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उसको ढूंढ रहा हूँ...

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-अशोक कुमार वशिष्ठ

उसको ढूंढ रहा हूं

 

सुन रे सूरज! तूने जलना, किससे कब सीखा था?

सुन रे चंदा! तूने ठरना, किससे कब सीखा था?

मैं भी उसको, ढूंढ रहा हूं, जो जीना सिखला दे,

हर दुखसुख को, विष अमृत को, जो पीना सिखला दे,

सुन री धरती! दुखसुख सहना, किससे कब सीखा था?

मैं भी उसको, ढूंढ रहा हूं, जो चलना सिखला दे,

इस धरती से, उस अंबर तक, जो उडना सिखला दे,

सुन री वायु! तूने चलना, किससे कब सीखा था?

मैं भी उसको, ढूंढ रहा हूं, जो मरना सिखला दे,

यार की खातिर, प्यार की खातिर, जो मिटना सिखला दे,

सुन री मौत! तूने मरना, किससे कब सीखा था?

 


नमस्कार करता हूं

 

तुझसे और तेरी सृष्टि से, बहुत प्यार करता हूं,

मेरे स्वामी! तुझको दिलसे, नमस्कार करता हूं.

धरती से लेकर अंबर तक, सबकुछ ही सुंदर है,

तेरा सबकुछ ही पावन है, सबकुछ ही मंदिर है,

क्योंकि सबमें तू रहता है, एतबार करता हूं.

तुझको चाहूं, तुझको पूजूं, बस इतना सा वर दो,

सृष्टि को सम्मान से देखूं, बस इतना सा वर दो,

अपने अंतरतम से तुझको, स्वीकार करता हूं.

स्वामी! मेरी किसी भूल पर, मुझको छोड न देना,

मुझसे किसी जनम भी तुम, रिश्ता तोड न लेना,

तुमतो जानो कि मैं तुमसे, कितना प्यार करता हूं.

 


 

प्यार नहीं तो क्या लेना है?

 

जिन आंखों में प्यार नहीं है, उन आंखों से क्या लेना है?

जिन सांसों में प्यार नहीं है, उन सांसों से क्या लेना है?

जिन शब्दों में प्यार नहीं है, उन शब्दों से क्या लेना है?

जिन होंठों पे प्यार नहीं है, उन होंठों से क्या लेना है?

जिन राहों पे प्यार नहीं है, उन राहों से क्या लेना है?

जिन बाहों में प्यार नहीं है, उन बाहों से क्या लेना है?

जिन सीनों में प्यार नहीं है, उन सीनों से क्या लेना है?

जिन जीनों में प्यार नहीं है, उन जीनों से क्या लेना है?

जिन रिश्तों में प्यार नहीं है, उन रिश्तों से क्या लेना है?

जिन लोगों में प्यार नहीं है, उन लोगों से क्या लेना है?

 


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