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विजय वर्मा की हास्य कविता - भिखारी

      भिखारी  
[निराला जी की आत्मा से क्षमा याचना सहित ]

-- वह आता!

मोबाइल पर बतिआते ,

निश्चिन्त-भाव से आता.

आकर कॉल-बेल बजाता.

भीख कहे या हफ्ता--

हर हफ्ते आकर ले जाता .

हरदम भरा रहता उसका पेट

अठन्नी उठा कर देता फेंक

पांच रूपया से कम मिलने पर

बहुत देर गरियाता

कभी-कभी उपदेश भी देता ,कहता-

"कब तक स्कूटर घसिटोगे साब!

क्यों चार चक्का नहीं ले आता"

वह आता !

मैं उसे देख घबराता

. .                                                                           

v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

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जी एक सत्य को कहती रचना...अब ऐसे भिखारी भी कहाँ

वाह आता
दो टूक
कलेजे के करता
पछताता
पथ पर आता

अग्रेजी साहित्य में पैरोडियों का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है।
हिंदी में ऐसे प्रयोग कम हुए हैं। इस दॄष्टि से आपका
प्रयास सराहनीय है।
सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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