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नए रचनाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं - वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र चौहान से अर्जुन प्रसाद सिंह की बातचीत

वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र चौहान से अर्जुन प्रसाद सिंह की बातचीत

अपने सूक्ष्म भाव संवेदन,संतुलित भाषा तथा अप्रतिम शिल्प के कारण समकालीन हिंदी रचनाकारों में शैलेन्द्र चौहान ने एक विशिष्ट मुकाम हासिल कर लिया है। इनकी रचनाएं मिट्टी की सोंधी गंध तथा लोकोन्मुखी चरित्र से साराबोर हैं। इनकी रचनाओं में एक खास तरह की सादगी है जो इनके अपने व्यक्तित्व का ही हिस्सा है। इनकी कृतियां- 'नौ रूपये बीस पैसे के लिए', 'श्वेतपत्र', 'ईश्वर की चौखट पर', 'नहीं यह कोई कहानी नहीं' एवं 'पाँव जमीन पर' आदि अपने पाठकों को गहरे बौद्धिक अनुशासन के साथ अद्भुत संबल प्रदान करती हैं। समकालीन चुनौतियों से होड़ लेते शैलेन्द्र चौहान ने कविता, कहानी, आलोचना तथा संपादन के क्षेत्र में स्तरीय काम किया है। हाल ही में रचनाकार अर्जुन प्रसाद सिंह ने शैलेन्द्र चौहान से साहित्य के विविध पक्षों पर सारगर्भित तथा बेबाक बातचीत की है। यहां प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश।

अ.प्र0सिंह- आप साहित्य की दुनिया में कैसे आये?

शैलेन्द्र- मेरे पिता राजेन्द्र सिंह चौहान पेशे से शिक्षक थे जिनके साथ मैं अकेला ही विदिशा म0प्र्0 रहता था। तब मैं बहुत संकोची ,मितभाषी तथा हीन भावना से ग्रस्त था। पिता द्वारा लाई गईं पत्र-पत्रिकाओं का ही मुझे सहारा था। पिता से मेरे संबंध महज औपचारिक थे। अकेलापन मेरी जिंदगी का स्थायी भाव हो गया था। इन्हीं एकाकी क्षणों में मित्र, सखा और सहचरी बनकर साहित्य ने मुझे सम्भाल लिया और तब से मैं साहित्य का ही होकर रह गया। मेरी प्रारंभिक कविताएं जो दुःख अवसाद और संकोच की त्रिवेणी थीं अनपेक्षित रूप से कादम्बिनी,उतरार्द्ध तथा साक्षात्कार जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छप गईं। इससे मुझे हौसला मिला।

अ.प्र.सिंह- षुरू से ही आप प्रगतिशील विचार धारा के पैरोकार रहे हैं। आपके अनुसार साहित्य में प्रगतिशीलता का अभिप्राय क्या है?

शैलेन्द्र- मेरे अनुसार प्रगतिशील साहित्य समानता का आग्रही है। यह समानता आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक अस्तरों पर होनी चाहिए। इस समानता के लिए साम्यवादी दलों ने प्रयास किया है। बुद्धिजीवियों ने भी लेखन के माध्यम से जन मानस में समानता के लिए चेतना जगाई है। इसी प्रयत्न में मैं भी शामिल हूं।

अ.प्र.सिंह- आज प्रगतिशील साहित्य की प्रासंगिकता को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

शैलेन्द्र चौहान- निश्चय ही पहले की तुलना में इन दिनों जागरूकता बढ़ी है। तकनीकी,शिक्षा तथा अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है लेकिन भेद-भाव युक्त सामाजिक व्यवस्था अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पूंजीवादी व्यवस्था ने सामंती व्यवस्था के साथ गठजोड़ कर लिया है। अतः सामंती व्यवस्था अभी भी बरकरार है। यूरोप में औद्येागिक क्रान्ति ने सामंतवाद को ध्वस्त कर दिया था। भारत में सही अर्थों में औद्योगिक क्रान्ति हुई ही नहीं। अंग्रेजों ने उपनिवेशवाद के दौर में निजी तथा सार्वजनिक दोनों से फायदा उठाया। आजादी के बाद हमारे शासकों ने इस स्थिति को कायम रखा। सिद्धांत में समाजवाद तथा व्यवहार में पूंजी वाद के लिए काम किया गया। देष में मिश्रित अर्थव्यवस्था कायम की गई जिसके चलते यथास्थिति बनी रही। आज तो आवारा पूंजी का दौर चल रहा है। उपभोक्तावाद की आंधी में सबके पांव उखड़ रहे हैं। संकट की इस घड़ी में मेरे अनुसार प्रगतिशील विचारधारा और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।

अ.प्र.सिंह- इन दिनों प्रगतिशील विचार धारा से जुडे़ साहित्यकारों में भटकाव, विभ्रम तथा अजीब उहापोह की स्थिति हो गई है। आपके अनुसार इसकी वजह क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- मैं सन् 1970-72 के बीच जब इस विचार धरा के निकट आया तब नेताओं,रंगकर्मियों तथा रचनाकारों में गजब की प्रतिबद्धता थी। उन्हें उम्मीद थी कि दुनिया बदलेगी। परंतु 1989 में तत्कालीन प्रधान मंत्री नरसिंहा राव के गैट पर हस्ताक्षर करने के साथ ही देश पूंजीवाद की दिशा में मुड़ गया। इस दौरान वामपंथी दलों का सहयोग कांग्रेस के साथ बना रहा तथा कांग्रेस ने कारपोरेट घरानों के लिए किसानों को उजाड़-उजाड़ कर सेज सजाती रही। यह सब देख लोगो में विभ्रम की स्थिति पैदा हो गई। लोगों का मोह न केवल साम्यवादी दलों से बल्कि प्रगतिशील साहित्यिक विचारधारा से भी भंग होने लगा। साहित्यकार भी विशेषकर जो मध्यमवर्गीय परिवारों से आए थे, शासकीय पुरस्कारों एवं सम्मानों के लालच में फंस गए। कष्टों और अभावों में कौन जीना चाहता है?

अ.प्र.सिंह- आपके अनुसार लोक क्या है? क्या इसमें लोक-परलोक का कोई भाव है? लोकोन्मुखी साहित्य जिसे जनपक्षधरता भी कहते हैं का अभिप्राय और औचित्य क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- लोक का अपभ्रंश हिंदी में लोग है जबकि पंजाबी में लोक और लोग एक ही शब्द है इस लिए लोक-परलोक की व्याख्या को मैं खारिज करता हूं क्यों कि यह पंड़िताउ अवधारणा है। अपने देश में दस प्रतिशत लोग अमीर तथा नब्बे प्रतिशत लोग गरीब हैं। गरीब लोग ग्रामीण अंचलों में रहते हुए परम्परागत रूप से कृषि तथा कुटीर उद्योगों ये जुड़े हैं। इन्हीं का एक तपका शहरों में मलिन/स्लम बस्तियों में नारकीय जीवन जीते हुए रहता है। जाहिर है कि दस प्रतिशत तथा नब्बे प्रतिशत के बीच सामाजिक,आर्थिक तथा सांस्कृतिक स्तरों पर बड़ा भारी अंतर है। हर तरह की सुख-सुविधाओं से वंचित देश के इस नब्बे प्रतिशत लोगों को मैं जन या लोक मानता हूं तथा इनकी अस्मिता के लिए किए जा रहे प्रयत्नों को मैं जनपक्षधरता मानता हूं। मुझे नब्बे प्रतिशत लोग जन दिखाई देते हैं। आप ही बताएं कि हाशिए पर पड़े नब्बे प्रतिशत लोगों के साथ होना मानवीय धर्म है या दस प्रतिशत लोगों के साथ होना।

अ.प्र.सिंह- वर्तमान संदर्भ में प्रभु वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है? क्या प्रभु वर्ग आज भी प्रभावकारी है?

शैलेन्द्र चौहान- संयुक्त राज्य अमेरिका में 1/99 की जंग छिड़ी हुई है। परेशान लोग वाल स्ट्रीट पर कब्जा करने को तैयार हैं। भारत में १० प्रतिशत लोग अति सम्पन्न हैं जिन्हें हम कारपोरेट घरानों के रूप में जानते हैं। ये लोग सामंती शक्तियों तथा सरकारों से मिलकर जनता का हर प्रकार से शोषण कर रहे हैं। नब्बे प्रतिशत लोगों में उचित शिक्षा,चेतना तथा जागरूकता का नितांत अभाव है। आज भी एक गरीब के द्वारा दूसरे गरीब पर जुल्म कराया जा रहा है जैसे कि अंग्रेजी हुकूमत में एक गरीब भारतीय सिपाही गरीब किसान को बेरहमी से मारता था। आज भी हमारे यहां गरीब की समझ उस मानवीय चेतना क नहीं पहुंच सकी है जहां के लिए वह वांछित है। अतः संख्या में कम होते हुए भी प्रभु वर्ग अपने हितों के प्रति न केवल जागरूक है बल्कि नब्बे प्रतिशत लोगों के शोषण के लिये नित नए हथकंडे रच रहा है।

अ.प्र.सिंह-क्या कारण है कि मुख्य धारा के साहित्यकार ज्यों-ज्यों दलितों तथा उनकी समस्याओं से जुड़ रहे हैं त्यों-त्यों दलितों का अविश्वास उनके प्रति और भी गहरा होते जा रहा है। दलित अब स्वतंत्र रूप से खुद के द्वारा अपना दलित साहित्य लिखना चाहते हैं। इस मोहभंग का कारण क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- वस्तुतः जनवादी चेतना के उभार के साथ पूंजीवादी वर्ग चौकन्ना हो गया और उसने गरीब वर्ग के सभी समुदायों को अलग से पहचान बनाने के लिए प्रेरित किया। यह काम अंग्रेजों ने ही शुरू कर दिया था। उन्होंने बाकायदा भारतीय जातिप्रथा पर शोध करवाए और भारतीय समाज में जातीय आधार को पुष्ट करने के लिए हर जाति को अपनी अलग पहचान बनाये रखने के लिए प्रेरित किया। यही काम आजादी के बाद के भारतीय शासकों ने भी किया। बांटो और राज करो की नीति में ही उन्हें अपना उज्ज्वल भविष्य दिखा।

इस बात को कौन अस्वीकार कर सकता है कि हजारों वर्षों से दलितों के साथ भेद-भाव पूर्ण व्यवहार होते रहा है। फिर भी लार्ड मैकाले की जयंती मनाने वाले दलितों को क्या पता है कि अंग्रेजी शासन में अंग्रेजों ने उनसे हमदर्दी भी जताई और उन्हें दलित भी बनाए रखा। यहां तक कि जिन दलितों को अंग्रेजी मिशनरियों ने ईसाई बनाया उन्होंने भी उनके साथ दलितों जैसा ही सलूक किया। समाजवादी बुद्धिजीवियों ने दलितों को अलग से कोई समुदाय न मानते हुए सिर्फ शोषित तपका ही माना। उनकी सामाजिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। इसी वजह से दलितों का मुख्य धारा के साहित्य और साहित्यकारों से मोह भंग हो गया। दूसरे भारतीय शासक वर्ग ने भी उन्हें वोट बैंक से ज्यादा और कुछ नहीं समझा। फलतः उनकी स्थिति समाज में अलग- थलग बनी रही। परिणाम स्वरूप आज दलित उभार न केवल सामाजवादी व्यवस्था बल्कि सवर्ण हिंदुबहुलता के खिलाफ भी उग्र है।

अ.प्र.सिंह- भारत में इन दिनों सांस्कृतिक क्षरण तेजी से हो रहा है। सारे मूल्य,मान तथा प्रतिमान ध्वस्त हो रहे हैं। युवा पीढ़ी उद्भ्रांत है। एक अजीब उहापोह तथा संक्रमण की स्थिति है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

शैलेन्द्र चौहान- इस ह्रास के लिए प्रथमतः शासक वर्ग जिम्मेदार है क्योंकि उसकी कोई सांस्कृतिक व शैक्षणिक नीति नहीं है। हमारी सरकार हथियार से लेकर विचार तक के लिए पूर्णतः पश्चिम पर निर्भर है अतः पश्चिम द्वारा किए जा रहे सांस्कृतिक हमले को रोकने की उसकी कोई मंशा नहीं है। सच तो यह है कि पश्चिमी बाजारवादी व्यवस्था को भारत में मजबूत करने में हमारी सरकार सुविधाप्रदाता या फैसिलिटेटर की भूमिका में है। सभी जानते हैं कि किसी भी समाज में शासक वर्ग के विचार ही अंततः जनता के विचार बन जाते हैं। इस साजिश में शासक वर्ग,भ्रष्ट अधिकारी,पूंजीपति वर्ग,अपराधी तथा धार्मिक नेता सभी शामिल है। इन लोगों के अनुसार जनता मर चुकी है। इन्हें न तो सामूहिक उद्भव में रूचि है और न आने वाले समय के बेहतरी में विश्वास। इनका उद्देश्य है निजी सम्पत्ति में अनंत विस्तार।

अ.प्र.सिंह- समकालीन साहित्य में व्याप्त तिककड़म, गुटबाजी और खेमेबाजी को आप क्या कहेंगें? किसी रचनाकार को साहित्य में स्थापित एवं विस्थापित करने में आलोचकों की भूमिका किस हद तक प्रभावी होती है?

शैलेन्द्र चौहान- यूं तो कोई भी साहित्यकार अपनी कृतियों के बल पर ही स्थाई रूप से स्थापित होता है। फिर भी वर्तमान संदर्भ में किसी साहित्यकार को स्थापित एवं विस्थापित करने में राज सत्ता के साथ सहयोग करने वाले साहित्यकारों की बड़ी भूमिका हो गई है। सत्ता समर्थक साहित्यिक मठाधीश लोग पुरस्कार एवं सम्मान दिलवाने में माहिर हैं। वे अपने चाटुकार साहित्यकारों का नकली महिमामंडन कर उन्हें कुछ समय के लिए प्रसिद्ध कर देते हैं। इन मठाधीशों की पकड़ पुस्तकों के प्रकाशन,वितरण,प्रचार तथा व्यापार आदि पर होती है। ये अपने चहेतों की रचनाओं को स्कूल तथा विश्वविद्यालयीन स्तर के पाठ्यक्रमों में भी शामिल कराने की क्षमता रखते हैं। आज स्थिति यह है कि हजारों पुरस्कार हैं,लाखों सम्मान,पर उनकी प्रतिष्ठा संदेह के घेरे में है। सत्ता परिवर्तन के साथ पुरस्कार पाने वाले नातों की सूची बदल जाती है। यदि आप अशोक वाजपेयी, नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव या ज्ञानरंजन के कृपापात्र हैं तो आपको पुरस्कार व सम्मान सहज ही मिल जाएंगे क्योंकि ये गिने-चुने नाम ही हर बड़े साहित्यिक पुरस्कारों के ज्यूरी मेम्बर होते हैं। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि कई पुरस्कार व्यक्तिगत संबंधों या खरीद-फरोख्त के आधार पर प्राप्त किए जा रहें हैं। अब तो पुरस्कार अविश्वसनीय तथा प्रायोजित से हो गए हैं। अतः खेमाविहीन रचनाकारों को जनस्वीकृति को ही असली पुरस्कार समझना होगा तथा जन से ही सृजनात्मक उर्जा ग्रहण करनी होगी।

अ.प्र.सिंह- समकालीन हिंदी साहित्य के लिए क्या विवाद संजीवनी का कार्य कर रहा है? विवादों के अंदर की राजनीति क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- जाहिर- सी बात है कि आजकल रचनात्मकता की नहीं बल्कि विवादों का ही सृजन हो रहा है। विवाद कृति के मुफ्त प्रचार-प्रसार का एक हथकंडा बन गया है। किसी एक पुरस्कार पर प्रायोजित विवाद उत्पन्न करने के बाद अधिकांश लेखक कोई दूसरी ऐसी पुस्तक नहीं लिख पाए जो किंचित भी लोकप्रिय हो पाया हो चाहे सलमान रसदी, तसलीमा नसरीन या अरून्धती राय ही क्यों न हों। इन प्रयत्नों से जनमानस में न केवल साहित्यकार बल्कि साहित्य भी निरन्तर अरूचिकर एवं अविश्वसनीय होते जा रहा है।

अ.प्र.सिंह- क्या आप अभी तक के अपने लेखन से संतुष्ट हैं?

शैलेन्द्र चौहान- संतुष्टि रचनाकार के लिए अपेक्षित नहीं है। अगर साहित्यकार संतुष्ट हो गया तो फिर लिखने की आवश्यकता क्या बचेगी? जैसे-जैसे अनुभव समृद्ध होता है वैसे-वैसे वक्त की चुनौतियां भी जटिल होती जाती हैं। ज्यों -ज्यों औद्योगीकरण हो रहा है। त्यों-त्यों पूंजीपति सारे राजतंत्रीय एवं सामंती मूल्यों को अपने में समेट लेना चाहते हैं। इन चुनौतियों से अनवरत मुठभेड़ करना ही मेरे अंदर के लेखक का दायित्व है।

अ.प्र.सिंह- आप अपने चाहने वाले विशाल पाठक वर्ग से क्या कहना चाहेंगे या नए लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

शैलैन्द्र चौहान- नए रचनाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं परंतु दुर्भाग्यवश वे ऐसे धन्धेबाज संपादकों, प्रकाशकों तथा साहित्यिक दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं जो अल्पवय में ही उनकी झूठी तारीफ कर-कर के उन्हें भटका देते हैं। यदि कोई चेतना सम्पन्न संस्था नए रचनाकारों की मदद करे तो उनकी उम्र बढ़ सकती है। नए रचनाकारों को हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश तथा तद्भव जैसी पत्रिकाओं की राजनीति से बचते हुए, सार्थक लेखन कर सीधे पाठकों से जुड़ना चाहिए। पाठक ही किसी रचनाकार के वास्तविक समीक्षक होते हैं। मैं अपने पाठकों से यह अपेक्षा करता हूं कि वे अनावश्यक प्रशंसा से किसी लेखक को पथभ्रष्ट न करें किंतु उपेक्षा से उसे मार ही न डालें

 

अर्जुन प्रसाद सिंह

सम्पर्क- अर्जुन प्रसाद सिंह,

जवाहर नवोदय विद्यालय,पाटन,सीकर,राज0

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अच्‍छा लगता है जब कोई वरि‍ष्‍ठ, नवसृजन की प्रशंसा करता है. वर्ना यह कहने का तो चलन सा ही हो गया है कि नया उतना अच्‍छा हो ही नहीं सकता जि‍तना कि‍ कल था. साधुवाद.

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