीछे हो लिया और इस तरह उनके पीछे पीछे चलने लगा कि किसी को उस पर शक न हो .लाल बत्ती पर दोनों सहेलियाँ मुड़ गईं ,कियारा को सीधे जाना था, वह तेज कदमों से चलने लगी ,सजग सचेत ,अपने को संभालती हुई .बस इस रेड लाईट से आगे जाते ही सर्विस लेन में मुडकर उसका एपार्टमेंट है पर इतनी दूर भी अकेले जाना नागवार गुजरता था. बड़ी हो रही है न्यूज देखती थी ,पढ़ती थी ,दिल्ली शहर को बचपन से जानती थी .किस वेश में कौन सा दरिंदा कहाँ छुपा है ? मम्मा ने अच्छी तरह से सब कुछ समझा रखा था ,यों तो मम्मा उसे छोड़ने और लाने जाया करती थी पर जब से उनके बच्चेदानी का ऑपरेशन हुआ था, कियारा को यह छोटा सा सफर अकेले ही तय करना होता था .

पापा ने मम्मा को कहा था “रेड लाईट के बाद से तो कियारा का अपना डोमेन शुरू हो जाता है ,वह फूल वाला , वह नारियल वाला ,वह आइसक्रीम वाला सब उसे बचपन से जानते हैं ,तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है .” लेकिन जब तक कियारा घर पहुंच नहीं जाती मम्मा घर से बालकनी और बालकनी से घर के चक्कर काटती रहती थी और उसके घर आ जाने के बाद आराम से बैठ कर चाय पीती मानों आज के सारे तनाव समाप्त हो गये हों .

तेज कदमों से चलती हुई कियारा को अपने बगल से कुछ आवाज आई ,उसने मुड़कर देखा . “ तेरा कोई है ?” उसने यश को देखा, उसे तसल्ली हुई “ ओ यश तू ?” “ बोल न तेरा कोई है क्या ?” “ क्या धत ......” “ ओ नहीं है ? पर क्यों नहीं है ?” “क्यों नहीं है मतलब ? नहीं है तो नहीं है और तुझे क्या लेना देना ? है या नहीं है ?” “ नहीं मतलब तू खुबसूरत है ,पढ़ने में भी तेज है , ट्यूशन में भी ध्यान देती है .” “ पढने में तेज होने से ट्यूशन में ध्यान देने से आई आई टी में होता है ब्वाय फ्रेंड थोड़ी बनता है ? और तेरा क्या ? कैसी डांट पड़ी थी ,याद है कि भूल गया ? और तू क्या मेरा पीछा करता है ?” “ मैं ? मैं क्यों करूंगा तेरा पीछा ? मेरी बुआ का घर है तुम्हारे एपार्टमेंट के बगल में .मैं तो वहीं जाता हूँ .” लड़की के पास इसका कोई जवाब नहीं था वह तेज कदमों से चलती हुई निकल गई .

दरअसल वह जानती थी, समझती थी ,यश उसके पीछे पीछे आता है ,हरऱोज बिना किसी व्यवधान के .इस लगभग अनजान साथी का अनचाहा, छुपा छुपा सा साथ उसके मन में नई नई तरंगों को जन्म दे रहा था .बड़ा प्यारा सा सुकून मिलता था उसे ,कोई है उसके साथ ,उसके पास ,सिर्फ उसके लिए जो एक आवाज भर देने से दौड़ा- भागा, खींचता सा चला आएगा .पर आवाज देने की हिम्मत नहीं थी उसमें .

फाल्गुन की बसंती हवा अरहरी को लजाकर इस ओर मुड़ी ही थी कि यश और कियारा के मन को पढकर उसने उनके नन्हे नन्हे हृदय में भी अपना जादू चला दिया .लड़की अपने उछलते ,उमगते दिल को थामे ,उसे काबू में करने का प्रयास करती हुई आगे बढ़ गई , लड़के के पैरों में जैसे पवन की तेजी समां गई .लड़की के ओझल होते ही वह अपने घर की ओर मुड़ गया और गीत गाता, गुनगुनाता हुआ अपने घर चला गया .

लड़का और लड़की दोनों हमउम्र ही थे. लगभग सोलह या सत्रह वर्ष उनकी आयु होगी . दोनों दिल्ली के द्वारका में रहते थे .लड़की माउंट कार्मल स्कूल में पढ़ती थी लड़का डेल्ही पब्लिक स्कूल में पढ़ता था .

लड़के के पिता सौरभ शुक्ला नामी सर्जन हैं ,माँ भी डाक्टर है पर बेटे के कारण सिर्फ प्रैक्टिस करती है वह भी अपने समय के हिसाब से . घर में पैसों की बाढ़ है फिर अकेला लड़का , बड़े लाड प्यार से पला बढ़ा है यश .स्नेहा खुद स्त्री रोग विशेषज्ञ है और उसे पहले से पता था कि उसके शरीर में जो खोट है उसके कारण एक ही बच्चा हो जाए स्वस्थ तो बहुत बड़ी बात है सो एक स्वस्थ बच्चे को पाकर उसका दिल ख़ुशी से झूम उठा था .दूसरे बच्चे के लिए कई बार उसका दिल मचला था पर उसने अपने आप को संभाल लिया था .

यश के दादा दादी दिल्ली में ही रहते थे पर वे कभी साथ नहीं रहे .वे उम्र से पुराने होते हुए भी जरा नये ख्यालों के थे . उनका मानना था कि दूर रहने से संबंधों में मिठास बनी रहती है.पर विधाता ने कुछ और ही टच रखा था जिससे मिठास कुछ ज्यादा ही हो गई .जिन कारणों से परिवार में कलह क्लेश की शुरुआत होती है उसे विधाता ने जड़ से ही उखाड़ दिया .

यश के दादा यानि डाक्टर विजय शुक्ला के एक बेटा सौरभ और एक बेटी शिखा हुई .बिटिया को उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से पाला ,डाक्टर बनाया और उसके ही पसंद के लड़के शेखर के साथ बड़ी धूमधाम से शादी कर दी पर बेटी के दुर्भाग्य को न बदल सके .

शादी के कुछ ही वर्षो के बाद शेखर की तबीयत खराब रहने लगी .काफी जाँच के बाद पता चला कि उसे कैंसर है . पूरा परिवार शोक के सागर में डूब गया .

ठीक इसी समय सौरभ की पत्नी स्नेहा ने यश को जन्म दिया .यश के आने की ख़ुशी भी परिवार को इस सदमे से बाहर न निकाल सकी .स्नेहा ने कितना सोच रखा था ऐसे पार्टी करूँगी ,वैसे पार्टी करूँगी ,कुछ न हो सका .

जब यश एक वर्ष का हुआ तब डा विनय ने अपने घर पर छोटी सी पार्टी रखी ,सभी लोगों के जाने के बाद उन्होंने शिखा से कहा “ देखो बेटा मैं जानता हूँ यह निर्णय आसान नहीं है मगर एक बार सोच कर देखो, शेखर से भी बात कर लो .” “ क्या पापा ?” “ तुम और शेखर मेरे पास आ जाओ रहने के लिए. शेखर के माता पिता को भी गाँव से बुलवा लेंगे ,हम चारों मिलकर शेखर का ध्यान रख लेंगे .”

शिखा को प्रस्ताव अच्छा लगा ,घर गृहस्थी ,अपनी नौकरी एवं बीमार पति को संभालना दिन पर दिन कठिन होगा, उसे मालूम था .यहाँ घर भी काफी बड़ा है .पूरे पूरे चार बेड रूम वाला फ़्लैट है उपर से नौकर के लिए अलग से कमरा .कम से कम घर जंजाल की चिंता से दूर होकर वह अपनी नौकरी और पति का ध्यान अच्छे से रख सकेगी .फिर पापा की देखरेख में शेखर रहेगा .

पर शेखर को मनाना आसान नहीं था .अपने छोटे से दो कमरे के फ़्लैट से उसे बड़ा लगाव था .वह अपनी बीमारी से अवगत था और डा होने के कारण आने वाले समय की दिक्कतों को भी समझ रहा था. वैसे भी अपने कमजोर होते शरीर को रोगी से ज्यादा और कौन समझ सकता है ?वह यह भी समझ रहा था कि यह बोझ शिखा अकेले नहीं संभाल पाएगी पर उसकी जिन्दगी ? उसकी चाहत ? उसकी जिन्दगी के कुछ बचे वर्ष वह अपने ढंग से ,अपने तरीके से जीना चाहता था .यह घर उसके लिए महज घर नहीं उसके प्यार का, उसकी ख़ुशी का आशियाना था, जिसे उसने बड़े चाव से ,उत्साह से अपनी प्रियतमा के लिए ,उसके साथ मिलकर सजाया संवारा था .घर की एक एक निर्जीव लगती वस्तुओं से उसे बेहद लगाव था .

पर शिखा के लिए किसी निर्जीव वस्तु से लगाव को समझना बहुत मुश्किल था क्योंकि उसके सामने से तो उसका सबसे अनमोल जीता जागता ,हँसता बोलता सजीव प्राणी तिल तिल कर जा रहा था और वह उसे रोक पाने में अपने आप को पूरी तरह असमर्थ पा रही थी .पर शिखा ने अपने बीमार पति से कोई बहस करना ठीक नहीं समझा .

दिन बीतने लगे ,लगभग एक वर्ष के बाद शेखर ने स्वयं कहा “ पापा की बात मान लेते हैं .” उसके माँ पापा को भी यही निर्णय सही लगा .उन्हें लगा पूरा परिवार साथ रहकर इस गंभीर समस्या से जूझ सकेगा .

शेखर अस्पताल में ही था ,इसी बीच सौरभ और स्नेहा ने पूरी शिफ्टिंग कर दी ,शेखर के माँ पापा भी आ गए ,उन्हें भी तसल्ली हुई कि कम से कम बेटे के सामने तो रहेंगे .

अस्पताल से घर आने पर शेखर की ख़ुशी का ठिकाना न रहा ,उसके प्यार का आशियाना बिना किसी छेड़छाड़ के ज्यों का त्यों इस घर में शिफ्ट कर दिया गया था .ड्राइंग रूम में उसका सोफा, सोफा कम बेड ,सजावट की सारी वस्तुएं ,उसका एक्वेरिअम ,उसमें उसकी पालतू मछलियाँ ,उसके घर के सारे पेंटिंग .वह अपने सोफे पर बैठने ही वाला था कि स्नेहा ने कहा “अभी नहीं पहले अपना बेड रूम भी देख लो .”

बच्चे की तरह हुलसता हुआ शेखर स्नेहा के पीछे पीछे गया ,अपने कमरे में घुसा .उसकी आँखे खुली की खुली रह गई ,उसे लगा वह अपने साकेत वाले घर के अपने कमरे में है ,बिल्कुल वैसा का वैसा .पलंग पर बैठते हुए उसने भाव विभोर होकर स्नेहा का हाथ पकड़ लिया “ थैंक्यू दीदी आज से मैं आपको भाभी नहीं दीदी कहूँगा .”

बीमारी के दम घुटे परिवेश में भी बातचीत होने लगी ,हास परिहास होने लगा ,खासकर स्नेहा और यश के आने पर घर घर लगने लगता ,बच्चे के रोने मचलने से बड़ों का दिल बहलने लगा .शेखर को भी दिन बिताना पहाड़ नहीं लगता था इसके अलावा शिखा के पापा जाने माने एन्कोलोजिस्ट थे ,शिखा ने भी राहत की सांस ली ,उसकी जिम्मेदारी काफी कम हो गई धीरे धीरे यश शेखर के अत्यन्त करीब आ गया . स्नेहा एवं सौरभ हर वीकेंड पर यहीं रहने लगे .

शेखर की मम्मा भी अब रात दिन रोती नहीं थी ,मानो सबने ईश्वर के इस क्रूरतम फैसले को बेमन से ही लेकिन स्वीकार कर लिया हो ,सभी लोगों की बस एक ही कोशिश थी शेखर जितना हो सके खुश रहे एवं उसे कम से कम तकलीफ हो ,सो सबने अपना अपना कार्य भाल संभाल लिया .मगर शेखर को सबसे ज्यादा ख़ुशी देता था यश का साथ .उसकी बाल सुलभ चेष्टाएँ शेखर को इस माहौल से एकदम अलग थलग लेकर चली जाती थी . एक दिन शेखर ने शिखा से कहा था “ जब यश मेरे पास होता है तब मैं सब कुछ भूल जाता हूँ .” “ सब कुछ यानि मुझे भी ?” शोख अदाओं में कहा था शिखा ने एक लाचार सी हँसी हँसते हुए कहा था उसने “ तुम्हारा सेन्स ऑफ़ ह्यूमर बहुत ही लाजवाब है .” स्नेहा को यह बात मालूम हुई ,वह यश को लेकर ऱोज आने लगी , वे लोग अक्सर रात को भी रुकने लगे .

शेखर और यश ने अपनी एक अलग दुनिया बना ली , यश के साथ बिल्कुल बच्चा बन जाता था शेखर .यश के बड़े होने के साथ साथ उनके खेल बदलते गये पर साथ ज्यों का त्यों बना रहा .

लेकिन अनहोनी तो होनी थी सो हो गई .शेखर के माता पिता गाँव लौट गये अपने बड़े बेटे के पास .यश के दादा ने बहुत कोशिश की ,कि बेटी का घर दुबारा बस जाय पर शिखा ने एक न सुनी . एक दिन अधैर्य होकर उन्होंने शिखा से पूछा हमारे बाद तुम्हारा क्या होगा सोचा है कभी ?” क्यों यश है न ? भैया भाभी को देखेगा तो मुझे भी देखेगा .” यश वहीं पास बैठा था ,शिखा ने मजाक करते हुए पूछा “ क्यों यश देखेगा न ?” यश ने मासूमियत से कहा “ मेरी शादी करा देना फिर हम दोनों मिलकर सबको देख लेंगे .” सब हँस दिए .

यानि यश किसी एक का न रहकर सबका हो गया .पूरा घर उसके एक इशारे पर नाचने को तैयार रहता था ,मगर एक बीमार व्यक्ति के साथ जीवन का पहला पड़ाव बिताने के कारण वह बिगड़ा नहीं .दुःख उसे बिल्कुल छूकर निकली थी जिसके कारण वह बहुत ही नरम दिल का , ईमानदार एवं दूसरे के दुःख को यथासंभव समझ कर दूर करने का प्रयत्न करने वाला तथा रिश्तों की अहमियत को समझने वाला था. मानो विधाता ने काफी कम उम्र में ही जीवन के कटु सत्यों से अवगत करा दिया हो जिसके कारण बचपन से ही उसके व्यवहार में, विचार में एक ठहराव था ,एक संयम था.

किन्तु सोलह - सत्रह वर्ष की आयु में आकर्षण तो स्वाभाविक है. कियारा को जब से उसने देखा है उसके हृदय में अजब सी हलचल मची रहती है .ट्यूशन से घर लौटते वक्त वह उसका पीछा करता ,कभी आधे रास्ते से डरकर लौट जाता कभी निर्भीक होकर उसके अपार्टमेन्ट में घुस जाता और उसके लिफ्ट में घुस जाने के बाद पूरा अपार्टमेन्ट घूमकर बाहर निकल जाता .कभी आगे बढकर बुआ के घर चला जाता तो कभी लौटकर अपने घर चला जाता .

कभी कभी उसे अपने आप में अजीब लगता एक लड़की का इस तरह से पीछा करना .यह तो बहुत ही बुरी बात है .वह सोचता क्या मैं बुरा हूँ ?क्या मेरी सोच ,मेरा उत्साह ,मेरे हृदय में उठते रंग बिरंगे तरंग कलुषित हैं ?क्या किसी दुर्भावना से ग्रसित हूँ मैं ?पर अगले पल ही उसे अपने आप से ही उत्तर मिल जाता “ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि मैं तो उसे देवी की तरह पावन मानता हूँ .”सिर्फ उस स्वर्गीय कुसुम के साथ बैठकर बातें करना चाहता हूँ ,पर क्यों ? क्यों चाहता हूँ मैं ऐसा ?”

उसकी सोच भले ही इधर से उधर हो जाए पर ट्यूशन के बाद उसके पाँव स्वतः ही उधर उठ जाते जैसे लगता उन पावों को उनका कर्म बताने वाले मन मस्तिष्क पर यश का कोई वश ही न हो.जैसे किसी जादूगर ने उस पर कोई जादू कर दिया हो .सहूलियत यही थी कि दादा का घर कियारा के घर के बगल में था और वह दादा दादी या बुआ से मिलने जाने का बहाना कभी भी बना सकता था .

आज वह तय करके ही आया था कि उससे बातें करेगा ,उसी वजह से उसका मन पढाई में भी नहीं लग रहा था उसी चक्कर में सुशीला मैडम से भी डाँट खाया .

पर कोई बात नहीं इतना ही सही ,कियारा ने उससे बातें तो की .बातें करते वक्त कितनी अच्छी लग रही थी ,स्वभाव भी कितना अच्छा है. कल फिर बातें करूंगा ,पर कहीं गुस्सा न हो जाए या फिर बुआ ने पूछ लिया “रोज रोज इधर क्यों आने लगे तो ?”यह सोचकर वह अपने घर की ओर मुड़ गया .

उसके घर पहुंचते ही मम्मा ने पूछा “इतनी देर कहाँ लगा दी ?” “ बुआ के घर गया था .” बुआ कमरे से बाहर आई “ तुम फोन तो कर लेते ,जाने से पहले .हम सब तो यहीं हैं जब तुम जा रहे थे तब भी यहीं थे . दादी ने कहा भी था तुम्हें जल्दी आ जाने .ये हो क्या रहा है तुम्हें ? ध्यान कहां रहता है तुम्हारा ?”

बिना उत्तर दिए वह अपने कमरे में चला गया ,मानों उनसब चीजों का उसपर कोई असर ही नहीं होता हो .

दूसरे दिन यश फिर गया ,उससे बातें की और जान गया कि कियारा को भी उससे बातें करना अच्छा लगता है. बस क्या था ? यश और कियारा अब रोज साथ साथ लौटने लगे ,धीरे धीरे कियारा की सहेलियों ने उसका साथ छोड़ दिया या यों कहें कियारा को सहेलियों के साथ में अब पहले वाला आनन्द नहीं आता इस थोड़े समय को वह दोस्तों के साथ कैसे बाँट ले ? सो उसने उन्हें छोडकर यश का हाथ पकड़ लिया .

बस घर से ट्यूशन और ट्यूशन से घर ,इतनी ही देर का साथ था दोनों का . पर वे खूब धीरे धीरे चलते और बातें करते .दोनों शाम का इन्तजार करते .यश अब लेने भी आने लगा था .वह अपने घर से निकल कर ऑटो ले लेता और कियारा के घर के पास उतर जाता फिर कियारा के साथ साथ ट्यूशन जाता ,लौटते वक्त भी वह यही करता ,कियारा को घर छोड़ता और जल्दी पहुंचने के लिए आटो या इ रिक्शा ले लेता एवं अपने घर से थोड़ी दूर पहले ही उतर जाता .

दिन, महीने बीतते गये ,कुछ महीनों के बाद वे फोन पर भी बातें करने लगे .उनके बदलते रिश्तों के बारे में दोनों के दोस्तों को भी मालूम हो गया .दो वर्ष देखते देखते बीत गये और उनकी परीक्षाएँ समाप्त हो गई ,ट्यूशन का क्रम टूट गया .

कियारा डाक्टर बनना चाहती थी और यश इंजीयरिंग करके मैनेजमेंट करना चाहता था .यश की मम्मा ने यों तो कुछ कहा नहीं था पर यश को लगता कि वे भी यही चाहती हैं .दादा एवं पापा को क्लिनिक की चिंता थी .अभी काफी लोग थे पर बाद में क्या होगा सोच सोच कर परेशान रहते थे पर उन्होंने अपनी इच्छा कभी यश पर थोपने की कोशिश नहीं की थी . बुआ को भी मम्मा की ही तरह यही लगता कि इन बीमार एवं बीमारी के जंजाल से जितना दूर रहे यश ,उतना ही अच्छा है .

अतः यश के घर में तो कोई दिक्कत ही नहीं थी पर कियारा ने रो रोकर बुरा हाल कर लिया था जब से आई आई टी का रिजल्ट निकला था. यश का रैंक साठवॉ था जहाँ चाहे दाखिला ले सकता था .मेडिकल एंट्रेंस भी दोनों ने दिया था और कियारा को विश्वास था कि वहाँ भी दोनों को अच्छे रैंक मिलेंगे पर यश माने तब न .वह तो कुछ सुनना ही नहीं चाहता था बस चाहता था किसी तरह कियारा उसकी बात मान ले और इन्जिनियरिंग कर ले . उसका रैंक एक सौ चौरानबे था .यश ने तो यहाँ तक कहा कि जहाँ कियारा को एडमिशन मिलेगा वहीं वह भी एडमिशन ले लेगा ,मम्मा पापा को भी मना लेगा .इससे ज्यादा वह क्या करे ?

पर कियारा कुछ सुने तब न .वह तो जिद पर अड़ गई है .यश को अपने फूफा की याद आई ,काश इस वक्त वे होते यश के साथ ! कितना समझते थे वे उसे .उसके उम्र तक पहुंच कर उसकी समस्याओं को कितनी आसानी से सुलझा देते थे वे .फूफा के बारे में याद आते ही उसे अपने बहते अश्रुओं का भी ज्ञान नहीं होता था .थोडा रो लेने के बाद उसका मन हल्का हो गया .उसने सोचा आज वह कियारा से अंतिम फैसला लेने को कहेगा क्योंकि तर्कसंगत तो यही है न कि दोनों अगर एक दूसरे की बात नहीं समझ सकते तो जिसका जो जी चाहे करे .यश को इसमें कोई दिक्कत नहीं था कि कियारा मेडिकल करे और वह इंजीनियरिंग करे .पर कियारा का रोना “पांच वर्ष कैसे हम अलग रहेंगे ?”ये तो बच्चों वाली बात है न पढाई तो करनी पड़ेगी न ,और अगर वह मेरी बात नहीं मान सकती तो मैं क्यों उसकी बात मानूँ ?मेरी जिन्दगी भी मेरी अपनी है न .

शाम को सेक्टर बारह के काफी हाउस में बैठे थे दोनों आमने सामने ,वे अकेले नहीं थे सोनाक्षी और रोहित भी थे .दोनों अपने अपने घरों से अपने दोस्त के साथ निकले थे ताकि किसी को कोई संदेह न हो .

यों तो कियारा ने एक दिन अपनी परेशान मम्मा को बता दिया था “ मम्मा तुम परेशान मत हो मेरा एक दोस्त रहता है मेरे साथ ट्यूशन जाते वक्त भी और लौटते वक्त भी .” उसे लगा था मम्मा को तसल्ली मिल जाएगी पर मम्मा तो और बेचैन हो गई और प्रश्नों को झड़ी लगा दी “कौन है ? क्या है ? कहाँ रहता है ?तुम और कहीं तो नहीं मिलते हो ?और पता नहीं क्या क्या ?” कियारा को लगा कि वह अपना सर पीट ले ,उसने बात को समाप्त करते हुए कहा था “ऐसी कोई बात नहीं है ,बगल वाले एपार्टमेंट में रहता है ,समय एक है जाना एक ही जगह है ,बस इतना ही ,तुम तो बेमतलब ही बात का बतंगड बना रही हो .’

थोड़ी देर सभी चुप बैठे रहे .फिर कियारा ने ही बात आरंभ की “मेरी मम्मा और पापा दोनों ही शिक्षक है और उनका एकमात्र सपना अपनी इकलौती बेटी को डाक्टर बनाने का है .तो मैं क्यों उनका सपना तोड़ दूं ? कैसे ?” “ और यश उसका सपना ? उसका क्या ?” रोहित ने कहा उसका क्या ? वह तो जिन्दगी भर कुछ न भी करे तो भी ......” “ तो भी क्या ?” सोनाक्षी थी “ इसकी तो एक दादी को छोडकर सब इसी के लिए कमा रहे हैं ,रखने की भी जगह नहीं है .” रोहित ने कहा “ हाँ ये तो सही है मगर क्या लोग सिर्फ पैसे के लिए ही पढ़ते हैं ? और अगर तुम्हारा यश से शादी करने का प्लान पक्का है तो हम तो तुम्हारे लिए भी यही कह सकते हैं , फिर छोड़ दो पढाई और कर लो शादी .” फिर जरा मुस्कुराते हुए कहा उसने “ हम तो यह भी कह सकते हैं कि तुमने यश की दौलत को देखकर ...........” और सभी ही ही करके जोर जोर से हंसने लगे .उनकी हँसी में ईर्ष्या, द्वेष या व्यंग लेशमात्र भी नहीं था ,किशोरावस्था की बेपरवाह ,उन्मुक्त हँसी थी . सोनाक्षी ने मुँह बनाते हुए कहा “ काश मैं यश के ट्यूशन में गई होती तो क्या पता ? हू नोज ?” कियारा ने बात का रूख बदलते देखकर कहा “ मैं ज्यादा देर रूक नहीं सकती ,आजकल मम्मा को जरा जरा सी बात पर शक होता है .” “ तुम दोनों बता क्यों नहीं देते अपने पैरेंस को अभी तो वे तुमसे काफो खुश होंगे .” रोहित था “ नहीं नही मैं तो नहीं बताऊंगी ,और अभी तो मेडिकल का रिजल्ट भी नहीं नकला है .” “तुम्हे क्या तुम्हारा तो हो ही जाएगा न ,और यश का क्या वह तो किसी भी प्राइवेट कालेज में पढ़ सकता है .” सोनाक्षी थी कियारा ने रूठते हुए कहा “ नहीं नहीं हम एक ही कालेज में पढ़ेंगे .” “ तो चलो ले लो एडमिशन आई आई टी में .” यश ने कहा बातचीत का सिलसिला लम्बा चला पर समस्या और उलझती गई .दोनों जिद पर अड़े थे .

जब यश घर पहुंचा तो रात के आठ बज रहे थे ,मम्मा क्लिनिक में थी .पापा किसी काम से इंदौर गए थे ,बुआ ड्राइंग रूम में ही बैठी थी ,निरुद्देश्य ,अकेली उदास .उन्हें ऐसे देखकर यश डर गया ,उसे लगा कोई बात हुई है क्योंकि यश को देखकर भी उन्होंने. कुछ नहीं पूछा . “क्या हुआ बुआ ?” “ अरे तू आ गया ?” “ बात को घुमाओ मत ,मैंने देखा तुम आँसू पोंछ रही थी .सब ठीक है न ?” “हाँ रे सब ठीक है .” “ फिर ? “मेरा एक मरीज था क्लिनिक में बहुत दिनों से बीमार था ,आज उसकी मृत्यु हो गई घर वालों का कोहराम देखकर मन खराब हो गया .” “ यश ने कपड़े बदले ,बुआ के लिए चाय बनाई ,चाय देकर बगल में बैठ गया . “ “पीकर बताओ कैसी बनी है ? मैंने बनाई है .” “ अरे पिंकी को कह देते .” कहने को तो कह दिया पर वे खुश हुईं और पूछा “ कैसी रही तुम्हारी पार्टी ?” और यश को सब कुछ याद आ गया ,उसने उदास स्वर में कहा “ काश आज फूफा जी होते .” “ “क्या हुआ बेटा तू उदास लग रहा है .” “बुआ मैं डाक्टर नहीं बनूँगा जब घर में इतने सारे डाक्टर के होते हुए तुमलोग एक व्यक्ति को नहीं बचा सके तो क्यों बनूँ मैं डाक्टर ?” दोनों अपने अपने शोक में डूब गए .अश्रुपूरित आँखों को छिपाने के लिए यश ने टेलीविजन चला दिया .

तीन वर्ष बीत गए ,आई आई टी कानपुर में अच्छे रैंक लाना आसान नहीं ,पर यश ने जी जान से मेहनत की एवं अब्बल रैंक लाता रहा ,किन्तु चौथे वर्ष उसका पढाई से मन उचट गया .

दरअसल तीन वर्ष तक एक जूनून था अपने को साबित करने का .वह जाता रहा .इन सबसे बोर हो गया वह .दिन रात कियारा याद आने लगी .फोन से चैटिंग से अब उसका मन भरता नहीं था सो एक दिन चला गया लखनऊ उसके हॉस्टल .

वह ऑटो से उतरने ही वाला था हास्टल के गेट पर कि उसकी नजर कियारा पर पड़ी .वह रोहित के साथ थी. हाथों में हाथ डाले वे कहीं जा रहे थे. यश ने ऑटो वाले को पैसे दिए और इस तरह लोगों के पीछे खड़ा हो गया कि उनकी नजर यश पर न पड़े .वे लोग एक ऑटो पर बैठने लगे . यश वाला ऑटो अभी खड़ा ही था शायद पैसेंजेर की प्रतीक्षा कर रहा था, यश जल्दी से ऑटो पर बैठ गया और उनके ऑटो का पीछा करने को कहा .थोड़ी दूर तक तो वह उस ऑटो के पीछे पीछे गया पैर थोड़ी दूर जाने के बाद पता नहीं वे किस मोड़ पर मुड़ गये .वह वापस हास्टल के गेट पर आया .वहाँ बहुत देर तक उनका इन्तजार किया ,लगातार कई बार कियारा को फोन किया पर कोई जवाब नहीं आया, न वे ही आये .

यश का शक यकीन में बदल गया ,उसने रात भर कोशिश की बात करने की फोन पर और सुबह क्रोधित होकर फोन का सिम ही निकाल कर फेंक दिया .

वापस आकर कई दिन कमरे में ही पड़ा रहा .दोस्तों ने मम्मा को फोन कर दिया और मम्मा आ गई एकदम से बिना बताये .

यश की हालत देखकर मम्मा को कुछ अंदाजा तो लगा पर यश कुछ भी बोलने को तैयार नहीं था .दोस्तों से बातचीत करने पर भी मम्मा को कुछ पता न चल सका .उन्होंने यश को समझाने की कोशिश की कई तरीके से पर यश के सामने एक ही दृश्य घूम रहा था .मम्मा ने उसे नया सिम दिलाया और खूब समझा बुझा कर,दोस्तों को जरूरी हिदायतें देकर वापस लौट गई .

जब रिजल्ट आया तो उन्हें अचम्भा नहीं हुआ .हमेशा टॉप करने वाला बच्चा किसी तरह पास भर हुआ था .ममा ने कोशिश करके ,प्रोफेसरों से बात करके उसका अन्तिम सेमेस्टर का प्रोजेक्ट दिल्ली में करवा लिया .

बच्चा हास्टल से घर आ गया .मम्मा पापा थोड़े आश्च्स्त हुए कम से कम सामने तो रहेगा .सभी बड़ों को लगा कि घर में रहेगा तो प्रावल्म कुछ समझ में आएगी पर यश तो अपना सारा गुस्सा .क्रोध ,दुःख अपने छोटे से हृदय में समेटे हुए था .बात करता तो भी किससे ? उसका सबसे अजीज मित्र ही तो .......फिर भी यश ने बहुत कोशिश की ताकि घर वालों को दुःख न हो और इसी कोशिश में हालात बद से बदतर होते गये .

बड़ों को सारी कोशिशें नाकामयाब रहीं और यश की हालत सुधरने की बजाय बिगड़ने लगी .बोलना बतियाना तो दूर उसने खाना पीना भी कम कर दिया .डिप्रेसन की दवा ने भी कोई ख़ास असर नहीं दिखाया .

घर का खुशनुमा परिवेश बदलने लगा ,सभी के मुख पर चिंता की रेखाएं गहराने लगीं .तभी छुट्टियों में रोहित आया ,और आते ही वह अपने मित्र से मिलने चला आया .उसे देखकर बिलकुल शांत रहने वाला यश बुरी तरह भड़क गया ,अनाप शनाप बकने लगा ,उसे मारने के लिए बुरी तरह हाथ पैर फेंकने लगा .रोहित की समझ में कुछ भी नहीं आया .उसे थोडा बहुत मालूम था पर हालात इतने गंभीर हैं ,उसे अंदाजा नहीं था .उसे समझा बुझा कर पापा ने वापस भेज दिया .

दूसरे दिन वे लोग रोहित के घर गये .रोहित ने उन्हें सारी बातें बता दी कियारा के बारे में ,यह भी कि कालेज जाने के तीन वर्षों तक उनके बीच सब कुछ ठीक ठाक था ,पर पिछले वर्ष से यश ने एकाएक फोन करना बंद कर दिया ,कियारा ने कितनी कोशिश की पर .....वह तो मिलने कानपुर भी चली गई थी . “ फिर क्या हुआ कानपुर में ?कुछ पता है तुम्हें ?”पापा ने पूछा “ वहाँ उसने आंटी को देखा यश के कमरे में और वह डरकर वापस चली आई ,वह तो हमसे भी बात नहीं करती है .” “पर क्यों ?” मम्मा थीं “ क्योंकि उसे लगता है कि मुझे यश के बारे में सब मालूम है और मैं उसे जानबूझ कर नहीं बताता हूँ जबकि बीमार होने के बाद से मेरी यश से कभी बात ही नहीं हुई है ,मुझे तो आपसे ही उसके बारे में मालूम चला थोडा बहुत और इसलिए कल मैं मिलने चला आया .” “क्या तुमने अपनी और कियारा की कोई फोटो यश को भेजी थी ?”पापा ने पूछा “ नहीं ,पर क्यों तो अंकल .” “ वह इसलिए कि वह तुमसे बहुत क्रोधित है और किसी के सामने उसने उस तरह से नहीं किया था जैसे कल ,तुम समझ रहे हो न ?”

मम्मा ने पूछा “एक बात बताओ तुम और कियारा कभी साथ साथ कहीं गये थे ?” कभी किसी काम से हास्टल के बाहर या हास्टल में ही कहीं साथ साथ ?” रोहित ने याददाश्त पर जोर दिया और कहा “हाँ एक बार उसके मामाजी लखनऊ आये थे और उनका एक्सिडेंट हो गया था तब मैं कियारा को लेकर अस्पताल गया था जहाँ उसके मामा को रखा गया था ,उनकी हालत काफी गम्भीर थी ,उन्हें आई सी यू में रखा गया था , हम रात भर उनके पास थे , सुबह उसकी मामी आ गई और हम वापस चले गये थे .”

मम्मा पापा को बात साफ़ होती नजर आई ,वे घर गये उन्होंने यश से बात करने की कोशिश की कियारा के बारे में ,वह उसी तरह भड़क गया .उन्होंने यश के डाक्टर को सारी बातें बताईं और सच सामने आ गया . सभी बातें साफ़ हो गईं .यश को भी सच्चाई का पता चला .

मम्मा और बुआ उसे कियारा के घर लेकर गये .यश ने कियारा से माफ़ी माँगी पर कियारा ने साफ़ शब्दों में इनकार कर दिया

रुक रुक कर कहा उसने “छोटे से शक की वजह से जो इस तरह से ........मैंने किस तरह से वे दिन काटे .......और उसे अपने सबसे अच्छे दोस्त पर भी एतवार नहीं हुआ .....कम से कम बात तो करता ,वजह के तह तक पहुंचने की कोशिश तो करता .........” और उसने अपना पक्का इरादा सबके सामने बता दिया “मैं इसके साथ किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती .” और अंदर जाकर फूट फूट कर रोने लगी .

कुछ दिनों के बाद कियारा की मम्मा ने उसे समझाते हुए कहा “ बेटा एक बार और सोच कर देख लो .भले लोग मालूम पड़ते हैं . एक बार भी किसी ने तुम पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं दिया ,चुपचाप बेटे को लेकर चले गये .”

एक बार ये सोच केर देखो कि तुम कानपुर जाती और देखती कि यश किसी लड़की को थामे जा रहा है तब.............” “ मम्मा तब मैं चुपचाप पीछा नहीं करती ,सामने जाकर सच पता लगाती ................”. “और अगर यश ने ऐसा किया होता तो मुझे कितनी सान्त्वना मिलती ,कितनी नर्वस थी मैं उस समय ...” “नहीं मम्मा मैंने बहुत सोचा है , अब यह किस्सा खत्म समझो ,मैं इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती .”

यश ने बहुत हाथ पैर जोड़े ,अपनी गलती मानी पर बात नहीं बनी और यश पूरी तरह टूटने लगा .उसकी बीमारी बढ़ने लगी .एक वर्ष बीतते बीतते यश पूरी तरह से रोगी बन गया .सारे दिन घर में यहाँ से वहां बेचैन सा घूमता रहता ,निरुद्देश्य ,बिना किसी काम के .समय बीतता गया , दवा के डोज बढ़ने लगे पर सुधार की कोई आस दिखाई नहीं देती .

घर में मातम सा रहने लगा .दादा,दादी ,बुआ सभी इसी घर में रहने लगे ,फिर से साथ साथ .दादी हर वक्त यश के साथ साये की तरह रहती हर वक्त चौकस ,क्योंकि उसके डाक्टर के हिसाब से वह कभी भी अपनी जान लेने की कोशिश कर सकता था .

बाकि लोग अपने आपको काम में डूबा देने को कोशिश करते .यश के दादा जी अक्सर बीमार रहने लगे .

तीन वर्ष बीत गये .यश के ठीक होने की उम्मीद जाती रही .दादा जी ने बिस्तर पकड़ लिया .यश के डाक्टर दादा जी के पुराने दोस्त सुनील झा थे सो बात छिपी रही .यश को क्लिनिक का डायरेक्टर बना दिया गया था केवल नाम के लिए ताकि सबका मुंह बंद रहे .

अड़ोसी पड़ोसी ,मिलने वाले लोगों में काफी कमी हो गई थी .शादी ब्याह नाते रिश्तेदार सभी से उन लोगों ने मुँह मोड़ लिया था .सभी का मानना था कि बहुत पैसा आ जाने की वजह से वे घमंडी हो गये हैं .

यश की शादी की भी कोशिश की गई .गाँव के किसी गरीब घर की लड़की से पर कहीं बात नहीं बनी क्योंकि वे लोग सब कुछ सच सच बिना बताये शादी नहीं करवाना चाहते थे .

डाक्टर झा घर पर ही आकर यश को देख जाते ,दवा लिख देते ,हिदायतें दे देते .उसके बाद अपने मित्र के कमरे में जाते .बैठते चाय नाश्ता करते एवम् उन्हें ढाडस भी बंधा जाते पर उस दिन उनके पास ढाड़स के लिए शब्द नहीं थे .

सो उन्होंने यश के पापा को क्लिनिक से बुलवा लिया और कहा “दवा का डोज बढाना पड़ेगा क्योंकि लगता है कि यश अपनी याददाश्त भी खोता जा रहा है ,जीने की लालसा भी .वह मुझे भी नहीं पहचानता है ?”

पापा को यह बात मालूम थी यश सिर्फ अपनी दादी एवं मम्मा को ही ठीक से पहचानता था .उन्होंने पूछा “ लेकिन डोज बढाने पर किडनी पर उसका असर पड़ेगा तब तो दिक्कत और बढ़ जायेगी .” बड़ी देर विचार विमर्श करने के बाद डा झा दादाजी के कमरे में गये .मेडिकल कालेज में वे रूम मेट थे .उनकी दोस्ती की मिशाल दी जाती थी ,बड़े ही मस्तमौला थे दोनों .जब भी मिलते उनके ठहाकों की गूंज दूर तक सुनाई पड़ती थी आज वहाँ बात करने को शब्द भी नहीं थे .

तभी काल्बेल बजी ,मम्मा एक मरीज के साथ थी जब डाक्टर झा का फोन आया था ,उनसे निबट कर वे भागी भागी घर आई .उनका मन बड़ा ही अशांत लग रहा था जैसे कोई बुरी बात होने वाली हो ,अंदर घुसते ही उन्होंने जोर से दरवाजा बंद कर दिया मानो अपनी वेदना .अपना खीझ उसपर उतार रही हो , तभी फिर से घंटी बजी .हडबडाकर उन्होंने दरवाजा खोला सामने कियारा थी ,उन्होंने बिना कुछ कहे जोर से दरवाजा बंद कर दिया ,पर वहीं खड़ी रहीं . बाहर से आवाज आई “आंटी प्लीज एक बार मेरी बात सुन लीजिये .” थोडा सा दवाजा खोला स्नेहा ने और गरज कर कहा “तुम क्यों हमें जलाना चाहती हो ?” फिर एकाएक उनकी आवाज धीमी हो गई “ बेटा प्लीज हम सब से दूर रहो बस इसमें ही सबकी भलाई है .” आंटी मैं मिठाई लाई हूँ, आपसे आशीर्वाद माँगना चाहती हूँ .” “ मेरे आशीर्वाद देने के हाथ तो तुमने छीन लिए हैं ,तुम्हें आशीर्वाद क्या श्राप भी नहीं दे सकती हूँ ,दूर हो जाओ नजरों से .” “ पर आंटी मैं तो....... मैं तो .......” “हाँ तो कहो न जुबान लडखडा क्यों रही है ? इतना कुछ हो गया फिर भी तुझे चैन नहीं मिला ,कर लो और जो करना है .”और भी बहुत आशीर्वचन कहे उन्होंने

पीछे कियारा के पापा खड़े थे उनके धैर्य का बाँध टूट गया “ बहन जी आप तब से बोली जा रहीं है एक बार इसकी बात तो सुन लीजिये .” “ ठीक है आप ही सुना दीजिये .” “ ये कियारा आपके बेटे से शादी करना चाहती है .इसलिए मिठाई लेकर आई है और यह अंगूठी भी .अब आप पर है कि आप इसे स्वीकार करें या ठुकरा दें ,बीता हुआ समय तो वापस नहीं आ सकता मगर वर्तमान और भविष्य पर तो अपना .......”

तभी यश के पापा पीछे आकर खड़े हो गये “ क्या शोर है ये सब ? कौन हैं ये लोग ?” “कियारा के पापा कियारा का रिश्ता लेकर आये हैं .”कहकर अजीब सी निगाहों से देखा स्नेहा ने अपने पति की ओर “क्या ?” उनका मुंह खुला का खुला रह गया .थोडा सम्भलने के बाद कहा उन्होंने “मेरा मुंह क्या देख रही हो ? अंदर बुलाओ बैठकर बातें करेंगे .” बैठने के बाद एक दूसरे से परिचय हुआ .घर के लोगों का परिचय देने के बाद स्नेहा ने कियारा को बताया “ ये डाक्टर झा है यश के डाक्टर .” “मैं इनसे मिल चुकी हूँ.” सभी संदेहास्पद दृष्टि से एक दूसरे को देखने लगे .डा झा ने कियारा को कुछ इशारा किया तब उसने बात को बदलते हुए कहा “मैं अपने रिश्तेदार को लेकर इनके क्लिनिक गई थी .” डा झा को तसल्ली हई . स्नेहा कियारा से बात करने को उद्धत थी पर सौरभ ने कहा मुझे कियारा से कुछ बातें करनी है सब चुप हो गए .

पापा ने कहा “ देखो कियारा मैं तुम्हें दोष नहीं देता पर तुमलोगों की नादानी से मेरे बेटे की जिन्दगी खराब हो गई ,मैं नहीं चाहता कि एक और नादानी से तुम्हारी जिन्दगी भी तबाह हो जाये ,क्योंकि ये तुम्हारी पूरी जिन्दगी का सवाल है ,हो सकता है कि यश कभी ठीक न हो .”

“अंकल मुझे यश की बीमारी के बारे में सबकुछ मालूम है ,मैंने सब कुछ सोच समझ कर यह निर्णय लिया है ,मैं डाक्टर बन गई हूँ. मुझे सरकारी नौकरी भी मिल गई है ,यहीं दिल्ली में ,फिर आप सब भी हैं मैं सब संभाल लूंगी .” और थोडा झेंपते हुए कहा उसने “ मैं यश के बिना नहीं रह पाऊँगी ,मैं सच कहूँगी अंकल मैंने बहुत कोशिश की भूल जाने की ,नया रिश्ता बनाने की ,मगर मगर ........”

“मगर यश तुम्हे क्या दे पायेगा ?,जानती हो न सब कुछ ,वह धीरे धीरे अपनी याददाश्त भी खो रहा है ,हो सकता है तुम्हें पहचाने भी नहीं .” “ हाँ जानती हूँ अंकल पर वह मुझे वह चीज दे पायेगा जो अन्यत्र दुर्लभ है मेरा प्रथम नेह .” इस दलील के आगे सबको चुप होना पड़ा . यश को बुलवाया गया .वह दादी का पल्लू पकडे पकड़े एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह आया .वह दादी का पल्लू कभी नहीं छोड़ता था. सोये में भी वह दादी का पल्लू पकड़ा रहता था .

उसने कियारा को देखा .उसकी आँखों में अजब सी चमक आई और उसने दादी का पल्लू छोड़ दिया. कियारा के सामने जाकर खड़ा हो गया फिर रूक रूक कर कहा “ की..या..रा ..तुम ...? कियारा ने लज्जा संकोच सब छोडकर सबके सामने यश के दोनों हाथ पकड़ लिए भावविह्वल होकर कहा “ मुझे माफ़ कर दो ,अब मैं ये हाथ कभी नहीं छोडूंगी ,तुम्हे छोडकर कभी ,कहीं नहीं जाऊंगी ,एकदम पक्का वाला वादा .”

“ सच ...”यश ने पूछा .उसकी आँखों में अनेक भाव थे थोडा विश्वास ,थोड़ा अविश्वास ,थोड़ी ख़ुशी थोडा दुःख ,थोड़ा आश्चर्य, थोडा कौतुहल और.. और वह लड़खड़ाने लगा .डा झा ने उसे एक सुई देकर सुला दिया .

कई वर्ष बीत गए हैं ,डा विमल ने अपने घर में छोटी सी दावत रखी है अपने प्रपौत्र शेखू यानि शेखर के जन्मदिन पर .पूरा घर ख़ुशी में डूबा है सभी दावत की तैयारी में व्यस्त हैं .

और यश ? वह कियारा से उलझ रहा है कह रहा है “ नव्या इतनी सुंदर है उसे मैं दिल्ली में नहीं पढ़ाऊंगा ,उसे विदेश भेज दूंगा पढ़ने के लिए.” पर कियारा भी जिद पर अड़ी है वह अपनी बेटी को अपने देश की मिटटी में ही पालना में चाहती है .

और नव्या की नानी जो शादी के बाद कुछ वर्षों तक काफी गुस्से में थी, अपनी किसी सहेली से कह रही हैं “ मीट माइ सन इन लॉ ,इसने हावार्ड से मैनेजमेंट किया है .”

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रचनाकार: कहानी - लड़िकाई को प्रीत अलि - ज्योति झा
कहानी - लड़िकाई को प्रीत अलि - ज्योति झा
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