गुरुवार, 2 सितंबर 2010

गोपी गोस्वामी की कविता – उसने भगवान को देखा है

सने भगवान को देखा है

उसने कहा

उसने भगवान को देखा है

पेड़-पौंधों ने सर नवाजा

पथरीली पगडंडियों ने

मुस्कुरा कर उसे रास्ता दिया

ठंडी हवाओं ने उसको सहलाया

आसमान से कुछ बूंदें भी

गिरी उसकी अधपकी दाढ़ी पर

वो हँसा

उसने भगवान को

पा जो लिया था

वो चलता रहा

मस्त-मौला

बिखरे-बाल और फटे कम्बल

को ओढ़े

बगल में झोला दबाए

यही बात उसने

इंसानों की बस्ती में कही

चिल्ला कर

सुनो, सुनो

देखा है मैंने भगवान को

शहर की चीखती-चिल्लाती

जिंदगी उसे 

अनसुना कर चलती रही

पर वो तो अपनी खुशी

को मुक्त करना चाहता था

अपनी आँखों से

उन सबके लिए

वो फिर चिल्लाया 

सच कहता हूँ

देखा है मैंने उसको .....

कुछ कदम ठिठके, रुके

कौन है ये

पागल, भिखारी, फकीर या

कोई दरवेश

हाँ, देखा है मैंने उसे

वो जो सर्व शक्तिमान है,

एक इशारे से दुनिया पलट दे,

दयालु भी है, दाता भी है,

प्रेम से लबालब भरा

वो जो है विधाता

देखा है मैंने उसे

कुछ लोग और फिर बहुत से लोग

सुनने लगे उसे....

ये तो सचमुच कोई दिव्य

आत्मा है, चेहरे का तेज देखो

इसकी वाणी में अमृत है

कैसा दिखता है वो?

भीड़ ने उछाला प्रश्न

वो राम जैसा दिखता है

कृष्ण जैसा भी

जीसस जैसा, अल्लाह जैसा

वाहे गुरु जैसा भी

बस.....बहुत हुआ

पागल लगता है...

हाँ-हाँ पागल है

फिर एक पत्थर उछला,

फिर दूसरा, फिर तीसरा...

एक लहुलुहान शरीर अब

अकेला गिरा पड़ा था

पर उसके चहरे पर

वही तेज था, वही उमंग,

वो हँस रहा था

मैंने भगवान को देखा है

उसकी आवाज धीमी थी

पर विश्वास से ओत-प्रोत

बाबा, क्या तुमने सचमुच

भगवान को देखा है...

एक नन्हा प्रश्न लेकर

दो छोटी-छोटी आँखें

उसके सामने खड़ी थी

हाँ ...मैंने देखा है

तुम भी देखोगे....ये लो

देखो ....

झोला टटोल कर

उसने एक टूटा हुआ आइना

रख दिया दो नन्हे हाथों में ....

देखो ....तुम भी देखो ...

अरे! ये तो मैं हूँ ...बिट्टू

हट......दूर हट!

उसने आइना बच्चे से

छीन लिया....

मैंने तुझे भगवान दिया

तुने उसे बिट्टू बना दिया

जा चला जा ....

बच्चा डर गया और पलट कर भागा

पर जाते जाते कह गया

पागल कहीं के .....

पागल ...मैं नहीं तुम सब हो ...

इसमें भगवान है

सचमुच ....

उसने आईने में अपना चेहरा देखा

मुरारी लाल’ ......

उसका चेहरा सफ़ेद हो गया

तू सचमुच पागल हो गया है

तू सचमुच पागल हो गया है

मुरारी लाल

उसके हाथ से आईना गिर गया

उसके सारे शरीर में दर्द

होने लगा ...वो लडखडाते हुए

सड़क की तरफ बढ़ा ......

अब उसके मुँह से

यही निकल रहा था

मुरारी लाल तू पागल हो गया है

सामने से तेज गति से एक

महँगी, बहुत महँगी कार आ

रही है

इतनी महंगी कि

उसकी आँखें फूट गई हैं..................

3 blogger-facebook:

  1. oh-------ye kya likh diya.............gazab kar diya.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर अभिव्यक्ति...

    पूरी जिंदगी कश्मकश में निकल गयी 'मजाल',
    हल्का सा इक अंदेसा हुआ था कभी.

    उत्तर देंहटाएं
  3. रहस्यवाद की संभावना से लबरेज़ एक अच्छी कविता जिसकी हर पंक्ति अगली पक्ति को जल्द पढने के लिये मज्बूर करती है। रचनाकार को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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