बुधवार, 15 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -36- कविता वर्मा की कहानी : सगा सौतेला

सगा सौतेला

कविता वर्मा

ट्रिंग ट्रिंग फ़ोन की घंटी की आवाज़ ने सुधीर को अख़बार छोड़ कर उठने को विवश कर दिया.

-हलो सुधीर भैया ब्रज बोल रहे हैं राधा भाभी नहीं रहीं.

-अरे कब कैसे? अच्छा बहुत दिनों से बीमार थीं क्या हुआ था?नहीं नहीं मुझे नहीं पता ठीक है कब ले जायेंगे? पूछते पूछते सुधीर ने हिसाब लगाया चार घंटे का सफ़र ट्रेन तो मिलेगी नहीं अभी कोई, कार से भी तुरंत निकलना होगा. अच्छा सविता, सुधा और बाकियों को खबर कर दी है ठीक है हम पहुँचते हैं. फोन रखकर पलट कर देखा नेहा प्रश्नवाचक मुद्रा बनाये खडी थी.

-भाभी नहीं रहीं,अभी निकलना होगा.

-कब? हमें तो कभी कोई खबर ही नहीं की.

ना चाहते हुए भी नेहा का स्वर कसैला हो गया. सुधीर ने इसे महसूस तो किया पर इसे नज़रंदाज़ करना ही उचित समझा.

-तुम चलने की तैयारी करो कल शाम तक लौटना होगा. मैं ऑफिस का इंतजाम करके घंटे भर में आता हूँ. कहते हुए सुधीर जवाब का इंतजार किये बिना कमरे से निकल गया.

कार चलाते हुए सुधीर बिलकुल खामोश था. नेहा ने एक बार उसकी ओर देखा फिर बाहर देखने लगी. सुधीर के दिमाग में पिछले पचास सालों की घटनाएँ चलचित्र की भांति चल रहीं थीं.

राधा भाभी याने उसके सौतेले बड़े भाई गोपाल की पत्नी. सुधीर के पिताजी की पहली पत्नी के बेटे थे गोपाल भैया. उनकी माँ की मौत के बाद सुधीर के पिताजी ने दूसरी शादी की थी. उनसे सुधीर और उनकी दो छोटी बहनें थीं. सुधीर की उम्र जब सात आठ बरस की रही होगी जब पिताजी चल बसे तब तक गोपाल भैया की शादी हो चुकी थी. घर में कमाने वाले गोपाल भैया अकेले थे. छोटा सा जमीन का टुकड़ा और उस पर गुजारा करने वाले गोपाल भैया के तीन बच्चों समेत नौ लोगों का परिवार. गाँव में खुद का लम्बा चौड़ा मकान था सो जगह की कमी नहीं थी. लेकिन राधा भाभी को उनका वहां रहना बिलकुल ना सुहाता था और बहू होते हुए भी माँ के लिए उनके ताने उलाहने हमेशा चलते रहते थे. अपने बढ़ते परिवार को देखते हुए सौतेले भाई द्वारा संपत्ति में हिस्सा मांग लेने का भय उन्हें हमेशा सताता रहा. फिर दो-दो बहनों की शादी और उसके बाद के खर्च खुद का ही गुजारा मुश्किल से होता था . अंततः माँ को तीनों बच्चों को लेकर नानाजी के पास आना पड़ा.

--

रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

----

 

नानाजी अपनी विधवा बेटी और उसके बच्चों को पालने का जतन करते रहे. अचार बड़ी पापड़ बनाते और लोगों के कपडे सिलते माँ ने किसी तरह सुधीर को ग्रेजुएशन करवाया. एक बहन की शादी नानाजी के रहते हो गयी थी. उनके गुजर जाने के बाद छोटी बहन की शादी और घर की जिम्मेदारी सुधीर पर आन पड़ी. इधर उधर की छोटी मोटी नौकरी करते हुए वह माँ का संबल बना रहा. इस बीच गाँव से नाम मात्र का ही संपर्क रहा. गोपाल भैया के यहाँ से परिवार बढ़ने की ख़बरें आती रहीं. उनका तीन लड़कियों और तीन लड़कों का समृद्ध परिवार हो गया. लेकिन उनकी समृद्धि बढ़ने के समाचार गाँव से आने वाले किसी रिश्तेदार से ही मिलते.

भौजी गोपाल भैया ने नदी के पास एक और खेत खरीद लिया. इस साल धान की फसल खूब लहलहाई है जैसी ख़बरें देकर रिश्तेदार अपना धर्म निभा लेते. माँ ऐसी ख़बरों पर निर्विकार ही बनीं रहतीं . वह खबर देने वालों की मंशा भी जानती थीं और गोपाल भैया से खबर ना मिलने का मतलब भी,पर वह खुद इतनी असहाय थीं कि कुछ भी प्रतिक्रिया व्यक्त करके रिश्ते के जर्जर पड़े इस धागे को तोड़ देने का साहस ना कर पातीं.

अचानक गाड़ी के सामने भैंस के आ जाने से सुधीर ने जोर से ब्रेक लगाया. इसी के साथ ही विचारों की रफ़्तार भी टूट गयी. उसने नेहा को देखा वह सामने टकराते टकराते बची थी.

सीट बेल्ट लगा लो इस सड़क पर ऐसे ही अचानक ब्रेक लगाने पड़ते हैं. सुधीर ने कहा. गाड़ी ने फिर गति पकड़ी और सुधीर के विचारों ने भी.

सुधीर की बैंक में नौकरी लग गयी. छोटी बहन की शादी हो गयी पर गोपाल भैया के यहाँ से कोई ना आया. शायद उन्हें डर था कि सामने पड़ने पर कोई अन्य खर्च सर पर ना मढ़ दिया जाये . हाँ बहन के पैर पखारने के लिए एक हल्का फुल्का गहना और दहेज़ के पांच बर्तन जरूर आये जिन्हें स्वीकार कर लिया गया.

सुधीर की शादी की खबर गोपाल भैया को काफी पहले से दे दी गयी थी साथ ही बारात में घर के बड़े की हैसियत से चलने का आग्रह भी था. तब इतने सालों में गोपाल भैया भाभी पहली बार आये थे और बारात की सारी व्यवस्थाएं भी संभाली थीं. भाभी माँ के साथ काम में हाथ बंटाती रहीं. पुरानी बातें उकेरने का ना समय था ना किसी ने कीं. भाभी ने ही घर की बड़ी बहू के रूप में नेहा की मुंह दिखाई की.

सुधीर की नौकरी से गोपाल भैया और भाभी को अब ये तसल्ली तो थी की अब वो उन पर बोझ तो नहीं बनेंगे. बहनों की जिम्मेदारियां निबट ही गयीं थीं. बाकी रिश्तेदारी व्यवहार निभाने में सुधीर अब सक्षम था. लेकिन सम्बन्ध अभी भी गहरे नहीं हुए थे. शायद पुश्तैनी जायदाद में हिस्से की आशंका उनके मन के किसी कोने में दुबकी हुई थी,जो उन्हें सुधीर से एक दूरी बनाये रखने को विवश कर रही थी.

इसके बाद जिंदगी बहुत आसान तो ना थी पर एक तसल्ली थी एक अच्छी नौकरी और गोपाल भैया से पत्रों के माध्यम से सतत संपर्क. अब गोपाल भैया माँ को कभी कभार गाँव आने को लिख देते थे. माँ भी ब्याह कर तो उसी घर में गयीं थीं सो वे भी वहां जाने की हुलस दबा ना पातीं और साल में महीने पंद्रह दिनों के लिए गाँव चली जातीं. लेकिन वहां भी अपने आने जाने का खर्च रिश्तेदारी के व्यवहार खुद ही निभातीं इसलिए वो गोपाल भैया पर कोई भार भीं ना थीं. वहां उन्हें अब यथोचित सम्मान मिलता था.

सुधीर ने अपनी सूझबूझ से अपनी गृहस्थी बना ली. नेहा भी अपनी चादर देख कर ही अपनी उमंगों के सिरे संभाले रही. सीमित आय में बच्चों की अच्छी देखभाल और माँ का यथोचित सम्मान के साथ जीवन के छोटे मोटे उतार चढ़ाव वे बखूबी पार करते रहे. उधर गोपाल भैया तीन- तीन बेटियों की जिम्मेदारी उठाने में खुद को अकेला पाते रहे ओर किसी तरह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होने के लिए गरीब कम पढ़े लिखे लड़कों से बेटियों की शादी करते रहे. सगाई होने तक सुधीर को कोई खबर तक ना दी जाती हाँ शादी में सपरिवार आने का आग्रह जरूर होता. शायद गोपाल भैया अपनी बढ़ती जिम्मेदारियों में खुद को अकेला पा कर सुधीर को उसकी जिम्मेदारियों के साथ अकेला छोड़ देने पर शर्मिंदा थे. इसलिए अपनी जिम्मेदारियों के लिए उससे सलाह या मदद माँगने का साहस ना जुटा पाते.

वक्त अपनी रफ़्तार से चल रहा था कि थोड़ा रुक जाते चाय वगैरह पी लेते,नेहा की आवाज़ में उसे वर्तमान में ला दिया. पिछले ढाई घंटों से वह बिना बोले अपने ही विचारों में गुम गाड़ी चला रहा था . नेहा कितनी बोर हो रही होगी ये ख्याल तो उसे आया ही नहीं. वह थोड़ा असहज हो गया. नेहा ने उसे कभी भी भाई भाभी के व्यवहार का उलाहना नहीं दिया और आज भी बिना किसी शिकवे शिकायत के पिछले ढाई घंटों से इस रिश्ते की मूकता के बावजूद उस के साथ चली जा रही है. लेकिन सुधीर के मन में यह रिश्ता पूरी मुखरता के साथ मौजूद है. वह एकाएक नेहा के प्रति अधिक सतर्क हो गया.

चाय के साथ कुछ खाओगी लाऊं? उसने पूछा.

हाँ देखो क्या है अभी कुछ खा लेते हैं वहां जा कर पता नहीं कितनी देर लगे.

सुधीर चौंक कर जैसे यथार्थ में उतरा भैया भाभी तो अब तक उसके साथ ही थे . हाँ हाँ अब तक तो सारे रिश्तेदार भी आ गए होंगे .

नहीं सुधा की ट्रेन तो तीन बजे तक आएगी तब तक तो रुकेंगे ही.

फिर तो हम समय से पहुँच ही जायेंगे .

आप भी कुछ खा लो सब काम होते होते शाम हो जाएगी कब तक भूखे रहोगे . नेहा ने कहा

सुधीर की इच्छा नहीं थी कुछ खाने की घर में ग़मी हो गयी है क्रियाकर्म के पहले कैसे कुछ खा ले. आज जाने क्यों वह जुड़ाव महसूस कर रहा था. नहीं मेरी इच्छा नहीं है उसने बात टाली.

अरे इच्छा अनिच्छा क्या  है नहीं खाओगे तो एसिडिटी हो जाएगी.

सुधीर ने बेमन से चाय के साथ ३-४ बिस्किट खाए.

कार में बैठते ही सुधीर ने सी डी प्लेयर ऑन कर दिया . नेहा के अकेलेपन का एहसास था उसे.

भाभी की बीमारी की कभी खबर नहीं मिली. कुछ बताया बृज भैया ने क्या हुआ था?

हाँ बीमार थीं कई दिनों से,वही पेट की तकलीफ अल्सर था. खाना पीना सब छूट गया था.

हूँ खुद बीमार थीं,बहुओं से तो कोई उम्मीद थी नहीं बीमारी में जाने कौन देखभाल करता होगा? 

क्यों बहुओं का क्या?? सुधीर ने पूछा.

पिछले महीने कुसुम दीदी मिलीं थीं बता रहीं थीं की भाभी बेटे बहुओं के झगड़े से बहुत दुखी थीं.

बहुओं का तो ठीक है लेकिन बेटों का क्या? सुधीर जानने को उत्सुक हुआ.

तीनों बेटों में बिलकुल नहीं बनती. जायदाद ओर काम के बंटवारे को लेकर रात दिन झगड़े होते हैं. नेहा ने कहा.

तुमने कभी बताया नहीं?

अब बताती भी तो क्या कर लेते हम? फिर भैया ने भी तो तुम्हे कभी कुछ नहीं बताया. जब वो ही परायापन पाले हुए हैं तो हम जानकार कर भी क्या लेते? 

सुधीर समझ रहा था. गोपाल भैया से उसका सौतेला रिश्ता था और इस सौतेलेपन का कारण पुश्तैनी जायदाद ही था. इसमें हिस्सा ना देने के लालच में ही भैया भाभी ने दूरियां बढ़ाईं थीं. वैसे तो उनमें कोई वैचारिक मतभेद नहीं था एक दूसरे के लिए यथोचित मान भी था. गोपाल भैया अब कैसे बताते की इसी जायदाद के लिए सगे भाइयों में सर फुटोव्वल हो रही है. भैया भाभी की अजीब स्थिति थी किसकी तरफ बोलें? 

पांच साल पहले बेटे की शादी के लिए घर की पूजा में शामिल होने सुधीर सपरिवार गाँव गया था. पूरे गाँव में पता नहीं कैसे ये खबर फ़ैल गयी की सुधीर जायदाद में हिस्सा लेने आया है. गोपाल भैया भी तब तक जायदाद के लिए बेटों के झगड़ों से तंग आ गए थे. उनके बीच बंटवारा भी वो कर देते लेकिन सगे भाई एक दूसरे के लिए अपना दिल बड़ा करने को तैयार नहीं थे. हर कोई मकान के बड़े हिस्से और खेती की बड़ी जमीन के लिए अड़ा था. गोपाल भैया से भी लड़कों की इसी बात को लेकर तकरार होती रहती और गोपाल भैया उन्हें ये कह कर चुप करा देते की अभी तो हम सौतेले भाइयों में बंटवारा नहीं हुआ पहले वो होने दो फिर हमारे हिस्से में से तुम्हें हिस्सा मिलेगा. तब भैया ने कहा भी था तुम्हारा भी हिस्सा है इस जायदाद में तुम अपना हिस्सा ले लो.

सुधीर भावुक हो गया था उसका गला रुंध गया बहुत देर तक तो वह चुप ही रहा फिर बोला, नहीं गोपाल भैया में क्या करूँगा हिस्सा लेकर? मेरा खुद का मकान है. हिस्सा ले भी लिया तो यहाँ आ कर तो रहूँगा नहीं. और ये आपकी मेहनत से बनी जायदाद है मैंने तो कभी खेती बारी देखी नहीं और इसे बेचने की भी मेरी इच्छा नहीं है. ताला पड़ा रहेगा इससे तो अच्छा है की आप लोगों की चहल-पहल रहे यहाँ.

सुधीर ने ये बात कभी नेहा को नहीं बताई थी. हालाँकि नेहा के संतोषी स्वभाव से वाकिफ था वो पर पता नहीं क्यों? 

सुधीर और गोपाल भैया के बीच रिश्ते का सौतेलापन इस जायदाद की हिस्सेदारी की आशंका ही थी,जिसमे गोपाल भैया की अपनी सीमित चादर की लाचारी थी जो सुधीर की आर्थिक असहायता को देखते हुए बार बार अपना सर उठा लेती थी. वरना तो इस बारे में उनकी कभी कोई अनबन नहीं हुई थी. समय के साथ इस आशंका ने भी दम तोड़ दिया था और अब जब सगे भाइयों ने दिल का सौतेलापन उजागर कर दिया गोपाल भैया सौतेले भाई के सगेपन से विभोर हो गए.

इस वार्तालाप के बाद दोनों बहुत देर तक खामोश बैठे रहे . सुधीर का मन भीगा था अपनेपन की नमी पा कर तो गोपाल भैया की आँखें नम थीं सौतेले भाई के बड़प्पन से.

कब गाँव की सरहद पर पहुँच गए पता ही नहीं चला. नेहा ने सी-डी प्लेयर बंद कर दिया और सिर का पल्लू ठीक करने लगी तब बगल में होती हलचल से उसका ध्यान गया की गाँव आ गया. घर से थोड़ी दूर गाड़ी रोक कर दोनों उतरे नेहा औरतों के बीच चली गयी और वह भैया के पास.

भैया बहुत कमजोर दिख रहे थे. वह उनके पास जाकर बैठ गया और अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया . सुधीर को देखते ही गोपाल भैया उससे लिपट कर फफक पड़े. तीनों बेटे क्रियाकर्म की तैयारियां करवा रहे थे. भाभी की मांग भरने जब भैया उठे तो सुधीर ही उन्हें सहारा दे कर ले गया. भाभी को देख सुधीर की आँखें भर आयीं. बहुत गहरा रिश्ता तो नहीं रहा उनसे लेकिन उन्होंने और सुधीर ने रिश्ते की मर्यादा हमेशा रखी. कभी किसी ने किसी को आहत करने वाली बात नहीं कही. बचपन तो सुधीर को याद नहीं पर जब से होश संभाला भाभी को खुद पर विश्वास करता ही पाया.

भैया  इतने कमजोर हो गए थे की अर्थी को कंधा देने पर लड़खड़ा गए,तब सुधीर ने ही उन्हें सहारा दिया और उनके कंधे पर रखे पाए को अपने कंधे का सहारा दिया. सभी रिश्तेदार बारी बारी से अर्थी को कन्धा देते रहे और सुधीर गोपाल भैया को सहारा देते चलता रहा. आज वह उनसे एक अनोखा जुड़ाव महसूस कर रहा था.

चिता पर भाभी का शव देख कर भैया खुद को संभाल ना सके और गिर पड़े जब पंडित ने मुखाग्नि देने के लिए बड़े बेटे को बुलाया तो गोपाल भैया जैसे अचानक सचेत हुए और हाथ उठा कर बड़के को वहीँ रोक दिया. फिर सुधीर की ओर मुखातिब हो कर बोले अग्नि तुम दोगे.

रिश्तेदारों में खुसुर पुसुर शुरू हो गयी तीन तीन लड़कों के होते,लेकिन भैया ने दृढ़ स्वर में कहा तुम सब लड़कों से बढ़ कर हो. भाभी भी तो माँ होती है तुम ही चिता को अग्नि दोगे. फिर रोते हुए बोले तीन तीन बेटों के होते तुम्हारी भाभी ने बुढ़ापे में जो दुःख झेले हैं उसके बाद इन बेटों ने उनके अंतिम संस्कार का अधिकार खो दिया है. उनके लिए जमीन जायदाद माँ बाप की सुख शांति,उनकी सेवा से ज्यादा बड़े हो गए. तुम्हारी भाभी आखिरी समय तक तुम्हें याद करके रोती रही कहती रही ऐसे तीन के बजाय भगवान सुधीर जैसा एक संतोषी बेटा ही दे देता तो बुढ़ापे में ऐसी गत ना होती. तुमसे मिलना चाहती थी वो तुमसे माफ़ी मांगना चाहती थी जिस जायदाद के मोह ने तुम्हें हमसे पराया कर दिया उसी जायदाद ने हमारे बेटों से हमें पराया कर दिया. लेकिन तुमसे आँख मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और ऐसे ही चली गयी.

वापसी में सुधीर पहले से कहीं अधिक खामोश था चिता की लपटों ने रिश्तों में बचे सौतेलेपन को जला कर राख कर दिया था और वह रिश्ते की गर्माहट को महसूस कर रहा था. उसने भाभी को खोया था लेकिन गोपाल भैया को पा लिया था. देर से ही सही.

--

कविता वर्मा

नाम कविता वर्मा पोस्ट ग्रेजुएट, शिक्षिका ,पढ़ने का शौक बचपन से ही था. लिखना करीब १२ साल पहले किया. लेकिन ज्यादातर लेखन स्वान्त सुखाय ही रहा. ब्लॉग से लेखन को गति मिली. अपने आस पास की घटनाओ को देखते उसके पीछे छिपे कारण को तलाशना ओर लोगों के व्यव्हार को कहानियों के पात्रों में उतारना ही शौक है इसलिए ज्यादातर कहानियां बिलकुल अपने आस पास की घटनायों सी होती है.

जीवन का नजरिया है "बड़ी बड़ी खुशियाँ है छोटी छोटी बातों में. "

--

श्रीमती कविता वर्मा

५४२ a तुलसी नगर

बोम्बे हॉस्पिटल के पास

इंदौर  ४५२०१०

kvtverma27@gmail. com

   http://kavita-verma. blogspot. in/

9 blogger-facebook:

  1. कल जो टिप्पणी लिखी थी शायद वह स्पैम मे होगी।
    कहानी मर्मस्पर्शी और शिक्षाप्रद है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. रिश्तों के ताने-बाने से बुनी बहुत अच्छी कहानी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही मर्मस्पर्शी...रचना...ये आस-पास हर जगह हो रहा है...उन्हें शब्दों में पिरोना कमाल है...

    उत्तर देंहटाएं
  4. पैसे के लालच में रिश्तों में कडुवाहट आने का बहुत यथार्थपरक एवं सटीक चित्रण. कहानी में पात्रों का बहुत सजीव चित्रण. सुधीर का बहुत सशक्त चरित्र चित्रण और अपने से जुडा सा महसूस होता है. कहानी भावप्रवण होते हुए भी यथार्थ के धरातल पर अपने पद चिन्ह छोड़ जाती है. बहुत सुन्दर...बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. तन-मन-धन में मन की संतुष्टि सबसे अहम है| शानदार तरीके से लिखी कहानी, बधाई|

    उत्तर देंहटाएं
  6. kahani nahi vastvikta hai ..jisne irshton ko chinn bhinn kar diya hai....

    उत्तर देंहटाएं
  7. पारिवारिक रिश्तों पर आधारित बहुत अच्छी कहानी आज के परिवेश कॊ उदभाषित करती हुई लेखिका को बहुत बहुत बधाई|
    प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

    उत्तर देंहटाएं
  8. KHUBASURAT KAHANI RISHTON KA TANABANA.EK SACHCHI KAHANI.
    100 MEN 101

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------