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असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण- अंतिम किश्त

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चलते तो अच्छा था ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण - असग़र वजाहत अनुक्रम यहाँ देखें अध्याय 22 रेत पर शहर ईरान पर अरबों की...


चलते तो अच्छा था

ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण

- असग़र वजाहत


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अध्याय 22

रेत पर शहर

ईरान पर अरबों की विजय (सातवीं शताब्दी) के बाद अग्निपूजकों को दूर-दराज़ के इलाक़ों में भागना पड़ा था। जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया था उन्हें देश के मुख्य भाग से खदेड़ दिया गया था। अग्निपूजक दक्षिणपूर्व के रेगिस्तान दश्ते-लूत और दश्ते-काबीर की तरफ़ चले गये थे। ये रेगिस्तानी इलाक़े तेहरान से दूर थे लेकिन बहुत अंजान और कटे हुए भी न थे। तेहरवीं शताब्दी में मार्कोपोलो ने यज्द शहर की प्रशंसा की थी। यज्द आज भी प्रशंसनीय है। शहर का अपना चरित्र है जो मुख्य धरा के ईरानी शहरों से भिन्न है। यज्द में आज भी अग्निपूजक रहते हैं और उनके मंदिर हैं। इस्लामी गणराज्य में अग्निपूजकों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है लेकिन इस इलाके में धार्मिक सहिष्णुता और सह-अस्तित्व दिखाई पड़ता है। यज्द साढे चार-पांच लाख की आबादी का ही शहर है लेकिन प्रमुख व्यापार मार्ग पर स्थिति होने तथा अपने रेशम और हथकरघों के कारण विख्यात है। मध्यकाल में ईरान से भारत आने का रास्ता भी यज्द से गुज़रता था।

रात में करीब आठ बजे मैं यज्द पहुंचा था और कुछ थोड़े से मंहगे मुसाफिरख़ाने में जगह मिली थी। पहली ही नज़र में शहर की सादगी और स्थापत्य ने मोह लिया था। सुबह शहर देखना शुरू किया। एक मंज़िला बाज़ार, बराबर बनी दुकानें, फ़ुटपाथ पर पेड़ इमारतों की सीधी स्थापत्य कला और ईरान के अन्य शहरों की तरह टाइल्स का काम नहीं बल्कि ईंटों को आगे पीछे रखकर जुड़ाई करने से बनाये सुरुचिपूर्ण 'पैटर्न' दिखाई पड़े। चौराहों पर बनी दुकानों के समान पतले बरामदे, गोल दर, पतले खंभे और दुकानों की गोलाकार बनावट बहुत अच्छी लगी। चौराहों पर बने गोलपार्कों के साथ चौराहे की गोलाकार दुकानें अच्छा तारतम्य स्थापित करती लगीं।

यज्द में की स्थापत्यकला में 'विण्ड टावर' यानी हवा मीनार का अपना अलग महत्व है। पूरे शहर को इन कलात्मक हवा मीनारों ने कुछ जादुई रंग दे डाला है। हवा मीनार घरों के ऊपर बनाये जाते हैं। इनकी ऊंची दस बारह फ़ुट होती है और चौड़ाई चार बाई चार होगी। इनमें हवा जाने के लिए रास्ता छोड़ा जाता है। तपते हुए मौसम में गर्म हवा इन मीनारों के अंदर जाती है और दीवारों के बीच घूमकर ठण्डी हो जाती है। इसका प्रभाव कमरों के तापमान पर पड़ता है। यह प्राचीन 'एयरकण्डीशनिंग' का सिस्टम यज्द में आज भी काम करता है। हवा मीनारों को कलात्मक बनाने की होड़ भी दिखाई पड़ती है लेकिन निश्चित रूप से इनकी उपयोगिता ही इनका महत्व है।

मुख्य सड़क से निकलने वाली गलियां इतनी सुंदर हैं कि उनमें जाने से अपने आपको रोक पाना असंभव-सा है। सीधी, साफ़ गलियां और मिट्टी के साथ सुथरे मकान अपने प्राकृतिक रंग-रूप के कारण आकर्षित करते हैं। इसके अलावा मिट्टी के घरों का स्थापत्य हमारे यहां जैसा ही है। फ़र्क इतना है कि पक्की ईंटों और मिट्टी को ये लोग मिला देते हैं। छतों का आकार भी अलग होता है। सादगी में सुंदरता इनका रहस्य है।

घूमता-घामता, शहर को देखता यज्द की जामा मस्जिद तक पहुंच गया, पुराने शहर की यह सबसे बड़ी इमारत है और अन्य मस्जिदों से बिल्कुल नहीं तो काफ़ी अलग है। ऊंचे मुख्य द्वार के ऊपर पतली और ऊंची-ऊंची दो मीनारें हैं। मुख्य द्वार के दाहिनी बायें उसी प्रकार के छोटे द्वार हैं और मीनारें भी छोटी हैं। बारहवीं शताब्दी में बनी यह मस्जिद आज भी ईरान की श्रेष्ठ इमारतों में गिनी जाती है।

यज्द अग्निपूजक या जोराशट्रियन धर्म का भी केन्द्र है। ईसा से साढ़े पांच सौ साल पहले अफ़गानिस्तान के मज़ार शरीफ़ इलाके में जोराशहर या जारतोश्त का जन्म हुआ था जो इस धर्म के प्रवर्तक माने जाते हैं। ईरान में इस्लाम आने से पहले यही धर्म रायज था। हम कह सकते हैं कि आज भी ईरान के समाज पर इस धर्म का पर्याप्त प्रभाव है। आमतौर जाने-माने मुस्लिम विरोधी लेखक इस बात पर बल देते हैं कि मुसलमान या इस्लाम अपने पूर्ववर्ती धर्मों से पूरा रिश्ता नाता तोड़ लेता है। ईरान के संबंध में ऐसा नहीं है। ईरान का सबसे बड़ा त्योहार नवरोज़ या नवरुज़ इस्लामी नहीं बल्कि जोराशट्रियन त्योहार है। मैं ईरान में कई बुद्धिजीवियों से मिला जो इस्लामपूर्व गाथाओं पर काम करते हैं। कई प्रसिद्ध नाटककार इस्लामपूर्व कथाओं अपने नाटकों का आधार बनाते हैं। अभी हाल में ही ईरान के एक लेखक का मेरे पास ई-मेल आया था जिसमें बक़रीद के त्योहार पर शुभकामनाएं देने के साथ किसी जोराशाट्रियन त्योहार का उल्लेख करते हुए उस पर बधाई दी गई थी। इस तरह यह धर्म आज भी ईरान की एक धड़कन बना हुआ है।

अदृश्य एक ईश्वरवाद का विश्वास करने वाले इस धर्म के ग्रंथ 'अवेस्ता' में 'द्वंद्वात्मकता'_ सत्य और असत्य की अनवरत संघर्ष को रेखांकित किया गया है। यह धर्म मानता है कि सद्बुद्धि और कुबुद्धि, दिन और रात, जीवन और मृत्यु का आधार हैं। यह परस्पर विरोधी बुद्धि के स्वरूप सबसे बड़े देवता असुर यज्द में हैं और यही हर जीवित प्राणी में भी हैं। जोराशट्रियन तत्व की शुद्धता में भी विश्वास करते हैं। यही कारण है कि अपने मुर्दों द्वारा पृथ्वी, जल और वायुमण्डल को दूषित नहीं करते बल्कि वे मुर्दों को किसी खुली सुनसान जगह रख देते हैं जिसे 'टावर ऑफ़ साइलेन्स' कहा जाता है। वहां गिद्ध मुर्दों को खा लेते हैं और किसी तरह की अशुद्धता नहीं होती। मैं इस धर्म के बारे में अधिक नहीं जानता पर एक जानकारी देना रोचक है। ज़ोराशट्रियन भी जनेऊ धारण करते हैं। यह जानकारी मुझे ईरान में नहीं बल्कि दिल्ली में मिली थी जब एक पारसी मित्र ने अपना जनेऊ दिखाया था।

यज्द का 'आतिशकदा' मतलब अग्निमंदिर संसार के प्रसिद्ध मंदिरों में जिसके दर्शन करने पूरी दुनिया से पारसी जाते हैं। यहां जो आग जल रही है उसका इतिहास भी रोचक है। कहा जाता है कि यह अग्नि 470 ई. से जल रही है। इसे मुख्य हाल की खिड़कियों से जलता हुआ देखा जा सकता है। यह विश्वास है कि यह अग्नि अपने मूल स्थान से 1174 ई. में अरदकान गयी थी और उसके बाद 1474 ई. में यह यज्द लाई गयी थी। इस तरह इसका इतिहास बहुत प्राचीन है। शुद्धता पर विश्वास करने वाला धर्म अग्नि को शुद्धिकरण का एक सर्वोत्तम साधन मानता है और इसकी पूजा करता है।

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फिर धर्म और कविता की ओर

यज्द से मशहद हज़ार किलोमीटर होगा। मैं शाम चार बजे के करीब यज्द से चला था और अगले दिन सुबह मशहद पहुंचा था। अग्निपूजकों के शहर से इस्लामी शहर आ गया था। मशहद में आठवें इमाम हज़रत रज़ा का मकबरा है। खलीफ़ा मामून ने 203 हिजरी सन में ज़हर देकर हज़रत रज़ा की हत्या करा दी थी। उनके यहां दफन किए जाने के कारण यह शहर सनाबाद से मशहद (शहादत की जगह) कहा जाने लगा था। आज यह पूरी दुनिया के शिआ मुसलमानों का बहुत पवित्रा तीर्थ स्थान है।

होटल से मैंने प्रो. रजमी को फ़ोन किया जो मशहद यूनीवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं। अगले दिन वे मुझसे आये। साथ में उनका जवान बेटा भी था जो कम्प्यूटर इंजीनियरिंग कर रहा है। उसके हाथ में तस्बीह (माला) थी जिस पर वह लगातार दुआएं पढ़ रहा था। मुझे यह देखकर कुछ अजीब-सा लगा। धर्म के प्रति इतना लगाव तो बुढ़ापे में पैदा होता है।

बातचीत के दौरान प्रो. रज़मी ने पूछा कि मैं उनकी क्या मदद चाहता हूं। मैंने बताया कि यहां मुझे दो चीजें देखनी हैं, पहले फिरदौसी का मक़बरा देखना चाहता हूं जो तूस में है, और दूसरे ख़ाफ़ जाना चाहता हूं। उन्होंने वायदा किया कि मेरी मदद करेंगे। होटल का कमरा देखकर वे बोले कि यह अच्छा कमरा नहीं है। अगर मैं चाहूं तो किसी ऐसे होटल में कमरा मिल सकता है जहां टी.वी. वग़ैरा भी हो। मैंने मना किया और कहा कि मेरे बजट के हिसाब से यह कमरा बहुत ठीक है।

दस पन्द्रह मिनट की औपचारिक बातचीत के बाद वे मुझे अपने साथ इमाम रज़ा के रौजे क़ी जियारत कराने ले गये। लेकिन हम लोग अंदर नहीं गये क्योंकि उनके पास समय कम था। बाहर से देखने के बाद मेरी वही प्रतिक्रिया थी जो फ़ुम में मासूमा का रौज़ा देख कर हुई थी। बहुत शानदार, भव्य, प्रभावशाली, सम्पन्न और चमकता हुआ। प्रो. रजमी के चले जाने के बाद मैं वैसे ही सड़कों पर आवारगी के लिए निकल पड़ा। बहुत सम्पन्न शहर लगा। बड़ी-बड़ी दुकानें, सोना, हीरे जवाहरात वग़ैरा की बेहिसाब जगमगाती दुकानें, आधुनिक से आधुनिक उपकरण बिकते दिखाई पड़े। महंगा, कीमती और नये फैशन के सामन से दुकानें पटी पड़ी थी। मशहद शहर में मोबाइल फ़ोन की जितनी दुकानें हैं उतनी शायद मैंने कहीं नहीं देखी। कितने लोगों को इस शहर में मोबाइल फ़ोन चाहिए?

इमाम रज़ा के रौज़े के दाहिनी तरफ़ कुछ खाने-पीने के होटल नज़र आये। वहां जाकर कबाब खाये। शायद पूरे ईरान में एक से कबाब बनते हैं। मसालों में फ़र्क नहीं है जबकि हमारे यहां हर तीस सौ किलोमीटर पर कबाबों में फ़र्क आ जाता है। दिल्ली के कबाब और लखनऊ के कबाब तो अलग हैं ही, संभल और रामपुर के कबाबों में भी फ़र्क़ देखा जा सकता है।

कबाब और रोटी खाने के बाद मैं उस इलाके में टहलने लगा। दिल्ली में बस्ती निजामुद्दीन जैसा लगा, पर उतना गंदा नहीं है। हां ये ज़रूर लगा कि कुछ कम माली हैसियत के लोगों का इलाका है। तीन-चार किलोमीटर का चक्कर लगाकर होटल आ गया।

मशहद के बस अड्डे पर भी मैंने टैक्सी ड्राइवर से कहा था कि मुझे शहर के केन्द्र में स्थित किसी मध्यम स्तर के मेहमान पिज़ीर (होटल) में ले चलो। इन टैक्सी वालों से आप जो चाहे कह लें, करते वहीं है जो इनका दिल चाहता है। टैक्सी वाला इरफ़ाने नौ- मेहमान पिज़ीर ले आया। यहां मुझे तहख़ाने का एक कमरा मिला जिसके साथ अच्छा बाथरूम और किचिन भी है। ये मेरे लिए 'फ़ाइव स्टार लक्ज़री' है। सोचा है कि यही कमरे पर चाय बनाने का इंतिज़ाम करूंगा। इस होटल में एक नयी बात यह है कि मैनेजर एक महिला है जो एक लड़की के साथ मिलकर होटल का इंतिज़ाम देखती है। दोनों जाहिर है 'हिजाब' में रहती हैं। एक और आदमी है जो मोटे काम करता है। इस महिला को मैं अपनी पुस्तिका भेंट कर चुका हूं और उसका रवैया हमदर्दाना है।

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कवि का कर्ज़ा

मशहद से कोई 30-35 किलोमीटर तूस नाम का पुराना गांव है जो कभी बड़ा केन्द्र रहा होगा। यहां फ़ारसी के विश्व प्रसिद्ध कवि फिरदौसी (940-1020 ई.) का मक़बरा है। प्रो. रज़मी एक दिन मुझे लेकर वहां गये। ईरानी अपने कवियों का सम्मान करते हैं। हमारे यहां जैसी स्थिति नहीं है।

फिरदोसी का पूरा नाम हकीम अबुल कासिम फिरदौसी था। ये तूस में ही पैदा हुए थे। उनका महाकाव्य 'शाहनामा' है जिसे लिखने में उन्होंने पूरी उम्र लगा दी थी। 'शाहनामा' खुरासान के शहज़ादे समानीद के लिए लिखा गया था। यह वह ज़माना था जब सातवीं शताब्दी में अरबों की ईरान पर विजय के बाद फ़ारसी भाषा और संस्कृति पर अरब प्रभुत्व दिखाई पड़ने लगा था। फिरदौसी के जीवनकाल में ही उनके संरक्षक शहजादे समानीद को सुल्तान महमूद गज़नबी ने हरा दिया था और खुरासान का शासक बन गया था। महमूद गज़नबी और फिरदौसी को लेकर कुछ रोचक कहानियां हैं जिनमें पता नहीं इतिहास कितना है और कल्पना कितनी है।

कहा जाता है कि महमूद गज़नबी ने फिरदौसी को यह वचन दिया था कि वह 'शाहनामा' के हर शब्द के लिए एक दीनार देगा। वर्षों की मेहनत के बाद जब 'शाहनामा' तैयार हो गया और फिरदौसी उसे लेकर महमूद गज़नबी के दरबार में गया तो सम्राट ने उसे प्रत्येक शब्द के लिए एक दीनार नहीं बल्कि एक दिरहम का भुगतान करा दिया। कहा जाता है इस पर नाराज होकर फिरदौसी लौट गया और उसने एक दिरहम भी नहीं लिया। यह वायदा ख़िलाफ़ी कुछ ऐसी थी जैसे किसी कवि के प्रति शब्द एक रुपये देने का वचन देकर प्रति शब्द एक पैसा दिया जाये। फिरदौसी ने गुस्से में आकर महमूद गज़नबी के खिलाफ़ कुछ पंक्तियां लिखी। वे पंक्तियां इतनी प्रभावशाली थी कि पूरे साम्राज्य में फैल गयीं। कुछ साल बाद महमूद गज़नवी से उसके विश्वासपात्र मंत्रियों ने निवेदन किया कि फिरदौसी को उसी दर पर भुगतान कर दिया जाये जो तय की गयी थी। सम्राट के कारण पूछने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि हम लोग साम्राज्य के जिस कोने में जाते हैं हमें वे पंक्तियां सुनने को मिलती हैं जो फिरदौसी ने आपके विरुद्ध लिखी हैं और हमारा सिर्फ शर्म से झुक जाता है। उसे निर्धारित दर पर पैसा दे दिया जायेगा तो हमें बड़ा नैतिक बल मिलेगा।' सम्राट ने आदेश दे दिया। दीनारों से भरी गाड़ी जब फिरदौसी के घर पहुंची तो घर के अंदर से फिरदौसी का जनाज़ा निकल रहा था। पूरी उम्र गरीबी, तंगी और मुफ़लिसी में काटने के बाद फिरदौसी मर चुका था। कहते हैं कि फिरदौसी की एकमात्र संतान उसकी लड़की ने भी यह धान लेने से इंकार कर दिया था। इस तरह सम्राट कवि का कर्जदार रहा और आज भी है। शायद यही वजह है कि आज फिरदौसी का शाहनामा जितना प्रसिद्ध है उतनी ही या उससे ज्यादा प्रसिद्ध वे पंक्तियां है जो फिरदौसी ने महमूद गज़नबी की आलोचना करते हुए लिखी थीं।

फिरदौसी का 'शाहनामा' दरअसल ईरान का इतिहास ही नहीं ईरानी अस्मिता की पहचान है। उसमें प्राचीन ईरान की उपलब्धियों का बखान है। सम्राटों का इतिहास है। प्राचीन फ़ारसी ग्रंथों को नया रूप देकर उनको शामिल किया गया है। मिथक और इतिहास के सम्मिश्रण से एक अद्भुत प्रभाव उत्पन्न हुआ है। प्रेम, विद्रोह, वीरता, दुष्टता, मानवीयता, युद्ध, साहस के ऐसे उत्कृष्ट उदाहरण हैं जिन्होंने 'शाहनामा' को ईरानी साहित्य की अमर कृति बना दिया है। ईरानी साहित्य में 'शाहनामा' जितनी तरह से जितनी बार छपा है उतना और कोई पुस्तक नहीं छपी है। फिरदौसी ने रुस्तम और सोहराब जैसे पात्र निर्मित किए हैं जो मानव-स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं।

बताया गया कि आज जहां फिरदौसी का मक़बरा है वह वास्तव में वही स्थान नहीं है जहां उनकी कब्र थी। कई बार ज़माने के उलटने-पलटने, राजनैतिक हालात बदलने और सत्ता में आये परिवर्तनों के कारण फिरदौसी का मक़बरा इधर-उधर होता रहा या कभी-कभी अदृश्य भी हो गया था। लेकिन 'शाहनामा' और फ़ारसी अस्मिता के सबसे सशक्त हस्ताक्षर जनमानस में सुरक्षित रहे और उनके गांव में उनका मक़बरा बनाया गया।

जैसा कि ईरानियों ने अपने बड़े कवियों के साथ किया है, फिरदौसी के मक़बरे के चारों ओर सुंदर बाग है। इधर-उधर उनकी प्रतिमाएं लगी हैं। संगमरमर पर उनकी कविता के विशेष प्रसंगों को उकेरा गया है। उनके पात्र 'ऐक्शन' में चित्रित हुए हैं। उनके शेर पत्थरों पर लिखकर लगाये गये। पास ही फिरदौसी संग्रहालय है। फिरदौसी शोध संस्थान है। फिरदौसी से मुलाक़ात एक नयी ताक़त का संचार करती है।

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हुक्मे नादिरशाही

नादिरशाह (1688-1747) भारत में एक निर्दयी, अत्याचारी, लुटेरा और लोभी व्यक्ति माना जाता है। था भी वह ऐसा ही। मशहद में नादिरशाह का मक़बरा है जहां पर्यटक प्राय: जाते हैं। प्रो. रज़मी ने मुझसे पूछा था कि क्या मैं नादिरशाह का मक़बरा देखने जाऊंगा? क्योंकि बहुत से हिन्दुस्तानी नादिरशाह के मक़बरे नहीं जाते। वहां न जाने की वजह मेरी समझ में नहीं आई।

मशहद की एक मुख्य सड़क पर बने पार्क के अंदर नादिरशाह का मक़बरा है। नादिरशाह की बड़ी-सी प्रतिमा लगी है जिसमें वह घोड़े पर सवार है, हाथ में तलवार लिए है और घोड़ा अपने अगले पैर हवा में उठाये हुए है। मतलब प्रतिमा युद्धरत नादिरशाह की है। गेट पर टिकट लेकर मैं अंदर आ गया। सामने पिक्चर पोस्टकार्ड और किताबों की दुकान थी। एक किताब का नाम देखकर ठिठक गया। 'नादिरशाह-फ़ातेह देहली।' यानी नादिरशाह दिल्ली विजेता। पढ़कर अच्छा नहीं लगा क्योंकि नादिरशाह ने दिल्ली में वह नहीं किया था जो विजेता करते हैं। विजेताओं की गरिमा, धैर्य और मानवीयता भी नहीं थी नादिरशाह के अंदर। उसके बाद भी उसे विजेता कहा जा रहा है। विजेता तो बाबर को कह सकते हैं, जिसने रणक्षेत्र में अपने शत्रु इब्राहिम लोदी की लाश से कहा था कि मैं तुम्हारा सम्मान करता हूं कि तुम रणक्षेत्र में मारे गये। बाबर ने इब्राहिम लोदी की मां और उसके परिवार के साथ विजेताओं वाला व्यवहार किया था। विजेता तो सिकंदर महान को कहा जाता है जिसने अपने प्रतिद्वंद्वी पोरस के एक वाक्य से प्रसन्न होकर उसे राज्य वापस कर दिया था।

पता नहीं समय कब आयेगा जब देशों के नहीं मानवता के नायक होंगे? लंदन में हैवलॉक (1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी का जनरल) की बड़ी-सी प्रतिमा लगी है तथा उसके परिचय के साथ प्रशस्तियां लिखी गयी हैं। यह वही जनरल हैवलॉक था जिसने पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हज़ारों बेगुनाहों को फ़ांसी पर लटका दिया था। जिसने फ़तेहपुर शहर में चारों ओर से आग लगवा दी थी ताकि अंदर जो भी है सब भस्म हो जाये। इस हैवलॉक को विजेता कौन मानेगा?

नादिरशाह ने दिल्ली पर जब आक्रमण (1738-39) किया तो उससे पहले ही साम्राज्य चरमरा कर टूट चुका था। गद्दी पर मुहम्मद शाह आलम रंगीले की हुकूमत थी जिसके बारे में मसल मशहूर थी कि 'हुकूमते-शाह आलम अज़ दिल्ली ता पालम' मतलब शाह आलम का साम्राज्य दिल्ली से पालम तक है। मुगल दरबार में सरदारों के आपसी मतभेदों और रंगीले सम्राट की निष्क्रियता के कारण मुग़ल सेना 13 फ़रवरी 1739 को पानीपत के मैदान में बुरी तरह पराजित हो गयी। अवध के सूबेदार और सेनापति नवाब सआदत अली खां ने नादिरशाह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अब मुगल सम्राट अपने 'मेहमान' के 'स्वागत' की तैयार करने लगा। 9 मार्च 1739 को जामा मस्जिद दिल्ली में नादिरशाह के नाम का 'खुतबा' पढ़ा गया। वह पूरे हिन्दुस्तान का सम्राट हो गया। पर इतना काफ़ी नहीं था। नादिरशाह तो लुटेरा था। उसके जीवन की शुरुआत ही एक लुटेरे के रूप में हुई थी। लुटेरों को पद-प्रतिष्ठा से क्या मतलब? नादिरशाह ने मुगल सम्राट से बीस करोड़ रुपये की मांग की और मुहम्मद शाह रंगीले ने यही बेहतर समझा कि ख़ज़ाने की चाबियां ही नादिरशाह को थमा दें। ख़जाना खाली था। तख्ते ताऊस और कोहेनूर को अपने कब्जे में लेकर नादिरशाह ने मुग़ल सामंतों पर करोड़ों रुपये के जुर्माने लगाने शुरू कर दिये। जिसने पैसा न दिया या न दे पाया उसे न केवल बेइज्जत किया गया बल्कि पिटाई तक करायी और जेल में डाला गया। एक सामंत जुर्माने की रकम नहीं दे पाया तो नादिरशाह ने उसका कान काट लेने का आदेश दे दिया। कान कट जाने के बाद सामंत ने अपने को इतना अपमानित महसूस किया कि आत्महत्या कर ली।

एक दिन शहर में यह ख़बर उड़ी कि लाल किले में नादिरशाह की हत्या कर दी गयी है। दिल्ली की जनता भड़क उठी और ईरानी सिपाहियों पर आक्रमण और उनकी हत्याएं शुरू हो गयी। दूसरी रवायत यह है कि नादिरशाह के किसी सैनिक और दिल्ली के किसी कबूतर बेचने वाले के बीच कहा-सुनी हो गई और परिणाम स्वरूप नादिरशाह के सिपाही की हत्या कर दी गई। बहरहाल, अपने सिपाहियों की हत्या की खबर सुनकर नादिरशाह घोड़े पर बैठकर चांदनी चौक आया और कोतवाली के सामने अपनी म्यान से तलवार निकाल ली। यह कत्ले आम का आदेश था। सुबह नौ बजे से दोपहर दो बजे तक नादिरशाह नंगी तलवार लिए चांदनी चौक में खड़ा रहा और इस बीच शहर के बीस हज़ार मर्द, औरत, बच्चे, बूढ़े कत्ल कर दिए गये। तब नादिरशाह की खून की प्यास बूझी।

इतिहास बताता है कि नादिरशाह को दिल्ली शहर बहुत पसंद आया था। और वह ईरान में दिल्ली जैसा शहर बनाना चाहता था, इसलिए उसने आदेश दिया था कि राजमिस्त्री, बढ़ई, लोहार और इमारतें बनाने वाले दूसरे कारीगरों को गिरफ्तार कर लिया जाये। सोचने की बात यह है कि नादिरशाह के अपने देश ईरान में एक से एक शानदार शहर जैसे इस्फ़हान, शीराज़ और तबरेज़ थे तब वह दिल्ली जैसा शहर ईरान में क्यों बनाना चाहता था? क्या दिल्ली ईरान के उन शहरों से ज्यादा सुंदर और अच्छा था? उन दिनों की दिल्ली के बारे में मीर तकी 'मीर' का एक शेर है_

कूचे न थे देहली के अवराक़े मुसव्विर थे

जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई।

दिल्ली के गली कूचे, गली कूचे नहीं थे बल्कि कलाकार के चित्र थे। हर आदमी तस्वीर जैसा सुंदर था। इस शेर को पढ़ कर पहले मेरी यह राय बनी थी कि सबको अपना शहर, गांव आदर्श लगता है। 'मीर' साहब को दिल्ली बहुत पसंद थी तो इसके भावनात्मक कारण रहे होंगे। पर जब यह पढ़ा कि नादिरशाह ईरान में दिल्ली जैसा शहर बनाना चाहता था तो लगा दिल्ली क्या रही होगी, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है।

हिन्दुस्तान का बादशाह बनने और अपने नाम का सिक्का चलवाने के बाद नादिरशाह लौट गया। वह अपने साथ तख्ते ताऊस और कोहेनूर के साथ-साथ पन्द्रह करोड़ रुपये नकद और पन्द्रह करोड़ रुपए का सोना और चांदी अपने साथ ले गया था। इसके अलावा दीगर कीमती सामान भी उसकी लूट में शामिल था। नादिरशाह के खजांची के अनुसार कुल लूट का अनुमान सत्तर करोड़ के आसपास आंका गया था। अपने पीछे वह उजाड़ दिल्ली, हज़ारों लोगों के मुर्दा शव, अपमानित परिवार और बेसहारा लोग, पराजित और खण्डित हिन्दुस्तान छोड़ गया था। और दे गया था एक नयी काव्य शैली 'शहरे आशोब' जिसमें शहर की तबाही, लोगों की बर्बादी का मातम किया जाता था। 'मीर' की दिल्ली दिल्ली न थी, सबके रोज़गार की सूरत बिगड़ गयी थी। सिपाही ढाल और तलवार बेच रहे थे और बनिये अपनी किस्मत को सो रहे थे। अंतत: अकाल ने आ दबोचा और 'मीर' ने लिखा_

ख़ूब रु अब नहीं है गन्दुम गूं

'मीर' हिन्दोस्तां में काल पड़ा।

सुंदर चेहरे वाले अब गेंहुए रंग के नहीं रहे क्योंकि हिन्दोस्तान में अकाल पड़ गया है।

इस पूरी पृष्ठभूमि के साथ मैं नादिरशाह के कब्र को देख रहा था। हममें से बहुत कम जानते हैं कि हिन्दुस्तान लूटने के बाद नादिरशाह जब ईरान पहुंचा तो उसके साथ क्या हुआ? प्रारंभिक में विजय का उल्लास था। नादिरशाह ने लूट की खुशी में अपनी जनता से तीन साल तक कोई टैक्स नहीं लिया ताकि साधारण जनता भी उसकी लूट में भागीदार बन सके। लेकिन इसके बाद जो हुआ वही हर खून के प्यासे और इंसानियत के दुश्मन के साथ होता है।

नादिरशाह को समझने के लिए उसके अतीत की कुछ झलकियां भी ज़रूरी है। नादिरशाह ने अपना 'कैरियर' एक डाकू और लुटेरे के रूप में शुरू किया था। यह भी बड़ा रोचक तथ्य है कि नादिरशाह ही नहीं बल्कि अन्य सामंतों और सम्राटों का इतिहास भी लुटेरों के रूप में सामने आता है। लूट का धन उन्हें सत्ता के निकट लाता है क्योंकि सत्ता से बड़ा डाकू कौन हो सकता है? तो धीरे-धीरे छोटे डाकू बड़े डाकू के साथ मिल जाते हैं, जहां लूट के साथ-साथ सम्मान भी मिलता है। नादिरशाह ने 1726 में एक डाकू सरदार के तौर पर पांच हज़ार की सेना जमा कर ली थी। तुर्कों के खिलाफ़ नादिरशाह ने स्वयं तुर्क होते हुए ईरान के बादशाह का साथ दिया था ओर इस तरह राज्य सत्ता तक पहुंचा था और उसे हड़प कर लिया था।

दिल्ली से लौटकर जब नादिरशाह ईरान गया तो उसके पुत्र रीज़ा कुली को यह झूठा समाचार मिला कि नादिरशाह की मृत्यु हो गयी है। उसने ईरान की गद्दी के हक़दार पुराने सफ़वी वंश के शासक तहमास्य को फ़ांसी दे दी ताकि राज्य सत्ता पर उसकी पकड़ मज़बूत हो जाये। लेकिन दरअसल नादिरशाह की मृत्यु नहीं हुई थी। कुछ लोगों ने यह भी प्रचार कराया कि नादिरशाह की हत्या के प्रयास उसका बेटा कर रहा है। इस पर नाराज़ होकर नादिरशाह ने अपने पुत्र रीज़ा कुली को अंध कर देने का आदेश दे दिया। नादिरशाह के बेटे ने अंध किये जाने से पहले अपने पिता से कहा था_ 'तुम मुझे नहीं ईरान को अंध कर रहे हो।' बाद में यह पता चला कि जिस आरोप में नादिरशाह ने अपने बेटा रीज़ा कुली को अंध किया था, वह झूठा और ग़लत था। नादिरशाह अपने किए पर बहुत पछताया ही नहीं बल्कि उसे बेहद गुस्सा आया। इस गुस्से की आग में किसी को तो जलना था। नादिरशाह ने आदेश दिया कि उन सरदारों के सिर उड़ा दिए जायें जिन्होंने उसके बेटे रीज़ा कुली की आंखें फ़ोड़ी जाते देखा है। नादिरशाह ने उन सरदारों की ग़लती यह ठहराई कि उनमें से किसी ने ये क्यों नहीं कहा कि रीज़ा कुली के बजाये उसकी आंखें फ़ोड़ दी जायें।

अपने दरबार के सबसे प्रतिष्ठित सरदारों की हत्या कराने के बाद नादिरशाह का पागलपन और प्रतिशोध बढ़ने लगा। उसे हर आदमी दुश्मन दिखाई पड़ने लगा और उसने बड़े पैमाने पर लोगों की हत्याएं करायीं। अव्यवस्था, असंतोष, प्रतिहिंसा और अविश्वास की आंधी में साम्राज्य डगमगाने लगा। अंतत: सन् 1747 में नादिरशाह के अंगरक्षकों के दस्ते के प्रमुख ने नादिरशाह की हत्या कर दी।

कहते हैं संसार का सबसे बड़ा हीरा कोहेनूर किसी को रास नहीं आता, किसी का फ़लता नहीं। कोहेनूर का स्वामी और 'तख्ते ताऊस' का सम्राट नादिरशाह आठ साल के अंदर-अंदर 61 वर्ष की आयु में अपने सबसे बड़े विश्वासपात्र द्वारा क़त्ल कर दिया। हिंसा, हिंसा को बढ़ाती है।

मैं मक़बरा देखकर बाहर आया, यहीं संग्रहालय भी है। चाय खाना भी है। मैं चाय पीने लगा और सोचने लगा कि आज भी नादिरशाहों का यही अंजाम होता है। नासिर काज़मी का शेर याद आता है_

है यही ऐने वफ़ा दिल न किसी का दुखा

अपने भले के लिए सबका भला चाहिए।

26

ख़ाफ़ में तोते

कोई दो महीने पहले तेहरान के मेहराबाद हवाई अड्डे पर तोतों का झुण्ड उतरा था और फिर अदृश्य हो गया था। एयरपोर्ट के सुरक्षा कर्मियों ने चैन की सांस ली थी कि तोतों के कारण किसी उड़ान में कोई खलल नहीं पड़ने पाया।

अदृश्य हो गये तोतों का झुण्ड नज़र तो नहीं आता लेकिन ईरान में उड़ रहा है किसी अमरूद के बाग़ की तलाश में। तोतों को ललगुदिया अमरुद पसंद हैं। तोतों को विशाल तालाब के ऊपर उड़ान भरना अच्छा लगता है। तोतों को जंगली जलेबी कुतरना और तपती दो पहरों में नीम के घने पेड़ों की छाया में बैठना अच्छा लगता है. . .तोते खोज रहे हैं यह सब ईरान में. . .

मशहद में प्रोफ़ेसर रज़मी से जब मैंने कहा कि मैं ख़ाफ़ जाना चाहता हूं तो वे चौंक गये क्योंकि ख़ाफ़ मशहद से कोई साढ़े तीन सौ किलोमीटर एक कस्बा है जहां ऐसा कुछ नहीं कि वहां कोई पर्यटन जाये।

_ आप ख़ाफ़ क्यों जाना चाहते हैं? उन्होंने पूछा था।

_ कहा जाता है हमारे पूर्वज सोलहवीं शताब्दी में हुमायूं की सेना में ईरान से हिन्दुस्तान गये थे और वे ख़ाफ़ के रहने वाले थे। 'मैंने डरते और शरमाते हुए कहा क्योंकि अपनी सूचनाओं पर मुझे स्वयं पक्का विश्वास नहीं था। प्रो. रज़मी मुझे घूरने लगे और बोले_ तब आप शिआ कैसे हुए आप तो सुन्नी हुए।' वे विश्वास के साथ बोले।

_ क्यों?

_ इसलिए कि ईरान के उस इलाक़े में शिआ आबादी नहीं है। करीब-करीब सौ फ़ीसदी सुन्नी हैं।

_ आप ठीक कहते हैं लेकिन मैं ख़ाफ़ जाना चाहता हूं।

_ देखिए वह खासा दूर है. . .वहां आप अकेले नहीं जा सकते . . .और फिर वहां देखने के लिए. . .। मैं उन्हें कैसे बताता कि मैं नहीं तोतों का झुण्ड है जो ख़ाफ़ जाना चाहता है।

_ लोग तो वहां जाते ही होंगे? मैंने पूछा।

_ हां, हां क्यों नहीं।

_ तो मैं भी चला जाऊंगा. . .। वे समझ गए कि मैं जाने के लिए कमर बांधे हुए हूं।

_ बस अगर मुझे कोई द्विभाषिया मिल जाये तो मज़ा आ जाये। क्योंकि ख़ाफ़ में मैं जो कुछ देखना, कहना, सुनना चाहता हूं वह द्विभाषिए के बिना संभव नहीं है।

_ ठीक है। मैं आपको कल बताता हूं। वे बोले।

तोतों के लिए कल नहीं होती। तोते तो तोते होते हैं। उन्हें बस आज का पता होता है। पूरी रात मैं सोचता रहा कि अगर प्रो. रज़मी ने मना कर दिया तो मैं क्या करूंगा। कैसे पहुंचूंगा ख़ाफ़।

अगले दिन प्रो. रज़मी को फ़ोन किया तो उन्होंने बताया कि वे मेरे साथ नहीं जा सकते। चूंकि छुट्टियां हैं इसलिए उनका काई छात्रा भी मेरे साथ नहीं जा सकता। इसलिए उन्होंने मेरे लिए एक प्लान बनाया है। वह यह है कि मैं कल सुबह मशहद से तुरबते हैदरिया जाने की बस पकड़ लूं। तुरबते हैदरिया एक कस्बा है जो मशहद और ख़ाफ़ के बीच में है। वहां मैं एक सरकारी कार्यशाला 'दबीरे खान-ए-शूरा' चला जाऊँ जहां मुझे हाजी आग़ी मुहम्मदी मिलेंगे जो मेरे ख़ाफ़ जाने का बन्दोबस्त कर देंगे।

सब कुछ नोट कर लेने के बाद भी दिल में सैकड़ों शंकाएं पैदा होती चली गयीं। पहली बात तो यह कि तुरबते हैदरिया की बस मिल जाये। दूसरी यह कि वहीं उतरूं। ऐसा न हो कि कहीं आगे चला जाऊँ। तीसरा यह कि तुरबते हैदरिया में उस सरकारी दफ्तर पहुंच जाऊँ जहां जाना है। तीसरे यह कि प्रो. रज़मी के दोस्त वहां मिल जायें या वहां हों। अगर इसमें से कोई कड़ी भी टूटती है तो मैं ख़ाफ़ नहीं पहुंच पाऊंगा। भाषा न जानने तथा बीहड़ इलाका होने की वजह से कुछ भी हो सकता था। मैंने मानसिक तौर पर अपने आपको तैयार कर लिया। कुछ न हुआ तो लौट आयेंगे। बक़ौल फैज़ अहमद 'फैज'_ ... लौट जाये तेरे सरबुलन्द क्या करते।

सुबह ठीक समय पर मशहद के बस अड्डे पहुंच गया और वहां से तुरबते हैदरिया जाने वाली बस भी मिल गयी। बस शायद भर जाने क इंतिज़ार में आध घण्टा खड़ी रही। बस की सवारियों पर नज़र डाली तो सब गांव के से लोग लगे। मतलब अंग्रेजी का तो सवाल ही नहीं उठता। फ़ारसी में दो चार बातें हो जायें तो ही बहुत है।

मशहद से बाहर निकलते ही बस बिल्कुल वीरान, सुनसान, वृक्षविहीन, सूखे पहाड़ों, जली हुई घास के मैदानों में आ गयी। याद आया कि याद अगर दिल्ली से लखनऊ आओ तो रास्ता कितना हरा दिखाई देता है। यह भी सोचा कि यार यहां के रहने वाले सोलहवीं शताब्दी में पंजाब गये होंगे तो हरियाली देखकर पागल हो गये होंगे। हिन्दुस्तान जैसा कि रजनी पामदत्ता ने लिखा है एक सम्पन्न देश है जहां गरीब रहते हैं। और ये गरीब देश है जहां सम्पन्न लोग रहते हैं।' बस तेजी से आगे बढ़ती रही। सह-यात्रियों ने नाश्ता शुरू कर दिया था। तन्दूर की पकी बड़ी सी रोटी के एक टुकड़े पर पनीर के साथ नाश्ता 'शेयर' करने लगे। मैं फिर बाहर देखने लगा। निर्जन पहाड़ियों का रंग कुछ बदलता सा दिखाई पड़ा। मिट्टी का रंग बदल रहा था। इतना जरूर है कि हरियाली नाम को न थी। एक आध इलाकों में बस रुकी तो यह शायद दूर-दराज़ के गांवों से आने वाली सड़कों के चौराहे थे। बस अड्डा, पेट्रोल पम्प, कुछ दुकानें और बस कुछ नहीं। रास्ते में कुछ पुराने गांव भी पड़े जो बहुत आकर्षक लगे क्योंकि वे टीलों पर बसे थे और घर कच्ची मिट्टी के थे।

मिट्टी का रंग बदल कर गहरा मटमैला हो गया। फिर ज्यादा काला होने लगा। उसमें कुछ हरापन भी आने लगा। नाश्ता-वाश्ता करने के बाद स्थानीय लोग ऊंघने लगे थे।

कोई ढाई तीन घण्टे के बाद बस किसी बड़े कस्बे में दाख़िल होने लगी। चूंकि मैं कई बार सहयात्री से घबरा-घबराकर 'तुरबते हैदरिया' पूछ चुका था। इसलिए उसने इशारा किया कि तुर्बते हैदरिया आ गया है। मैं उतरा। मेरे हाथ में वह पर्चा था जहां मुझे जाना था। बस के ड्राइवर और कण्डक्टर ने मुझे पास खड़ी एक टैक्सी में बैठ जाने को कहा। मैंने टैक्सी ड्राइवर को पर्चा दिखाया और उसने पीछे बैठ जाने का इशारा किया। अब पता चला कि बस ने तुरबते हैदरिया से कुछ दूर मुख्य 'हाइवे' पर उतारा था।

तुरबते हैदरिया बिल्कुल पक्का खुरासानी कस्बा लगा। लेकिन यह सोचकर हैरत हुई कि यहां भी व्यवस्था थी। सफ़ाई थीं। दोतरफ़ा सड़कें थीं और भुखमरी नहीं थी। लोग सम्पन्न नहीं दिखाई दे रहे थे पर चेहरों पर वैसी लाचारी भी नहीं थी जो हम प्राय: देखते रहते हैं। टैक्सी में और लोग भी बैठे थे। सब को अलग-अलग उतारती टैक्सी मुझे लेकर आगे बढ़ती रही। फिर एक इमारत के सामने टैक्सी रुकी और ड्राइवर ने इशारा किया कि यही तुम्हारी मंज़िल है। मैं उतरा। जाहिर है टैक्सी वाले ने कुछ ज्यादा ही पैसे लिए होंगे। पर इतना होश किसे था। मैं तो आगे की सोच रहा था। इमारत में मैं जा ही रहा था कि सामने से आते एक युवक ने अंग्रेजी में मेरा नाम लेकर पूछा कि क्या मैं वही हूं।

चलो यहां तक तो बात बनी।

इन सज्जन ने अपना परिचय महमूद अग़ाली के रूप में कराया और बताया उन्हें सिटी काउंसिल ने मेरे इंटरप्रेटर के तौर पर बुलाया है। मैं यह रहस्य न समझ सका पर चुप रहा। मेरे बोलने से कुछ बिगड़ जाता तो बड़ा नुकसान होता।

महमूद ने बताया कि जिनसे मुझे मिलना है यानी हाजी आग़ई मुहम्मदी तो कहीं बाहर गए हुए हैं, पर उनके सहयोगी अमीन महमूदी मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस कार्यालय को अंदर से देखने का मौका मिला तो समझ में आया कि यह अपने यहां की तहसील जैसा कोई ऑफ़िस है जिस ये सिटी काउंसिल कहते हैं। बहरहाल अमीन महमूदी अंग्रेज़ी नहीं बोलते। द्विभाषिए के माध्यम से बातचीत शुरू हुई। इन लोगों को केवल यह सूचना थी कि मैं आ रहा हूं और यहां से ख़ाफ़ जाना चाहता हूं। इसके अलावा और कुछ नहीं मालूम था। मैंने संक्षेप में बताया और अपनी पुस्तिका भेंट की।

ख़ाफ़ जाने के लिए एक टैक्सी का बंदोबस्त था। कछ ही देर में टैक्सी आबादी से बाहर निकल आयी। एक दक्ष गाइड की तरह महमूद मुझे इलाक़े के बारे में बताने लगे। उन्होंने विस्तार से बताया कि तुरबते हैदरिया में प्रसिद्ध सूफ़ी कवि कुतुबउद्दीन हैदर दफ्न है और इसी कारण यह कस्बा जाना जाता है। इलाके के बारे में उन्होंने कहा कि नीशाबुर भी इस क्षेत्र का विश्व प्रसिद्ध इलाक़ा है जहां उमरे खय्याम का मक़बरा है और दूसरा विश्व प्रसिद्ध कवि फिरदौसी है जिसका मज़ार तूस में है। इस तरह मध्यकाल में यह एक सांस्कृतिक 'गोल्डन ट्रेंगिल' था। यह इलाका नीशाबुर के नाम से अधिक प्रसिद्ध था और नीशाबुर ही प्रमुख शहर हुआ करता था। मुझे ध्यान आया कि फ़तेहपुर कोड़ा जहानाबाद में दफ्न हमारे एक पुरखे जैनुलआब्दीन खां के नाम के साथ नेशाबुरी भी लिखा हुआ मिलता है। ख़ैर इसका मतलब था कि मेरी दिशा सही है। महमूद ने यह भी बताया कि इस क्षेत्र में बहुत बड़े मदरसे और पुस्तकालय थे जिनके खण्डहर आज भी दिखाई पड़ते हैं। अफ़गानिस्तान और फिर हिन्दुस्तान तक जाने के एक रास्ते में होने के कारण भी इस क्षेत्र का बड़ा महत्व था।

टैक्सी सुनसान रेतीली नहीं बल्कि बंजर पहाड़ियों के बीच से गुजर रही थी। सड़क बहुत बढ़िया थी और गाड़ी की तरफ़ सौ ऊपर हो गयी थी। दूर-दूर तक कोई हरियाली नहीं नज़र आ रही थी। मुझे लगा कि इस क्षेत्र में सैकड़ों साल पहले पैदल या घोड़ों पर यात्रा करना कितना मुश्किल रहा होगा। रास्ते में हमें एक गांव दिखाई पड़ा जिसमें मिट्टी के घर थे। छतें गोल थीं लेकिन गांव बिल्कुल उजाड़ और जनविहीन नज़र आया। मैंने महमूद से कारण पूछा तो उसने बताया कि इस तरह के दूर-दराज़ के गांवों से लोग नव-विकसित आबादियों में चले गये हैं। बहुत दूर-दूर पर कहीं-कहीं कुछ हरियाली नज़र आती थी और लगता था वहां थोड़ी बहुत खेती होती होगी या पेड़ होंगे।

सड़क के किनारे ख़ाफ़ तक का फ़ासला बताने वाले बोर्ड लगे थे। मैंने महमूद से कहा कि मैं इनमें से किसी बोर्ड की तस्वीर खींचना चाहता हूं। जब ख़ाफ़ पांच किलोमीटर का बोर्ड आया तो टैक्सी रोककर मैंने बोर्ड और सड़क का चित्र खींचा।

ख़ाफ़ पास आने लगा तो महमूद ने मुझसे कहा_ आपको जिस तरह की जानकारी चाहिए वह किसी स्कूल या कालेज में ही मिल सकेगी। इसलिए कस्बा शुरू से पहले एक कालिज पड़ता है। वहां चलेंगे।

मैं सोचने लगा दरअसल मुझे क्या जानकारी चाहिए? शायद कुछ नहीं। मैं तो बस इलाका देखना चाहता था। ख़ाफ़ देखना चाहता था क्योंकि यह अनजान सा नाम साढ़े चार सौ साल तक अगर हमारे परिवार में रह गया है तो कम से कम इसे देखा तो जाये। साढ़े चार सौ साल पुराने किसी सूत्र की आशा करना तो मूर्खता ही होगी।

ख़ाफ़ से पहले 'पयामे नौ यूनीवर्सिटी' के एक कोचिंग सेंटर पर हम उतर पड़े। यह ईरान की पहली प्राइवेट यूनीवर्सिटी है जिसने दूरस्थ माध्यम से शिक्षा को फैलाया है। सेंटर के प्राचार्य नूर अहमद बुलन्दख़ार से मिले।

महमूद ने उन्हें बताया कि आज से साढ़े चार सौ साल पहले इन साहब (मेरे) पूर्वज सैयद इकरामुद्दीन ख़ाफ़ से हुमायूं की सेना के साथ भारत गये थे और ये अपने उन्हीं सूत्रों की तलाश करने ख़ाफ़ आये हैं।

नूर अहमद यह सुनकर मुस्कुराये और जो बोले उस पर महमूद हंसने लगे और मुझे बताया- नूर साहब कह रहे हैं आपको कुछ ज्यादा देर नहीं हुई।

ख़ैर, नूर साहब ने गंभीर होकर बताया कि इतिहास उनका विषय नहीं है। वे उन लोगों को फ़ोन कर सकते हैं जो खुरासान के इतिहास के विशेषज्ञ हैं हो सकता है उनसे कोई जानकारी मिल जाये। नूर साहब ने फ़ोन उठाया और कहीं फ़ोन किया। इस बीच फ़्रूट जूस आ गया था। हमने पिया। कुछ बातें इस सेंटर के बारे में होती रहीं। ख़ाफ़ के बारे में बताया कि निश्चित रूप से यह बहुत पुराना कस्बा है और कभी बहुत सम्पन्न हुआ करता था पर लगातार युद्धों के कारण बर्बाद होता चला गया। हम बातें कर ही रहे थे कि फ़ोन की घंटी बजी। नूर साहब ने कहा कि मेरे लिए फ़ोन है। मैं क्या बात करता? महमूद ने बात की और मुझे बताया कि यह खुरासान इतिहास के एक विशेषज्ञ का फ़ोन था। उन्होंने बताया है कि आपके पुरखे सैयद इकरामउद्दीन के बारे में खुरासान की इतिहास की पुस्तक 'तारीखे रिज़ाले शारख़े खुरासान' के दूसरे खण्ड के पृष्ठ संख्या 174-6 में इंदिराज हैं। क्या लिखा है, पूछने पर उन्होंने सामान्य जानकारियां दी जैसे कि वे पढ़े लिखे आदमी थे। शायर थे। सिपाही थे आदि आदि।

महमूद ने मुझसे कहा कि क्या मैं विशेषज्ञ से मिलना चाहता हूं। मैंने नहीं मैं सैयद इकरामउद्दीन पर शोध करने नहीं आया हूं। मुझे तो ख़ाफ़ देखने में ज्यादा दिलचस्पी है। महमूद ने कहा कि विशेषज्ञ ने यह भी बताया है कि मैं यदि अधिक जानकारी चाहता हूं तो मुझे मशहद में इब्राहिम ज़नगानेह से मिलना चाहिए जो खुरासान के इतिहास के बड़े विशेषज्ञ हैं। मशहद में मैंने उनसे मिलने की कोई कोशिश नहीं की।

हम आगे बढ़े मैं जल्दी से जल्दी मुख्य कस्बा देखन चाहता था। अब प्रोग्राम यह था कि हम ख़ाफ़ में इतिहास के एक अध्यापक के घर जायेंगे। और आशा थी कि वह हमें कुछ और जानकारियां देंगे।

गाड़ी ख़ाफ़ की मुख्य बाज़ार में आ गई। दो तरफ़ा सड़कों पर दुकानें बनी थीं। दुकानों के सामने फ़ुटपाथ थे और उन पर पाइन जैसे पेड़ लगे थे। दुकानें बहुत चमक-दमक वाली तो न थीं लेकिन कस्बे की दुकानों की तुलना में व्यवस्थित लग रही थी। सफ़ाई भी दिखाई दे रही थी। मुख्य बाज़ार वाली सड़क से जो गलियां निकल रही थीं उनके नामपट्ट भी लगे थे जो मुझे काफ़ी दिलचस्प लगे। चौराहे पर बीच में एक छोटा-सा पार्क था जहां बेंचें पड़ी थीं। हमने आगे बढ़कर एक मोड़ लिया और एक चौड़ी गली में आ गये। गली के दोनों तरफ़ मिट्टी के मकान बने थे। इनमें से बड़ी संख्या में मकान गिर चुके थे और उनकी मोटी-मोटी दीवारें, गोल छतें और धुआंई हुई छतें नज़र आती थी। गोल छतें बाहर से गुम्बद की तरह दिखाई दे रही थी।

हम स्कूल मास्टर के घर पहुंचे जो कच्चे पक्के मकान का संगम था। बिलकुल वैसा ही जैसा हमारे यहां होता है। एक आदमी निकलकर आये और बताया कि मास्टर साहब स्कूल में हैं। मैंने महमूद से कहा कि स्कूल जाने से पहले मुझे ख़ाफ़ का सबसे पुराना मोहल्ला दिखाओ। महमूद ने पूछताछ की तो पता चला कि यही सब से पुराना मोहल्ला है। इतनी देर में कुछ लोग जमा हो गये थे। सब एक अजनबी को देखकर अंदाज़े लगा रहे थे। दो चार ने महमूद से पूछा कि मैं कौन हूं तो महमूद ने वही जानकारी दी जो उन्हें पहले में दी थी। लोग मुझे हैरत से देख रहे थे। कच्चे टूटे-फूटे मकानों की तस्वीरें कौन खींच रहा है। इस तरह की गलियों में कौन भटक सकता है। गिरे हुए मकानों के अंदर क्यों कोई जाता है। धीरे-धीरे दर्शक बढ़ने लगे जो मुझे लगातार देख रहे थे और आपस में बातें कर रहे थे। यहां की फ़ारसी पर अफ़गानिस्तान की बोलियों का प्रभाव है और शायद शुद्ध फ़ारसी नहीं है।

अचानक महमूद ने मुझसे हंस कर कहा_ आप जानते हैं ये लोग आपके बारे में क्या बातें कर रहे हैं।

_ज़ाहिर है नहीं।

_ यह कह रहे हैं कि आप किसी ख़जाने की तलाश में यहां आये हैं। मुझे पहले हैरत हुई, फिर हंसी आयी और सोचा यार कहानी तो बड़ी अच्छी बनती है। फ़तेहपुर के मकान में मनों मिट्टी के नीचे से मुझे एक दस्तावेज़ मिलती है जिसमें यह दर्ज है कि साढ़े चार सौ साल पहले सैयद इकरामउद्दीन अपने पुश्तैनी महान में, जो ख़ाफ़ में है, यह ख़ज़ाना दफ़न कर आये थे। मैं पता लगाता हुआ यहां तक आया हूं। मेरे जेहन में मोहल्ले और मकान का पूरा नक्शा है। मैं वह सब देख रहा हूं। अब रात के अंधेरे में आऊंगा। सही जगह पर पहुंच कर ख़जाना निकालूंगा।

मैंने महमूद से कहा_ हां आया तो मैं खजाने की तलाश में ही हूं। यह कहकर मैंने पुराने कच्चे टूटे मकान का एक टुकड़ा उठा लिया।

महमूद ने हंस कर लोगों से कहा- इन्हें खज़ाना मिल गया। वे सब हंसने लगे।

स्कूल आ गये। कस्बे के हिसाब से ठीक-ठाक लगा। मास्टरजी से बात हुई। वे कहने लगे कि उन्हें देखना पड़ेगा। वैसे उन्हें कुछ याद नहीं है। मैंने पूछा कि यहां सैयद रहते हैं। सैयद आमतौर पर शिआ होते हैं तथा प्रो. रज़मी की बात मेरे दिमाग़ में थी कि ख़ाफ़ सुन्नियों का इलाका है और अगर आपके पूर्वज वहां के थे तो आप लोग सुन्नी हुए।

_ यहां सैयद कम हैं. . . .ज्यादातर सुन्नी हैं।

_ क्या सोलहवीं शताब्दी में यहां सैयद रहते थे?

_ हां जरूर. . .इस क्षेत्र का महत्व 13वीं शताब्दी में मुग़लों के हमलों के कारण कम हो गया था। और यहां से काफ़ी लोग खासकर सैयद दूसरे इलाके में चले गये हैं. . .पर अभी कुछ दस-बारह घर सैयदों के हैं। अगर आप चाहें तो उनमें किसी से मिल सकते हैं। एक सैयद की बाज़ार में फ़ोटोग्राफ़ी की दुकान है. . . यहां से करीब है।

हम बाज़ार आ गये। अब हमारे साथ काफ़ी लोग हो गये थे। एक पत्रकार भी आ गये थे। उन्होंने मुझसे कुछ सवाल पूछे और यह बताया कि वे स्थानीय अखबार में यह 'स्टोरी' छपवाना चाहते हैं। बहरहाल जितना हो सकता था, मैंने उन्हें बताया। बाज़ार में सैयद साहब की फ़ोटोग्राफ़ी की दुकान बंद थी। मास्टर साहब ने पूछा कि इनके घर चलें?

मैंने मना कर दिया। मैं ज्यादा से ज्यादा समय ख़ाफ़ देखना चाहता था।

हम लौटकर फिर पुरानी बस्ती में आ गये। गलियों में फ़ोटोग्राफ़ी अभियान चालू हो गया। कुछ पुराने और बड़े घरों के कोनों पर मिट्टी की सुंदर मीनारें भी दिखाई पड़ी। मैंने इस्फ़हान से शीराज़ जाते हुए रास्ते में मिट्टी का एक किला भी देखा था। वह अद्भुत किला था। सब कुछ मिट्टी का था। चारों तरफ़ मीनारें, फ़ाटक का द्वार और परकोटे अंदर की पूरी इमारत।

ख़ाफ़ में मिट्टी के घर देखते हुए अपने ज़िले के कस्बों और गांवों के मिट्टी के घर याद आ गये। बिल्कुल उसी तरह के मेहराब वाले दर थे। लकड़ी के वैसे ही दरवाजे ज़िनमें मेहराब वाले दर थे। लड़की के वैसे ही दरवाज़े जिनमें ऊपर की तरफ़ जंजीर लगती है और घण्टी का काम भी देती है। ललौली, हसुआ, हथगाम, बिलन्दा और कोड़ा की याद आ गयी। यह भी याद आया कि हमारा घर मिट्टी का हुआ करता था। बरसात शुरू होने से पहले मिट्टी की छतों की मरम्मत का काम बड़े पैमाने पर शुरू हो जाता था और महीनों खट-खट हुआ करती थी। हमारे दादा हमेशा कच्ची कोठरी और खपरैल में रहे। वे पकी ईंट से बनी इमारत के सख्त ख़िलाफ़ थे। उनका कहना था कि मिट्टी के घर हर मौसम में आरामदेह होते हैं। जाड़ों में गरम और गर्मियों में ठण्डे रहते हैं।

महमूद ने मुझसे कहा कि अब हम कुछ आगे जाकर प्राचीन लायब्रेरी के खण्डहर और पुरानी मस्जिद भी देख सकते हैं। गाड़ी में बैठ कर हम आगे बढ़े। गांव के बाहर लेकिन दूर नहीं, सड़क की दूसरी तरफ़ महमूद ने मिट्टी का एक ऊंचा-सा टीला दिखाया, कहा यही वह लायब्रेरी थी।

सड़कें के इस तरफ़ एक पुरानी मस्जिद थी। महमूद ने बताया कि यह करीब छ: सौ साल पुरानी मस्जिद है और अगर आपके पूर्वज यहां रहते होंगे तो यही नमाज़ पढ़ने आते होंगे। मस्जिद की मरम्मत चल रही थी। उसका 'टायल्स' का काम मुझे नयी मस्जिदों के काम से अलग लगा। पता नहीं यह क्या बात है कि किसी भी कलाकृति के पीछे कलाकार का मन झांकने लगता है। आज ईरान में पुराने फैशन के अनुसार ही जो टायल्स का काम हो रहा है वह इतना अधिक या अतिरिक्त रूप से सुसज्जित है कि उसके पीछे श्रद्धा और आस्था नहीं बल्कि दिखावा ओर प्रदर्शन नज़र आता है। लगता है प्रभावित और आंतरिक करने के लिए कला की जा रही है। लेकिन इस मस्जिद के टायल्स के काम में वह दिखावा नहीं है। लगता है बनाने वालों ने बड़ी सहजता, सम्मान और आस्था के साथ काम किया है। उनके मन में प्रदर्शन का भाव नहीं था। मस्जिद काफ़ी बड़ी लगी। दूसरी मंज़िल भी है जिस पर मदरसा हुआ करता था। अब यह बिल्कुल वीरान है लेकिन सरकारी तौर पर इसकी मरम्मत की जा रही है। महमूद ने बताया या कहीं पढ़ा था कि ईरान की सरकार चालीस हज़ार मस्जिदों का इंतिज़ाम देखती है। इसके अलावा सैकड़ों पुरानी मस्जिदों की मरम्मत भी कराती है।

लौटकर ख़ाफ़ आ गये। मास्टर जी ने कहा आप रुक जाइये। हम आपकी ख़ातिर करना चाहते हैं। आखिर साढ़े चार सौ साल के बाद आप आयें हैं। गांव वाले भी रुकने के लिए कहने लगे। उन्हें पता चल गया था कि मैं किस ख़जाने की तलाश में यहां आया था। शाम ढल रही थी। मशहद लौटना था। मैंने उन सबसे माफ़ी मांगी। चाहता तो था कि काश रुक पाता। पर तोतों को किसी भी तरह के ख़जाने से क्या मतलब वे तो उड़ना चाहते थे नीले आकाश में, अमरूद के बाग़ों और बबूल के जंगलों के ऊपर. . .भरे हुए तालाबों और ओस के भीगे खेतों के ऊपर।

27

ईरान के गिरफ़्तार

रातभर बस की यात्रा करता सुबह मशहद से तेहरान पहुंचा। पूरा देश घूमने और हर शहर में बेरोकटोक फ़ोटोग्राफ़ी करते हुए मैंने सोचा कि यार तेहरान में मैंने कैमरा क्यों न निकाला। क्यों मैं डराने से डर गया कि तेहरान में फ़ोटोग्राफ़ी खतरनाक हो सकती है।

तेहरान शहर के चित्र मेरे पास नहीं थे। बस अड्डे से मैट्रो ली। शहर के केन्द्र में आ गया। यहां मैंने अमेरीकन दूतावास की वह इमारत देखी थी जो एक समय में विश्व का केन्द्र थी। जहां अमरीकी राजनयिकों को बंधक बनाया गया था। अब उस इमारत में दूतावास नहीं है। अमेरीका और ईरान के बीच किसी तरह के राजनयिक संबंध नहीं है। उस दूतावास की इमारत की चौहद्दी पर अमरीका विरोधी नारे लिखे हैं। यह इतने उत्तोजक नारे हैं कि इनका चित्र लेने से मैं अपने को रोक नहीं सका। बड़े आराम से कैमरा निकाला और इन नारों के चित्र खींचने लगा। पीठ पर पच्चीस किलो का बैग था। हाथ में कैमरा था और मैं आगे बढ़ रहा था। कहीं कोई अच्छी इमारत नज़र आयी तो यह सोचकर तस्वीर खींच ली कि यार भारत में तो लोग जानते ही नहीं कि तेहरान कैसा लगता है। मैं अपनी चाल में चला जा रहा था। हाथ में कैमरा था। अचानक किसी तरफ़ से तीन पुलिस वाले जो कमाण्डो जैसे लग रहे थे, धड़धड़ाते हुए आये, एक ने मेरे हाथ से कैमरा छीन लिया, दूसरे ने मेरा हाथ पकड़ लिया और तीसरा. . .मैं उम्मीद कर रह था कि गर्दन पकड़ेगा, लेकिन नहीं पकड़ी।

एक सिपाही ने पूछा_ फ़ोटो. . .फ़ोटो. . .

मैंने कहा_ यस. . .

दूसरा मुझे खींचेन लगा। ख़ैर वे मुझे एक बड़ी सी इमारत में ले गये। फ़ारसी में नाम वग़ैरा लिखा था जो मैं पढ़ नहीं सका। पर सुरक्षा इंतिज़ाम देखकर पता चला कि कोई 'संवेदनशील' किस्म की इमारत है।

मैं एक कमरे में ले जाया गया जहां चार पांच लोगों ने मुझे घेर लिया उनमें से दो अंग्रेजी बोल रहे थे। एक ने कहा- 'आपने हमारे आफ़िस की फ़ोटो ली है जो वर्जित है।'

मैंने कहा उसने कहा_ नहीं. . .ली है।'

सिपाहियों ने मेरा कैमरा उस आदमी को दे दिया।

तीसरा बोला_ 'आप कौन हैं? कहां से आये हैं? यहां क्या कर रहे हैं?'

मैंने बताया कि मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और कोई आध दर्जन ईरानी शहर देख चुका हूं।

एक ने कहा_ 'हम आपके सामान की तलाशी लेंगे।'

नहीं कहने का तो कोई सवाल ही नहीं था। मैंने कहा, ठीक है ले लें। अब मेरे सामने बैग से एक-एक चीज़ निकाली जाने लगी। मेरा पासपोर्ट, टिकट लेकर एक अधिकारी किसी और कमरे में चला गया।

सामान की तलाशी में मेरे नोट्स मिले। होता यह था कि अगर कहीं मुझे जाना होता था तो ईरानी मित्र हाथ में कागज़ पर नक्शा बनाकर मुझे दे देते थे। ये नक्शे मेरी मुसीबत बन गये। मुझसे पूछा गया कि यह क्या है? किसने बनाये हैं? क्यों बनाये हैं? कुछ देर बाद एक अधिकारी मेरा पासपोर्ट लेकर आया और कहा कि आपका वीजा तो ख़त्म हो चुका है। आप यहां गैरकानूनी तौर पर रह रहे हैं। मैंने कहा- 'श्रीमानजी यह छ: महीने का वीज़ा है। आप ध्यान से देखें।'

इस बीच एक अधिकारी मेरे कैमरा लेकर आया और कहा कि मैं कैमरे से फ़िल्म खींचकर बाहर निकाल दूं। मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि इस कैमरे में ऐसा नहीं हो सकता। मैं पूरी फ़िल्म लेंस के सामने हाथ लगाकर खींच लूंगा और रोल दे दूंगा।

अधिकारी ज़िद करने लगा कि नहीं मैं कैमरा खोलकर फ़िल्म ज़ोर से खीचूं। मेरे ख्याल से उसने यह दृश्य सन् पचास-साठ के आसपास बनी किसी हॉलीवुड की फ़िल्म में देखा होगा और चाहता था कि वह सीन उसके सामने 'रिपीट' हो। मेरे बहुत समझाने पर वह तैयार हुआ। मैंने लेंस के सामने हाथ लगाकर क्लिक करता रहा और फिर फ़िल्म निकालकर दे दी।

मेरे सामानों की तलाशी जारी थी। मिट्टी का वह टुकड़ा भी निकाला गया जो ख़ाफ़ से मैंने उठाया। उस पर भी पूछताछ हुई। पूछा गया कि क्या यह पवित्र स्थान मशहद की मिट्टी है? मैंने कहा नहीं ये ख़ाफ़ की मिट्टी है। तलाशी में इमामों की तस्वीरें भी निकली जो मैंने मशहद से खरीदी थीं। ये सब हो ही रहा था कि एक अधिकारी आया बोला कि मैंने जिन शहरों की यात्राएं की हैं वहां मैं कहां-कहां रहा था? सौभाग्य से मुसाफिरख़ानों के कार्ड मेरे पास थे। वे मैंने दिखाये।

इतनी सारी बातचीत और तलाशी के बाद मैं घबरा गया था क्योंकि बताया गया था, ये लोग कुछ भी कर सकते हैं। एक बार 'अंदर' हो जाने का मतलब था कि पता नहीं कब, कैसे किस तरह कितने दिनों, महीनों या सालों बाद आदमी बाहर निकलेगा।

मुझसे पूछा गया कि मैं तेहरान में कहां ठहरा हुआ हूं? मैंने राहुल का नाम और फ़ोन नंबर दिया। वह फ़ोन किया गया। राहुल घबरा गये। उन्होंने भारतीय दूतावास फ़ोन कर दिया कि मैं गिरफ्तार कर लिया गया हूं।

करीब डेढ़ घण्टे की तलाशी के बाद अधिकारी आये और बोले- 'क्षमा करें। हमसे ग़लती हो गयी है। आप तो 'हमारे' ही आदमी हैं।'

मुझे बाइज्ज्त रिहा कर दिया गया। लेकिन मैं उनका गिरफ्तार तो था भी नहीं। मैं तो ईरान की गिरफ्त में था. . .बहुआयामी ईरान के सम्मोहन का गिरफ्तार. . .वहां से कैसे 'रिहा' हो सकता था।

रातभर का बस यात्रा करने के बाद बिना चाय नाश्ते के कोई दस बजे मुझे पकड़ा गया था और अब बारह बजे रहे थे। पीठ पर वजन पचास किलो लग रहा था और बार-बार सोच रहा था कि तलाशी में कहीं कुछ वहीं तो नहीं रह गया है। पर टिकट और पासपोर्ट पास थे। राहुल को फ़ोन करके अपने छूटने की खुश-खबरी सुनाई। उन्होंने कहा तुम सीधे घर जाओ। मैं और मोनी तो घर पर नहीं है। मनोज होगा। वह तुम्हें नाश्ता चाय दे देगा।

मनोज ने शुद्ध भारतीय चाय बनाई। पराठे बनाये। खाया-पिया जान में जान आई। कहा, जान बची तो लाखों पाये। खैर से बुद्धू घर को आये।

तीन दिन बाद मेरी फ्लाइट थी। कैमरा तो मैंने इतना छिपाकर रख दिया था कि अगर मैं भी खोजता तो न मिलता। हालांकि गिरफ्तार होने से पहले सोचता था कि दो दिन तेहरान में खूब फ़ोटोग्राफ़ी करूंगा।

मैं पहले ही तय कर चुका था ईरान से और कुछ ले जाऊं या न ले जाऊं रोटियां ज़रूर ले जाऊंगा। उसी तरह जैसे लखनऊ से चाहे कुछ ले जाऊं या न ले जाऊं शीरमाल ज़रूर ले जाता हूं। रोटियों की अलग-अलग दुकानें हैं। रोटियां जमा करने के लिए कई दुकानों के चक्कर लगाने थे। समान में पांच छ: किलो वज़न बढ़ाने की गुंजाइश थी।

दो दिन मैं रोटियां जमा करता रहा। मीठी और नमकीन रोटी। मुरब्बा भरी रोटी। सूखी जौ के आटे और साग की रोटी। खड़खड़ाती पतली चपाती जैसी रोटी, मोटी सूखी रोटी। तीन फ़ुट लंबी नरम रोटी। छोटी बिस्कुट जैसी रोटी, पतली नरम चपाती जैसी रोटी और पता नहीं कैसी-कैसी रोटियों से एक बड़ा-सा थैला भर गया था। मनोज के लिए यह काफ़ी रोचक था। वह मुझे पागल नहीं तो सनकी तो मान ही रहा होगा।

सुबह चार बजे तेहरान के मेहराबाद एयरपोर्ट से मैं और मेरे साथ सभी तोते उड़े। तोतों ने कहा, यहां अमरूद तो होते नहीं। नीम और बबूल के पेड़ भी नहीं हैं। सरसों के पीले खेत और लबालब भरे तालाब. . . पीछे मुड़कर देखा तो एकरंगा शहर था लेकिन इसके कितने रंग हैं ये तो पास जाने पर पता चलता है।

(समाप्त)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. अब तोतों की जड़ें वहाँ नहीं यहीं पर हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या बात है .. क्या बात है । ईरान के मुकाबले फ़ारस को ज्यादा जानकर बहुत ख़ुशी हुई । ईरान में कवियों का सम्मान, तेहरान की आधुनिकता और अग्निपूजकों के बारे में बातें बहुत रोचक लगीं । साथ ही ईरान और अज़रबैजान में व्याप्त 'फ़िरंगी लूट' ये एहसास दिलाती है कि हम दुनिया में किसी से कम नहीं ।

    इस्फ़हान का स्थापत्य ही इतिहास की झलक, तेहरान तो नौरंग है
    तबरेज़, कोहेक़ाफ़ की परियों के लिए छिड़ी हमआप में ज़ंग है
    क्या कुम क्या तख़्त-ए-जमशेद, क्या शीराज़ क्या खोरासान
    देखें तो जाने क्या हो, बयाँ-ए-असग़र से ही बन्दा दंग है ।

    उत्तर देंहटाएं

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रचनाकार: असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण- अंतिम किश्त
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