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विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता : सदन में कुर्सी खूब चली है…

hasparihas हास्य व्यंग्य हास्य कविता

सदन में कुर्सी खूब चली है.

बिजली नहीं है, परेशां है जनता

गिरते-पड़ते यह सरकार चली है.

कितने दिन तक सब्र करे कोई

बड़ी लम्बी इंतज़ार चली है.

कुछ और चले,चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है.

 

पेयजल के लिए हाहाकार मची है.

कुछ ले-देकर सरकार बची है.

सरकारी चापाकल  नहीं  चलता.

आज चला तो कल नहीं चलता.

आसन्न चुनाव है ,खलबली है.

कुछ और चले,चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है.

 

सज्जन संसद में चुने नहीं जाते

चुने गए तो सुने नहीं जाते

सुने गए तो दबंगों के आगे

इनकी कब एक चली है.

 

अशिष्ट भाषा अश्लील इशारे

लफंगों के है वारे -न्यारे

सत्तर प्रतिशत से भी ज्यादा

सदन में बैठे बाहुबली है.

कुछ और चले, चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है.

 

किसी के हाथ,किसी के पैर टूटे.

कोई टूटी कुर्सी के हाथ ले लूटे

पर जनता की तो किस्मत फूटे

इनकी करतूत के चर्चे गली-गली है.

कुछ और चले,चले ना चले.

सदन में कुर्सी खूब चली है

 

हर पखवारे पेट्रोल के दाम बढे हैं,

कच्ची जिंसों के हरदिन दाम चढ़े हैं.

आज इनकी बंदी,कल उनकी बंदी

कई दिनों से गाड़ियाँ नहीं चली है

कुछ और चले,चले ना चले

सदन में कुर्सी खूब चली है..

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