बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

हर्ष छाया का दीपावली विशेष व्यंग्य : 2011 की दीपावली में ट्विस्ट

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"पुरुषोत्तम राम" चौदह साल के वनवास के बाद घर लौट रहे थे...

पूरा शहर बहुत खुश था। आज उनके चहेते राम, लक्ष्मण और सीता के साथ वापस आ रहे थे। सारा शहर जग-मग सजा हुआ था। आज का दिन "दीपावली" के नाम से मनाया जाने वाला था।

शहर भर में दीये जले हुए थे ऐसा लग रहा थ जैसे आकाश से सारे तारे ज़मीन पर आ गये हों। जहाँ तहाँ सड़कों पर, घरों के छतों पर, खिड़कियों पर, दरवाज़ों पर बस दीये ही दीये...और हर घर के आगे रंगोली..बहुत ही अद्भुत दृश्य था। अभी राम बस शहर के बाहर थे...

जैसे ही वह शहर में घुसे उन्हें घरों से आवाज़ें आ रही थी..."चलो, पहले पूजा कर लें फटा-फट फिर दीवाली मनायेंगे, पुरुषोत्तम राम बस आते ही होंगे"। राम, सीता और लक्ष्मण यह सब देख और सुन बहुत प्रसन्न थे...

जैसे जैसे राम शहर में आते गये वैसे वैसे घरों में, पूजा या तो ख़त्म हो चुकी थी या शुरु हो रही थी, दीवाली मनाने के पहले सब पूजा कर लेना चाहते थे और राम बहुत उत्सुक थे कि पूजा के बाद ऐसा तो क्या होने वाला है जिसकी इन सब को इतनी जल्दी है? "मेरे आने की खुशी में दीवाली कैसे मनाने वाले हैं, मेरे शहर के लोग?" ..सोच सोच वह मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे...

अब राम शहर के ज़रा और अन्दर आ चुके थे..उन्होंने देखा कहीं कहीं ताश के पत्ते बाहर आने लगे, और कहीं कहीं ’बोतल’ खुलने लगी...धीरे धीरे सब घरों में परिवार ,दोस्त इकठ्ठा होने लगे..ताश के पत्ते बाँटे जाने लगे और ’पेग’ बनाये जाने लगे...देखते ही देखते सारा शहर ज़ोरों से शराब पीने लगा और खुल कर जुआ खेलने लगा..जैसे जैसे राम और शहर में घुसे वैसे वैसे लोग "पटाखे" जलाने लगे..और धीरे धीरे सारा शहर पटाखों की आवाज़ से गूंजने लगा...बहुत शोर...कान फट जाये उतनी आवाज़..और बारूद के बदबू वाले धुएं से साँस लेना मुश्किल होने लगा..सीता और लक्ष्मण का भी दम घुटने लगा।

अचानक एक लावारिस "रॉकेट" लक्ष्मण की धोती के बहुत करीब से ’जम्म्म’ करके गुज़रा, उनकी धोती में छेद होते होते बचा, इस बात का शुक्र तो वह मना ही रहे थे कि धोती जल नहीं गयी वरना उतार, फेंकनी पड़ जाती...अचानक सीता ने इशारा किया तो राम ने देखा कि वह रॉकेट अब एक खिड़की से किसी घर में घुस गया, और उस घर के परदे में आग लग गयी और वह आग फिर करीब रखे पटाखों पर फैली और सारे पटाखे आनन फानन जलने-फटने लगे...जो भाग सकते थे भागे, एक सज्ज्न के मुँह पर ही एक पटाख़ा ऐसा फटा कि वह वहीं बेहोश हो गये...और उस घर में धीरे धीरे आग बढने लगी...और फिर उस "फ़्लैट" से आग बाकी की बिल्डिंग में फैलने लगी..

राम ने किसी से कहा अरे जाकर "फ़ायर ब्रिगेड" को फ़ोन करो, तो पता चला कुछ दिन पहले ही मुनिसिपल कॉरपोरेशन ने खुदाई की थी, "ब्रोड बैंड" केबल डालने के लिये सो इस इलाके के फ़ोन चल नहीं रहे..तो राम चिल्लाये.."अरे तो अपने मोबाईल से फ़ोन क्यूं नहीं करते"..जवाब आया.."अब हम पहले मोबाईल का ही इस्तेमाल करते हैं लेकिन आज त्यौहार है, आप आने वाले थे, सब बहुत खुश हैं, एक दूसरे को बधाई देते नहीं थक रहे सो मोबाईल लाइन्स जैम हो गयी हैं"...

राम कोई उपाय सोच ही रहे थे कि अचानक उन्होंने देखा एक बच्चे के माँ बाप अपने बच्चे को गोद में लिये अस्पताल की ओर भाग रहे हैं..उस दस साल के बच्चे का हाथ लगभग जल चुका था...उन्होंने देखा कि वह गाड़ी से उतर भाग रहे थे, क्योंकि रास्ते खचा खच जाम थे, गाडियाँ न आगे जा रही थी न पीछे...और चारों तरफ़ "पैं-पैं” की आवाज़ें..पीछे ट्राफ़िक में कहीं एक बेचारी सी "फ़ायर ब्रिगेड" की वैन अपना "टुन टुना" बजाते हुए रास्ता बनाने की कोशिश में थी, जो था ही नहीं...

अचानक लक्ष्मण ने देखा कि किसी एक घर से लोग बहुत ज़ोरों से लड़ते झगड़्ते बाहर आ निकले, एक आदमी दूसरे आदमी को बहुत ज़ोरों से कूट रहा था..क्यूं?..तो पता चला कि उनमें से एक ने दूसरे की बहन को शराब के नशे में छेड दिया, और बात मार पीट तक उतर आयी...उतने में अचानक देखा गया कि सामने सड़क पर एक आदमी के पीछे तीन आदमी भाग रहे थे उनमें से एक के हाथ में एक ख़तरनाक दिखता छुरा था..जुए में एक पैसा हार के भाग रहा था और बाकी उस से पैसे रखवाने के लिये उसका पीछा कर रहे थे, उसे जान से मार डालने की धमकी दे रहे थे..

चारों तरफ़ आनन फ़ानन एक अजीब डरावना सा विध्वंस मचा हुआ था..दूर एक और बिल्डिंग में आग लगी हुई थी..कुछ लोग घबराकर बचने के लिये दस और ग्यारह मंज़िल की खिड़की से कूद रहे थे...

राम बौखला गये..उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें और अभी तो आधा शहर ही देखा था..लक्षमण एक झगड़ा छुड़ाते तो कोई दूसरा शुरू हो जाता...वह भी थकने लगे थे..सो राम को लगा कि अब तो हनुमान को बुलाना ही पड़ेगा..उनके पास एक करामाती बाण था..लेकिन यह एक बाण चलाकर इस सारे शहर को बचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था..अब उन्हें क्या पता था कि ऐसे और बाणों की ज़रूरत पड़ेगी क्योंकि अब तो वह घर लौट रहे थे सो वनवास से लौट्ते लौट्ते वह रास्ते भर में "सोवेनीयर" ( जाते हुए एक भेंट..) के तौर पर लोगों को यह करामाती बाण बाँटते आ रहे थे और एक उन्होंने अपने पास यादगार के रूप में लिये रख लिया था।

शहर का हाल देखते हुए उन्हें लगा कि, इस बाण को शहर बचाने के बजाय हनुमान को बुलाने में खर्च करना चाहिये और फिर हनुमान संकेत मिलते ही अपनी वानर सेना के साथ आ शहर के लिये कुछ कर पाये..आखिर जो रावण से अकेले टकरा सकता है और सारी लंका में आग लगा देता है वह हनुमान यहाँ कुछ नहीं कर पायेगा तो कौन कर पायेगा? सो राम ने अपना धनुष कंधे से उतारा और वह करामाती तीर दूर ऊपर हवा में छोड़ा...

दूर, शहर के बाहर, जंगल में बैठे हनुमान ने आकाश में राम का बाण देखा...बाण की नोक पर "एस ओ एस" लिखा नीओन साईन चमक रहा था..हनुमान तब खाना खा रहे थे लेकिन राम का ”एस ओ एस” बाण देख सब छोड़ कर भागे और उनके एक इशारे पर सारी वानर सेना इक्कठा हो उनके पीछे दौड़ पड़ी...

अब वह तो बेचारे सब थे तो जंगले के बाशिंदे..."बॉम्ब" क्या होता है उन्हें क्या पता था..वह तो तीर कमान, भाला,गदा इत्यादि समझते थे...सो कुछ् तो शहर में घुसने के पहले ही "धमा-धम" की आवाज़ सुन सरपट वापस जंगल की ओर हो लिये..बाकी शहर के और अन्दर तक पहुँचे और अलग अलग इलाकों में फैल गये...एक जगह कुछ सात आठ वानर राहत कार्य में इतने व्यस्त थे कि कुछ बच्चों ने कब उनकी पूँछ पर सौ-सौ की लड़ी लगा दी उनको पता भी नहीं चला और फिर अचानक जब लड़ी ज़ोरों से आवाज़ करते हुए फटने लगी तब उनकी जान निकल गयी और वह डर के मारे यहाँ वहाँ भागने लगे और उनकी पूँछ पर लगी आग इधर उधर फैलने लगी..

एक बेचारे वानर ने आव देखा न ताव और सामने से आती गाड़ी को देख उस जलते हुए पटाखे को बुझाने के लिये पटाखे पर लपका..किसी बच्चे ने देखे बग़ैर वह पटाखा जलाकर बीच सड़क फेंक दिया था...अगर वह गाड़ी के आते आते ठीक उसके नीचे फटता तो बहुत बुरा अकस्मात हो सकता था, अब वह वानर पटाखे पर हड़्बड़ी में कूद तो गया और उस पटाखे को बुझा भी दिया और उस बुझे हुए पटाखे को किनारे फैंक ही रहा था कि गाड़ी से एक आदमी बाहर निकला और वानर के मुँह पर तमाचा दे मारा.."साले! चलती गाड़ी के सामने आता है?!..जाहिल!..कुछ हो जाता तुझे, तो मेनका गाँधी मेरी जान को रोती!"...

वानर बेचारा भौंचक्का सा सोचता ही रह गया कि "मैं तो शायद मदद ही कर रहा था.." और तब तक वह आदमी गाड़ी में बैठ आगे चल दिया...एक एक करके वानर बेचारे अपनी जान बचा भागने लगे...शहर का यह प्रकोप उनसे झेला नहीं जा रहा था, वानर सेना के शहर में आने के कुछ दस मिनट के अन्दर अन्दर सारे वानर दुम दबा वापस जंगल को भाग लिये..

उधर हनुमान बेचारे किसी घर में लगी आग से दो तीन को बचा कर नीचे लाते तो तुरन्त किसी और बिल्डिंग मे आग लग जाती...बेचारे हाँफ़ने लगे थे पर राम का आदेश था सो पीछे नहीं हट सकते थे...कभी ट्राफ़िक के बीच से उठा कर किसी "फ़ायर ब्रिगेड" वैन को किसी इलाके तक पहुँचा देते ताकी उनका काम उतना कम हो..पर कहीं कहीं जितनी ऊँची बिल्डिंग थी उतनी ऊँची फ़ायर ब्रिगेड् के पास सीढी नहीं थी..सो वहाँ तो उन्हें ही जाना पड़ता...फ़ायर ब्रिगेड का कोई ख़ास फ़ायदा नज़र नहीं आ रहा था...क्षेत्रीय सरकार ने बिल्डरों के साथ मिलकर पैसे खाने के चक्कर में जितने और जैसे तैसे प्लान एप्रूव कर दिये थे उतना खर्चा शहर की बाकी व्यवस्था पर नहीं किया था क्योंकि उन कामों में उन्हें ख़ुद कोई ख़ास फ़ायदा नहीं था..सो यदा कदा समाज के नाम पर किसी सड़क, स्टेशन या एयरपोर्ट का नाम बदलने के अलावा उन्होंने और किसी बात पर विषेश ध्यान देना उचित नहीं समझा था...

सो लेदेकर हनुमान आखिर थक हार राम के पास आधी बेहोशी की हालत में माफ़ी माँग लौटने लगे...लेकिन उन्होंने यह ज़रूर कहा कि "स्वामी, आप कहें तो मैं आपको और भाई लक्ष्मण और सीतामाता को अपने कंधे पर बिठा यहाँ से बाहर ले जा सकता हूँ, इस से ज़्यादा मैं कुछ न कर पाउँगा"..

राम ने सोचा ऐसे कैसे हार मान ली जाए..सो राम,सीता,लक्ष्मण और हनुमान के बीच किसी एक पचास मंज़िला बिल्डिंग की छत पर एकान्त में एक ’ब्रेन स्टोर्मिंग’ सेशन चला और कुछ ही मिनिटों में यह तय किया गया कि अमरीका से सुपरमैन या बैट्मैन या दोनों को बुलाया जाय..नीचे जलते-कटते शहर की हालत देख यह तय किया गया कि दोनों को ही बुला लिया जाय...हनुमान अपनी पूरी शक्ति लगा अमरीका की तरफ़ उडे, करीब पंद्रह मिनट् में वह वहाँ पहुँचे और दोनों को आने के लिये कहा..दोनों ने यशस्वी राम की कहानी गूगल में पढी थी और बहुत प्रभावित भी हुए थे सो वह हनुमान के साथ एक पल में हो लिये...

राम ने आकाश की ओर देखा और उनकी छाती फूल गयी..क्या दृश्य था..सीता और लक्ष्मण भी यह द्रुश्य एक टक देखते रह गये..दूर आसमान में एक तरफ़ सुपरमैन दूसरी तरफ़ बैट्मैन और बीच में हनुमान..आकाश में उड़ते हुए उनकी तरफ़ आ रहे थे...राम को लगा अब तो शहर बच जायेगा...

पचासवीं मंज़िल की छत पे खड़े होकर काले आसमान के नीचे पूरे शहर को तहस नहस देख दोनों सुपरमैन और बैट्मैन की हवा निकल गयी..उन्होंने कहा कि हम मदद तो कर सकते थे लेकिन शहर की दूसरी राहत एजेंसियों का काम करना आवश्यक है..हमारे अमरीका में तो उनके साथ मि्लकर ही हम काम करते हैं, उन एजेन्सियों की बहुत मदद मिलती है और जहाँ वह नहीं पहुंच पाते वहाँ वहाँ हम ध्यान दे पाते हैं और इस तरह दोनों मिलकर राहत कार्य संभालते हैं..

यहाँ तो आपके शहर में फ़ायर ब्रिगेड की सीढी बहुत से बहुत पंद्रह्वीं मंज़िल तक जाती है उसके बाद का तो सारा हमें करना पडेगा..फिर ट्राफ़िक जाम देखिये..लगभग सारे फ़ायर ब्रिगेड वैन तो यहाँ वहाँ अपना "टुन-टुना" बजाते जाम में अटके हुए हैं तो पहले उनको उठा उठा अपनी जगह पहुँचायें या लोगों को बचायें..

सब तो होगा नहीं और फिर सारी मेहनत के बाद भी हम बदनाम होंगे..और यह हम होने नहीं दे सकते क्योंकि इस वक़्त हम दोनों ’होलीवुड" में काफ़ी "पॉप्यूलर" हैं और हम पर एक के बाद एक फ़िल्में बन रही हैं सो हम अपना नाम ख़राब नहीं होने दे सकते, हमारी "मार्किट" पर असर पड़ेगा और फ़िल्में बननी बन्द हो सकती हैं और वैसे भी देखिये, आप तो "सर्वव्यापी’ हैं..सारे शहर में आपके "क्लोन" भाग दौड़ में लगे हुए हैं फिर भी कुछ हो नहीं पा रहा...इस मारा मारी में आप जैसे यश्स्वी के भी "क्लोन", आधे थक के किनारे बैठे हैं और कुछ "ओवर एग्ज़रशन" के मारे बेहोशी की हालत में हैं..और हमें तो आप-सा वरदान भी नहीं हम तो वैसे भी ’एक व्यापी" हैं..प्रभु हमें माफ़ करें...इतना कह वह दोनों चंगू-मंगू वहाँ से लमपट हो लिये...

कुछ देर राम ने नीचे सारे शहर का नज़ारा देखा..आग, धुआँ, शोर, चीखना, चिल्लाना, जुआ, शराब, पैं-पैं, पूँ-पूँ...तब लक्ष्मण ने उन्हें आवाज़ दी, देखा तो सीता मारे "पोल्यूशन" के बेहोश हो गयी थीं..सारा गंध तो हवा के सहारे ऊपर ही आ रहा था..और आज तो वह "बारूद” वाला बदबू मारता घना धुंआँ भी था..सीता, चैदह साल के स्वच्छ हवा पानी के बाद यह सब नहीं झेल पायीं..

लक्ष्मण ने झट हनुमान को संजीवनी बूटी लाने को कहा तो हनुमान ने समझाया कि वह जड़ीबूटी काम तो करती है पर उसे भी तो काम करने के लिये अमुक वातावरण चाहिये, और इधर जो हाल है उसमें तो बूटी यहाँ पहुँचते पहुँचते मुर्झा जायेगी सो सीतामाता को उस बूटी के पास ले जाना ही ठीक रहेगा...लक्ष्मण ने कुछ बहस करनी चाही तो राम ने उसे इशारे से चुप किया और हनुमान की ओर देखा..हनुमान ने अपनी "पोज़िशन" बनायी..राम सीता को ले हनुमान के एक कंधे पर बैठे और लक्ष्मण दूसरे कंधे पर ...नीचे शहर अपना किया अब खुद ही झेल रहा था और उड़ते हुए हनुमान के कंधे पर बैठे राम, सीता और लक्ष्मण वापस जंगल की ओर लौटते हुए काले आकाश में ओझल हो गये...

हर्ष छाया...

 

साभार - जीन्स गुरू

(http://harshchhaya.blogspot.com/2011/10/blog-post_25.html)

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