रविवार, 9 सितंबर 2012

बच्चन पाठक 'सलिल' का आलेख : सूरीनाम में भारतीय संस्कृति


image

सूरीनाम लैटिन अमेरिका का एक नन्हा पर सुन्दर देश है. यह प्रशांत महासागर के पास सूरीनाम नदी के तट पर बसा है. सातवें विश्व हिंदी सम्मलेन में मुझे भारतीय शिष्ट मंडल के एक सदस्य के रूप में, वहां जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.


सूरीनाम की राजधानी है-पारामारिबो, इसका अर्थ होता है- फूलों का शहर. यह अपने नाम को सार्थक करता है.यहाँ एक ही पेड़ की विभिन्न शाखाओं में विविध वर्ण और आकार के फ़ूल खिलते हैं.प्रतिमास यहाँ से करोड़ों डालर के फ़ूल बाहर भेजे जाते हैं. यूनेस्को ने इसे हेरिटेज सिटी घोषित किया है. सूरीनाम भारत से सत्तरह हजार किलोमीटर दूर है. सैकड़ों वर्ष पूर्व भारत से जी अनुबंधित कर्मचारी[कुली] सूरीनाम गए थे, उन्ही के प्रयास और श्रम से सूरीनाम नंदन कानन बना. डच शासन में उन कर्मचारियों ने अमानवीय यातनाएं सहीं. ...पर गीता के कर्मयोग को ध्यान में रखा. वे वहीं बस गए .डच शासन की समाप्ति के बाद सूरीनाम स्वतन्त्र हुआ,उन भारतवंशियों की आज पांचवीं पीढी सूरीनाम की  प्रतिष्ठित नागरिक हैं.उनकी दशा काफी अच्छी है. वे नौकरी और व्यवसाय के अतिरिक्त राजनीति में भी सक्रिय हैं.वहां के उप राष्ट्रपति राम अयोध्या और लोकसभा के प्रमुख रामदास थे. सूरीनामी बाहर में डच और अंग्रेजी बोलते हैं, पर आपस में हिंदी [सरनामी] में बात करते हैं. स्वाभाविक है क़ि हिंदी में कुछ नीग्रो शब्द भी आगये हैं. मै'' स्टारडस्ट''  होटल में ठहरा था.वहां के एक भारतवंशी रामपदारथ रोज शाम को आते, और दो तीन घंटे बैठते. मै सूरीनाम के विषय में उनसे नोट्स लेता रहता.


सूरीनाम में भारतवंशियों की संख्या कुल आबादी की चौवालिस प्रतिशत है. भारतीय संस्कृति ने उन्हें जोड़कर रखा है. वे आज भी गीता ,रामायण पढ़ते हैं. अतिथि सत्कार में भी रूचि लेते हैं. भारत को अपना पितृ देश मानते हैं. और गीता, गंगा ,गायत्री की महिमा से अभिभूत हैं.

 
सूरीनाम में हिंदी प्रचार भारतीय फिल्मों का बहुत बड़ा हाथ है. वहां छः आकाशवाणी केंद्र हैं.इनसे पर यह हिंदी धारावाहिकों का प्रसारण होता रहता है. फिल्मी गीत तो बजते ही रहते हैं.हिन्दी में सूचनाएं भी प्रसारित होती रहती हैं. एक दिन हम लोग सनातन धर्म मंदिर गए, सभी देवी, देवताओं के वहां विग्रह स्थापित थे. नियम पिर्वक पूजन और  हवन होते थे.सांध्य आरती में सैकड़ों भारतवंशी जुट जाते हैं. प्रेम और मिलन के अवसर अनायास प्राप्त हो जाते हैं. कुछ शादी,ब्याह भी इसी मंदिर में संपन्न होते हैं. ...और सभागार स्वस्त्ययन से गूंज उठते हैं. पूर्व पुरुष और महिला की स्मृति में एक स्मारक है --आजा माई का स्मारक. भोजपुरी में पितामह को आजा कहते हैं. लोग वहां प्रणाम करने जाते हैं. नव वर वधु भी वहां जाकर आशीर्वाद ग्रहण करते हैं. सम्मलेन में मारीशस की सरिता बुधु [फ्रेंच- हिंदी विदुषी] और हालैंड की चन्द्र [हिंदी शिक्षिका]भी आई थीं. वे भारतीय मूल की हैं. मुझे चाचा कहती थीं और मेरी मुंहबोली भतीजियाँ बन गयी थीं. उनसे उनके देश में भारतीय संस्कृति पर चर्चा होती थी. मारीशस में तो भारतीय बहुसंख्यक हैं और हमारी संस्कृति वहां फल फ़ूल रही हैह्हलैंड में भीआप्रवासी भारतीय  अपनी संस्कृति से परम रखते हैं सूरीनाम में बच्चों के नाम प्रायः रामायण और महाभारत के पत्रों के नाम के आधार रखे जाते हैं. जैसे -रामदेव, रामपुकार, रामपदारथ, अर्जुन, भीम, कोशिला,आदि.

सदियों की गुलामी के प्रभाव से देवनागरी लिपि लुप्त हो रही है. सरनामी रोमन में लिखी जाती है. भारत सरकार के तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने घोषणा की थी क़ि हिंदी की पढाई भी आरम्भ की जायेगी. सूरीनाम में हिंदी कविता लिख कर, तुलसी,सुर,रहीम,कबीर,आदि से वहां के कवियों ने लोगों को परिचित कराया है. और संस्कृति और नैतिकता की शिक्षा दी है. इनमे प्रमुख हैं,-मुंशी रहमान,खान, महादेव खुनखुन, राम सेवक आदि. संस्कृति वह जीवन शैली है, जो निरंतर श्रेष्ठत्व का वरन करती है. और हानिकारक रुढियों को त्यागती है. सूरीनामी इस तथ्य से परिचित हैं. ये आप्रवासी भारवंशी वन्दनीय हैं. ---

-डॉ.बच्चन पाठक ''सलिल;;

  [पूर्व प्राध्यापक .महिला महाविद्यालय ,जमशेदपुर]

     बाबा आश्रम कालोनी 

,पंचमुखी हनुमान मंदिर के सामने  

आदित्यपुर-२,जमशेदपुर ,झारखण्ड.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------