गुरुवार, 30 अगस्त 2012

डाक्टर चंद जैन 'अंकुर' की रचना - मैं नीर माँ....

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मैं नीर माँ.......

जीवन, देह में विचारों ,भावनावों और क्रियाओं का योग है और विश्व शिव संग माँ का परमयोग है। मानव आदिगुरू का  प्रयोग हैI देह को तो गुरुत्व का बंधन है पर विचार तो मुक्त है, आकाश के अनंत आयामों में इसे उपग्रह बना कर स्थापित करना चाहता हूँ, विचारों को तो कम से कम सत्य का आधार दिया जा सकता है, भाव अतिसूक्ष्म  है और चेतना सूक्ष्मतम है,  भाव चेतना और विचारों के बीच की कड़ी है, क्रिया ही जीवन है, करनेवाला 'मैं' है, जीने के लिए जीवन में सत्य से समझौता करना पड़ता है,  झूठ का भी सहारा लेना पड़ता है, पर औरों को क्षति पहुचाएं बिना यह उतना हो जितना रोटी में नमक हो और ये संभव है। उस ईश्वर ने सत्य और असत्य के बीच यह जीने का  रास्ता दिया है यहाँ पर पद, प्रतिष्ठा और धन संतुलित रहता है,  विश्व पंचतत्वों के संतुलन से दिखाई देता है मेरा भी ऐसा ही कुछ है, सबको गुरुत्व का आधार है, जीवन जीने के लिए तरलता और सरलता की आवश्यकता है पर गतिमयता और आनंदमयता से जीवन रंगीन हो जाता है, इन्द्रधनुष की तरह दर्शनीय हो जाता है, मैं अपनी पूरी चेतना को नीरमय करना चाहता हूँ , जल तो स्नेह और तरलता का परम तत्व है पर नीर बन कर नदी संग बहना चाहता हूँ और क्षीर बन कर समुद्र के अन्तःस्थल में स्थापित होना चाहता हूँ पर यह नहीं भूलना चाहता की  मैं बूंद हु अंश हूँ, निरुद्देश्य हूँ, इसलिए नदी का आधार चाहिए, मैं ये नहीं जानता की मैं ऐसा क्यों हूँ, नदी तो गुरु माँ की तरह है जो मुझे सागर से आकाश तक ले जा सकती है

 

मैं  नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ, 

चूमता मैं ज्वार से आकाश को ये चन्द्र माँ मैं तेरा बिम्ब माँ, 

बादलों के द्वार पर मैं नृत्य करता नटराज सा मैं तेरा अंश माँ, 

घटाओं से आलिंगन करता मुकताकाश माँ, 

बिजली बन भयंकर भयंकर भरता हाहाकार करता, 

कड़ कड़ गीत गाता कण कण गीत गाता, 

रज रज के कण कण में फ़ैल जाता मैं हर बूंद माँ,

मैं  नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ,

घटाओं संग प्रेम करता उसमे रंग भरता,                                                 

मैं रंगरेज माँ  हर रंग माँ आकार माँ, 

मैं कालिमा लालिमा नीलिमा मैं इंद्र का टंकार माँ, 

मैं हरीतिमा मैं तेरी गरिमा ये गौरीमाँ,

मैं मेघ माँ मल्हार माँ मैं बरखा बहार माँ, 

मैं धरती का प्यार माँ, 

मैं  नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ,

मैं संत माँ बसंत माँ मैं तेरे अंक माँ, 

मैं धरती का प्यास माँ कृषक की आश माँ, 

घुंगरू  सा बजता मैं बरखा का बूंद माँ बौछार माँ, 

हलधर के मस्तक पर मोतियो सा बूंद बनता, 

वन वन मीत गाता संगीत गाता,

भौरों संग गुनगुनाता लता संग झूम जाता,  

मैं ओस माँ हर ओर माँ  हर छोर माँ,  

हर पात माँ प्रातःकाल माँ, 

वनदेवी का हार बनता अलंकार बनता,

जगमग जगमगाता प्रातःधूप माँ,  

बालाओं के घुँगरू संग रुन झुन रुनझुन रुन्झुनाता,

पद चाप बन छप छप छप छपाता,

थप थप थप थापता सबके संगमा,

मैं नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ,

हिमगिरी के शीश पर गतिहार बनता जलधार बनता, 

माँ  का गीत गाता हरी गीत गाता, 

मैं गंगानीर गाता ये गंगा धीर जा, 

ये गिरिजा पाषाणों पर मैं गिरता मैं लिखता,

मैं गंगा आदि माँ, अंग माँ ,अनंत माँ,

मैं धुआंधार माँ कल कल गीत गाता,

छल छल छलछलाता,

मैं शांत माँ ,गति आनंद माँ,

मैं नीर माँ नदी से समुद्र माँ समुद्र से आकाश माँ

--

डाक्टर चंद जैन 'अंकुर'

[D.C. Jain (ankur), Dr. bais gali, behind new hanuman mandir, Brahmanpara, Raipur C.G (492001)

Mob. 98261-16946]

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