सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - आओ कहें दिल की बात : किश्त 4 - काला रंग

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आओ कहें...दिल की बात

कैस जौनपुरी

काला रंग

कैस,

जब मैं छोटी बच्ची थी...तभी मैं बड़ी बन गई थी... और अभी कुछ महीनों पहले ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मैं अपने बचपन को फिर से पाने की कोशिश कर रही हूँ...और जब तक ये खत पूरा होगा मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं फिर से एक बच्ची बन जाऊँगी. ये मेरा वादा है खुद से....

मेरे पिताजी को गुस्सा बहुत आता था. और वो अपना गुस्सा हमें दिखाते भी खूब थे. उनको बहुत छोटी-छोटी बातों पे गुस्सा आ जाता था...जैसे कि, काला रंग नहीं पसन्द था उनको. कभी समझ नहीं पाए हम इसका राज...क्यूँ उन्हें काले रंग से दिक्कत है...? और अगर गलती से भी किसी ने काली शर्ट पहन ली, तो उस दिन मम्मी की बर्तनों की अलमारी में खाली जगह बन जाती थी. खिड़कियों के शीशे, काँच के गिलास, शोपीस...यहाँ तक कि टीवी, फ्रिज भी टूटे मिलते थे अगले दिन...जंग के बाद के मैदान की तरह. बीच में तो क्या हुआ, समझ ही गए होंगे आप. ऐसा शायद तीन महीने में एक बार होता था, लेकिन मैं उसको हर पल जीती थी...क्यूंकि एक भूकम्प कभी भी आ सकता है...और मुझे उसके लिए सावधान रहने की जरुरत थी...

कहीं किसी उम्र पे पहुँच के मुझे अहसास हुआ कि इससे बचने का एक आसान तरीका है...नियमों पे चलने का...जैसा-जैसा पापा ने कहा, वैसा-वैसा करते रहो और आप परेशानी को टाल सकते हो...एक-एक करके ऐसे मैंने ना जाने कितनी कुर्बानियाँ दीं...मेरी कत्थक क्लास बन्द हो गई, जब मम्मी मेरे लिए लड़ने से थक गई...लेकिन पापा का घर की चाभी ले जाना शुरू नहीं हुआ. उनके लिए दरवाजा खोलने के लिए घर पे हमेशा किसी न को होना चाहिए था, क्यूंकि चाभी उनके ले जाने के लिए बहुत बड़ी थी. इसलिए मुझे मेरी कत्थक क्लास लाने और ले जाने वाला कोई नहीं था...

म्युजिक क्लास भी बन्द हो गई...आज समझ में आता है कि ‘अपनी बात कहना’ भी वहीं छूट गया था. वैसे काफी सालों से मालूम है, लेकिन मैंने अपनी कत्थक क्लास दुबारा शुरू नहीं की. वो बच्ची जिसने कई सारे डांस कम्पटीशन जीते थे, अब एक कदम भी आगे बढ़ाने में अपाहिज महसूस करती है.

इसी तरह काफी छोटे-छोटे हिस्से टूट कर गिर गए. आज उनको इकठ्ठा कर रही हूँ.

धीरे-धीरे पत्ते पूरी तरह मुरझा गए थे... मैंने एक खामोश कोना ढूँढ़ लिया था. अपने मुँह से एक भी शब्द निकलने की इजाजत नहीं देती थी जो एक दूसरा भूकम्प लाता...मैं लाश बन चुकी थी. आप मुझे कमरे में महसूस भी नहीं कर सकते...इस तरह. बस एक उम्मीद थी कि एक दिन उड़ जाऊँगी. और ऐसा ही हुआ.

जब स्कूल खत्म हुआ, तो मुझे घर से बाहर निकलने का मौका मिला. बल्कि मैंने अपनी जिन्दगी को इस तरह बनाया कि मुझे बाहर जाने का मौका मिले. और जो मैं चाहती थी वो मिला भी. मुझे पूरी आजादी मिली वो करने की जो मैं चाहती थी. आप मुझे लगातार काले रंग के पकड़े पहने हुए देख सकते हैं जो बेशक मेरा मनपसन्द रंग हुआ करता है...मैं कुछ खुश लोगों के साथ वक्त बिताती हूँ जो मेरे लिए थोड़ी खुशी लाए. धीरे-धीरे मैंने खुद को फिर से जिन्दा किया. जबकि हमेशा एक “गुड गर्ल” बनी रही जो आपको कभी भी उसे डांटने का मौका नहीं देती. वो “गुड गर्ल” का लेबल नहीं छोड़ पाई. लेकिन ठीक भी है. सिर्फ जिन्दगी से विद्रोह करने के लिए मुझे बैड गर्ल बनने की जरूरत नहीं है...! ये कोई मुद्दा भी नहीं है. मुद्दा है...अपने उन छोटे-छोटे टुकड़ों को वापस पाना जो गिर चुके थे.

अब मैं ये देखती हूँ कि मेरे पिताजी अपनी जिन्दगी से जूझ रहे थे...... और वो बहुत था. मैं अपने आप में इतना डूबी हुई थी कि कभी उनकी दुनिया में कदम न रख सकी. मैंने कभी ये नहीं देखा कि वो अपनी गाढ़ी मेहनत से कमाई हुई दौलत खर्च करते थे... मुझे शहर में सबसे महँगे स्कूल में भेजने के लिए...मेरे लिए मेरी जिन्दगी में हर वो ऐशो-आराम था जिसके लिए कुछ लोग सिर्फ तमन्ना करते हैं. अतीत में मैं कभी उनकी बेटी नहीं रही...

तब जिन्दगी मुझे एक दूसरे चौराहे पे ले आई...अब मैं अपने पिताजी की बेटी हूँ...एक बिल्कुल नया व्यक्तित्व हूँ...एक चमकता हुआ चेहरा...जो अपने आसपास के लोगों में ढेर सारा प्यार फैलाता है...मुझे पता है लोग मेरे पास जिन्दगी पाते हैं तो मैं कौन होती हूँ ये फैसला करने वाली कि मुझे मर जाना चाहिए. मुझे खुशी है कि मेरे बदले की भावनाओं ने कुछ उदंड हरकत नहीं करने दिया. आज मेरी जिन्दगी में जो कुछ भी है उन सब चीजों के लिए मैं भगवान का शुक्रिया अदा करती हूँ.

अब वो आखिरी टुकड़ा जो मेरे होने में वापस पाना रह गया था वो था अपनी बातों को खुल के कहना...बिना किसी झिझक के...और वही मैंने इस खत में किया है...खुद को खुश महसूस कर रही हूँ...आपसे कहके...और आपके माध्यम से दूसरों से कहके...

मुझे ऐसा करने देने के लिए शुक्रिया...!

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