दीप्ति परमार की उपन्यास समीक्षा : छिन्नमस्ता - नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा

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( प्रभा खेतान के उपन्यास पर केन्द्रित ) विशिष्ट प्रतिभा की धनी प्रभा खेतान (1 नवम्बर 1942 से 19 सितम्बर 2008 ) ने दर्शन शास्त्र् से एम. ए...

deepti b parmar

( प्रभा खेतान के उपन्यास पर केन्द्रित )
विशिष्ट प्रतिभा की धनी प्रभा खेतान (1 नवम्बर 1942 से 19 सितम्बर 2008 )
ने दर्शन शास्त्र् से एम. ए. कर ज्याँ पोल सार्त्र् के अस्तित्ववाद पर पीएच. डी. की।
'अपरिचित उजाले','कृष्णधर्मा मैं' सहित छह कविता संग्रह,'आओ पेपे घर चलें'
और 'छिन्नमस्ता' सहित सात उपन्यास, दो उपन्यासिकाएँ, 'शब्दों का मसीहा सार्त्र्'
और 'बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ' सहित पाँच चिंतनपरक पुस्तकें, तीन
संपादक पुस्तकें, एक आत्मकथा तथा अनेक दक्षिण अफ्रीकी कविताओं के हिन्दी
अनुवाद के लिए ख्याति प्राप्त और राहुल सांकृत्यायन तथा बिहारी पुरस्कार जैसे
विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित प्रभा खेतान का हिन्दी समकालीन लेखन में
चिरस्मरणीय योगदान हैं।

'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान का मारवाड़ी समाज की नारी जीवन से सम्बन्धित वो
संघर्ष और मुक्ति की गाथा है जो अब तक साहित्य में अप्रस्तुत थी। उपन्यास की
नायिका प्रिया लड़की होने के कारण बचपन से ही अवहेलना एवं घरेलू बलात्कार का
भोग बनी हुई है। विवाह के बाद उसे मारवाड़ी समाज में होनेवाले बहुविवाह की
कुप्रथा के कारण दुसरी औरत का स्थान प्राप्त होता है। पति का कठोर शाशन,
संपत्ति समझकर अनवरत होनेवाले बलात्कारों का सिलसिला आदि स्थितियां उसे
अनेक यातनाओं से भर देती है। अनेक यातनाओं को छिन्नमस्ता देवी की तरह
अपने उपर झेलकर प्रिया उन्हीं यातनाओं के सामने अपना संहारक, विद्रोही एवं
आत्मनिर्भर रूप दिखाकर दयनीय स्थिति से मुक्ति पाती है। पौराणिक गाथाओं के
अनुसार छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में पांचवी देवी है। यह अपना ही कटा हुआ
सिर अपने बायें हाथ में लिये हुए है। मुंह खुला और जीभ निकली हुई है। अपने
ही गले से निकली रक्तधार को वह चाटती है। इनके हाथ में खड़ग, गले में मुण्डों
की माला रहती है। छिन्नमस्ता निर्वस्त्र् रहती है। इसका यह रूप भयंकर अवश्य है
किन्तु शक्ति का प्रतिरूप है। छिन्नमस्ता वह शक्ति है जो संसार बनाती भी है और
उसका नाश भी करती है। जो महामाया षोडशी, भुवनेश्वरी बनकर संसार का पालन
करती हुई अन्तकाल में छिन्नमस्ता बनकर सर्वनाश कर डालती है। महाप्रलय की
प्रक्रिया में छिन्नमस्ता की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

प्रिया को छिन्नमस्ता का प्रतीक बनाकर प्रभाजी ने उपन्यास में नारी जीवन की यातना,
संघर्ष, विद्रोह एवं मुक्ति को अधिक सशक्तता से प्रस्तुत किया है।
'छिन्नमस्ता' कलकत्ता में रहनेवाले उच्चवर्गीय मारवाड़ी परिवार की कथा है, जहाँ घर
में काम करने के लिए ढेरों नौकर है, परिवार की आन, बान और शान देखते ही
बनती है। किन्तु 'छिन्नमस्ता' की किसी भी औरत के जीवन को जरा सा खुरेचो, तो
उसमें दर्द, पीड़ा और आँसुओं का दरिया मिलेगा। यद्यपि उसकी अलमारी में हजारों
साड़ी, ब्लाउज, ढेर सारा मेकअप का सामान और हीरों के कीमती आभूषण मिलेंगे
किन्तु शारीरिक एवं मानसिक अत्याचारों से भीतर से टूट चुकी है। इस परिवार में
लड़की के जन्म को अशुभ, बोझ और हुंडी माना जाता है। प्रिया इस परिवार की
स्त्री कस्तुरी की अनचाही चौथी बेटी है। अतः माँ ने न उसे कभी गोद लिया, न पास
सुलाया, न बीमार होने पर कभी डॉक्टर को बुलाया। वह सदैव एक शाश्वत दूरी
बनाएं रखती है। चौथी लड़की का होना प्रिया की माँ कस्तुरी के लिए भाररूप है।
अतः प्रिया दाई माँ की बेटी के रूप में पहचानी जाती है कस्तुरी की बेटी के रूप में
नहीं। प्रिया को पढ़ा लिखाकर स्वयं की पहचान बनाने के लिए नहीं किन्तु सिर्फ
विवाह के लिए बड़ा किया जाता है। सिर्फ विवाह ही उनका भविष्य है। साथ ही उसे
'काली लड़की' से पहचाना जाता है। पढ़ने लिखने की उसकी इच्छा का कोई मूल्य
नहीं, विवाह के बाजार में उसकी बौद्धिक क्षमता नहीं उसकी चमड़ी का रंग
महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। इसी वैचारिक परिवेश में प्रिया की परवरिश होती है।

प्रिया को जन्म से ही विद्रोहिणी बनाने के मूल में पारिवारिक वैचारिकता के साथ साथ
अनेक यातनाओं की भी लंबी सूची है। उसका शैशव अनवरत बलात्कारों की कड़ी
है। सौतेले भाई द्वारा बार बार किये गये बलात्कारों ने दस वर्षीय प्रिया के अन्दर
भय एवं घृणा भर दी है। जैसे जैसे प्रिया बड़ी होती गयी उसका मन विद्रोह के उफान
से भरता जाता है।

प्रिया को छिन्नमस्ता बनाने में मारवाड़ी परिवार में चल रही बहुविवाह की कुरीति एवं
उसको मिलने वाला दूसरी औरत का दर्जा भी महत्त्वपूर्ण है। बहुविवाह प्रथा के
चलते प्रिया करोड़पति घराने के नरेन्द्र की दूसरी औरत बन जाती है। दूसरी औरत
का दर्जा देनेवाला नरेन्द्र एक हैल्दी एनिमल से ज्यादा कुछ नहीं है। उसका मशीनी
यौनावेग प्रिया की संवेदनाओं को मार डालता है अतः प्रिया पति द्वारा बनाये गये
हरबार के सम्बन्ध को बलात्कार की तरह झेलती है। अनवरत बलात्कारों का
सिलसिला और पति का कठोर शासन प्रिया को विद्रोहिणी बनाने में अपना प्रगाढ़
योगदान देता है। प्रभा खेतान ने उच्चवर्गीय, सामन्ती परिवारों में पुरुष की
अधिकार भावना, पुरुषीय वासना, पुरुषसत्ता की निरंकुशता, संपत्ति पर एकाधिकार
की भावना, स्त्री के प्रति तिरस्कृत एवं तुच्छ दृष्टिकोण आदि का वर्णन करते हुए
उनकी बखिया उधेड़ कर रख दी है- जहाँ स्त्री के पास पैसे हैं, जेवरात है, महेंगी
पार्टियां हैं, जिसमें पैसे खर्च किये जा सकते हैं। यदि व्यवसाय के लिए उन जेवरों
को बेचना चाहे तो संयुक्त परिवार की संपत्ति होने के कारण कोई संभावना नहीं।
व्यक्ति के निज कोने पर कोई अधिकार नहीं, उसकी अभिरुचियों का कोई सम्मान
नहीं, वह कपड़ों पर खर्च कर सकती है, किताबों पर नहीं। चूंकि कमाती नहीं
इसलिए गरीब नौकर की मौके पर मदद का हक उसे नहीं। अपने सिद्धांतों के
क्रियान्वयन, मानवीयता की भावना के तहत यदि कुछ करना चाहें तो स्त्री को कमाना
होगा अथवा गुलाम की तरह पति की दया पर जीवित रहना होगा। 1

पति के धनाढ्य परिवार में पति के नाम से जानना प्रिया को स्वीकार्य नहीं, किन्तु
'व्यक्ति के तौर पर बड़ा होना और हर एक का अपनी प्रतिभा का भरपूर दोहन
करने का तर्क परंपरागत परिवारों में समझा या समझाया नहीं जा सकता। बौद्धिक
क्षमता का उपयोग होना चाहिए अथवा 'काम' स्त्री के लिए जीवन शक्ति हो सकता
है।' 2 'यह न प्रिया के पिता का परिवार समझता है न पति का।' 3 नरेन्द्र तो यह
भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं कि स्त्री होने के कारण प्रिया का अपना भी
कोई वजूद हो सकता है, उसकी अपनी भी कुछ इच्छाएँ और वैचारिकता भी हो
सकती है, वह भी अपनी प्रतिभा से कुछ कर सकती है। वह मारवाड़ी बिजनेसमेन
है जो अमरीका जाकर शोपिंग करता है किन्तु पत्नी के ओफिस आने पर कहता है
'श्रृंगार पटार करो और रंडियों सी जा कर ओफिस में बैठो।' 4

नरेन्द्र प्रिया को व्यवसायिक क्षेत्र में प्रवेश देने के लिए बिलकुल तैयार नहीं है, किन्तु
अनायास जब प्रिया को नरेन्द्र के व्यवसाय में 'डमी पार्टनर' बनने का मौका मिल
जाता है, तब वह अनेक विराधी परिस्थितियों में भी अपना व्यवसाय, नाम और पैसा
बनाने के लिए पूरे सामर्थ्य से लग जाती है। नीना के यह कहने पर कि 'माँ हम
लोगों को रुपयों की तो जरूरत नहीं' प्रिया का उत्तर है 'मुझे तो है बेटा' 5 प्रिया
अपनी प्रतिभा से अपनी अलग पहचान बनाती है। प्रिया की यह विशेषता स्त्री को
सिर्फ घर गृहस्थी के लायक समझने वाले नरेन्द्र के लिए चुनौती बन जाती है और
प्रिया का संघर्ष बढ़ जाता है। नरेन्द्र की बच्चों को छीन लेना, घर से निकालना,
रिजर्व बैंक में पत्र लिखकर बिजनेस बंद करवाने की धमकियाँ प्रिया को अधिक
विद्रोही बना देती है। अपने पिता की मृत्यु के बाद घर में भी लड़कियाँ लानेवाला
नरेन्द्र प्रिया की बिजनेस ट्रिप को 'अकेले मोज करने की आदत' कहता है और
कहता है 'मैं सीरियस हूँ' फिर कहता हूँ यदि आज तुम लन्दन गई तो मेरे घर में
तुम्हारी जगह नहीं है। यह भी साली कोई जिन्दगी है जब देखो तब बिजनेस।
कल कस्टमर आ रहे है। तो आज सैम्पल बंधवाने में ही फैक्टरी में रात के दस
बज गये। फिर रात को साली फोन की घंटी बजती रहती है। घर न हुआ
पागलखाना हो गया।' 6 घर नरेन्द्र का है उसमें प्रिया रहे या नहीं यह निर्णय नरेन्द्र
का अधिकार क्षेत्र है। फिर सुन लो, यहाँ मत आना। आओगी तो मैं धक्के देकर
बहार निकलवा दूँगा। 7

स्त्री की परंपरागत भूमिका से भिन्न रुप परिवार एवं समाज को स्वीकार्य नहीं है।
पुरुषों के अधीनस्थ की भूमिका वाले कार्य स्त्री सदियों से कर रही है, किन्तु स्त्री जब
पुरुष के बराबर रहकर कुछ करना चाहे तो प्रश्न खड़े हो जाते है। पुरुष की इसी
मानसिकता पर अलका सरावगी की टिप्पणी है- 'ऐ औरत तूने जब भी किसी भी
कोने में पुरुष से अलग अपना कुछ बनाया है तो तुझे इसकी कीमत देनी पड़ी है 8
प्रिया ने भी जब अपने लिए पैसे कमाने चाहे अपने स्वतंत्र अस्तित्व के विषय में
सोचा, ऐसे में उसके हिस्से में सजा का आना निश्चित ही था। नरेन्द्र प्रिया को
परिवार और बिजनेस दोनों में से एक विकल्प चुनने के लिए कहता है, प्रिया
बिजनेस को चुनती है, क्योंकि वह जान चुकी है कि परिवार, प्यार, समर्पण,
वफादारी आदि शब्दों का उपयोग स्त्री को भ्रमर में फँसाने के लिए ही है। नारी के
सम्बन्ध में प्रयुक्त मानवाचक संबोधन नारी आहुति परंपरा को कायम रखने के लिए
ही होते हैं।

पुरुष सर्वोच्च वादी परिवार में प्रिया छिन्नमस्ता बनकर मुश्किल राहों में भी अपना
मार्ग बना लेती है। देश विदेश में अपना बिजनेस फैलाकर सफलता प्राप्त कर के
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित होती है। 'इन्डिया टुडे' में उसका फोटो छपता है-
'ए ग्रेट बिजनेस इन्टरप्राइझर मिसेस प्रिया।' प्रिया अपने व्यक्तित्व को एक विशेष
उँचाई पर पहुँचाकर पति परिवार एवं समाज को मुंह तोड़ जवाब देती है वहीं अपने
साहस से नारी समाज को भी एक नयी पहचान देती हुई संघर्ष द्वारा मुक्ति का मार्ग
खोजने की प्रेरणा देती है। मैंने दुःख झेला है। पीड़ा और त्रासदी में झुलसी हूँ,
जिस दिन मैंने त्रासदी को ही अपने होने की शर्त समझ लिया उसी दिन, उस
स्वीकृति के बाद, मैंने खुद को एक बड़ी गैर जरूरी लड़ाई से बचा लिया। कुछ के
प्रति मेरा समर्पण था। सारे जुल्मों के सामने सलीब पर लटकते मैंने पाया कि अब
पूरी तरह जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हूँ। 9

'छिन्नमस्ता' काश ! इस उपन्यास को मैं फिर से लिख पाऊँ' लेख में प्रभा खेतान
लिखती है साधारण मानवीय रूप में मेरी नायिका प्रिया अपनी व्यथा को कहती है
और हमें कहते कहते अपने एक त्रासद अतीत से उबारती है। समाज के अनुसार
उसे मर जाना चाहिए था, टूट जाना चाहिए था। उसका सर तो पहले ही कट चुका
था, लेकिन फिर भी वह छिन्नमस्ता देवी अपने रक्त से परिवेश से और अन्ततः
अपने पति से लड़ती हुई अपनी जिन्दगी बनाती है क्योंकि मेरे जीवन की सबसे बड़ी
प्रेरणा रही है कि स्त्री अपनी मानवीय गरिमा के लिए संघर्ष करे, उसे जगत में अपने
होने के माध्यम से हासिल करके रहे।

'छिन्नमस्ता' उपन्यास में प्रभा खेतान ने नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा को उसकी
मानवीय गरिमा के साथ प्रस्तुत किया है। छिन्नमस्ता बनकर अपने लिए रास्ता
तलाश ने का नारी का प्रयत्न समाज का तिलमिलाने वाला कटु यथार्थ है।

संदर्भ :
1 'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान पृष्ठ, 194 , 197
2 वही पृष्ठ, 157
3 वही पृष्ठ, 215
4 वही पृष्ठ, 154
5 वही पृष्ठ, 15
6 वही पृष्ठ, 14
7 वही पृष्ठ, 14
8 'शेष कादम्बरी' अलका सरावगी पृष्ठ, 78
9 'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान पृष्ठ, 10

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समीक्षक :
डॅा. दीप्ति बी. परमार प्रवक्ता - हिन्दी विभाग
श्रीमती आर. आर. पटेल महिला महाविद्यालय, राजकोट

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: दीप्ति परमार की उपन्यास समीक्षा : छिन्नमस्ता - नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा
दीप्ति परमार की उपन्यास समीक्षा : छिन्नमस्ता - नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा
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