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राकेश भ्रमर की कहानी - अंधेरे रास्ते

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कहानी अंधेरे रास्‍ते राकेश भ्रमर रात घनी अंधेरी थी, तिस पर वह पिए हुए था․ गिरता-पड़ता और दारू पिलाने वालों की जय-जयकार करता हुआ अकेला चला ...

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कहानी

अंधेरे रास्‍ते

राकेश भ्रमर

रात घनी अंधेरी थी, तिस पर वह पिए हुए था․ गिरता-पड़ता और दारू पिलाने वालों की जय-जयकार करता हुआ अकेला चला जा रहा था․ पैर धूल से अंट गए थे․ कपड़े चीकट हो गए थे, परन्‍तु उसे अपने शरीर की कोई चिन्‍ता नहीं थी․ वह तो लाल परी के उड़नखटोले में बैठा सातवें आसमान पर उड़ रहा था․

कर्म से वह मजदूर था, परन्‍तु आजकल काम पर नहीं जाता था․ मनरेगा का काम बंद था․ खेतों में भी कोई काम नहीं था․ केवल ईंट के भट्‌ठों में काम मिलता था, परन्‍तु वहां भी उसे जाने की जरूरत नहीं थी․ चुनाव आ गए थे․ अलग-अलग दलों के लोग गांव में प्रचार के लिए आते थे․ वोटरों को लुभाने के लिए उनको दारू की बोतल पकड़ाते थे․ सौ-पचास अलग से चुपके से दे देते थे․ उसकी ही नहीं, गांव में उसकी तरह के दूसरे निठल्‍ले लोगों की चांदी हो रही थी․ दारूबाज तो दिन रात दारू के नशे में झूमते रहते थे, परन्‍तु उनके घरों में फांकों की नौबत आ गई थी․ जिनकी घरवालियां खेत-मेड़ में काम करती थीं, वह तो घर के लोगों का किसी तरह पेट भर लेती थीं, परन्‍तु जिनके घरों में कमाने वाले केवल पुरुड्ढ थे, उनके घरों में चूहे भी भूखों मर रहे थे․ दारूबाज कहते थे, सरकार हर महीने चुनाव क्‍यों नहीं करवाती? और उनके घरों की औरतें अपने भाग्‍य को कोसती हुई कहती थीं कि आग लगे ऐसी सरकार को, जो चुनाव करवाती है और दारू देकर लोगों की सेहत खराब करती है और उनके मर्दाें को निठल्‍ला बना देती है․

वह घर पहुंचा तो घर में पूरी तरह सन्‍नाटा छाया हुआ था․ आसपास के घरों में भी कोई सुगबुगाहट नहीं थी․ जाड़ा अपनी पूरी जवानी पर था․ ऐसे में कौन जागता․ पूरी तरह से सोता पड़ गया था․ दिन भर के थके मांदे लोग गहरी नींद के आगोश में समा चुके थे, परन्‍तु रामजियावन जाग रहा था, उसके पेट में भूख भी जाग रही थी․ कच्‍ची दारू का नशा अब हल्‍का होने लगा था․ उसने जोर से दरवाजा भड़भड़ाया, ‘‘शीलू की मां, दरवाजा खोल!'' उसके स्‍वर में अनुरोध कम क्रोध भरा अधिकार ज्‍यादा था․ शीलू उसकी दूसरी बेटी थी․ बड़ी बेटी का नाम नीतू था․ उसी के नाम पर वह अपनी घरवाली को बुलाता था, परन्‍तु जब से वह बाहर चली गयी थी, अपनी पत्‍नी को दूसरी बेटी के नाम से बुलाने लगा था․

‘‘दरवाजा खोल, दरवाजा खोल'' की रट के साथ-साथ वह दरवाजे को पीटता भी जा रहा था․ अंदर से कुछ बडबड़ाने जैसी आवाजें आने लगीं तो वह और जोर से बोला, ‘‘हरामजादी, कुतिया, क्‍या अर्थी पर लेटी है, जो उठ नहीं सकती․ खोल जल्‍दी, नहीं तो तेरी․․․'' उसने अपनी सास के नाम पर घरवाली को एक भद्दी गाली दी․ तभी भड़ाक से दरवाजा खुल गया․ उसने अपने शरीर का भार दरवाजे पर डाल रखा था․ दरवाजा खुलते ही वह अन्‍दर की तरफ गिरते-गिरते बचा․

‘‘आ गया कमाकर․․․ खाएगा क्‍या․․․․ का? मरदुआ, सारा दिन पता नहीं कहां बैठकर दारू पीता रहता है, अब मरने के लिए घर आया है․ यहां तो तुझे जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं है, पेट में क्‍या ठूंसेगा? अपने बाप का․․․․?'' उसकी घरवाली ने उसे एक तरफ ठेलकर दरवाजा बंद कर लिया और रुआंसी आवाज में बड़बड़ाती आंगन की तरफ चली गई․ सर्दी बेतरह थी․ ऐसा लगता था, आदमी खड़े-खड़े ही जम जाएगा․ शाम को आग जलाकर शरीर को थोड़ी गर्मी पहुंचाई थी․ दिन को भात बनाया था, आलू की सब्‍जी थी․ वही खाकर उसने और बच्‍चों का पेट भरा था․ घर में और कुछ था ही नहीं․ क्‍या बनाती और क्‍या खाती? खसम के लिए भी थोड़ा भात और सब्‍जी बचाकर रख दी थी․

गीता तो फटाफट खटिया में रजाई लपेटकर घुस गयी․ ठण्‍डी हवा शरीर को तीर की तरह छेद रही थी․ हाथ-पैर जैसे सुन्न हो गए थे․ नाक और मुंह से भाप निकल रही थी․ बगल की खटिया पर बड़ी बेटी और दूसरे बच्‍चे एक दूसरे से चिपककर सोए हुए थे․ लगता था, पाला पडने़ लगा था, क्‍या होगा फसल का? अरहर तो पूरी तरह से सूख जाएगी․

इतनी ठंड के बावजूद रामजियावन को ठण्‍ड महसूस नहीं हो रही थी․ वह कच्‍ची जमीन पर धम्‍म से बैठता हुआ बोला- ‘‘ला खाना․''

‘‘हां, छप्‍पन भोग बनाकर रखे हैं, अभी देती हूं․'' गीता ने रजाई के अंदर से जवाब दिया और करवट बदलकर लेट गयी․

‘‘ला वही दे दे․'' वह बड़बड़ाया․

‘‘पतीली में भात रखा है और कटोरी में सब्‍जी․․․ चुपचाप खा ले․ ज्‍यादा बड़बड़ मत कर! चुनाव वाले आते हैं, तुझे दारू पिलाते हैं, तो क्‍या हजार-पांच सौ घर के लिए नहीं दे सकते कि हमारे पेट में भी अन्न का एक दाना जाए?''

‘‘देंगे, देंगे․ इस बार सरकार हमें सब कुछ देगी․ हमारे दिन भी फिरेंगे․ हम न भूखों मरेंगे, न नंगे रहेंगे․ हमारा कच्‍चा घर भी पक्‍का हो जाएगा․''

‘‘हां, हां, बड़े आए! जब से होश संभाला है, यही तो देख रही हूं․ हर दूसरे-तीसरे साल चुनाव होते रहते हैं, कभी परधानी के, कभी एमेले के, कभी एमपी के․․․ हमें क्‍या मिला? घर में न जमीन है, न आमदनी का कोई जरिया․ एक राशन कार्ड तो बना नहीं․ ऊपर से तेरे जैसा निठल्‍ला पति․․․ तीन-चार पिल्‍ले․․․ कहां से इनका पेट भरूं?'' और वह रुआंसी सी हो गई․

रामजियावन चाहे दारू पी के पत्‍नी को गाली दे, परंतु जब वह रुआंसी हो जाती और ऐसी कलेजा फाड़ देने वाली बातें करती, तो उसका नशा हिरन हो जाता․ वह शान्‍त होकर बोला, ‘‘क्‍या करूं शीलू की मां․ मैं भी जानता हूं, न तो कोई सरकार, न कोई एमेले एमपी या परधान हमारा भला कर सकता है․ मैं भी तो बूढ़ा हो गया ऐसे वादे सुनते-सुनते․․․ इसलिए जब भी प्रचार वाले आते हैं, तो जो कुछ देते हैं, ले लेते हैं․''

‘‘तो कोई अच्‍छी चीज क्‍यों नहीं देते․ आदमियों को केवल दारू क्‍यों पिलाते हैं․ रुपया-पैसा भी तो दे सकते हैं?''

‘‘कभी-कभी देते हैं, कपड़ा लत्त्‍ाा देते हैं, परंतु आजकल टी․वी․ वालों की नजर उन पर रहती है․ उनके डर से कोई पार्टी जनता को खुलेआम कुछ नहीं देती․ चुपके से दारू का पाउच पकड़ा देती है․''

‘‘हुंह, सब कहने की बातें हैं․'' वह कसमसा कर बोली, ‘‘अगर चुपके से दारू दे सकते हैं, तो चुपके से साड़ी-कंबल, रुपया-पैसा भी दे सकते हैं․ परन्‍तु नहीं, उनको तो बस हमारा वोट चाहिए․ जीतकर लखनऊ चले जाएंगे और फिर पांच साल तक हमारा खून चूसकर अपना पेट भरेंगे․ कोठी-बंगला बनवाएंगे और हमें क्‍या मिलेगा․․․? वही सूखा भात और कभी-कभी आलू की सब्‍जी․․․ अरहर की दाल कभी नसीब नहीं होती․ रोटी खाने को तरस जाते हैं․․․हुंह․ अब चुपचाप खाना खाकर सो जाओ․ आधी रात बीत चुकी है․ रात की तरह हमारे जीवन में भी अन्‍धेरा है․ इन रास्‍तों में दिया जलाकर कोई नेता नहीं रखेगा कि बिना ठोकर खाए हम आगे बढ़ जाएं․''

अगर गीता दुःखी थी, तो उसके जैसे देश के अन्‍य लाखों लोग भी दुःखी थे․ रामजियावन और गीता की उमर पचास-चालीस के बीच थी․ इतनी उमर में उन्‍होंने चालीस नहीं तो कम से कम 25 चुनाव अवश्‍य देखे होंगे․․․ परधानी का, विधायक का और सांसद का․ कभी-कभी मध्‍यावधि चुनाव भी हो जाते थे․ इतने सालों में कितने नेता आए, कितने वायदे किये गए, किसी को याद नहीं होगा․ कई सरकारें बदल गयीं, देश-विदेश में बहुत सारे परिवर्तन हुए, परंतु उनके जैसे लाखों लोगों के जीवन में क्‍या परिवर्तन आया? उनके मां-बाप मजदूर थे, ये भी मजदूर हैं और इनके बच्‍चे भी मजदूर होंगे․

राजजियावन और गीता के जीवन में अगर कोई परिवर्तन आया था, तो वह था कि उनके चार बच्‍चे हो गए थे- तीन बेटियां और एक बेटा․ भगवान जिनको धन-संपत्त्‍ाि और विद्याधन नहीं देता, उनको बच्‍चे भरपूर देता है․

रामजियावन मजदूर था, परंतु हमेशा मेहनत से जी चुराता था․ एक दिन काम करता, तो दो दिन आराम․ लिहाजा घर में हमेशा अभाव का टोटा लगा रहता․ गीता भी काम पर जाती थी, पर एक औरत की कमाई से छः व्‍यक्‍तियों का पेट कैसे भरता? अब तो खैर, पांच ही लोग बचे थे घर में․ बड़ी बेटी․․․ भगवान किसी को ऐसा दिन न दिखाये, जब किसी मां-बाप की जवान बेटी किसी के साथ मुंह काला करे और एक दिन गांव से भाग जाए․ रामजियावन और गीता के लिए तो बड़ी बेटी मर चुकी थी․

अब दूसरी बेटी भी जवान हो चुकी थी․ उसको लेकर गीता चिंताग्रस्‍त रहती, परंतु रामजियावन को न तो काम की चिन्‍ता थी, न लड़कियों के जवान होने की, न उनके शादी-ब्‍याह की․ उसके लिए न तो घर की कोई समस्‍या थी, न बाहर की․ दारू पीने के लिए दो-चार दिन काम कर लेता, फिर ढाक के वही तीन पात․․․

जीवन के बेरहम थपेड़ों की मार सहते-सहते गीता बुद्धिमान न सही, समझदार अवश्‍य हो गयी थी․ बड़ी बेटी के पैर फिसले तो उसकी आंखें खुली थीं और जब वह भाग गई तो पता चला कि गरीब के घर में केवल भूख और अभाव ही नहीं होते हैं, बल्‍कि दूसरे प्रकार के अभिशाप भी उसे पीडि़त करते रहते हैं․ गरीब की बेटी आवारा कुतिया की तरह होती है, जिसके पीछे गांव-गली के आवारा, छिछोरे और निठल्‍ले लोग पड़े ही रहते हैं․ बिना किसी शरम-लिहाज के कुत्त्‍ाों की तरह उसे घेरे ही रहते हैं․

गरीब की बेटी की इज्‍जत जाड़े की धूप की तरह होती है, जिसमें हर कोई अपना बदन सेंकना चाहता है․ उसकी इज्‍जत रोज तार-तार होती है और मां-बाप के पास टुकुर-टुकुर ताकते रहने के सिवा कोई चारा नहीं होता․ वह न अपनी बेटी को इधर-उधर जाने से रोक पाते हैं, न बेटी की इज्‍जत लूटने वाले पुरुड्ढों से लड़ाई कर सकते हैं․

परंतु अब गीता सावधान हो गई थी․ दूसरी बेटी ने चौदहवें साल में कदम रखा था और उसके शरीर में जवानी के उभार परिलक्षित होने लगे थे․ इन परिवर्तनों के साथ-साथ शीलू की आंखों और शरीर में चंचलता भी आती जा रही थी․ गीता ने ठान लिया था कि इस बेटी पर वह पूरी नजर रखेगी और उसके कदमों को बहकने न देगी․

वह अच्‍छी तरह जानती थी कि रामजियावन के किए कुछ नहीं होगा, उसे ही कुछ करना होगा․ परंतु क्‍या․․․ इसके आगे उसकी सोच बंद हो जाती․ कोई रास्‍ता उसे नजर न आता․ हर तरफ तो अन्‍धेरा छाया हुआ था․ परंतु जहां अन्‍धेरा होता है, वहीं सवेरे का आभास भी होता है․

चुनाव खत्‍म हो गये थे․ लोगों की मुफ्‍तखोरी और नशाखोरी को लगाम लग चुकी थी․ समझदार लोग अपने-अपने काम धंधे में लग गये थे․ प्रदेश में नई सरकार बन चुकी थी․ नेता गांव की गलियों से गरीब के जीवन में सुख की तरह गायब हो चुके थे․ अब पांच साल तक जनता सुकून की नींद सो सकती थी, भूखे पेट ही सही․ जीवन पहले की तरह पटरी पर दौड़ने लगा था․․․ एकरस․

रामजियावन गांव की एकमात्र दुकान पर खैनी लेने गया था․ उस दिन दुकान पर सहुआइन बैठी थीं․ लाल साड़ी और चेहरे पर लाली पाउडर पोते दमक रही थीं․ माथे पर चौड़ी बिन्‍दी थी और होंठों पर गहरी लिपस्‍टिक․․․ पहली नजर में वह किसी को भी नई नवेली दुल्‍हन नजर आ सकती थी․ सहुआइन को देखते ही रामजियावन के दिल में तरंगें हिलोरें मारने लगीं․ रिश्‍ते में भौजी लगती थीं, किलकता हुआ बोला, ‘‘राम-राम भौजी! आप कब आईं?''

सहुआइन ज्‍यादातर दिल्‍ली में रहती थीं․ गांव में सबको बता रखा था कि दिल्‍ली में वह अपनी बेटी-दामाद के साथ रहती थीं․ उनका मानना था कि बेटी नासमझ और अकेली थी․ दामाद काम-धंधे में व्‍यस्‍त रहता था․ अतः बेटी का घर संभालने चली जाती थीं․ हर दूसरे-तीसरे महीने गांव आती रहती थीं․ जब लौटकर आतीं तो रिश्‍तेदारी के गांवों में भी खूब चक्‍कर लगातीं․ लोगों का कहना था कि गांव के गरीब घरों की छोकरियों को दिल्‍ली ले जाकर वह अमीर लोगों के घरों में घरेलू काम दिलवाती थीं․ इस तरह गरीबों का भला करके पुण्‍य कमाती थीं, परंतु लोगों के मुंह से तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती थीं जो सहुआइन के एक अन्‍य प्रकार के चरित्र के पहलू को उजागर करती थीं․ सत्‍य क्‍या था, यह तो सहुआइन ही जानती थीं, या वे लड़कियां जो दिल्‍ली जाकर दुबारा अपने गांव वापस नहीं आ पाई थीं․

‘‘कल ही शाम को तो आई हूं․'' उन्‍होंने बातों में मिसरी घोलते हुए नैन मटकाते हुए कहा, ‘‘बड़ी भाग-दौड़ करनी पड़ती है․ दिल्‍ली में बेटी का घर संभालो और यहां अपना․''

‘‘क्‍यों करती हो इतनी भागदौड़? बिटिया की शादी हो गयी․ बेटा शहर में पढ़ रहा है․ साहूजी अपनी दुकान चला रहे हैं․ सूद का पैसा लगातार आ ही रहा है․ कमी क्‍या है, जो आप गांव से शहर और शहर से गांव अलटी-पलटी मारती रहती हो․'' रामजियावन ने सीधे भाव से कह दिया․ हालांकि लोगों का कहना था कि इनके घर में जो सोना-चांदी और रुपये-पैसे का भंडार है, वह अकेले साहूजी की दुकान की कमाई का नहीं है․ उसमें सहुआइन का भी काफी योगदान है․

‘‘अरे तुम नहीं समझोगे देवरजी․ जीवन के छक्‍के-पंजे तुम क्‍या जानो, गंवार जो ठहरे․․․ दस पैसे कमाने के लिए बीस तरह की तिकड़म लड़ानी पड़ती है, तब जाकर कहीं धन-दौलत जुड़ती है․''

‘‘हां सो तो है․ भौजी हमें भी शहर ले चलो न! कहीं चौकीदारी का काम दिलवा दो, जिसमें मेहनत न करनी पड़े․ बैठे-बैठे नौकरी चलती रहे और दो पैसे हाथ में आ जाएं․''

‘‘इस उमर में तुम शहर जाकर क्‍या नौकरी करोगे? बूढे़ ठाठ में सांस लेने की जगह तो बची नहीं․ हां कोई छोटी लड़की हो तो बात बन सकती है․ दिल्‍ली में सेठों और अफसरों की कोठियों में काम करने वाली लड़कियों की बड़ी मांग है․ खाना-कपड़ा और रहना मुफ्‍त और चार-पांच हजार महीना तनख्‍वाह․ असम, बंगाल और बिहार की न जाने कितनी लड़कियां उनके घरों में काम करती हैं और इज्‍जत से रहती हैं․ हम यूपी वाले तो बहुत पिछड़े हैं, तभी तो इतने गरीब हैं․ काम ही नहीं करना चाहते․'' फिर सहुआइन फुसफुसाती हुई बोलीं- ‘‘मैंने तो एक बार पहले भी कहा था कि अपनी बड़ी लड़की को मेरे साथ भेज दो․ अब तक हजारों रुपये तुम्‍हारे हाथ में होते․ परंतु तुम न माने․ मेरी बात पर ध्‍यान ही नहीं दिया․ आखिर क्‍या हुआ, बेटी ने गांव में गदंगी फैलाई और तुम्‍हारी नाक कटाकर चली गई․ न पैसा मिला, न इज्‍जत बची․ मैं तो अपनी रिश्‍तेदारी की कई गरीब लड़कियों को दिल्‍ली में काम पर लगा चुकी हूं․ तुम कहो तो तुम्‍हारी दूसरी बेटी को काम दिला दूं․ अब तो जवान और समझदार हो गई है․ कहो तो उसे इस बार साथ लेती जाऊं․ दो महीने की तनख्‍वाह एडवान्‍स में मिलेगी, पूरे दस हजार․․․ ?'' सहुआइन ने मुस्‍कराते हुए चारा फेंका․

रामजियावन का दिल धड़क उठा․ लगा किसी ने उसके दिल को मरोड़ दिया हो․ लाख शराबी सही, परंतु गैरत से महरूम नहीं था․ सहुआइन हंसमुख थीं, मीठी बातें करती थीं․ किसी के भद्दे मजाक का भी बुरा नहीं मानती थी․ परंतु गांव में उनके बारे में तरह-तरह की बातें चर्चित थीं․ मसलन उनका अवैध सम्‍बन्‍ध अपने दामाद से था, इसीलिए भाग-भाग कर दिल्‍ली जाती थीं․ उनका दामाद वहां परचून की दूकान करता था․ इसके अलावा लोग यह भी कहते थे कि गरीब औरतों को बहला फुसलाकर उनकी जवान हो रही बेटियों को दिल्‍ली में काम दिलाने के बहाने कोठे में बेच देती थीं या कुछ अधेड़ उम्र के लोगों को बेच देती थीं, जिनकी शादी नहीं हो पाती थी․ ये लोग अच्‍छा खासा रुपया देकर कमसिन लड़कियों को खरीद लेते थे और शादी करके या सीधे रखैल बनाकर घर में रख लेते थे․ तभी तो साहूजी गांव में मालामाल हो रहे थे․

रामजियावन चिन्‍ता में डूब गया था․ अच्‍छा क्‍या है, बुरा क्‍या․․․ यह उसकी समझ से परे था․ सहुआइन ने आगे चारा फेंका, ‘‘ज्‍यादा मत सोचो देवर जी․ गरीब के जीवन में ज्‍यादा सोचने के लिए कुछ नहीं होता․ बस, फटाफट तय कर लो․ दस हजार अभी रख लो, बाकी जब-जब मैं आऊंगी, बेटी की तनख्‍वाह तुम्‍हें लाकर देती रहूंगी․ या कहोगे तो अगली बार आकर एक साल की पूरी तनख्‍वाह तुम्‍हारे हाथ में धर दूंगी․ पूरे पचास हजार रुपये!'' इतना लुभावना चारा तो कोई भी हजम कर सकता था․

रामजियावन की आंखों में चमक आई, फिर अचानक ही बुझ गई․ इतने पैसे क्‍या वह एक साथ अपने जीवन में देख सकेगा? क्‍या करेगा इन पैसों का, अगर उसे एक साथ मिल गये? बैंक में जमा कर देगा, तीसरी बेटी का ब्‍याह करेगा? बेटे को पढ़ायेगा? या दारू पीकर उड़ा देगा? उसकी कुछ समझ में न आया․ इतने पैसे के बारे में सोचकर ही उसका दिमाग चकराने लगा․ जब हाथ में आएंगे तो कहीं पागल न हो जाए․ परंतु गीता․․․उसकी घरवाली․․․ क्‍या वह बेटी को दिल्‍ली भेजेगी?

‘‘जाओ देवर जी घर जाओ․ घरवाली से एक बार पूछ लो․ ऐसा मौका बार बार नहीं आएगा․ जवान बेटी का ब्‍याह तो कर नहीं पाओगे, फिर वह भी कहीं नाक कटा बैठी तो? काम करेगी तो तुम्‍हारे घर की हालत भी सुधर जाएगी․ सुख से दो रोटी तो खाओगे? बाद में कहीं उसकी शादी कर देना, तब तक तीसरी बेटी काम करने लायक हो जाएगी?'' सहुआइन ने मुस्‍कराते हुए रामजियावन के विचारों को छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया․ रामजियावन ने घूरकर सहुआइन को देखा उनकी आंखों में अनोखी चमक थी․ क्‍या वह उनकी जीत की चमक थी, या रामजियावन के जीवन में आने वाले अंधेरे के पहले की रोशनी․

जवान होती बेटी․․․ दस हजार रुपये․․․ पचास हजार रुपये․ तीनों चीजें आपस में गड्ड-मड्ड हो रही थीं․ उनके बीच में रामजियावन उलझ गया․ रातभर ऊहा-पोह में पड़ा रहा․ सोच-सोचकर सांसें फूलतीं, परन्‍तु कुछ तय नहीं कर पाया․ इसी दुविधा में पत्‍नी को कुछ नहीं बताया․

परंतु सहुआइन चुप कहां बैठने वाली थीं․ उसने चारा फेंका था․ उसे तो देखना ही था कि मछली कितना चारा खाती है और कितना कांटा निगलती है․ चारा खाएगी तो कांटा उसके मुंह में फंसना ही था, फिर मछली को पकड़ने और मारने में कितना समय लगता है․ गरीब तो वैसे भी जमीन पर पड़ी हुई मछली के समान होता है, जिसकी अन्‍तिम सांसें कभी भी निकल सकती हैं․ कोई भी उसे मारकर खा सकता है․

दूसरी सुबह सहुआइन सुबह-सवेरे रामजियावन के घर आ गयीं․ इधर-उधर की बातों के बाद चुपके से पूछा- ‘‘देवर ने तुम्‍हें कुछ बताया या नहीं․''

गीता चौंककर बोली- ‘‘क्‍या․․․ क्‍या? नहीं तो․''

‘‘अच्‍छा․'' सहुआइन ने चौंकने का अभियन किया, फिर धीरे-धीरे उसे भी शीशे में उतारने लगीं․ चालाकी से ऐसी-ऐसी मीठी बातें कीं कि लगने लगा कि उसके घर में लक्ष्‍मी की बरसात होने वाली है, बस शीलू को दिल्‍ली भेजने की देर है․ सहुआइन की बातें उसे लुभा रही थीं, परंतु उनके बारे में गांव में जो चर्चा थी, उसके कारण मन में डर भी था कि कहीं बेटी को उनके साथ भेजकर किसी मुसीबत में तो नहीं डाल देगी? ․

परंतु रुपयों का लालच बहुत बड़ा होता है․ मन लालच और शंका के बीच में झूलता रहा․

‘‘जवान हो रही बेटी को अकेले कैसे भेज दें? दिल्‍ली में किसके यहां रहेगी, कैसे रहेगी? किसका आसरा करेगी? मां-बाप, भाई-बहिन कोई नहीं․․․ सब पराये आदमी․․․ उनके बीच कैसे रहेगी?'' लालच के बीच से गीता के मन में शंका के साये ने मुंह उठाया․

सहुआइन ने उसकी शंका को एक झटके में मार दिया, ‘‘मैं हूं न, क्‍या तुमको मेरे ऊपर भरोसा नहीं? और वह काम भी उसी घर में करेगी, जिसमें पूरा परिवार․․․ मां-बाप, भाई-बहन, बहू-बेटे, बच्‍चे․․․ सभी होंगे․'' फिर सहुआइन ने बात को घुमाते हुए कहा, ‘‘देखो बहन अपने घर की हालत देखो․ दीवारें गिर रही हैं․ जाड़े में भी बच्‍चों के बदन पर कपड़े नहीं․ जो हैं, वो भी फटे हुए․․․ सोचो एक बार बेटी काम पर लगी तो सब के दिन फिर जाएंगे․'' फिर उन्‍होंने शीलू को अपनी तरफ बुलाते हुए कहा, ‘‘यहां आओ! देखो तो कितनी जवान हो गई है, परन्‍तु सारा बदन उघड़ा हुआ है․ गांव के लोगों को तो तुम जानती हो․ क्‍या हुआ तुम्‍हारी बड़ी बेटी के साथ? गंदे लोगों की निगाहों और हाथों से कहां बच पायी? अब क्‍या चाहती हो कि छोटी बेटी भी उसी रास्‍ते पर चले, जिस पर चलकर तुम्‍हारी बड़ी बेटी तुम्‍हें बदनामी का कभी न छूटने वाला दाग दे गयी․ सोचो मत! दिल्‍ली में इसकी इज्‍जत भी सुरक्षित रहेगी और कमाकर तुम्‍हें दो पैसे का सुख भी देगी․''

सहुआइन ने गीता को कुछ सोचने-समझने का मौका नहीं दिया और सौ-सौ रुपये की एक गड्‌ड़ी गीता के हाथों में पकड़ाकर बोली, ‘‘ये रख लो․ काम आयेंगे․ अगली बार आऊंगी तो पूरे साल की तनख्‍वाह तुम्‍हारे हाथ में होगी․'' फिर शीलू के सिर पर हाथ रखकर बोली, ‘‘मेरे साथ दिल्‍ली चलोगी? वहां थोड़ा काम तो करना पड़ेगा, परंतु खाने-पीने, रहने और पहनने का सुख होगा․ मौज करोगी, हां, जाने के पहले मैं तुम्‍हारे लिये एक जोड़ी कपड़े भिजवा दूंगी․ परसों ही चले चलेंगे․ शुभ काम में देरी नहीं․'' उनकी बातों से लग रहा था, वह बहुत जल्‍दी में है․ किसी को सोचने समझने का मौका नहीं दे रही थीं․ सब कुछ जैसे पहले से तय करके आयी थीं․

शीलू ने एक बार मां की तरफ देखा․ मां नोटों की गड्‌डी को देख रही थी․ उसकी आंखों में कुछ ऐसे भाव थे, जैसे बेटी को बेच रही थी․ शीलू इस तरह सहमी खड़ी थी जैसे कबूतरी ने बाज को देख लिया था․ वह किसी कोने में दुबकना तो चाहती थी, परंतु बाज से बचने का कोई उपाय उसे नजर नहीं आ रहा था․ सबके मन में अलग-अलग विचार थे, परंतु उन विचारों पर वक्‍त की काली छाया पड़ी हुई थी और वह कुछ देखने-समझने में असमर्थ थे․ किसी भी घटना को चाहकर भी वह रोक नहीं सकते थे, क्‍योंकि वह तो निमित्त्‍ा मात्र थे․ साधने वाला कोई और था․

सहुआइन की मीठी-मीठी बातों और दस हजार की गड्डी ने सारी अच्‍छी-बुरी बातों पर मोटा पर्दा डाल दिया था․

सहुआइन के जाने के बाद गीता ने पति से पूछा, तो वह तपाक से बोला, ‘‘मैंने भी रात भर इस बात पर विचार किया है․ घर में पांच प्राणी हैं․ हम दो कमाने वाले․ बेटी भी कमाने लगेगी, तो घर की हालत सुधर जाएगी․ छोटी बेटी और बेटे को स्‍कूल में डाल देंगे․''

‘‘परंतु सहुआइन दीदी के बारे में लोग तरह-तरह की बातें करते हैं, कहीं शीलू को दिल्‍ली ले जाकर बेच न दें?'' गीता के मन में शंका के पैर काफी दूर तक फैले हुए थे․

रामजियावन सहम गया, फिर जी कड़ा करके बोला, ‘‘वैसे तो सहुआइन गांव की इज्‍जतदार औरत हैं․ इतना बड़ा अपराध नहीं करेंगी․ वरना जब गांव लौटकर आयेंगी तो क्‍या जवाब देंगी हमें?'' उसने पत्‍नी को समझाना चाहा․

‘‘हम क्‍या जवाब लेंगे उससे? अगर बेटी को बेच भी देंगी तो हम उनका क्‍या बिगाड़ लेंगे? क्‍या थाना-कचहरी करेंगे? कोई हमारी सुनेगा? नहीं․․․ वह रुपये-पैसे वाली हैं․ पैसे से सबका मुंह बंदकर देंगी․''

‘‘बेटी के भाग्‍य में क्‍या है, यह तो कोई नहीं जानता, परंतु सोचो, उसको दिल्‍ली भेजने से कितना पैसा हमें मिल रहा है? आगे भी मिलेगा․ फिर आगा-पीछा छोड़ो․ सोचने से हमारा भला नहीं होने वाला․ मैं तो समझता हूं, शीलू हमारे लिए लक्ष्‍मी बनकर आई है, वरना गरीब की बेटी अपने मां-बाप को दुःख, लांछन और कर्ज के सिवा क्‍या देती है? सोचो, बड़ी बेटी ने हमें क्‍या दिया?''

रामजियावन की बातों में दम था․ गीता ने भी अपने जीवन में इतने दुःख सहे थे कि उसने भाग्‍य के भरोसे सब कुछ छोड़ दिया․ घर आई लक्ष्‍मी को कौन लात मारता है? जो मारते हैं, वे सदा गरीबी और कर्ज के सागर में डूबे रहते हैं․ अंततः सब कुछ भाग्‍य के भरोसे छोड़कर राजजियावन और गीता ने वहीं करने का निर्णय लिया, जो नियति उनसे करवा रही थी․

वह लोग समय से काफी पहले स्‍टेशन पहुंच गये थे․ गीता भी साथ में आई थी उन्‍हें स्‍टेशन छोड़ने․ सहुआइन ने मना किया था, परंतु उसका दिल न माना․ बेटी इतनी दूर पहली बार घर से बाहर जा रही थी․ पता नहीं कब मुलाकात हो? उसका दिल बैठा जा रहा था․ इसीलिए स्‍टेशन तक आ गयी थी․

गाड़ी आने में अभी आधा घंटा था․ सहुआइन खुश थीं․ गीता का दिल दहल रहा था․ शीलू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उसके जीवन में क्‍या होने वाला था․ वह नए कपड़ों में काफी सुन्‍दर दिख रही थी, परन्‍तु नए कपड़े पहनकर भी वह खुश नहीं दिख रही थी․ उसके विचार उसे पीछे गांव की तरफ खींच रहे थे और वह मां से कहना चाह रही थी, ‘अम्‍मा मुझे अपने से दूर क्‍यों कर रही हो? मैं तुम्‍हारे बिना वहां कैसे रहूंगी?' परन्‍तु उसकी जुबान तालू से चिपक कर रह गयी थी․

जैसे-जैसे समय आगे सरक रहा था, गीता को लग रहा था, कहीं कुछ गलत तो नहीं कर रही थी․ बेटी को कुएं में तो नहीं धकेल रही थी? सोच-सोचकर उसका दिल छोटा होता जा रहा था, परंतु इसके साथ ही गांव का एक अलग चित्र भी उसकी आंखों के आगे उभरने लगता था․ लम्‍पट और निठल्‍ले लोग उसकी बेटी को घेरे हुए हैं․ सब उसके साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं․ उसे लुभा और बरगला रहे हैं, उसके शरीर को नोच रहे हैं, खेत के भीतर ले जाकर उसकी इज्‍जत लूट रहे हैं․ यह दृश्‍य मन में आते ही उसको थोड़ी सान्‍त्‍वना मिली कि कुछ भी हो, शहर में उसकी बेटी के साथ कोई जबरदस्‍ती तो नहीं करेगा․

मन को ऐसी सान्‍त्‍वना देने के बावजूद भी उसे लग रहा था कि वह अपनी बेटी से सदा के लिए बिछड़ने जा रही थी․ उसकी बेटी के भविष्‍य में क्‍या है, वह नहीं जानती थी․ सहुआइन दीदी ने जो बताया था, वह पूरा सच नहीं हो सकता था․ अगर सच हो तो कितनी अच्‍छी बात है․ वह अपने मन को समझाने की कोशिश करती कि सहुआइन दीदी सचमुच उसकी बेटी को किसी अच्‍छे घर में काम करने के लिए ले जा रही हों․ दिल्‍ली में वह ढेर सारे पैसे कमायेगी और एक दिन जब वह ढेर सारे पैसे लेकर गांव आयेगी, तो धूमधाम से उसकी शादी कर देगी․

वह अपने मन को तसल्‍ली देती और सोचती कि यह तसल्‍ली झूठी न हो․

प्‍लेटफार्म पर भीड़ बढ़ गई थी, गाड़ी बस आने ही वाली थी․ चारों तरफ चीख-चिल्‍लाहट और शोर-शराबा था․ जैसे ही ‘‘गाड़ी आ रही है'' का शोर तेज हुआ, गीता ने बेटी को अपने सीने से लगा लिया और रोती हुई बोली, ‘‘बेटी चिंता न करना, दीदी को बोलूंगी कि तुमको जल्‍दी लेकर गांव आ जाएं․ वहां ठीक से रहना और अपने काम से काम रखना, इधर-उधर घूमना मत, जमाना बहुत खराब है․'' और फिर वह तेजी से रोने लग गई․ शब्‍द जैसे चुक गये थे․ बेटी को विदा करते समय माताएं केवल रोती हैं, वह कुछ कह नहीं पाती․ यही स्‍थिति उस समय गीता की थी․

सहुआइन ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं साल-छः महीने में उसे लेकर गांव आती रहूंगी․''

शीलू अपनी मां के सीने से लगकर बोली, ‘‘मां मुन्ने का ख्‍याल रखना, उसे खुला मत छोड़ना, वरना बिल्‍ली उसे खा जायेगी․ अगली बार जब मैं गांव आऊंगी तब वह बड़ा हो चुका होगा और क्‍या वह मुझे पहचान पायेगा?'' उसके मुंह से सिसकी फूट पड़ी․

गीता ने इसी साल एक बकरी पाली थी․ उसने दस दिन पहले ही एक बच्‍चा जन्‍मा था, उसी बच्‍चे को शीलू मुन्ना कहती थी․ उसे इतना प्‍यार करती कि हर वक्‍त अपनी गोदी में लिये घूमती फिरती थी․ रात को भी अपने बिस्‍तर पर सुलाती․ कहीं बाहर जाती तो उसे झौवे के अन्‍दर छिपाकर उसके ऊपर दरेती का पत्‍थर रख देती, जिससे कोई कुत्ता या बिल्‍ली उसे पकड़ न सके․

शीलू की बात सुनकर उसकी मां बोली, ‘‘हां बेटी, हां, मैं उसका ख्‍याल रखूंगी, तुम अपना ख्‍याल रखना, रोना मत!'' और तभी धड़धड़ाती हुई ट्रेन प्‍लेटफार्म पर आ रुकी․ लोग इधर-उधर भागने लगे․ सहुआइन ने अपना झोला उठाया और शीलू को पकड़कर खींचते हुए बोलीं, ‘‘चलो, चलो, जल्‍दी करो, डिब्‍बा पीछे है․'' और वह उसे खींचते हुए पीछे की तरफ भागीं․ उन्‍हें पता था कि जनरल डिब्‍बा किस तरफ लगता था․ गीता भी उनके पीछे लपकी․ उसे लगा जैसे उसकी बेटी को कोई उससे छीने ले जा रहा था․

उसने ध्‍यान से देखा तो पीछे से सहुआइन उसे डायन जैसी लगीं․ वह उसकी बेटी को उससे छीनकर भगाए ले जा रही थीं․ उसने अपने कदमों को तेज किया कि डायन के हाथों से अपनी बेटी को छुड़ा ले, परंतु सहुआइन रूपी डायन के कदम सधे हुए थे और तेज गति से आगे की तरफ बढ़ रहे थे․ गीता को प्‍लेटफार्म पर दौड़ने का अभ्‍यास नहीं था․ वह बार-बार लोगों से टकरा जाती और रुककर अपनी बेटी की तरफ देखने लगती․ भीड़ में उसकी आंखें भटक जातीं․ जब तक उसे डायन नजर आती, तब तक वह उसकी बेटी को लेकर काफी आगे निकल चुकी होती․

पलक झपकते ही सहुआइन शीलू का हाथ पकड़े डिब्‍बे में चढ़ गईं․ गीता जब तक डिब्‍बे के पास पहुंची, तब तक सहुआइन और शीलू डिब्‍बे के अन्‍दर प्रवेश कर चुकी थी․ चढ़ने वाले लोगों ने उन दोनों को और ज्‍यादा अन्‍दर कर दिया था․ उसने बहुत कोशिश की, परंतु डिब्‍बे के अन्‍दर शीलू उसे कहीं दिखाई नहीं दी․ भीड़ बहुत ज्‍यादा थी और भीड़ के कारण डिब्‍बे के अन्‍दर उन दोनों को देखना गीता के लिए संभव नहीं था․ वह धम्‍म से जमीन पर बैठ गई․ उसे लगा, डायन उसकी बेटी को जिन्‍दा निगल गयी थी․

रेलगाड़ी ने जोर से सीटी दी और धीरे-धीरे पटरी पर सरकने लगी․ धीरे-धीरे गाड़ी की गति में तेजी आती गई और उसी तेजी से गाड़ी के पहियों के चलने की आवाजें भी ऊंची होती जा रही थीं․ गीता की सूनी आंखों के सामने रेलगाड़ी के पहिए धड़धड़ाते हुए आगे बढ़ते गये․ उसे लगा जैसे ये रेल के पहिए पटरी पर नहीं उसके सीने पर चल रहे थे․

वह संज्ञाशून्‍य होकर प्‍लेटफार्म पर लेट गई․

---

(राकेश भ्रमर)

7, श्री होम्‍स, कंचन विहार,

बचपन स्‍कूल के पास, विजय नगर,

जबलपुर-482002 (म․प्र)

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(चित्र - नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप की मुखौटा कलाकृति)

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नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,226,लघुकथा,808,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: राकेश भ्रमर की कहानी - अंधेरे रास्ते
राकेश भ्रमर की कहानी - अंधेरे रास्ते
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