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अजय कुमार मिश्र ‘अजय श्री' की कविता

ध्रुव सत्‍य

दूर गगन में देख सितारा,

मत होना तुम विचलित,

बन कर एक सितारा क्‍या पाओगे।

कही गगन में एक जगह,

स्‍थिर रह जाओगे।

बनना है तो बनो पवन तुम,

जन-जन की सांसों में बस जाओगे।

कोई तुम से छल न करेगा,

न मिलने पर आहें भरेगा,

न कोई तुम पर वार करेगा,

हर दम तुम को प्‍यार करेगा।

सारी दुनिया को अपनाओगे,

ध्रुव सत्‍य तुम कहलाओगे

--

अजय कुमार मिश्र‘अजय श्री'

लखनउ उ.प्र.

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बनना है तो बनो पवन तुम,

जन-जन की सांसों में बस जाओगे।
Bhut hi sunder, bhadaiya.


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