संतोष कुमार अचारी की कविताएं

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चंद कविताएं
-संतोष कुमार अचारी

वह एक मजदूर

वह एक मजदूर

जलती धूप हो

चाहे उसका कितना विकृत रुप हो

वो चाहता है आराम करना

वो चाहता है रुकना

पर उसका वक्त इसका लिए तैयार नहीं

उसको इजाजत नहीं एक पल थकने के लिए

बहता रहे तन से चाहे जितना पसीना

पर ढ़ोता रहेगा बोझा उसका सीना

वह लाचार वह मजबूर

सोचता इतने पर भी दो जून की रोटी रहती उससे क्यों दूर।

वह एक मजदूर।


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प्रकृति ह्रास


ढ़ूंढ रहा हूं मैं

पेड़ों की सजावट

पक्षियों की चहचहाहट

वो फूलों एवं कलियों की मुस्कराहट

भवरों की गुंजाहट

जुगनुओं की जुगजुगाहट

वो शुद्व महकती हवा की आहट

वो पहाड़ों वो जंगलों की रियासत

मिल नहीं रही है यह अब क्यों

क्या बंद कर दिया है प्रकृति ने ऐसी बनावट
यह हम ही बन गये है इनके बीच की रुकावट
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सचेत मानव

क्या पेट की भूख को

इन महलों से भर पायेगा

मानव वन उपवन मिटाकर

एक रोज बहुत पछतायेगा।

वायु को दूषित करके

आयु को अपने घटाया है

हरे भरे खेतों के बिन

क्या तू जीवित रह पायेगा।

मानव वन उपवन मिटाकर

एक रोज बहुत पछतायेगा।

प्रगति के नाम पर प्रकृति का विनाशा कर

कब तक तू बच पायेगा

अरे अज्ञानी न भूल कर

क्या फिर से प्रलय बुलायेगा।

मानव वन उपवन मिटाकर
एक रोज बहुत पछतायेगा।
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तितली रानी


तितली रानी तितली रानी

तू है कितनी सुन्दर प्राणी

रंग बिरंगी रंगीली

तू है कितनी चमकीली

मखमली चादर ओढ़े लगती बड़ी सुहानी

तितली रानी तितली रानी

कभी पवन के संग घूमती

कभी बागों में घूमती

जन्नत में भी परियों के संग है तेरी कहानी

तितली रानी, तितली रानी

कोई न छू पाये

पलक झपक में फुर्र हो जाये

है तू बड़ी सयानी

तितली रानी, तितली रानी


फूल

महक ही महक महकाते हो

सबका हृदय लुभाते हो

बागों की शोभा बन जाते हो

कली बनके खिलखिलाते हो

तुम फूल कहलाते हो।

चिंता हर मन में उमंग लाते हो

कांटों के संग जीना सिखलाते हो

वीरों का मान बढ़ाते हो

प्रभु के गले का हार बन सौभाग्य पाते हो

तुम फूल कहलाते हो।

गुड़िया



पापा-पापा मुझे उठा लो

गोद में अपने मुझे खिला लो

वो गुडि़या मेरी सहेली

सजी-धजी वो अलबेली

कहां गयी उसको ला दो

पापा-पापा मुझे उठा लो

ये क्या कितने बोझ लदे अब

कहते मुझको पराया क्यों सब

मैं नन्हीं ही रहना चाहूं

खुली गगन में उड़ना चाहूं

ब्याह नहीं मुझको मेरा बचपन लौटा दो।

पापा-पापा मुझे उठा लो


गुब्बारा

बच्चों लाया मैं गुब्बारा
नीला, पीला सब दिखता प्यारा

नीला, पीला सब दिखता प्यारा
खेल खिलायेगा तुमको
बहुत हंसायेगा तुमको
बात मान लो हमारा

बच्चों लाया मैं गुब्बारा
नीला, पीला सब दिखता प्यारा

डोर इसकी पकड़ लो हाथों में
छोड़ न देना इसे बातों - बातों में
आसमान में उड़ जायेगा
हाथ न आयेगा दुबारा

बच्चों लाया मैं गुब्बारा
नीला पीला सब दिखता प्यारा

सोचो न तुम इतना
बचा अब है ही कितना
जल्दी से ले आओ मम्मी से पैसा
मिलेगा न तुमको गुब्बारा ऐसा
देखो-देखो बिक न जाये सारा
नीला, पीला सब दिखता प्यारा

बच्चों लाया मैं गुब्बारा
नीला पीला सब दिखता प्यारा


बाल मन


बाल मन हंसता - खिलखिलाता

खेल-खिलाता तारों सा झिलमिलाता

न कोई डर

मुट्ठी में भर-भर

खुशियां लुटाता

बाल मन हंसता-खिलखिलाता

न कोई भार

प्यार ही प्यार

पग पग चलता हृदय लुभाता

बाल मन हंसता-खिलखिलाता

झूले में झूल-झूल लोरी सुनना

मां के आंचल में संजना संवरना

जग से न घबराता मीठी नींद में सो जाता

बाल मन हंसता-खिलखिलाता।
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संपर्क:

संतोष कुमार अचारी,
अयोध्या।
sanaug97@rediffmail.com

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1 टिप्पणी "संतोष कुमार अचारी की कविताएं"

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