रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का व्यंग्य : पट्टे वाले कुत्ते

dog कुत्ता कुत्ते 

चाचा दिल्लगी दास को इन कुत्तों के बारे में जितनी जानकारी है उतनी मालूमात तो शायद खुद कुत्तों को भी अपने बारे में नहीं होगी। आज आते ही बताने लगे कि कुत्तों को नस्ल और लिंग के आधार पर तकसीम करने के बाद भी और दो भागों में बांटा जा सकता है। एक तो पट्टे वाले कुत्ते दूसरे बिना पट्टे वाले कुत्ते। वैसे सही मायनों में कुत्ते भी वो ही होते है जिनके गलों में पट्टे नहीं पड़े हों। जब फीता लगने के बाद कोई आदमी आदमी नहीं रह जाता तो फिर भला एक कुत्ते से पट्टा पहन लेने के बाद भी कुत्ता ही रह जाने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? गले में पट्टा और मोटी सी जंजीर पड़ जाने के बाद कोई कुत्ता अपने कुनबे से अलग तो जरुर हो जाता है मगर इसकी एवज में उसे दो वक्त का खाना रहने की जगह, बिछाने के लिए एक अदद टाट का टुकड़ा अवश्य मिल जाता है। जबकि पट्टा विहीन कुत्तों को ये तमाम इंतजामात स्वयं अपने ही प्रयासों से करने पड़ते है और इसे किस्मत समझो या बदकिस्मत ,लेकिन कुत्ते की वास्तविक जिन्दगी का लुत्फ तो ये पट्टा विहीन कुत्ते ही उठा पाते हैं। कुत्ते की मौत फिर भी दोनों को समान रुप से मिलती हैं।

पट्टा पहन लेने के पश्चात 'भौंकना' कुत्ते की प्रकृति न रहकर एक मजबूरी हो जाती हैं। उसकी हैसियत अपने मालिक से और मालिक की औकात अपने पालतू कुत्ते से आंकी जाती है। पट्टाधारी कुत्ते को किस पर, कब, कितना भौंकना है यह मर्जी पर न रह जाती बल्कि उसका मालिक तय करता है यानी फिर उसके भौंकने के अवसर भी घट जाते है और भौंकने की मात्रा भी। फलतः वो तनावग्रस्त रहने लगते हैं और प्रायः पेड़ों पर दौड़ती गिलहरियों पर भौंक-भौंक कर अपनी कुण्ठाएं मिटाने की कोशिशें करते रहते हैं। मगर ये पट्टे वाले कुत्ते हाथियों के पीछे भौकने की अपनी पारम्परिक लत से महरुम जरुर हो जाते हैं और कई बार बाज मौकों पर तो इनको खुद के कुत्ता होने पर भी शक होने लगता है।

गले में पड़ी जंजीर कुत्ते को बांधे तो रखती है ही साथ-साथ कुत्ता कितना खतरनाक है इसका पैमाना भी होती है। अगर बिल्ली से ही डरने वाले मरियल से कुत्ते के गले में मोटी सी जंजीर डाल दी जाय तो वो भी खुद को खासा खतरनाक समझने लग जाता है भले ही उसका बोझ सम्भालना भी कुत्ते के लिए मुश्किल क्यों न हो। वहीं पिण्डली पकड़ने में माहिर कुत्ते अगर बिना पट्टे के गलियों में आवारा घूमने लगे तो लोग कुछ गिनते ही नहीं। खूंखार दिखने वालों की तो बात ही क्यां ! जो कुत्ते वास्तव में खूंखार होते है उनको भी अगर आप मालिक के आगे पूंछ हिलाते और कदमों में लौटते देख लें तो ताज्जुब कतई न करें। क्योंकि उन्हें अपने गले में पड़ा पट्टा काफी अजीज होता है और उसके छिन जाने के डर के कारण इनको बहुत कुछ करना पड़ता है। पट्टा छिन जाने के बाद एक कुत्ते की क्या कद्र रह जाती है इसको जानने के लिए सेवानिवृत अफसर या पदच्युत मंत्री को देख लें जिनकी कद्र किसी कुत्ते जितनी भी नहीं रह जाती! चाचा थोड़े फलसफाई अन्दाज में बोले कि इन कुत्तों की जात भी एक अजीब जात है।

अब देखिए न एक और तो पट्टे से वंचित रह गए कुत्तों में से बाज कुत्ते तो इसलिए तेज-तेज भौंकते है कि शायद कोई उनके भौंकने पर रीझ कर ही उनके गले में पट्टा डाल दें। वहीं दूसरी ओर फुरसत के लम्हात में पट्टे से वंचित रहे कुत्ते संगठित होकर उन कुत्तों के पास जाते है जो गेट पर जंजीर से बंधे होते है और समवेत स्वर में उन पर लानत मलानत भेजते है। पट्टाधारी कुत्तों की एक शिकायत यह रहती है कि उनको अपने मालिक के पूरे परिवार के प्यार का भाजन बनना पड़ता है और वो इसलिए कि उनमें आपस में तो किसी को किसी से प्यार होता नहीं सो सब के सब अपना प्यार बारी-बारी से अपने पालतू कुत्ते पर ही उंडेलते है, बदले में कुत्तों को भी प्यार करना पड़ता है। और ये तमाम चोंचले भी ये इस माहौल की बदौलत बखूबी सीख लेते है। आखिर इंसानों की संगत का इतना असर तो होता ही जाता है। इन पट्टाधारी कुत्तों की दूसरी शिकायत यह होती है कि जिनको कुत्ता पालने का शौक होता है वहां भी इनको सुकून नहीं और जिनको कुत्ता पालने की बीमारी हो वहां इनको चैन मिलने के इम्कानात हो नहीं सकते।

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

hum sabhi janate hai ki aaj ke yug me patte wale kutte hi jyada se jyada hai.samaaj me sammanit bhi hai.....achhi rachana hai.

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget