बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ

एक दिन-- कुछ हसरतें

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तुझसे बेपनाह मोहब्बत करता हूँ,

सारी जिंदगी समझाता रहा,

खून के एक-एक कतरे से,

खत लिख,मर कर एलान- ए- मोहब्बत

कर जाऊँगा” एक दिन”!

 

तेरी एक"हाँ" के इंतेज़ार में,

सारी जिंदगी तड़पता रहा,

गर क़ुबूल ना की मेरी मोहब्बत,

तो तेरी अर्थी का फूल बन,

बदनाम कर जाउँगा “एक दिन”!

 

मयखाने में तो रोज पीता हूँ,

ज़ाम का नशा बहुत हुआ,

अब तेरी आँखों से पी कर,

मदहोश हो जाना चाहता हूँ ,

बस” एक दिन”!

 

प्रभु तेरी बेरहम दुनिया में,

मैं रोज कत्ल होता हूँ,

पर तू पत्थर बन देखता ही रहा,

तेरे दर पे सर पीट हमेशा के लिए,

रुखसत हो जाउँगा” एक दिन”!

 

किसी ग़रीब पे सितम ना कर,

उसकी हाय में वो ताक़त है,

की पत्थर को भी रेत बना,

धारा पे ला सकता है” एक दिन”!

 

दूसरों की लिए बहुत जिया,

मुझसे मैं ही छिन गया,

अब तो बस यही ख्वाहिश है,

की खुद के लिए जी अपने को

पहचान पाऊँ बस” एक दिन”!

 

गर हौसले बुलंद हो,

और दिल में जज़्बा हो,

तो पत्थर से भी पानी,

निकाल प्यास बुझा ,

सकता है” एक दिन”!

 

खुद के लिए तो रोज जीते है,

आपनी हसरतें पूरी किए गये ,

किसी गमज़दा की आँखों से गम ,

चुरा ले,तो तुझे खुदा यही मिल

जाएगा” एक दिन’ !

---

आँखों ही आँखों में

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जब जहन में शब्द ना हो,

और जुबां थम जाए,

तो कुछ बातें हो जाती हैं,

बस आँखों ही आँखों में!

 

प्रेम के दो शब्द ,

कहने में उम्र गुजर जाती है,

इकरारे मोहब्बत हो जाता है,

बस आँखों ही आँखों में!

 

समय की नज़ाकत को समझ,

कुछ इशारे हो जाते है,

शब्द पढ लिए जाते हैं,

बस आँखों ही आँखों में!

 

बेवफ़ाई वो कर गये,

प्यार को ठुकरा दिया,

इनकार हमने पड़ लिया,

बस आँखों ही आँखों में!

 

तन्हाई में हम क़ैद थे,

सहारा ढूंढते रहे,

दर्द-ए-दिल वो समझ गये,

बस आँखों ही आँखों में!

 

उनकी एक झलक को तरसते रहे,

पुर जिंदगी हम,

एक दीदार हुआ,

और कत्ल हो गये,

बस आँखों ही आँखों में!

 

डॉली उठी मेरे यार की,

किसी और की वो हो गयी,

अलविदा हमें कह गयी,

बस आँखों ही आँखों में!

 

सुहाग की सेज पे,

सनम का दीदार है,

अब उम्र कट जाए,

बस आँखों ही आँखों में!

--

rajeev shrivastava

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

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