शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार - प्रविष्टि 48 - महेश चन्द्र द्विवेदी की कहानी : एमोर प्लेटोनिकस

ऐमोर प्लेटोनिकस

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तूफ़ान आया हुआ था. पूरे ढाका की बिजली गुल थी. कैदी की कालकोठरी को छोड़कर अमावस की रात्रि को ढाका की सम्पूर्ण जेल में घना अंधकार छाया हुआ था. आकाश में छाये घटाटोप बादल समस्त वातावरण के भुतहा होने की अनुभूति उत्पन्न कर रहे थे. कैदी को न केवल वह वातावरण भुतहा लग रहा था, वरन स्वयं के भूत होने की अनुभूति भी हो रही थी - ’ऐमोर प्लेटोनिकस’ (प्लेटोनिक लव) के त्रासद अंत का भूत. वह आने वाली प्रातः के पांच बजे जीवन के समस्त कष्ट, भय, क्लेश, द्वेष, मिलन, बिछोह, स्वार्थ और प्रेम की अनुभूतियों से मुक्त होने वाला था. गत सायं जेलर अलाउद्दीन उससे उसकी अंतिम इच्छा पूछने आया था, तो उसने कागज़, कलम, एवं अपनी कोठरी में लालटेन की मांग की थी. अलाउद्दीन रहमदिल इंसान था, उसने पहले भी आसान्न मृत्यु हेतु प्रतीक्षारत कैदियों से ऐसे प्रश्न किये थे, परंतु पहले किसी ने कुछ लिख लेने मात्र की अनुमति नहीं मांगी थी. उसका दिल भर आया और अनुमति देते हुए उसने पूछ लिया,

"क्या जो कुछ लिखना है, उसे कहीं पहुंचाना चाहोगे?"

कैदी के मुंह से प्रतिप्रश्न निकला, "कहां?" - और साथ ही उसकी आंख से एक अश्रु अनियंत्रित होकर टपक पड़ा था.

रात्रि दस बजे से कैदी एक रोबोट की भांति लिख रहा था- उसे पांच बजे प्रातः से पहले अपनी अंतिम कहानी पूरी जो करनी थी. यद्यपि उसे भान था कि कुछ घंटों के उपरांत उसके लिये यह बात निरर्थक हो जायेगी कि उसकी अनुभूतियों का ग्यान उस पाषाण-हृदय को हुआ अथवा नहीं, तथापि ज्यों ज्यों वह क्षण निकट आ रहा था, उसकी यह इच्छा अधिकाधिक उत्कट होती जा रही थी कि एक बार अपने मन की बात उस निष्ठुर को पहुंचा सके. कैदी नहीं चाहता था कि उसकी आत्मकथा के पात्रों को कोई अन्य पहचान सके. अतः उसने कहानी छद्मनाम से ’थर्ड पर्सन’ में लिखी थी.

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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अगली प्रातः कोठरी की सफ़ाई करने आये जमादार को कुछ कागज़ लालटेन के नीचे दबाये हुए मिले थे, जिन्हें उसने जेलर को सौंप दिया था. जेलर उन कागज़ों को पढ़कर भाव-विभोर हो गया था. वह यह समझ गया था कि उनमें लिखी कहानी कैदी की अपनी कहानी है, अतः उसने वे कागज़ फांसी पाये उस कैदी के घर डाक से दिल्ली भेज दिये थे.

आज तीन वर्ष बीत रहे होंगे जब क्षितिजा इंडिया हैबिटाट सेन्टर, दिल्ली के भव्य हाल में नवनीत का गायन सुनकर अभिभूत हो गई थी. वातानुकूलित हाल खचाखच भरा हुआ था. प्रकाश मद्धिम था. नवनीत राग यमन में ’सजना, हिय की टीस जाने ना’ गा रहा था. नवनीत द्वारा ’ना........’ के स्वर को लम्बा खींचे जाने पर क्षितिजा के हृदय में भी कुछ लंबा सा खिंचने लगता था. क्षितिजा को अपने मानस के कम्पनों की आवृति नवनीत के स्वरों के कम्पन की आवृति से मिलती प्रतीत हो रही थी. भौतिक शास्त्र के अनुसार ऐसी अवस्था में कम्पन का तरंगदैर्घ्य बहुत बढ़ जाता है - क्षितिजा के कम्पनों का तरंगदैर्घ्य भी इतना बढा़ हुआ था कि उसके नेत्र स्वतः निमीलित हो गये थे और वह परालोक में विचरण करने लगी थी. उसकी यह भावाभिभूति गायन के स्वर के थमने पर ही टूटी थी.

क्षितिजा विश्वविद्यालय में दर्शन-शास्त्र की अध्यापिका थी. उसकी तर्कबुद्धि जितनी प्रखर थी, उतना ही प्रखर एवं मुखर उसका स्वभाव था. उसे मित्रों से मिलने-जुलने, बात करने एवं संगीत सुनने का विशेष चाव रहता था. संगीत महाविद्यालय में नवनियुक्त अध्यापक नवनीत की गायन प्रतिभा के बारे में उसने सुना था और आज उसके इस कार्यक्रम के आयोजन की बात जानकर वह यहां आई हुई थी- घर में किसी अन्य को संगीत में रुचि न होने के कारण वह अकेली ही आई थी. नवनीत द्वारा अन्तिम बार अवरोहित ध्वनि में ’सजना..................’ कहकर शांत होने पर क्षितिजा कुछ पलों तक अपने को सहज करती रह गई थी और अन्यों के साथ तालियां बजाना भूल गई थी. सहज होने के पश्चात अपने परिवेश से अवगत होने पर वह अनायास नवनीत को बधाई देने हेतु मंच की ओर चल दी थी. क्षितिजा के पहुंचते पहुंचते नवनीत मंच से उतरते हुए अंतिम सीढ़ी पर आ चुका था.

"बधाई हो नवनीत जी. आप के गायन ने तो श्रोताऒं को विस्मृति की स्थिति में पहुंचा दिया." - यद्यपि क्षितिजा कहना चाहती थी कि मुझे विस्मृतिलोक में पहुंचा दिया, परंतु भारतीय नारी के संस्कारगत संकोचवश वह बात समस्त श्रोताओं पर थोप कर कही गई थी. क्षितिजा के स्वर में सत्य का भास तो था ही, साथ-साथ एक अनोखी खनक भी थी, जिसने नवनीत जैसे स्वर-पारखी को क्षितिजा को धन्यवाद देने की औपचारिक प्रक्रिया के दौरान उसकी ओर कुछ अतिरिक्त पलों तक देखते रहने को बाध्य कर दिया था.

मानव जीवन अनोखेपन एवं विरोधाभासों से परिपूर्ण रहता है- जीवन में कभी कभी तो सहस्रों पल ऐसे बीत जाते हैं कि कहीं कुछ घटित ही न हुआ हो, परंतु कभी कभी दो-चार पल मात्र ऐसी स्थायी हलचल उत्पन्न कर जाते हैं जैसे ऐटलांटिक महासागर में गल्फ़-स्ट्रीम की धारा यूरोप से मेक्सिको तक सागर को जीवंत, उद्वेलित एवं ऊष्मित कर देती है. आज के ये पल अप्रयास क्षितिजा के मानस को भी ऐसे ही ऊष्मित एवं उद्वेलित कर गये थे. इस प्रथम मिलन के पश्चात चाहे-अनचाहे क्षितिजा इस रूमानी ऊष्मा एवं उद्वेलन की पुनरानुभूति हेतु नवनीत के प्रत्येक गायन कार्यक्रम में जाने लगी थी. नवनीत के मंच पर आते ही वह औरों से आंख बचाकर उसे कुछ पल के लिये अतिरिक्त देर तक देखती रहती थी. नवनीत उन अतिरिक्त पलों का गूढ़ार्थ समझने लगा था, और वह भी मंच को प्रणाम करते समय क्षितिजा की सीट को ढूंढ लेता था और अवसर पाकर उसे कुछ अतिरिक्त पलों तक देख लिया करता था. लुकछिपकर देखने का यह खेल गायन के दौरान चला करता था. कार्यक्रम की समाप्ति पर क्षितिजा मंच के निकट जाकर नवनीत को बधाई देने के बहाने उससे कुछ क्षण की निकटता प्राप्त करने का लोभ सम्वरण नहीं कर पाती थी, और क्षितिजा के मंच के निकट पहुंचने में कुछ देरी होने पर नवनीत किसी से बात करते रहने के बहाने उसकी प्रतीक्षा करने लगता था.

अग्नि में जितनी समिधा डाली जाती है, वह उतनी ही भड़कती है. नवनीत की स्मित बिखेरती निगाहें शनैः शनैः क्षितिजा के हृदय में प्रवेश कर पहले से सुलगती अग्नि में समिधा का काम करने लगीं थीं. इस अग्नि की ऊष्मा नवनीत को भी उसी अनुपात में तपाने लगी थी. प्रेम का ताप बढ़ने पर विछोह का एक-एक पल अधिकाधिक असह्य होता जाता है एवं प्रेम के ताप में जलकर भस्म हो जाने का उद्वेलन तीव्रतर होता जाता है. क्षितिजा और नवनीत दोनों पतिंगे के समान प्यार के दिये की लौ में भस्म हो जाने की कामना के वशीभूत होने लगे थे. नवनीत के एक गायन कार्यक्रम के पश्चात एक रात्रि जब क्षितिजा उसे बधाई देने उसके पास गई थी, तभी एक श्रोता ने नवनीत का विज़िटिंग कार्ड मांगा था, तो क्षितिजा भी सस्मित बोल पड़ी थी,

"एक कार्ड मुझे भी दीजियेगा?"

नवनीत के मन में गुदगुदी उठी थी और उसने कार्ड क्षितिजा को देते हुए एक कुशल कलाकार की भांति उसकी पतली-लम्बी उंगलियों का स्पर्श सप्रयास कर लिया था- दोनों के शरीर में विद्युतप्रकम्प हुआ था. उस समय प्रत्यक्षतः दोनों सहज ही बने रहे थे. रात्रि में जब भोजन के उपरांत घर के सब लोग सोने चले गये थे और क्षितिजा ड्रौइंग रूम में अकेली रह गई थी, तब उसने सहमते हुए नवनीत को फोन मिलाया था. दूसरी ओर से नवनीत की "हलो!" सुनकर क्षितिजा कुछ क्षण तक कुछ बोल न सकी थी. तब नवनीत, जो क्षितिजा के फोन की मन ही मन प्रतीक्षा करता रहा था, कांपते होठों से बोल पड़ा था,

"क्षितिजा?"

"क्या सो गये थे?" - क्षितिजा को फोन पर अपने ही होने की संस्वीकृति करने के बजाय स्वयं प्रश्न करना अधिक सुगम लगा था.

"नहीं...... फोन की प्रतीक्षा कर रहा था."

यह सुनकर क्षितिजा अनायास हंस दी थी. नवनीत भी हंस पड़ा था. फिर बात में बात निकलती गई थी और बातचीत का सिलसिला देर तक चलता रहा था.

धीरे-धीरे ऐसी बातचीत की आवृत्ति बढ़ती गई थी, परंतु सप्ताह, माह और वर्ष बीत जाने पर भी दोनों में से कोई वे तीन शब्द नहीं बोल सका था, जिन्हें बोलने के लिये आदिकाल से प्रेमी लोग बेचैन रहे हैं. उसी बेचैनी की दशा में एक दिन क्षितिजा ने नवनीत से एक प्रश्न पूछ लिया था,

"क्या आप को प्लेटोनिक लव में विश्वास है?"

प्रश्न दूरभाष के तारों में झनझनाते हुए नवनीत के मानस को झंकृत कर रहा था. य़द्यपि शब्दों की ध्वनि में किसी प्रकार की थरथराहट का अभाव था, तथापि नवनीत का मन उस प्रश्न की निष्छलता पर आश्वस्त नहीं हो सका था. नवनीत के पास इस अनाश्वस्ति के ठोस कारण भी थे. उसका मन उस प्रश्न के निहितार्थ को समझ कर मीलों उछल रहा था, परंतु प्रकटतः वह एक दार्शनिक के भाव से बोला था,

"मैडम क्षितिजा! यू मीन ऐमोर प्लेटोनिकस अर्थात आध्यात्मिक प्रेम? यद्यपि आध्यात्मिक प्रेम की चेतना आदिकाल से समस्त विश्व मे रही है, अंग्रेज़ी भाषा में सर्वप्रथम इस शब्दद्वय का प्रयोग सर विलियम डेवेनांट ने अपनी पुस्तक ’प्लेटोनिक लवर्स’ (१६३६) में किया था. पश्चिमी देशों में ऐमोर प्लेटोनिकस की अवधारणा ग्रीक दार्शनिक प्लेटो की पुस्तक ’सिम्पोज़ियम’ से उत्पन्न हुई मानी जाती है, जिसमें विपरीतलिंगी व्यक्ति के प्रति ऐसे प्रेम को वर्णित किया गया है, जो दैहिक आकर्षण से ऊपर उठकर दैव के प्रति लगाव उत्पन्न करे. आधुनिक शब्दकोशों के अनुसार यह दो विपरीतलिंगी व्यक्तियों के मध्य ऐसा निर्मल आध्यात्मिक प्रेम है, जिसमें शारीरिक इच्छायें न हों."

क्षितिजा नवनीत के एक-एक शब्द को आत्मसात करती रही थी, फिर हंसकर बोली थी,

"नवनीत, मुझे लग रहा है कि दर्शन शास्त्र की अध्यापक मैं नहीं, तुम हो."

नवनीत कुछ देर तक फोन पर हंसता रहा था. फिर बोला था,

"मैडम, मैने ब्याह नहीं किया है, तो क्या बारातें भी नहीं कीं हैं?"

क्षितिजा व्यंग्य करते हुए बोली थी, "अच्छा इतनी बारातें कीं हैं, तो यह भी बता दीजिये कि ऐमोर प्लेटोनिकस की परिणति क्या होती है?"

नवनीत कुछ क्षण सोचता रहा था. फिर गम्भीर स्वर में बोला था, "मेरी समझ में दो ही परिणति सम्भव हैं - ’शारीरिक प्रेम’ अथवा ’देवदास’ जैसी त्रासदी."

नवनीत का उत्तर सुनकर क्षितिजा के मानस को ऐसा झटका लगा था, जैसे बिजली का खुला तार छू गया हो. वह अभी तक एक काल्पनिक प्रेम-संसार में जी रही थी, जो सम्भवतः उसके अपने घर के वातावरण की घुटन से बाहर निकलकर भरपूर श्वांस लेने का प्रयत्न मात्र था. वह नवनीत द्वारा बताये दोनों परिणामों के लिये तैयार नहीं थी और उनकी भयावहता से अत्यंत घबरा गई थी. उसके द्वारा देर तक कुछ न बोलने पर नवनीत का मन किसी अनहोनी की आशंका से भर गया था. तब वह बोल पड़ा था,

"क्षितिजा! क्या हुआ?"

"मुझे कुछ आवश्यक काम है"- यह कहते हुए क्षितिजा ने फोन काट दिया था.

नवनीत ने बाद में अनेक बार क्षितिजा को फोन किया, परंतु उसका फोन नहीं उठा था और न उसकी ओर से कोई फोन आया था. क्षितिजा का नवनीत के कार्यक्रमों में आना भी बंद हो गया था. नवनीत को स्पष्ट हो गया था कि कारण चाहे जो भी हो, क्षितिजा उससे बात नहीं करना चाहती है. नवनीत जितना आश्चर्यचकित था, उससे कहीं अधिक आहत था.

नवांकुरित प्रेम सदैव प्लेटोनिक ही होता है- यदि किसी के प्रति प्रारम्भ से मात्र कामाकर्षण उत्पन्न होता है, तो वह वासना मात्र होती है, प्रेम नहीं. कामाकर्षण में दूसरे को प्राप्त करने की चाह कुछ वैसी होती है, जैसी बुभुक्षु को क्षुधा-शांति की होती है. इसमें प्रेम के पात्र के शरीर को पाना प्राथमिक उद्देश्य होता है, उसके मन को जीतना गौण होता है. प्लेटोनिक प्रेम का प्रथम उद्देश्य चाहत के पात्र के मन को जीतकर अपने प्रेम का प्रतिदान पाना होता है. मन का आधार अहं है, अतः प्लेटोनिक प्रेम में पात्र के प्रति जितना आकर्षण उत्पन्न होता है, उससे कहीं अधिक स्व के अहं की रक्षा का भाव भी उत्पन्न होता है. प्लेटोनिक प्रेम में प्रेमी अपने प्रेम के पात्र द्वारा अस्वीकृत कर दिये जाने के भय से ग्रस्त रहता है और उसे स्व के अहं के आहत होने का खतरा रहता है. यदि प्लेटोनिक प्रेम की परिणति शारीरिक प्रेम में हो जाती है, तो अहं के आहत होने की आशंका कम हो जाती है. ऐसे प्लेटोनिक प्रेम, जो शारीरिक प्रेम में परिवर्तित नहीं हो पाता है, की परिणति प्रायः त्रासदी में होती है- वह त्रासदी मानसिक तो होती ही है शारीरिक भी हो सकती है. अकस्मात प्रेम का अपात्र हो जाना किसी भी मानव के लिये ऐसी स्थिति होती है, जो जिजीविषा की हंतक तथा दुख, नैराश्य तथा अवसाद की जनक होती है. मानवीय समाज में सदियों से पुरुष-वर्चस्व रहने के कारण पुरुष के अहं को लगी ठेस उसे असह्य विचलित करती है- नवनीत भी असह्य रूप से विचलित था.

क्षितिजा द्वारा इस कहानी से अपने को पूर्णतः असम्बद्ध कर लेने एवं कहानी की परिधि से ऐसे बाहर हो जाने कि उसकी छाया भी उस परिधि में न पड़े, के कारण यह बता पाना सम्भव नहीं है कि क्षितिजा पर क्या बीती अथवा उसने किसी दुख का अनुभव किया भी अथवा नहीं. हां, कहानी के पुरुष पात्र नवनीत के तीन अंत हो सकते थे- नवनीत छल-बल से क्षितिजा के शरीर पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करे, अथवा स्वयं को वाइन-वोमन में डुबाकर अपने लिये उत्पन्न त्रासदी का बदला क्षितिजा से लिये जाने की काल्पनिक अनुभूति में खोया रहे, अथवा स्वयं का अंत कर महात्रासदी को प्राप्त हो जाये. इनमें से कुछ भी होता, तो कुछ भी अनोखा न होता, परन्तु नवनीत ने कुछ अलग ही किया था.

नवनीत कुछ दिन तो दुत्कारे हुए श्वान की भांति लज्जित, क्षुभित, एवं त्रसित बना रहा था. फिर उसने एक दिन टी. वी. पर एक पात्र को यह कहते हुए सुन लिया था कि प्यार भीख में नहीं मिलता है और भिक्षा में प्राप्त प्यार स्वीकारना भी नहीं चाहिये. बस उसी दिन उसने अपने मन पर एक असम्पृक्तता का आवरण ओढ़ लिया था. विगत यादों से छुटकारा पाने के उद्देश्य से उसने संगीत महाविद्यालय से त्याग पत्र दे दिया था, और एक नामी ग़ज़ल गायक मियां सरवर अली की शागिर्दगी ले ली थी. मियां सरवर अली नवनीत के गायन से इतने प्रभावित हो गये थे कि कुछ दिन पश्चात जब उन्हें बांगला देश से गायकी हेतु निमंत्रण प्राप्त हुआ था, तो उन्होंने नवनीत को भी आमंत्रित करा लिया था. नवनीत के यह कहने पर कि वह बंगाली में तो गाता नहीं है, उन्होंने बताया था कि बंगाली और हिन्दी दोनों भाषाओं में कार्यक्रम होगा.

ढाका में जब बिमान एयरलाइन्स का जहाज़ उतरा, तो आसमान में बादल छाये हुए थे और हल्की हल्की पुरवाई बह रही थी. मौसम बड़ा सुहाना था. नवनीत का हवाई यात्रा का यह पहला अनुभव था और वह भी एक नये देश का. उसका मन आज बहुत दिनों बाद क्षितिजा द्वारा दिये घाव की पीड़ा के प्रभाव क्षेत्र से अपने को मुक्त सा अनुभव कर रहा था. एयरपोर्ट भवन के बाहर आते हुए नवनीत ने देखा कि आगंतुकों के स्वागतार्थ आये परिवारीजनों, मित्रों, आदि की भीड़ लगी हुई थी. तभी उस भीड़ में से अकस्मात प्रकट होकर खनकती आवाज़ में ’आदाब चचाजान’ कहते हुए एक लम्बी-छरहरी नवयुवती ने मियां सरवर अली के हाथ का कैरीबैग अपने हाथ में ले लिया था. मियां सरवर अली ने अपना हाथ उसके सिर पर रखकर कहा, "ख़ुश रहो बेटी फ़ौज़िया".

फिर नवनीत का परिचय कराते हुए बोले थे,

"यह हैं नवनीत - दिल्ली के ऐसे फ़नकार, जो इंशाअल्ला जल्दी ही दुनियां भर में छा जाने वाले हैं."

इस तारीफ़ पर नवनीत तो सकुचा सा गया था और उसने नमस्कार की मुद्रा में अपने हाथ जोड़ लिये थे, परंतु फ़ौज़िया की निगाह देर तक नवनीत पर टिकी रही थी. तब नवनीत कुछ और अधिक सकुचा गया था. तभी मियां सरवर अली बोल पड़े थे,

"और तुम नवनीत! फ़ौजिया को कम न समझना. महफ़िल में तुम्हें इसके बराबर तालियां बटोरने के लिये कड़ी मशक्कत करनी होगी."

नवनीत के मुख पर एक स्मित रेखा दृष्टिगोचर हुई और उसने पहली बार सामने खड़ी लम्बी, छरहरी, कमनीय फ़ौज़िया को ध्यान से देखा था, परन्तु उसकी निगाह में ऐसा भाव था जैसे वह किसी सुन्दरी नवयुवती को न देखकर एक प्रस्तर मूर्ति को देख रहा हो.

फ़ौज़िया समझ गई थी कि उसे नवनीत पर अधिक श्रम न करना होगा. उसे आभास हो गया था कि नवनीत का मन किसी चोट से घायल एवं अवसादित है, और सहानुभूतिमय प्रेम का आभास करा के उस अवसाद के उद्वेग को वांछित दिशा में मोड़ देना कठिन न होगा. घर पहुंचते ही वह नवनीत की आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान देने लगी थी एवं उसकी चाहतों को जानने का प्रयत्न करने लगी थी. प्रथम दिवस गायन का कोई कार्यक्रम नहीं था, और रात्रि भोजन के उपरांत शीघ्र सभी लोग अपने अपने कमरे में सोने चले गये थे. नवनीत कपड़े बदलकर अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करने की सोच ही रहा था कि खुले दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई और पर्दा हटाकर फ़ौज़िया अंदर आकर मुस्कराते हुए पूछने लगी थी,

"नवनीत जी, और किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है?"

यद्यपि नवनीत ने आते ही देख लिया था कि फ़ौज़िया का परिवार बड़ा ’ऐडवांस्ड’ था, परंतु उसकी धारणा में मुस्लिम लड़कियां पर्दे में रहने वाली और बेहद लजीली होतीं थीं, अतः फ़ौज़िया के खुलेपन और खिलंदड़ी स्वभाव ने उसे सोच में डाल रखा था. अब रात्रि में उसके इस तरह अकस्मात नवनीत के कमरे में घुस आने से नवनीत की सोच एकदम लड़खड़ा गई थी. क्षितिजा से सहस्रों मील की दूरी, नवीन परिवेश एवं एक मुस्लिम लड़की की अक्खड़ी नवनीत के भूतकाल को कब्र में गाड़कर उसे वर्तमान में जीने को उत्प्रेरित कर रहे थे. उसके भावहीनता ओढ़े हुए चेहरे पर हल्की सी स्मितरेखा आई और वह बोला,

"मुझे सुबह जागकर दो-तीन गिलास पानी पीने की आदत है. अगर एक बोतल और मिल जाता तो अच्छा रहता."

"अभी लाई."

फ़ौज़िया ने एक बोतल लाकर स्टूल पर रख दी और फिर पूछा,

"अली अंकल ने आप को सभी प्रोग्रामों के बारे में बताया है नहीं?"

"सब के बारे में तो नहीं बताया है."

यह सुनते ही फ़ौज़िया पलंग के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गई और ढाका, माइमेनसिंह, खुलना, राजशाही, सिलहट आदि के कार्यक्रमों के विषय में विस्तार से बताती रही- बीच बीच में अंतराल रखते हुए पूरे महीने भर के कार्यक्रम थे और नवनीत को लग रहा था कि फ़ौज़िया भी उन्हें पूरे महीने भर तक बताती रहना चाहती है. नवनीत को भी कोई जल्दी नहीं महसूस हो रही थी, क्योंकि उसे लग रहा था कि क्षितिजा द्वारा दिये घावों पर फ़ौज़िया बड़े आहिस्ते आहिस्ते मलहम लगा रही है. फिर स्वीट ड्रीम्स कहकर फ़ौज़िया अपने कमरे में चली गई थी. बड़े दिन बाद उस रात नवनीत गहरी नींद सोया था, परंतु प्रातःकाल जागने पर उसे पहला विचार आया था कि ’कहीं वह फ़ौज़िया के प्रेमजाल में तो नहीं फंस रहा है? तब क्या यह क्षितिजा को धोखा देना नहीं होगा?’ नवनीत का वह दिन इसी ऊहापोह में बीता था.

सायं का कार्यक्रम अद्भुत था. गायन-कला के ऐसे पारखी नवनीत ने पहले कहीं नहीं देखे थे. यद्यपि नवनीत के लिये बड़ी तालियां बजीं थीं, परंतु फ़ौज़िया के लिये भी उससे कम नहीं बजीं थीं. फ़ौज़िया को मुबारकबाद देने जब महिलाओं का एक झुंड आया, तो फ़ौज़िया ने कहा था,

"मुबारकबाद तो नवनीत जी को दीजिये. इनका गाना सुन कर ही मुझे भी अच्छे से अच्छा गाने का जुनून चढ़ा था."

नवनीत इस वक्र प्रशंसा से प्रभावित हुए बिना न रह सका था, परंतु उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकले थे, बस फ़ौज़िया को वक्र निगाहों से देखता रहा था. य़द्यपि क्षितिजा की स्मृतियां बीच बीच में नवनीत को बेचैन कर जातीं थीं, परंतु उसे यह अनुभूति भी हो रही थी कि अनचाहे ही सही फ़ौज़िया की निकटता उस बेचैनी को शांत कर रही थी. उस रात फ़ौज़िया और अधिक देर तक एवं और अधिक अधिकार से नवनीत के कमरे में बातें करती रही थी. आज बातें औपचारिकता से आगे बढ़कर उन दोनों के भूत से सम्बंधित थीं. नवनीत ने अपने विषय में बहुत कुछ बता दिया था, यहां तक कि यदा कदा मित्रमंडली में पीकर आउट हो जाने की बात भी, परंतु कंजूस द्वारा छिपाये स्वर्ण की भांति क्षितिजा को हृदय में छिपा रहस्य ही रहने दिया था. फ़ौज़िया को नवनीत के हृदय में रहस्य छिपे होने का आभास तो हो गया था, परंतु उसने यह सोचकर कि नवनीत को उस रहस्य पर डाका पड़ता न लगे, उससे इस विषय में कोई पूछताछ नहीं की थी. फ़ौज़िया ने भी अपने विषय में बहुत कुछ बताया था - यह भी कि वह बांगला देश की फ़ौज से घृणा करती है क्योंकि उसके जनरल कासिम ने फ़ौज़िया के निर्दोष भाई को गोलियों से भून दिया था. यह कहते हुए फ़ौज़िया की आंखों में अश्रु छलछलाने लगे थे, जिससे नवनीत भी द्रवित हो गया था.

अगली सायं कार्यक्रम माइमेनसिंह में था. कार्यक्रम से पहले कुछ युवक फ़ौज़िया से मिलने आये थे, जिनका परिचय फ़ौज़िया ने नवनीत की तारीफ़ के पुल बांधते हुए उससे करा दिया था. कुछ ही देर में वे नवनीत से घुलमिल गये थे. कार्यक्रम के पश्चात वे नवनीत को शहर घुमाने के बहाने अपने साथ ले गये थे. वहां एक गेस्ट हाउस में ले जाकर दोस्ती का वास्ता देकर उसे पीने को मजबूर किया था. शराब के कई दौर चले थे. इस दौरान उन्होंने बांगला देश की सरकार और फ़ौज के बारे में बात छेड़ दी थी और उनकी तरह तरह की बुराइयां एवं अत्याचारों का बखान करते रहे थे. तभी उनमें से एक ने उसके एक पेग में कोई ऐसी नशीली वस्तु मिला दी थी जो उत्तेजक तो थी परंतु नीर-क्षीर विवेक की क्षमता समाप्तप्राय कर देती थी. फिर वे उसे उस होटल में छोड़ आये थे, जहां नवनीत, फ़ौज़िया, आदि रुके हुए थे. उनके जाते ही फ़ौज़िया रोज़ की भांति उसके कमरे में घुस आई थी. आज नवनीत अपने भूतकाल से ऐसा अचेत था कि फ़ौज़िया के ’नवनीत’ कहकर उसे अपने बड़े बड़े नेत्रों से देखने मात्र से वह उत्तेजित होने लगा था. फिर फ़ौज़िया ने दरवाज़े की कुंडी लगाकर उसे बाहों में भर लिया था और आहिस्ते से उसके पलंग पर ले आई थी. फ़ौज़िया ने एक मंजे कलाकार की कुशलता से नवनीत का प्लेटोनिक प्रेम, उसके मानस में विराजमान क्षितिजा की मूर्ति, एवं उसका आत्माभिमान सभी कामाग्नि में जलाकर राख कर दिये थे.

दूसरे दिन नवनीत देर से उठा था और रात्रि की घटनायें याद आने पर वह स्वयं पर लज्जित एवं क्षितिजा के प्रति किये विश्वासघात से क्षुभित था. परंतु जब प्रतिदिन की भांति उसने दो गिलास जल पिया, तो कुछ क्षण पश्चात उसके ये भाव तिरोहित होने लगे थे और उनका स्थान उत्फुल्लता के भाव लेने लगे थे - उसके जल में फ़ौज़िया ने पहले ही रात वाली ड्रग मिला दी थी. इस प्रकार बारीसाल और खुलना के कार्यक्रम हंसी खुशी बीते थे. नवनीत के नवीन मित्र उसे रोज़ रात्रि कार्यक्रम के उपरांत अपने साथ ले जाते थे और छक के खिला पिलाकर मद्यमस्त कर देते थे- फिर फ़ौज़िया उसकी रातें रंगीन कर देती थी. नवनीत स्व-नियंत्रण खोता जा रहा था और फ़ौज़िया एवं उसके मित्रों की इच्छाओं का क्रीतदास बना जा रहा था. खुलना के कार्यक्रम के उपरांत रात्रि में जब फ़ौज़िया ने नवनीत को अपने अंक में भरा था, तब चाशनी भरे शब्दों में उससे बोली थी,

"नवनीत! मेरा भाई बड़ा नेक बंदा था. उस पर झूठा इल्ज़ाम लगाकर फ़ौज वालों ने उसे बड़ी बेरहमी से मारा था. मै अपने भाई के हत्यारे जनरल कासिम से बदला लेना चाहती हूं, पर मैं औरतज़ात क्या कर सकती हूं. उसके नज़दीक जाने की कोशिश की तो दूर से ही पकड़ ली जाऊंगी. मैने अपने दोस्तों को भी आज़माया है, पर उनमें भी कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है."

कुछ रुककर एक उच्छवास छोड़ते हुए आगे बोली थी, "पता नहीं मेरी ज़िन्दगी में यह तमन्ना पूरी होगी भी या नहीं?"

नवनीत को जीवन से मुक्त हो जाने का ख़याल पहले भी आया था, जब क्षितिजा द्वारा प्रेम-डोर को निर्ममता से तोड़ देने से उसके मन का उद्वेलन अपने अतिरेक पर था, परंतु उसने उसे वहीं दबा दिया था - विशेषतः इसलिये कि एक बार आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर बात करते समय क्षितिजा ने उससे कहा था कि जो आत्महत्या करता है वह जीने के काबिल नहीं है और उसे मर ही जाना चाहिये. तब उसके विवेक ने उससे कहा था कि ऐसे दार्शनिक के लिये प्राण-त्याग करना अपने को मखौल का पात्र बनाना मात्र होगा. परंतु आज की मनःस्थिति में उसे फ़ौज़िया के लिये प्राणोत्सर्ग कर देना स्वयं को शहीद कर देने के समान लग रहा था. उसने बेहिचक कह दिया,

"फ़ौज़िया, मुझे बताओ तुम्हारे भाई का बदला लेने के लिये करना क्या होगा."

"नहीं नवनीत, मैं तुम्हें इतने जोखिम में नहीं डाल सकती हूं."

अब तक नवनीत का पुरुषोचित अभिमान जागृत हो गया था और वह अपनी बात पर अड़ गया था. तब फ़ौज़िया ने कुछ नानुकुर के उपरांत उसे बताया,

"कल का कार्यक्रम सिलहट में है, जिसे सुनने जनरल कासिम भी आयेगा. प्रोग्राम के बाद वह सबसे पहले जायेगा. उसे रुख्सत करने बहुत लोग आगे आयेंगे. उस वक्त उस पर ग्रेनेड फेंककर मेरे भाई के कत्ल का बदला लिया जा सकता है. रात में भीड़ में दूसरों की निगाह से बच जाना आसान होगा."

"फ़ौज़िया, तुम्हारे लिये यह नेक काम मैं ज़रूर करूंगा."

"नवनीत, एक बार फिर सोच लो. हालांकि तुम पर किसी को शक नहीं होना चाहिये, लेकिन खतरा तो है ही."

"फ़ौज़िया, मैने सब सोच लिया है. तुम्हारे लिये कुछ करते हुए यह ज़िंदगी चली भी जाय, तो मुझे परवाह नहीं है."

"शुक्रिया जानम." यह कहते हुए फ़ौज़िया ने पुनः नवनीत को अपने अंक में भर लिया था

दूसरे दिन प्रोग्राम के तुरंत बाद फ़ौज़िया ने एक ग्रेनेड नवनीत के कुर्ते की बड़ी सी जेब में रख दिया था, जिसे फेंकते हुए नवनीत पकड़ा गया था. ग्रेनेड के हमले से जनरल साफ़ बच गये थे, बस एक सुरक्षा गार्ड को कुछ टुकड़े लगे थे. मियां सरवर अली अवाक थे और आश्चर्यचकित. वह नवनीत से मिलने जेल भी गये थे, परंतु आरोप इतना गम्भीर था कि ज़मानत करा सकने का सवाल ही नहीं था. फ़ौज़िया ने नवनीत की कोई खोज खबर नहीं ली थी. मुकदमें के दौरान नवनीत को पता चला था कि न तो फ़ौज़िया का कोई भाई था और न जनरल कासिम ने किसी को निर्दोष मारा था. वरन जनरल कासिम की ख्याति एक जनतांत्रिक, नेकदिल एवं धर्मनिरपेक्ष इंसान की थी. वह तत्कालीन प्रधान मंत्री, जो कट्टर इस्लामिक शासन के बजाय जनतांत्रिक पद्धति में विश्वास रखतीं थीं, के बड़े विश्वसनीय जनरल थे. फ़ौज़िया हूजी नामक आतंकी इस्लामिक संगठन की सदस्या थी. हूजी, वर्तमान शासन को उखाड़ फेंकने और शरियत-आधारित शासन की स्थापना हेतु कुछ भी करने को उद्यत रहता था. उसी ने फ़ौज़िया को जनरल कासिम को मारने हेतु तैयार किया था. जनरल कासिम की हत्या करवाकर एवं फ़ौज पर मनमाफ़िक जनरल बिठाने के पश्चात हूजी का अगला निशाना प्रधान मंत्री थीं.

फांसी के लिये जाते समय नवनीत की दोनों आंखों में एक-एक आंसू था - एक क्षितिजा के लिये जिसने उसे आध्यात्मिक प्रेम में धोखा दिया था और एक फ़ौज़िया के लिये जिसने उसे शारीरिक प्रेम में धोखा दिया था.

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Mahesh Chandra Dwivedy
'Gyan Prasar Sansthan'
1/137, Vivekkhand, Gomtinagar,
lucknow

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