बुधवार, 20 अप्रैल 2011

शेर सिंह की कविता - समय बलवान है

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महलों को ढहते देखा है

पर्वतों को मिटते देखा है ।

 

जवानी में ऐशो -आराम करते रहे जो

बुढ़ापे में उन्‍हें रोते देखा है ।

 

वाचालों को हकलाते और कराहते हुए

गूंगों को चिल्‍लाते देखा है ।

 

गरीब तो ईंट की तकिया पर सो लेता है

अमीर को रात- रात जागते देखा है ।

 

खुशी को गम में बदलने में देर नहीं

जीवन को मृत्‍यु से लड़ते देखा है ।

 

आदमी बेशक संग्रह पर संग्रह करता जाए

विपत्ति को बेआवाज विचरते देखा है ।

 

तूफान में दीए को जलते देखा है

रोते को हंसते हुए देखा है ।

 

चरित्र, शुचिता की दुहाई देते रहे बहुत

विश्‍वास को चूर- चूर होते देखा है ।

 

अपने आदर्शों को होम कर दिया जिन्‍होंने

जीवन में उन्‍हें ऊंचा उठते देखा है ।

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O शेर सिंह

अनिकेत अपार्टमेंट, प्‍लाट नं. 22

गिट्टीखदान लेआउट, प्रतापनगर

नागपुर - 440 022

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