शनिवार, 25 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -61- रेखा जोशी की कहानी : तार तार हुई ममता

कहानी

तार तार हुई ममता

रेखा जोशी

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. अपनी अप्रकाशित कहानी भेज सकते हैं अथवा पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. कहानी भेजने की अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012 है.

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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आंध्रप्रदेश में एक छोटा सा गाँव अनंतपुर, गरीबी रेखा के नीचे रहते कई किसान भाई, जिनका जीवन सदा उनके खेत और उसमें लहलहाती फसलों के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है। आज शोक में पूरी तरह डूबा हुआ है। पता नहीं किसकी नजर लग गई जो आज सुबह घीसू भाई, शहर में किसी के साथ अपनी जवान बेटी रधिया को बेचने का सौदा कर के आया है।

सुबह से किसी के पेट में खाने का एक निवाला तक नहीं गया, क्योंकि वहां कई घरों में चूल्हा ही नहीं जला, सवेरे से ही रधिया और उसकी छोटी बहन रमिया ने अपने आप को पीछे की छोटी कोठरी में बंद कर रखा हुआ है। घीसू की पत्नी गुलाबो का तो रो रो कर बुरा हाल हो गया, ''क्या इसी दिन के लिए उसने अपनी जान से भी प्यारी बेटी को पाल पोस कर बड़ा किया था, चंद नोटों के बदले अपने ही जिस्म के टुकड़े को बेचने के लिए, नहीं नहीं, वह मर जाएगी पर ऐसा अनर्थ नहीं होने देगी। वह अपनी रधिया को कभी भी अपने से दूर नहीं जाने देगी। हे भगवान अब केवल तेरा ही आसरा है। किसी भी तरह से इस अनहोनी को होने से रोक लो। ''यह सब सोच सोच कर गुलाबो का दिल बैठा जा रहा था ।

उधर घीसू के दिल का हाल शायद ही कोई समझ पाता। ऊपर से पत्थर बने बुत की भांति अपना सर हाथों में थामे, घर के बाहर एक टूटी सी चारपाई पर वह निर्जीव सा पड़ा हुआ था। लेकिन उसके भीतर सीने में जहाँ दिल धडकता रहता है, उसमें एक ज़ोरदार तूफ़ान, एक ऐसी सुनामी आ चुकी थी जिसमें उसे अपना घर बाहर सब कुछ बहता दिखाई दे रहा था। ''कोई उसे क्यों नहीं समझने की कोशिश करता। अपने बच्चे को क्यों कोई बेचेगा। मैं उसका बाप आज कितना मजबूर हो गया हूँ जो अपने कलेजे के टुकड़े को, कैसे अपने दिल पर पत्थर रख कर उसे सिर्फ पैसे के लिए अपने से दूर इस अंधी दुनिया में धकेल रहा हूँ।

पता नहीं उसकी किस्मत में क्या लिखा है परन्तु वह कर भी क्या सकता है। आज उसके खेतों ने भी उसका साथ नहीं दिया। फसल ही नहीं हुई। लेकिन उसके सर पर सवार क़र्ज़ की मोटी रकम कैसे चुकता हो पाए गी। उपर से भुखमरी, घर गृहस्थी का बोझ। जी तो करता है कि जग्गू की तरह नहर में कूद कर अपनी जान ही दे दूँ। लेकिन गुलाबो और रमिया की खातिर वह ऐसा भी तो नहीं कर सकता। जग्गू के परिवार का उसके मरने के बाद हुई दुर्गति से वह भली भाँती परिचित था ''। आज घीसू अपने आप को बहुत असहाय, बेबस और निर्बल महसूस कर रहा था। उसकी आँखों के आगे बार बार भोली भाली रधिया का चेहरा घूम रहा था और दिल में उठ रही सुनामी आँखों से अश्रुधारा बन फूट पड़ी। ''काश कोई रधिया को मुझ से अपने बाप से बचा ले। ''फूट फूट कर रो उठा घीसू ।

रधिया, जो गरीबी की सूली पर चढ़ चुकी थी, अपने पिता की बेबसी को बखूबी समझ चुकी थी। खामोश सी, अपनी आँखें बंद कर उस घड़ी का इंतज़ार कर रही थी, जब किस्मत के बेरहम हाथ उसे उठा कर, अपनों से दूर किसी अनजानी दुनिया में पटक देंगे। लेकिन अनचाहे विचार उसके मानस पटल पर उमड़ते हुए उसे व्यथित कर रहे थे। ''कब तक हम लड़कियों को अपने परिवार की खातिर बलि देते रहना होगा। मेरे बापू ने तो जी तोड़ मेहनत की थी। बदले में उन्हें क्या मिला । जग्गू चाचा का क्या कसूर था जो उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी । कभी सोने की चिड़िया कहलाने वाला हमारा भारत देश, जिसकी सोंधी सी महक लिए माटी में सदा लहलहाते रहे हैं, हरे भरे खेत खलिहान, किसानों के इस देश में, उनके साथ आज क्या हो रहा है ? उनके सुलगते दिलों से निकलती चीखे कोई क्यों नहीं सुन पा रहा। संवेदनहीन हो चुके हैं लोग या सबकी अंतरात्मा मर चुकी है। इस देश को चलाने वाली सरकार भी शायद बहरी हो चुकी है।

भारत के किसान अपनी अनथक मेहनत से दूसरों के पेट तो भरते आ रहें है। लेकिन वह आज अपनी ही जिंदगी का बोझ स्वयम नहीं ढो पा रहे और अब हालात यह हो गए है की वह या तो आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहें है या उनकी मेरी जैसी अनगिनत बेटियाँ अपने ससुराल न जा कर, अपनों के ही हाथों एक अनजानी, निर्मम और अँधेरी दुनिया में पैसों की खातिर धकेल दी जाती हैं ।

तभी शहर से आई एक लम्बी सी गाड़ी घीसू के घर के सामने आ कर रुक गई और घीसू ने अपने घर की प्यारी सी अधखिली कली, रधिया को आँखों से बहती अविरल अश्रुधारा से गाड़ी में बिठा कर उसे किसी अंधी गली में भटकने के लिए, सदा सदा के लिए विदा कर दिया

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रेखा जोशी 

फरीदाबाद 

हरियाणा 

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