शनिवार, 29 सितंबर 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -95- राजीव सागरवाला की कहानी : बापू

कहानी

बापू

राजीव सागरवाला

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अर्से पहले एक सपना मैंने देखा था।
ऐसा सपना था कि मेरे दिल ओ दिमाग पर असर कर गया। ऐसा कि अब तक मैं नहीं भुला पाया हूँ ।


कितने साल का हुआ हूँगा। उस समय। कह नहीं सकता ठीक से। शादी नहीं हुई थी। सरकारी नौकरी में लगा हुआ था। उसकी तरफ से भी कोई चिंता नहीं थी।
मां-बाप दोनों जिंदा थे। बापू अभी नौकरी में थे। इधर से भी कोई चिंता नहीं थी। सेहत भी ठीक-ठाक थी उनकी


फिर भी मैंने सपना देखा। क्यों देखा?  मेरी समझ से बाहर है।
करीब बीस साल तक वो सपना मेरे साथ रहा। 
सपनों के बारे में कहा जाता है कि ज्यादातर भुला दिये जाते हैं। बाज वक्त तो नींद से बाहर आते ही दिमाग पर जोर डालना पड़ता है कि क्या देखा था। फिर भी याद नहीं आता।
यह वैसा नहीं था।


जब भी मैं उसके बारे में सोचता पूरा दृश्य सामने आ जाता। सिहरन होने लगती। दहशत हो जाती। यह जानते हुए भी कि वह महज़ एक सपना है। फिर भी।
सपना क्या है एक हारर मूवी का ट्रेलर।
हम सागर के उसी घर में रह रहे हैं जिसमें मेरा बचपन बीता था। जहां नौकरी पर शहर से बाहर जाने से पहले करीब सतरह साल बिताए थे।
यह घर मकरोनिया गांव के पास बनी मिलेट्री की पुरानी बैरकों में से एक में था। घर बल्लियों के सहारे बांस की चटाई को मढ़, दीवारें खड़ा कर, छत पर खपड़ैल बिछा कर बना था। बांस की चटाई बल्लियों के दोनों ओर मढ़ी थी। बीच की खाली जगह में अक्सर चूहों के पीछे सांप भागते रहते थे। सरसराहट खौफ पैदा करती थी। सांप ऊपर पहुंच छत की शहतीरों से नीचे टपक पड़ते थे, खाट पर। अक्सर।


जब मैं उस मकान से रू-ब-रू हुआ था, बच्चा था, कोई सात-आठ साल का।
छत से लटकते बल्ब के पीछे नीम अंधेरा रहता था। चारपाई पर लेटते ही अंधेरे में मौजूद आकृतियाँ हनुमान चालीसा दोहराने को मजबूर कर देती थीं। बचपन में।
बरसात में पानी की फुहारें छत की खपड़ैलों से छन कर आती थीं। तेज़ हवाऐं बांस की चटाइयों से बनी दीवारों के रंधों से हू-हा-हू करती आर-पार जाती रहतीं थीं।
घर के सामने खुला मैदान था। दूर एक पतली सी सड़क । करीब सौ मीटर दूर होगी। बारिश के दिनों में मैदान में घास आदमी के कंधों तक उठ आती। घास के बीच से एक पगडंडी घर के बाजू से निकल सामने सड़क तक जाती थी। तेज हवाओं में यह घास समुद्र की लहरों सी एक के पीछे एक आ घर की दहलीज़ पर बरसात के पानी की धार साथ ले सिर पटकतीं।


घर में तीन कमरे थे। एक लाईन में। बीच वाला बापू का । रहने, पढ़ने-लिखने का। दरवाज़ा मैदान की तरफ एक खुले वरांडे में खुलता था। जिसके आगे वो मैदान था। घास भरा।  दो दरवाज़े बचे दो कमरों में खुलते। परले कमरे में कोयला, लकड़ी और बुरादा भरा रहता था अंगीठी चूल्हे में इस्तेमाल के लिये। बापू के कमरे के पल्ली तरफ वाला। इस तरफ वाले दूसरे में हम बच्चे और मां रहते थे। छः प्राणीं।

यह बता देना मुनासिब होगा कि सपना मैंने जवानी में देखा था। शादी नहीं हुई थी।
देखा कि बापू का कमरा है। कमरा किताबों से अटा है जो मौजूद अलमारियों और टेबुलों पर लदी हैं। कमरे में एक लम्बे तार से बल्ब लटका हुआ है । रोशन है। उसके पीछे छत दिखाई नहीं देती। इतनी उंचाई पर थी कि उसकी थाह लेना नामुमकिन था। हो सकता है कि ऊंचाई उतनी न भी हो पर अंधेरे के बावस्ता गहराई नापना मुश्किल लगा। सपने में वैसे भी मापने की सहूलियत या गुंजाइश तो रहती नहीं। बल्ब की रोशनी का दायरा हक़ीकत से सपने में कहीं कम लगा। जहां फर्श पर रोशनी थी उधर वह ही थी। पर उससे हटते ही कमरे की दीवारें, किताबों के ढ़ेर, टेबुल, टंगा केलेंडर सब पर अंधेरे का मुलम्मा चढ़ा हुआ था। यहां तक कि बापू के बिस्तर पर भी उतनी ही रोशनी थी जितने से पता चले कि हां कोई लेटा है।


बापू हमारे कमरे से लगे दरवाज़े के पास तख्त पर लेटे हैं। रजाई ओढ़े हुए। सख्त बीमार हैं। चलने-फिरने के मोहताज़।
तेज हवा चल रही है। रात का कोई भलता ही निशाचर पहर रहा होगा।
मैं तख्त के पास एक लोहे की फोल्डिंग कुर्सी पर बैठा हुआ हूं। ठंडी है। तीमारदारी करने के लिये।


बैठे-बैठे शायद मेरी नींद लग गई थी । ठोड़ी सीने से जा लगी थी। कई रातों की नींद आंखों में थी। कि । मेरी नींद किसी आवाज़ से खुलती है। दूर से आती।
तेज हवा सनसनाती हुई सन्नाटे को चीरती दीवार की चटाई के छेदों से होती हुई सीटी सी मारती चल रही है। इतनी तेज है कमरे में भी कि टेबुल पर रखे कागज़ भी फड़फड़ा रहे हैं। जैसे कि दीवारें नदारद हों। ठंडी इतनी कि हड्डी काट दे। पर इससे मुझे परेशनी न थी । उस आवाज़ों में भी कोई और शोर सुनाई दे रहा था ।  हल्का। कान चौकन्ने कर सुनने की कोशिश की। भीड़ की आवाज़ थी। एक अलग ही। बहशी शोर ।  


दौड़ कर मैं दरवाज़े तक जाता हूं। छेद से देखने की कोशिश करता हूं। दूर  अंधेरा सा। मैदान में लहलहाती घास। हवा के साथ। आंखों पर पूरा जोर डालने पर भी दूर कोई दिखाई नहीं दे रहा।


शोर तेज़ होता हुआ। लगा। भीड़ इसी तरफ आ रही है। क्यों आ रही है। मैं नहीं समझता। फिर रुक कर देखता हूं। शोर बढ़ा। अंधेरे के दूसरे छोर पर। घास के खुले मैदान के परे। चमचमाती आंखों के झुंड। बलवाई थे। हैरान कि कोई मसला तो नहीं था फिज़ा में। फिर?


जल्दी से कुण्डी लगा सिटकनी भी लगा देता हूं ।
शोर और बढ़ता हुआ। अब एक आध नारे उससे ऊपर उभरते हुए। डूबते उतराते।
ठेल कर एक भारी अलमारी दरवाज़े से अड़ा देता हूं । खासी कोशिश करना पड़ रही थी। सब कुछ बहुत धीरे-धीरे हो रहा था । जितनी कोशिश अलमारी सरकाने में लगी और लगा जितनी देर लगी उतनी लगनी नहीं चाहिये थी । हर पल लगता था कि बलवाई उससे कहीं ज्यादा तेजी से पास आ रहे हैं जितनी तेजी से मैं अलमारी खिसका नहीं पा रहा।


बहरहाल किसी तरह अलमारी को अड़ा दिया। तब तक मेरी सांस फूल गई थी। मैं अभी भी चिंता में था। सोच रहा था कि माज़रा क्या है? क्यों हमारी तरफ आ रहे हैं। ये लोग। कौन हैं। क्या चाहते हैं।


मैं अपने बचाव के लिये चारों ओर देखता हूं। क्या करूं? टेबुल की दराज़ें खखोलता हूं। पुराने नकली दांत । पुराने चश्में। अल्पिनें। मोम्बत्ती-लाख-सील । पंच। पुराने टूटे फाऊंटेन पेन। कागज़ फाड़ने का चाकू। वही उलट-पलट कर देखता हूं। कागज़ ही काट देता है। मेहरबानी। केमेल इंक की बोतल दिखाई देती है। कुछ नहीं तो उसे ही हाथ में उठा लेता हूं। एक पार्सल सीने का सूआ दिखाई देता है। उसे भी उठा लेता हूं। कमरे में और कुछ तो दिखाई न दिया। हथियार।


बापू की आवाज़ आयी। रजाई में से। दबी-दबी। टूटती........... ' पानी ' ।
इन्हें भी अभी पानी चाहिये था। मन मन झुंझलाता हूं।
सिराहने तिपाई पर रखी कटोरी उठा चम्मच से पानी ले मुंह में डालने जा रहा था कि चटाई की दीवारों को फाड़, दरवाज़ा तोड़ अड़ी अलमारी को गिराते रेला कमरे में घुस आया। हाथों में डंडे। तलवारें। भाले-त्रिशूल। बगनखे-खंजर। चाकू-कटारें .. .. ..तिरंगा नहीं।
नारे लगाते।


'ईंट का जबाब पत्थर से। इंकलाब....... ज़िंदाबाद। जो हमसे टकरायेगा ...। मारो......मारो......निकलने न पाये........। '
भड़भड़ .. .. चर्र। दरवाज़ा टूटा। ताज्जुब है। पोथियों से भरी इतनी बड़ी अलमारी गिरने से जरा सी भी आवाज़ नहीं हुई। गिरी ऐसे कि चिड़िया का पंख।
हाथ की कटोरी, चम्म्मच-पानी बिस्तर पर।
अलमारी की किताबें बिखरते, अपने ऊपर गिरते देखता हूं। बापू के ऊपर अपने को डाल देता हूं। लपेट कर। उनके डंडे पड़ने लगे। मेरे उपर।
जोर से चीखना चाहता हूं। कि कोई पड़ोसी सुन ले और बचाने आ जाय। कितनी भी कोशिश करूं कमबख्त नहीं निकलती। आवाज़। गले से। मैं दबा हूं। हाथों पर बोझ लिये। जोर-जोर से चिल्ला रहा हूं। दम घुट रहा है। छटपटा रहा हूं।
कराह नीचे से निकलती है।........घुटी हुई.........  'पानी'.....।
पानी चाहिये.....बापू को......।


छटपटा रहा हूं। कैसे दूं? बोलने की कोशिश करता हूं। गिड़गिड़ाता हूं.. .. 'रहम करो .. .. बापू बीमार पड़े हैं.. .. ..बक्श दो.. .. ..।'
उनके जूं नहीं रेंगती।
एक नेज़ा। लपलपाता।
अपनी ओर बढ़ते देखता हूं। चीखता हूं।
मेरी नींद खुल जाती है। कुछ समय लगता है । समझने में । बन्बई में हूं। लाज़ में। बिस्तर पर ओंधा पड़ा हूं। तकिया दबोचे। बतन तरबतर है। पसीने से। सांस धोंकनी की तरह चल रही है। रात का ढाई बजा है।

ओफ । क्या सपना था। सन १९६९ की रात थी।

बापू रिटायर हो चले सन छःहत्तर में । घर बनाया। सारी जमा-पूंजी लगा । अपनी जिंदगी में पहली बार। अब अपने खुद के मकान में थे। बुढ्ढा-बुढ़िया अकेले । बच्चे, हम सब अपनी-अपनी रोजी-रोटी के सिलसिले दूसरे शहरों में। शादी, बच्चे, घर-गृहस्थी। मस्त। बारी-बारी से आते । कुछ दिन रहते। घर की टूट-फूट देखते। सुधारते। चलते वक्त दोनों से साथ चलने का आग्रह करते। फर्जी तौर। दोनों मुस्करा कर टाल जाते। तुम लोग तो निकल जाओगे नौकरियों पर। हम बुढ्ढा-बुढ्ढी क्या करेंगे सारा दिन। अनजान शहर। दो बात करने को तरस जायें। यहीं ठीक हैं। चार आदमी हैं तो जानने वाले। दौड़ के जाओ सामने परचूनी से सामान ले आओ। न  बाबा।
जाने वाले राहत की सांस ले निकल पड़ते।

यह अपना घर मकरोनिया के उस घर से जिसे सपने में मैंने देखा था करीब दो  किलोमीटर ही होगा दूर । बुधवारिया बाज़ार जो कि पेंटागान के पास टेकरी पर लगता था हर बुधवार। उसी टेकरी पर। हाऊसिंग बोर्ड ने बंगले बनाए एच आई जी, एम आई जी। इसी में से एक है। यह घर। एच आई जी-१। घर अब पक्का है। मकरोनियां के उस घर जैसा खपडैल का छाया और चटाई की दीवारों का नहीं। घर में आंगन और चहारदीवारी है। पीछे सिविल लाईन्स वाली सड़क और बगल में कालोनी में आने वाली छोटी। दोनों सड़कें चलती हुईं।


दरसल पेंटागन पांच रास्तों का चौराहा है। पांच इस लिये कि दो तो सागर शहर से आते हैं। एक सिविल लाईंस से दूसरा केंट से। पेंटागन से एक रास्ता जबलपुर जाता है और दूसरा नरसिंगपुर । इन दोनों के बीच से एक रास्ता और निकलता है जो मकरोनियां उन्हीं बैरकों की तरफ निकलता है जिसका जिक्र मेरे भयावह सपने में है।  १९५० में पेंटागान पर गिनती की दो एक दूकानें थीं। एक परचूनी की और एक शायद ढाबा, जबलपुर रोड पर। तेल की ढिबरी में चलती थीं ये दूकानें। रास्तों पर घने पेड़ थे।
बात अब सन् ८४ की है। दूकानें बढ़ गई हैं। बिजली आ गई है। आस-पास आबादी भी बढ़ गई है। गाड़ियों की आवाजाही भी।


इस चौराहे से ट्रकों की आमद भी खासी तादाद में होती रहती है। उस समय भी और आज भी। उस समय कम थी। अब ज्यादा है।
समय बदल गया। कई साल पहले  में बापू को फ़ालिज़ मार गया। चल फिर नहीं सकते। बांयां हाथ बिलकुल बेकार हो लटक गया। घर के सामने की तरफ ड्राईंग रूम के साथ लगे बेडरूम में सामने खिड़की के नीचे बिस्तर लगा है। पड़े रहते हैं। पहले उठा कर कुर्सी पर बैठा देते थे। घर में इधर-उधर ले जाने में सहूलियत होती थी। मन और सा हो जाता था। बस।


इधर एक आध साल से वो भी बंद। लेटे रहते हैं। खाना पीना दाना सब बिस्तर पर। एक तरफ से मुंह कुछ टेढ़ा हो गया है। लार टपकती रहती है। बोलने की कोशिश करते हैं। बोला.. .. .. खुद ही समझते हैं। दिमाग अब भी चाक-चौबस्त है। सब समझते हैं। दिखाई पूरा देता है। बाहर कमरे में कोई आये तो आंखों के इशारे से पूछते हैं। नाराज़गी, नापसंदगी अगर है किसी चीज से तो ज़ाहिर कर देते हैं। चेहरा तमतमा जाता है।


दीवाली का समय। बीत चुकी थी दीवाली। शादी मेरी भी हो गई थी। एक बच्ची थी। दीवाली मनाने घर आये थे। छुट्टी खत्म होने वाली थी।
दिन में ही खबर हो गई थी कि इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी। समाचारों में अटकलों, अफवाहों का जोर था। माहौल में अनिश्चितता थी। रेडियो और दूरदर्शन पर उत्तर भारत के कई शहरों में दंगे लूट-पाट होने की खबरें थीं। अब क्या होगा? शहर से बाहर इस जगह कुछ पता नहीं चलता।


खाना पीना कर जल्दी ही हम सोने चले गये।
नींद में मुझे कुछ शोर सुनाई दिया। ऐसा कि दूर से डूबते उतराते शब्द। मारो.....पकड़ो......निकलने न दो.......। साथ ही लठियां पीटने की आवाज़ें।
मुझे पहले तो लगा कि वही सपना होगा। पीछा नहीं छोड़़ता।
लेटे-लेटे अंधेरे में समय का अंदाज़ लगाते सोच रहा था कि क्या बात है जो हो हल्ला हो रहा है। देखने के लिये उठा ही था कि किसी के अहाते में कूदने, दौड़ने और दरवाज़ा थपथपाने की आवाज़ आयी। कोई फुसफुसाते हुए गुज़ारिश कर रहा था कि जल्दी से दरवज़ा खोलें। पत्नी और मां भी हल्ला सुन कर आ गईं । डाईंगरूम में। मैं मां की ओर देखता हूं जो इशारे से कह रहीं हैं कि हम चुप लगा जायें। पता नहीं कौन हो।


दरवाज़े पर थपथपाहट और बढ़ गई। मैं पता लगाने के लिये कि आखिर माज़रा क्या है। दरवाज़े के पास। कौन है इस वक्त। कोई पड़ोसी तो नहीं। तीन नम्बर में भी सरदार रहते हैं। दांतों वाले। घर आना-जाना है। घरोपा है। बुजुर्ग हैं मियां-बीबी। नेक इंसान। कल शाम ही तो आंटी जी जेवर पोटली में बांध घर के पिछवाड़े गली में से आ सौंप गईं थीं मां को रखने के लिये। कहीं वो तो मुसीबत में नहीं।
देखने के लिये जरा सा दरवाज़ा खोला था कि उसे ठेल कर एक आदमी अंदर घुस आया। लम्बे बाल.. .. .. चेहरे पर बिखरे हुए। कमीज़ फटी हुई। किसी तरह तहमत संभाले हुए। नंगे पैर। माथे और होंठ पर से खून बहता हुआ। कंपकपाता। उम्र यही कोई तीस-बत्तीस। सरदारों के हिसाब से जरा दुबला पतला। हाथ जोड़े हुए। गिरता। पंजाबी हिन्दी बोलता। 'असी मुश्किल में साहब। मेनू पता नीं । जब्बलपुर से से चला सी। जी मुझे बचा लो। भीड़ पड़ी है मेरे पीछे। ट्रक जल गया जी। मेहरबानी होगी। गुरु असीस देवें ।'
थरथर कांप रहा था।
मैं उसको धक्का दे कर बाहर करने की कोशिश कर रहा था।

एक दम सपना ध्यान में आया। हक़ीकत में बदलता।

     भीड़ अभी इधर आ गई और पता चल गया कि वह यहीं छिपा है तो घर जला देंगे। मार-पीट करेंगे सो अलग। बिस्तर पर पड़े बापू का क्या करूंगा। आग लगने पर बाहर निकालना मुश्किल होगा। क्या करूं। मैं उससे से कह रहा था कि पीछे से आंगन की दीवार कूद कर भाग जाओ। यहां नहीं रहने देंगे। पत्नी और मां भी उसे पीछे ठेल रहे थे-   'निकलो यहां से।'
वो था कि कातर स्वर में गुहार कर रहा था कि रहने दें रात भर। हाथ जोड़ रहा था। मां जी के पैर पकड़ रहा था। 
इतने में बापू की घों-घों करती तेज आवाज़ सुनाई देती है। शायद घर में शोर से नींद खुल गई होगी। मां तेजी से अंदर कमरे में गईं।


मैंने सोचा यह आसानी से नहीं जायेगा इसके साथ बहस करने से शोर शराबा होगा और बाहर उसे ढूंढ रहे लोगों का ध्यान मकान की तरफ जायेगा। उसे लगभग खींचते हुए पीछे किताबों के कमरे में ठेल दरवाज़ा बंद कर बाहर से सांकल लगा पत्नी से मशविरा करने लगा। बच्ची भी आंख मलती उनींदी से आ मां से लिपट गई। पत्नी कह रही थी क्यों खतरा मोल ले रहे हो। निकालो इसे। भीड़ को मालूम चल गया तो हम सब की जान जायेगी। वो तो मरेगा ही हम भी मारे जायेंगे।
मां शायद पलंग पर लेटे बापू को समझा रही थी। पता नहीं उन्होंने क्या समझा। क्या न समझा।


हम सब कमरे में पहुंच गये। सड़क पर लगी ट्यूब लाईट की रोशनी खिड़की से होती उन पर पड़ रही थी। बाहर चारों तरफ से आवाज़ें आ रही थीं। एक जीप भी तेजी से घर के पास से बार-बार निकल रही थी। सब ऐसे चुप हो जाते थे कि सांप सूंघ गया हो।


मैं बापू से मुखातिब ह?आ। मैंने फिर से उन्हें बताया कि शायद यहां भी दंगे शुरू हो गये हैं। पेंटागन पर ट्रक जला दिया गया है । किसी तरह बलवाइयों से बच कर ड्राईवर घर में घुस आया है ।


कि हम सब की राय है कि खतरा मोल नहीं लेना चहिये और उसे इसी वक्त घर से बाहर धकेल देना चाहिये। अगर उन लोगों को पता चल गया तो हम सब मारे जायेंगे। पता नहीं कितने दिन तक यह चलेगा। आज रात निकल भी जाय किसी तरह तो फिर कल ....कल दिन में क्या होगा।
बापू के गले से गुर्राने जैसी आवाज़ निकली। चेहरा तमतमा गया। जैसे कि उन्हें मेरी बात अच्छी न लगी।


मां को इशारे में कुछ कहा।
मां ने पूछा उनसे .... 'यहीं रहेगा?'  .... उनके आंखें झपकने से मां ने जो समझा ..........हमसे कहा।
' दिमाग खराब हो गया है इनका ....कह रहे हैं......कहीं नहीं जायगा ' ।
पत्नी भी बड़बड़ाई कुछ.......' हमारी फिकर नहीं....' । बच्ची को गले से लगाये खड़ी थी। चिंताऐं।
मैंने फिर समझाने की कोशिश की कि कितना बड़ा खतरा है। समझदारी इसी में है कि उसे बाहर करें।
बापू का चेहरा फिर लाल हो गया। गुस्से में।
मां की तरफ देखा। कुछ बुदबुदाऐ ....मां झुक कर कर उनके मुंह के पास ले गईं। बोली....... ' कह रहे हैं........ बुलाओ....... उसको' ।
हम सब एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। उनका गुस्सा जग जाहिर था। और इस हालात में कहीं उनको कुछ हो गया तो ......अस्पताल ले जाना भी मुश्किल होगा। कोई चारा नहीं था।
कमरे का दरवाज़ा खोला तो फिर वह गिड़गिड़ाने लगा..... ' रहने दो एक रात ...मेहरबानी होगी......मेरे भी बाल बच्चे हैं.......रहम करो.... ' ।
उसने सोचा कि मैं बाहर निकाल रहा हूं.....उसे।
बांह पकड़ उसे बापू के पलंग के पास ला खड़ा किया। हाथ जोड़े खड़ा ...उनको देखता रहा....कुछ देर...बोला कुछ नहीं.. .. ..देखता रहा।
फिर न जाने क्या सोच .......पलटा ....आंखें पोंछते हुए.......दरवाज़े की तरफ जाते ......बोला.... शायद ....अपने से ही....... '  माफी पाजी .......जावां ..'
उसको जाते देख बापू ने पूरी ताकत से गले से आवाज़ निकाली..... बहुत अरसे बाद ही सुनाई दी उनकी आवाज़.....साफ.......इतनी साफ कि हमें भी समझ में आ गयी ............ ' रुको'
वह मुड़ा ... उसे पास बुलाया ...बापू ने.....नीचे झुकने को कहा...हाथ के इशारे से और अपना बांया हाथ .......लकवे वाला ....जिसकी अंगुलियां हथेलियों पर मुड़ चुकी थीं........उठाया ....... उसके धूल भरे सिर पर रक्ख....... अपने सीने पर खींच लिया।
वो जमीन पर बैठ गया पलंग के पास.......घुटनों के बल.........सिर बापू के सीने पर.......हाथ फैला लिपट गया........ फूट-फूट कर रो पड़ा...........बापू खुद भी फफक कर रो उठे........  बेजार।

                        **

6 blogger-facebook:

  1. Aam aadamee- jiskaa dangon se koe lena dena nahee ha.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही मार्मिक,अन्तिम 3 पंक्तियाँ पढते, आखों में आँसु आ गए.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही मार्मिक,अन्तिम 3 पंक्तियाँ पढते, आखों में आँसु आ गए.

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