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सिद्धार्थ का 'बुद्ध' बन जाना आकस्मिक नहीं था ! ■ डॉ. सदानंद पॉल

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बुद्ध पूर्णिमा विशेष ----------------------- सिद्धार्थ का 'बुद्ध' बन जाना आकस्मिक नहीं था ! ■ डॉ. सदानंद पॉल यह सुखद संयोग की बात है...

बुद्ध पूर्णिमा विशेष
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सिद्धार्थ का 'बुद्ध' बन जाना आकस्मिक नहीं था !

■ डॉ. सदानंद पॉल

यह सुखद संयोग की बात है कि इसबार बुधवार को हम बुद्ध पूर्णिमा मना रहे हैं । दो-दो बुद्धियों से मंडित वैशाख पूर्णिमा तीर्थ-दिवस लिए भी है। राजकुमार सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध, फिर महात्मा बुद्ध और अंत में भगवान बुद्ध के रूप में संसारख्यात हुए । जहाँ सिद्धार्थ 'बुद्ध' बने, वो गया नामक पुण्य धाम बिहार में है । इतना ही नहीं, बुद्ध के विहार-स्थलों के कारण ही 'विहार' से 'बिहार' नाम पड़ा । भले ही आज बौद्ध एक धर्म है, किन्तु हिन्दू धर्म इन्हें भगवान विष्णु के  9 वें अवतार के रूप में मानते हैं । सिर्फ 'बुद्धम शरणम गच्छामि' कहने भर से हम शांति को नहीं पा सकते, अपितु अमल करना जरूरी है । कई पत्र-पत्रिकाओं से संकलित उनके उपदेश हैं, यथा- शक की आदत से भयावह कुछ भी नहीं है, क्योंकि शक लोगों को अलग करता है। यह एक ऐसा जहर है जो मित्रता खत्म करता है और अच्छे रिश्तों को तोड़ डालता है। तीन चीजें ज्यादा देर तक नहीं छुप सकते- सूर्य, चंद्रमा और सत्य। जलते हुए सिर्फ एक दीया से हजारों दीये जलाए जा सकते हैं, फिर भी उस दीये की रोशनी कम नहीं होती है, ठीक इसी प्रकार खुशियां बांटने से बढ़ती हैं, कम नहीं होती ! अगर बुराई न हो, तो अच्छाई उसके ऊपर अपनी पवित्रता स्थापित कैसे कर सकते हैं। स्वास्थ्य सबसे बड़ा उपहार है, संतोष सबसे बड़ा धन है और वफादारी सबसे बड़ा संबंध है। आग बगैर हवा की नहीं जल सकती, मनुष्य भी आध्यात्मिक जीवन के बिना नहीं जी सकते !

ध्यातव्य है, 563 बीसी में वैशाख पूर्णिमा को सिद्धार्थ का जन्म 'कपिल वस्तु' में शाक्य राजा परिवार में हुआ था और मृत्यु व 'महा परिनिर्वाण' भी इसी पूर्णिमा के दिन 80 वर्ष की आयु में 483 बीसी को कुशीनगर व कुशीनारा में हुआ था, तो उन्हें ज्ञानप्राप्ति भी वैशाख पूर्णिमा के दिन गया में हुई थी । राजकुमार सिद्धार्थ ही कालांतर में महात्मा बुद्ध व भगवान बुद्ध कहलाए । ऐसा किसी अन्य महापुरुष के साथ आज तक नहीं हुआ है। अपने मानवतावादी एवं वैज्ञानिक बौद्ध धम्म (धर्म) 'विज्ञानी दर्शन' प्रेरित है । भगवान बुद्ध दुनिया के  संतों में एक है। आज दुनिया में बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में 180  करोड़ से अधिक बौद्ध धर्मावलम्बी हैं । सनातन हिन्दू धर्म मे में बुद्ध को भगवान विष्णु क 9वें अवतार माने जाते हैं । भारत सहित श्रीलंका, चीन, नेपाल, सिंगापुर, वियतनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, मलेशिया, म्यांमार, जापान, पाकिस्तान तक में बौद्ध धर्म माननेवाले लोग हैं ! भगवान बुद्ध के ही बिहार के गया (बौद्धगया) नामक स्थान हिन्दू व बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पवित्र तीर्थस्थल है । घर के त्यागने के बाद सिद्धार्थ सच की खोज में 7 वर्षों तक जंगल-जंगल भटकते रहे, उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधिवृक्ष (पीपल पेड़) के नीचे बैठकर ध्यान करते-करते बुद्धत्व को प्राप्त किये । उनके द्वारा स्थापित आश्रम बौद्धविहार कहलाता है, तो उनके बुद्धत्व संबंधी स्मारक 'स्तूप' कहलाती है । इन विहारों में से एक में भगवान बुद्ध की 6 फुट लम्बी मूर्ति भी है, जो लाल बलुई मिट्टी की बनी है।

गौतम बुद्ध भी उन्हीं के नामों में एक नाम है । उनकी सौतेली माता व मौसी गौतमी ने उनका पालना की । गौतमी की अपत्यवाची संज्ञा ही 'गौतम' ही । ध्यातव्य है, कोई भी 'संत' स्थान, धर्म और काल विशेष से परे होते हैं, बावजूद बिहार, झारखंड आदि राज्यों व नेपाल, जापान आदि देशों में लोकप्रिय संत महर्षि मेंहीं और उनके आध्यात्मिक-प्रवचन से भारत के राष्ट्रपति डॉ. शर्मा, प्रधानमन्त्री श्री वाजपेयी सहित कई राज्यो के राज्यपाल, मुख्यमंत्री , नेपाल के महाराजा सहित अनेक व्यक्ति प्रभावित हुए हैं । संत टेरेसा और बिनोवा भावे  उनसे खासे प्रभावित थे । 'सत्संग-योग' पुस्तक उनकी अनुकरणीय कृति है । उनकी  जिसतरह से भगवान बुद्ध के लिए बौद्धगया महत्वपूर्ण रहा है, उसी भाँति महर्षि मेंहीं के लिए कुप्पाघाट, भागलपुर महत्वपूर्ण स्थल है । प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु इस स्थल के दर्शन करने आते हैं । संत महर्षि मेंहीं की तुलना महात्मा गौतम बुद्ध से की जाती है । उत्तर भारत सहित नेपाल, भूटान आदि देशों तक प्रसारित संतमत परम्परा के प्रख्यात संत महर्षि मेंहीं के पितृ घर सिकलीगढ़ धरहरा, जो पूर्णिया जिला में है और जन्मभूमि यानी ननिहाल खोखसीश्याम, जो मधेपुरा जिला में है, किंतु उनकी कर्मभूमि कटिहार जिले के नवाबगंज और मनिहारी रही । नवाबगंज में संतमत सत्संग मंदिर 1930-31 में स्थापित हुई थी, तो मनिहारी में सत्संग मंदिर 1936 में बनी है, अपितु महर्षि मेंहीं के मुख्य निवास नवाबगंज मन्दिर रहा । मनिहारी कुटी में तो गंगा स्नानादि के तत्वश: जाते रहे । महर्षि मेंहीं का जन्मोत्सव 1945 में पहलीबार नवाबगंज सत्संग मंदिर में ही मनी थी।
महर्षि मेंहीं की जयंती बुद्ध की जयंती से एक दिन पूर्व यानी वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को है। बिहार के मधेपुरा जिले में जन्म, पूर्णिया जिला स्कूल में पढ़ाई, कटिहार जिला (नवाबगंज, मनिहारी) कर्मभूमि, कुप्पाघाट (भागलपुर) में ज्ञान-प्राप्ति वाले संत महर्षि मेंहीं को महात्मा बुद्ध के अवतार माने जाते हैं । सौ साल पाकर महर्षि मेंहीं 1986 को ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को महापरिनिर्वाण पाये।

बीसवीं सदी के बुद्ध 'महर्षि मेंहीं' की उल्लेखनीय आध्यात्मिक-पुस्तकों में 'सत्संग-योग' की चर्चा चहुँओर है, यह चार भागों में है । भगवान बुद्ध प्रणीत धर्मग्रंथ 'धम्मपद' को हर भौतिकवादी व्यक्तियों को भी पढ़ना चाहिए, जो पाली भाषा में है । विकिपीडिया के अनुसार, बुद्ध  के प्रथम गुरु आलार कलाम थे, जिनसे उन्होंने संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की । सिर्फ 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की तथा सुजाता नामक लड़की के हाथों खीर खाकर साधना तोड़े ! समीपवर्ती गाँव की सुजाता को पुत्र प्राप्ति पर वह बेटे के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची। सिद्धार्थ तब ध्यान कर रहे थे, उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा, "जिसतरह से मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।" कहते हैं, उसी रात्रि ध्यानबद्धता पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई और वे बुद्ध हो गए। गौतम बुद्ध व राजकुमार सिद्धार्थ के पिता राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए।

सनद रहे, उपर्युक्त उद्धृत दशाएँ सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सके ! कई के मुखजुबानी कहानी है, जो विकिपीडिया में भी है कि एकबार किसी दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले थे । उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था। हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था। दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकला, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया। उसकी साँस तेजी से चल रही थी। कंधे ढीले पड़ गए थे। बाँहें सूख गई थीं। पेट फूल गया था। चेहरा पीला पड़ गया था। दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था। तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली। चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे। पीछे-पीछे बहुत से लोग थे। कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया। उन्होंने सोचा, "धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है। धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है। धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है। क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य !" चौथी बार सिद्धार्थ बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया। इन सब कारकों ने ही सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया!
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●लेखक :- डॉ. सदानंद पॉल

●लेखकीय परिचय :-

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकार्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकार्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000 से अधिक रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. सबसे युवा समाचार पत्र संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में qualify. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

●संपर्क :-  s.paul.rtiactivist75@gmail.com

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रचनाकार: सिद्धार्थ का 'बुद्ध' बन जाना आकस्मिक नहीं था ! ■ डॉ. सदानंद पॉल
सिद्धार्थ का 'बुद्ध' बन जाना आकस्मिक नहीं था ! ■ डॉ. सदानंद पॉल
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