गुरुवार, 22 जुलाई 2010

विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता : सदन में कुर्सी खूब चली है…

hasparihas हास्य व्यंग्य हास्य कविता

सदन में कुर्सी खूब चली है.

बिजली नहीं है, परेशां है जनता

गिरते-पड़ते यह सरकार चली है.

कितने दिन तक सब्र करे कोई

बड़ी लम्बी इंतज़ार चली है.

कुछ और चले,चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है.

 

पेयजल के लिए हाहाकार मची है.

कुछ ले-देकर सरकार बची है.

सरकारी चापाकल  नहीं  चलता.

आज चला तो कल नहीं चलता.

आसन्न चुनाव है ,खलबली है.

कुछ और चले,चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है.

 

सज्जन संसद में चुने नहीं जाते

चुने गए तो सुने नहीं जाते

सुने गए तो दबंगों के आगे

इनकी कब एक चली है.

 

अशिष्ट भाषा अश्लील इशारे

लफंगों के है वारे -न्यारे

सत्तर प्रतिशत से भी ज्यादा

सदन में बैठे बाहुबली है.

कुछ और चले, चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है.

 

किसी के हाथ,किसी के पैर टूटे.

कोई टूटी कुर्सी के हाथ ले लूटे

पर जनता की तो किस्मत फूटे

इनकी करतूत के चर्चे गली-गली है.

कुछ और चले,चले ना चले.

सदन में कुर्सी खूब चली है

 

हर पखवारे पेट्रोल के दाम बढे हैं,

कच्ची जिंसों के हरदिन दाम चढ़े हैं.

आज इनकी बंदी,कल उनकी बंदी

कई दिनों से गाड़ियाँ नहीं चली है

कुछ और चले,चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है..

----------

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------