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सूचना-संपर्क क्रांति और लोककलाएँ



- मृणाल पाण्डे

मोबाइल, आईपॉड और इंटरनेट से लैस इक्कीसवीं सदी में हमारी पारंपरिक लोककलाओं का भविष्य क्या है? इस सवाल का जवाब एक ओर तो ‘लोक' के तेजी से बदलते मन और जीवनशैली पर टिका है और दूसरी ओर राज्य की सांस्कृतिक नीतियों पर!

पहले बात करें सांस्कृतिक नीतियों से उठते प्रश्नों की. लोकसंस्कृतियों और लोककलाओं को लेकर भाजपा तथा उसके शासित राज्यों में इधर कुछ चौंकाने वाला पूर्वाग्रह और शुद्धतावादी नजरिया दिखाई दे रहा है. इसके तहत सरस्वती का वस्त्रहीन चित्रण अभारतीय और दंडनीय दोनों बनता है तब फिर हम खजुराहो और कोणार्क के मिथुन-युग्मों और राजस्थान से लेकर बसोहली (हिमाचल) तक की मध्यकालीन चित्रशैलियों में राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती के केलि के चित्रों को भी क्या नष्ट करने लायक मान लें?

चिंता जताई जा रही है कि गांवों में परंपरा खत्म हो रही है और पश्चिमी परिधानों और उपकरणों का चलन बढ़ रहा है. क्या हम जिद पकड़ लें कि हमारे लोककलाकारों को पश्चिमी हवा से बचाने को ग्रामीणों द्वारा जींस, टी-टाई, धूप के चश्मे, मोबाइल, विदेशी कागज और शीतल-पेयों के इस्तेमाल पर कठोर प्रतिबंध लगाया जाए?

हिमाचल के युवक को आज उसकी प्रेमिका हाथ से काढ़े गए चंबा रूमाल की जगह मिल का बना रूमाल दे रही है और वह उसे चीन में बनी रेशमी साड़ी दे रहा है तो क्या इससे उनका प्रेम अश्लील और दंडनीय बन जाता है? क्या राज्य तय करेगा कि गंभीर बीमारी के उपचार के लिए आदिवासी और ग्रामीण लोग या तो स्वदेशी दवाई ही लें या अनिवार्यतः ओझा-बाबाओं (प्रायः ठग) और तांत्रिकों की शरण गहें?

सच तो यह है कि संस्कृति की लगातार बदलती धारा से शहर और गांव, कारपोरेट बॉस और आदिवासी लोककला सब एक ही तरह से प्रभावित होते हैं. प्लास्टिक या मैगी नूडल्स या कोक-पेप्सी भले ही स्वास्थ्यकारी उत्पाद न हों, पर सच्चाई तो यह है कि उनका इस्तेमाल देशव्यापी हो गया है.

अब दूसरी ओर देखें, जहाँ आधुनिक जीवन के प्रबल दबावों के बीच भी जातीय स्मृतियाँ और लोककलाएँ भाषाई साहित्य तथा मीडिया में न सिर्फ लोकप्रिय बनी हुई हैं बल्कि नई तकनीक के इस्तेमाल से दिनोंदिन और भी सशक्त तथा व्यापक बन रही हैं. भोजपुरी, गढ़वाली, पंजाबी, हरियाणवी और पुरबिया बोलियों के लाखों संगीत-कैसेट और सीडी देश में धड़ाधड़ बिक रहे हैं. ‘स्पाइडर मैन' से लेकर ‘जुरासिक पार्क' तक हालीवुड की हिट फ़िल्में बोलियों में ‘डब' हो रही हैं. हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं का मीडिया नवीनतम तकनीक की कृपा से न सिर्फ देश में फल-फूल रहा है बल्कि इंटरनेट और विदेशी शाखाओं की मार्फत करोड़ों अनिवासी भारतीयों तक भी पहुँचने लगा है. क्या यह पारंपरिक लोककलाओं, लोकगीतों और लोकनाट्य रूपों के सहज रूप से युगानुकूल और आमजन ग्राह्य बनने का ठोस प्रमाण नहीं है?

दरअसल लोककलाओं या भारतीय भाषाओं के खतरे में होने के बारे में वे ही दुष्प्रचार करते हैं जो ‘परंपरा खतरे में है', ‘हाय पश्चिमी संस्कृति का भेड़िया आया' के नारे उछालकर कला की मार्फत अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं. नए माध्यमों का उदय, दुनियाभर के कलारूपों तक सहज पहुँचे, भविष्य की मिली-जुली लोकतांत्रिक विश्व सभ्यताओं की परिकल्पनाएं और स्वयं हमारे धर्म जाति निरपेक्ष संविधान से उपजी सांस्कृतिक नीतियाँ हमें आश्वस्त करती हैं कि समय जरूर बदल रहा है पर कलाएँ नहीं मरने जा रहीं.

मनुष्य जाति की ही तरह कला में भी गहरी जिजीविषा और नई परिस्थितियों से तालमेल बिठाने की विस्मयकारी क्षमता होती है. कुछ कलाएँ और बोलियाँ कालक्रम में अगर विलुप्त भी होती हैं तो वे खाद के रूप में नए युग की उभरती नई भाषा और अभिव्यक्ति को पुष्ट ही करती हैं. परंपरा एक निरंतर प्रवाहमान सनातन धारा है, उसे ठहरा हुआ काईदार पानी क्यों बनाएँ?

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(संपादकीय, कादम्बिनी, जून 2007 से साभार)

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3 टिप्पणियाँ

  1. बिल्कुल सही । सबसे बड़ी बात है कोई होता कौन है किसी को बताने वाला कि वह कैसे जिये !
    घुघूती बासूती

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी5:51 pm

    दिए गए तर्क विचित्र हैं।

    जवाब देंहटाएं
  3. मृणाल'दी" ईमानदारी की बात तो यह है कि लोक-परम्पराओं के किसी को कोई चिंता नहीं रही है.खा़स कर सरकारी संस्कृति की बात करूं तो स्थिति बहुत ही भयावह नज़र आती है.जो ज़िम्मेदार लोग विभिन्न प्रदेशों की लोक-परम्परा के झंडाबरदार माने जाते हैं उन्हीं ने कलाकारों का शोषण कर पैसा बनाया है.राजस्थान,गुजरात,महाराष्ट्र में परिदृष्य थोडा़ बेहतर कहा जा सकता है वरना लोक-संस्कृति के नाम पर महिला कलाकारों के साथ दैहिक शोषण से कौन बेख़बर है ? पचास साल से ज़ियादा हो गए आज़ाद हुए हमें लेकिन हमारी लोक-कलाएं कुछ अपवादों को छोड़कर तो अपने वजूद पर आंसू ही बहा रहीं है. हां मै आपसे सहमत हूं कि लोक-कलाकार भी तो आज़ाद परिंदा है और उसे भी हालातों दे साथ बदलने का हक़ है.और एक बात बता दूं कि ये जितने भी ग्लैमर वर्ल्ड के नामचीन कलाकार हैं वे ख़बरदार रहें कि यदि एक बार लोक-कलाकार को कुछ या कहूं चन्द प्रायोजक मिलने लग गये या इवेंट मैनेजर्स को एक बात लोक-संगीत या दीगर कलाओं की सफलता का थोड़ा सा भी अहसास मिल गया तो ये (कलाकार)धूम मचा कर रख देगे.
    एक उदाहरण देना चाहूंगा ...झाबुआ आदिवासी अंचल के एक युवा कलाकार आनन्दीलाल भावेल ने पिछ्ले दिनों अपने एक गीत ( या कहूं एलबम से) मालवा-निमाड़ में सफलता का ऐसा रंग जमाया है कि जिसकी मिसाल नहीं दी जा सकती.उसका गीत ..अमु काका बाबा ना पोरिया रे कोंडवलिया खेला रे...सनद रहे भावेल का ये एलबम तब आया था जब पूरे देश में कजरारे कजरारे की धूम मची हुई थी..भावेल का एलबम कजरारे से ज़्यादा बिका है...उसके गीत अंग्रेज़ीदां विद्यार्थियों के आईपाड्स और पी.सी में लोड किये जा रहे हैं ..शादी ब्याह में बारात के तोरण पर दूल्हे के दोस्तो को थिरकाने वाला गीत ये देश है वीर जवानों का इन दिनो आउट आफ़ फ़ार्म चल रहा है और छा रहा है अमु काका बाबा ना पोरिया.इसकी सफ़लता का एक और कारण है कि भावेल ने लोक-गीत हाई-टेक अंदाज़ में पेश किया है यानी ड्रम भी बजवाया है और की-बोर्ड भी.अपने आप लोकरंग नये ज़माने के रंग पर चढ़ गया है.लोक-परम्पराओं को खुद अपना मार्केट बनाना पडे़गा..ज़माने के सुरों में ढलना होगा...ऐसा मत करिये लोक-परम्पराओं का मूल कलेवर मत बदलिये ..ऐसा कहने वाले तथाकथित संस्कृति के रहनुमाओं की सुनवाई बंद करना होगी..क्योंकि ये अपने आपको एकतरफ़ जनपदीय कलाओं के पोषक बताते हैं और फ़िर रात को पांच सितारा होटल में भड़्कीले बैली डांस देखते हुए सुर और सुरा में डूबते हैं ...इन्ही ने डुबाई है हमारी लोक-संकृति की लुटिया.

    संजय पटेल

    जवाब देंहटाएं

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