विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका -  नाका। प्रकाशनार्थ रचनाएँ इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी इस पेज पर [लिंक] देखें.
रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -

पिछले अंक

नए रचनाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं - वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र चौहान से अर्जुन प्रसाद सिंह की बातचीत

साझा करें:

वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र चौहान से अर्जुन प्रसाद सिंह की बातचीत अपने सूक्ष्म भाव संवेदन,संतुलित भाषा तथा अप्रतिम शिल्प के कारण समकालीन हिं...

वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र चौहान से अर्जुन प्रसाद सिंह की बातचीत

अपने सूक्ष्म भाव संवेदन,संतुलित भाषा तथा अप्रतिम शिल्प के कारण समकालीन हिंदी रचनाकारों में शैलेन्द्र चौहान ने एक विशिष्ट मुकाम हासिल कर लिया है। इनकी रचनाएं मिट्टी की सोंधी गंध तथा लोकोन्मुखी चरित्र से साराबोर हैं। इनकी रचनाओं में एक खास तरह की सादगी है जो इनके अपने व्यक्तित्व का ही हिस्सा है। इनकी कृतियां- 'नौ रूपये बीस पैसे के लिए', 'श्वेतपत्र', 'ईश्वर की चौखट पर', 'नहीं यह कोई कहानी नहीं' एवं 'पाँव जमीन पर' आदि अपने पाठकों को गहरे बौद्धिक अनुशासन के साथ अद्भुत संबल प्रदान करती हैं। समकालीन चुनौतियों से होड़ लेते शैलेन्द्र चौहान ने कविता, कहानी, आलोचना तथा संपादन के क्षेत्र में स्तरीय काम किया है। हाल ही में रचनाकार अर्जुन प्रसाद सिंह ने शैलेन्द्र चौहान से साहित्य के विविध पक्षों पर सारगर्भित तथा बेबाक बातचीत की है। यहां प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश।

अ.प्र0सिंह- आप साहित्य की दुनिया में कैसे आये?

शैलेन्द्र- मेरे पिता राजेन्द्र सिंह चौहान पेशे से शिक्षक थे जिनके साथ मैं अकेला ही विदिशा म0प्र्0 रहता था। तब मैं बहुत संकोची ,मितभाषी तथा हीन भावना से ग्रस्त था। पिता द्वारा लाई गईं पत्र-पत्रिकाओं का ही मुझे सहारा था। पिता से मेरे संबंध महज औपचारिक थे। अकेलापन मेरी जिंदगी का स्थायी भाव हो गया था। इन्हीं एकाकी क्षणों में मित्र, सखा और सहचरी बनकर साहित्य ने मुझे सम्भाल लिया और तब से मैं साहित्य का ही होकर रह गया। मेरी प्रारंभिक कविताएं जो दुःख अवसाद और संकोच की त्रिवेणी थीं अनपेक्षित रूप से कादम्बिनी,उतरार्द्ध तथा साक्षात्कार जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छप गईं। इससे मुझे हौसला मिला।

अ.प्र.सिंह- षुरू से ही आप प्रगतिशील विचार धारा के पैरोकार रहे हैं। आपके अनुसार साहित्य में प्रगतिशीलता का अभिप्राय क्या है?

शैलेन्द्र- मेरे अनुसार प्रगतिशील साहित्य समानता का आग्रही है। यह समानता आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक अस्तरों पर होनी चाहिए। इस समानता के लिए साम्यवादी दलों ने प्रयास किया है। बुद्धिजीवियों ने भी लेखन के माध्यम से जन मानस में समानता के लिए चेतना जगाई है। इसी प्रयत्न में मैं भी शामिल हूं।

अ.प्र.सिंह- आज प्रगतिशील साहित्य की प्रासंगिकता को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?

शैलेन्द्र चौहान- निश्चय ही पहले की तुलना में इन दिनों जागरूकता बढ़ी है। तकनीकी,शिक्षा तथा अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है लेकिन भेद-भाव युक्त सामाजिक व्यवस्था अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। पूंजीवादी व्यवस्था ने सामंती व्यवस्था के साथ गठजोड़ कर लिया है। अतः सामंती व्यवस्था अभी भी बरकरार है। यूरोप में औद्येागिक क्रान्ति ने सामंतवाद को ध्वस्त कर दिया था। भारत में सही अर्थों में औद्योगिक क्रान्ति हुई ही नहीं। अंग्रेजों ने उपनिवेशवाद के दौर में निजी तथा सार्वजनिक दोनों से फायदा उठाया। आजादी के बाद हमारे शासकों ने इस स्थिति को कायम रखा। सिद्धांत में समाजवाद तथा व्यवहार में पूंजी वाद के लिए काम किया गया। देष में मिश्रित अर्थव्यवस्था कायम की गई जिसके चलते यथास्थिति बनी रही। आज तो आवारा पूंजी का दौर चल रहा है। उपभोक्तावाद की आंधी में सबके पांव उखड़ रहे हैं। संकट की इस घड़ी में मेरे अनुसार प्रगतिशील विचारधारा और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।

अ.प्र.सिंह- इन दिनों प्रगतिशील विचार धारा से जुडे़ साहित्यकारों में भटकाव, विभ्रम तथा अजीब उहापोह की स्थिति हो गई है। आपके अनुसार इसकी वजह क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- मैं सन् 1970-72 के बीच जब इस विचार धरा के निकट आया तब नेताओं,रंगकर्मियों तथा रचनाकारों में गजब की प्रतिबद्धता थी। उन्हें उम्मीद थी कि दुनिया बदलेगी। परंतु 1989 में तत्कालीन प्रधान मंत्री नरसिंहा राव के गैट पर हस्ताक्षर करने के साथ ही देश पूंजीवाद की दिशा में मुड़ गया। इस दौरान वामपंथी दलों का सहयोग कांग्रेस के साथ बना रहा तथा कांग्रेस ने कारपोरेट घरानों के लिए किसानों को उजाड़-उजाड़ कर सेज सजाती रही। यह सब देख लोगो में विभ्रम की स्थिति पैदा हो गई। लोगों का मोह न केवल साम्यवादी दलों से बल्कि प्रगतिशील साहित्यिक विचारधारा से भी भंग होने लगा। साहित्यकार भी विशेषकर जो मध्यमवर्गीय परिवारों से आए थे, शासकीय पुरस्कारों एवं सम्मानों के लालच में फंस गए। कष्टों और अभावों में कौन जीना चाहता है?

अ.प्र.सिंह- आपके अनुसार लोक क्या है? क्या इसमें लोक-परलोक का कोई भाव है? लोकोन्मुखी साहित्य जिसे जनपक्षधरता भी कहते हैं का अभिप्राय और औचित्य क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- लोक का अपभ्रंश हिंदी में लोग है जबकि पंजाबी में लोक और लोग एक ही शब्द है इस लिए लोक-परलोक की व्याख्या को मैं खारिज करता हूं क्यों कि यह पंड़िताउ अवधारणा है। अपने देश में दस प्रतिशत लोग अमीर तथा नब्बे प्रतिशत लोग गरीब हैं। गरीब लोग ग्रामीण अंचलों में रहते हुए परम्परागत रूप से कृषि तथा कुटीर उद्योगों ये जुड़े हैं। इन्हीं का एक तपका शहरों में मलिन/स्लम बस्तियों में नारकीय जीवन जीते हुए रहता है। जाहिर है कि दस प्रतिशत तथा नब्बे प्रतिशत के बीच सामाजिक,आर्थिक तथा सांस्कृतिक स्तरों पर बड़ा भारी अंतर है। हर तरह की सुख-सुविधाओं से वंचित देश के इस नब्बे प्रतिशत लोगों को मैं जन या लोक मानता हूं तथा इनकी अस्मिता के लिए किए जा रहे प्रयत्नों को मैं जनपक्षधरता मानता हूं। मुझे नब्बे प्रतिशत लोग जन दिखाई देते हैं। आप ही बताएं कि हाशिए पर पड़े नब्बे प्रतिशत लोगों के साथ होना मानवीय धर्म है या दस प्रतिशत लोगों के साथ होना।

अ.प्र.सिंह- वर्तमान संदर्भ में प्रभु वर्ग से आपका क्या अभिप्राय है? क्या प्रभु वर्ग आज भी प्रभावकारी है?

शैलेन्द्र चौहान- संयुक्त राज्य अमेरिका में 1/99 की जंग छिड़ी हुई है। परेशान लोग वाल स्ट्रीट पर कब्जा करने को तैयार हैं। भारत में १० प्रतिशत लोग अति सम्पन्न हैं जिन्हें हम कारपोरेट घरानों के रूप में जानते हैं। ये लोग सामंती शक्तियों तथा सरकारों से मिलकर जनता का हर प्रकार से शोषण कर रहे हैं। नब्बे प्रतिशत लोगों में उचित शिक्षा,चेतना तथा जागरूकता का नितांत अभाव है। आज भी एक गरीब के द्वारा दूसरे गरीब पर जुल्म कराया जा रहा है जैसे कि अंग्रेजी हुकूमत में एक गरीब भारतीय सिपाही गरीब किसान को बेरहमी से मारता था। आज भी हमारे यहां गरीब की समझ उस मानवीय चेतना क नहीं पहुंच सकी है जहां के लिए वह वांछित है। अतः संख्या में कम होते हुए भी प्रभु वर्ग अपने हितों के प्रति न केवल जागरूक है बल्कि नब्बे प्रतिशत लोगों के शोषण के लिये नित नए हथकंडे रच रहा है।

अ.प्र.सिंह-क्या कारण है कि मुख्य धारा के साहित्यकार ज्यों-ज्यों दलितों तथा उनकी समस्याओं से जुड़ रहे हैं त्यों-त्यों दलितों का अविश्वास उनके प्रति और भी गहरा होते जा रहा है। दलित अब स्वतंत्र रूप से खुद के द्वारा अपना दलित साहित्य लिखना चाहते हैं। इस मोहभंग का कारण क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- वस्तुतः जनवादी चेतना के उभार के साथ पूंजीवादी वर्ग चौकन्ना हो गया और उसने गरीब वर्ग के सभी समुदायों को अलग से पहचान बनाने के लिए प्रेरित किया। यह काम अंग्रेजों ने ही शुरू कर दिया था। उन्होंने बाकायदा भारतीय जातिप्रथा पर शोध करवाए और भारतीय समाज में जातीय आधार को पुष्ट करने के लिए हर जाति को अपनी अलग पहचान बनाये रखने के लिए प्रेरित किया। यही काम आजादी के बाद के भारतीय शासकों ने भी किया। बांटो और राज करो की नीति में ही उन्हें अपना उज्ज्वल भविष्य दिखा।

इस बात को कौन अस्वीकार कर सकता है कि हजारों वर्षों से दलितों के साथ भेद-भाव पूर्ण व्यवहार होते रहा है। फिर भी लार्ड मैकाले की जयंती मनाने वाले दलितों को क्या पता है कि अंग्रेजी शासन में अंग्रेजों ने उनसे हमदर्दी भी जताई और उन्हें दलित भी बनाए रखा। यहां तक कि जिन दलितों को अंग्रेजी मिशनरियों ने ईसाई बनाया उन्होंने भी उनके साथ दलितों जैसा ही सलूक किया। समाजवादी बुद्धिजीवियों ने दलितों को अलग से कोई समुदाय न मानते हुए सिर्फ शोषित तपका ही माना। उनकी सामाजिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। इसी वजह से दलितों का मुख्य धारा के साहित्य और साहित्यकारों से मोह भंग हो गया। दूसरे भारतीय शासक वर्ग ने भी उन्हें वोट बैंक से ज्यादा और कुछ नहीं समझा। फलतः उनकी स्थिति समाज में अलग- थलग बनी रही। परिणाम स्वरूप आज दलित उभार न केवल सामाजवादी व्यवस्था बल्कि सवर्ण हिंदुबहुलता के खिलाफ भी उग्र है।

अ.प्र.सिंह- भारत में इन दिनों सांस्कृतिक क्षरण तेजी से हो रहा है। सारे मूल्य,मान तथा प्रतिमान ध्वस्त हो रहे हैं। युवा पीढ़ी उद्भ्रांत है। एक अजीब उहापोह तथा संक्रमण की स्थिति है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

शैलेन्द्र चौहान- इस ह्रास के लिए प्रथमतः शासक वर्ग जिम्मेदार है क्योंकि उसकी कोई सांस्कृतिक व शैक्षणिक नीति नहीं है। हमारी सरकार हथियार से लेकर विचार तक के लिए पूर्णतः पश्चिम पर निर्भर है अतः पश्चिम द्वारा किए जा रहे सांस्कृतिक हमले को रोकने की उसकी कोई मंशा नहीं है। सच तो यह है कि पश्चिमी बाजारवादी व्यवस्था को भारत में मजबूत करने में हमारी सरकार सुविधाप्रदाता या फैसिलिटेटर की भूमिका में है। सभी जानते हैं कि किसी भी समाज में शासक वर्ग के विचार ही अंततः जनता के विचार बन जाते हैं। इस साजिश में शासक वर्ग,भ्रष्ट अधिकारी,पूंजीपति वर्ग,अपराधी तथा धार्मिक नेता सभी शामिल है। इन लोगों के अनुसार जनता मर चुकी है। इन्हें न तो सामूहिक उद्भव में रूचि है और न आने वाले समय के बेहतरी में विश्वास। इनका उद्देश्य है निजी सम्पत्ति में अनंत विस्तार।

अ.प्र.सिंह- समकालीन साहित्य में व्याप्त तिककड़म, गुटबाजी और खेमेबाजी को आप क्या कहेंगें? किसी रचनाकार को साहित्य में स्थापित एवं विस्थापित करने में आलोचकों की भूमिका किस हद तक प्रभावी होती है?

शैलेन्द्र चौहान- यूं तो कोई भी साहित्यकार अपनी कृतियों के बल पर ही स्थाई रूप से स्थापित होता है। फिर भी वर्तमान संदर्भ में किसी साहित्यकार को स्थापित एवं विस्थापित करने में राज सत्ता के साथ सहयोग करने वाले साहित्यकारों की बड़ी भूमिका हो गई है। सत्ता समर्थक साहित्यिक मठाधीश लोग पुरस्कार एवं सम्मान दिलवाने में माहिर हैं। वे अपने चाटुकार साहित्यकारों का नकली महिमामंडन कर उन्हें कुछ समय के लिए प्रसिद्ध कर देते हैं। इन मठाधीशों की पकड़ पुस्तकों के प्रकाशन,वितरण,प्रचार तथा व्यापार आदि पर होती है। ये अपने चहेतों की रचनाओं को स्कूल तथा विश्वविद्यालयीन स्तर के पाठ्यक्रमों में भी शामिल कराने की क्षमता रखते हैं। आज स्थिति यह है कि हजारों पुरस्कार हैं,लाखों सम्मान,पर उनकी प्रतिष्ठा संदेह के घेरे में है। सत्ता परिवर्तन के साथ पुरस्कार पाने वाले नातों की सूची बदल जाती है। यदि आप अशोक वाजपेयी, नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव या ज्ञानरंजन के कृपापात्र हैं तो आपको पुरस्कार व सम्मान सहज ही मिल जाएंगे क्योंकि ये गिने-चुने नाम ही हर बड़े साहित्यिक पुरस्कारों के ज्यूरी मेम्बर होते हैं। सुनने में तो यह भी आ रहा है कि कई पुरस्कार व्यक्तिगत संबंधों या खरीद-फरोख्त के आधार पर प्राप्त किए जा रहें हैं। अब तो पुरस्कार अविश्वसनीय तथा प्रायोजित से हो गए हैं। अतः खेमाविहीन रचनाकारों को जनस्वीकृति को ही असली पुरस्कार समझना होगा तथा जन से ही सृजनात्मक उर्जा ग्रहण करनी होगी।

अ.प्र.सिंह- समकालीन हिंदी साहित्य के लिए क्या विवाद संजीवनी का कार्य कर रहा है? विवादों के अंदर की राजनीति क्या है?

शैलेन्द्र चौहान- जाहिर- सी बात है कि आजकल रचनात्मकता की नहीं बल्कि विवादों का ही सृजन हो रहा है। विवाद कृति के मुफ्त प्रचार-प्रसार का एक हथकंडा बन गया है। किसी एक पुरस्कार पर प्रायोजित विवाद उत्पन्न करने के बाद अधिकांश लेखक कोई दूसरी ऐसी पुस्तक नहीं लिख पाए जो किंचित भी लोकप्रिय हो पाया हो चाहे सलमान रसदी, तसलीमा नसरीन या अरून्धती राय ही क्यों न हों। इन प्रयत्नों से जनमानस में न केवल साहित्यकार बल्कि साहित्य भी निरन्तर अरूचिकर एवं अविश्वसनीय होते जा रहा है।

अ.प्र.सिंह- क्या आप अभी तक के अपने लेखन से संतुष्ट हैं?

शैलेन्द्र चौहान- संतुष्टि रचनाकार के लिए अपेक्षित नहीं है। अगर साहित्यकार संतुष्ट हो गया तो फिर लिखने की आवश्यकता क्या बचेगी? जैसे-जैसे अनुभव समृद्ध होता है वैसे-वैसे वक्त की चुनौतियां भी जटिल होती जाती हैं। ज्यों -ज्यों औद्योगीकरण हो रहा है। त्यों-त्यों पूंजीपति सारे राजतंत्रीय एवं सामंती मूल्यों को अपने में समेट लेना चाहते हैं। इन चुनौतियों से अनवरत मुठभेड़ करना ही मेरे अंदर के लेखक का दायित्व है।

अ.प्र.सिंह- आप अपने चाहने वाले विशाल पाठक वर्ग से क्या कहना चाहेंगे या नए लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

शैलैन्द्र चौहान- नए रचनाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं परंतु दुर्भाग्यवश वे ऐसे धन्धेबाज संपादकों, प्रकाशकों तथा साहित्यिक दलालों के चंगुल में फंस जाते हैं जो अल्पवय में ही उनकी झूठी तारीफ कर-कर के उन्हें भटका देते हैं। यदि कोई चेतना सम्पन्न संस्था नए रचनाकारों की मदद करे तो उनकी उम्र बढ़ सकती है। नए रचनाकारों को हंस, नया ज्ञानोदय, कथादेश तथा तद्भव जैसी पत्रिकाओं की राजनीति से बचते हुए, सार्थक लेखन कर सीधे पाठकों से जुड़ना चाहिए। पाठक ही किसी रचनाकार के वास्तविक समीक्षक होते हैं। मैं अपने पाठकों से यह अपेक्षा करता हूं कि वे अनावश्यक प्रशंसा से किसी लेखक को पथभ्रष्ट न करें किंतु उपेक्षा से उसे मार ही न डालें

 

अर्जुन प्रसाद सिंह

सम्पर्क- अर्जुन प्रसाद सिंह,

जवाहर नवोदय विद्यालय,पाटन,सीकर,राज0

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. अच्‍छा लगता है जब कोई वरि‍ष्‍ठ, नवसृजन की प्रशंसा करता है. वर्ना यह कहने का तो चलन सा ही हो गया है कि नया उतना अच्‍छा हो ही नहीं सकता जि‍तना कि‍ कल था. साधुवाद.

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * || * उपन्यास *|| * हास्य-व्यंग्य * || * कविता  *|| * आलेख * || * लोककथा * || * लघुकथा * || * ग़ज़ल  *|| * संस्मरण * || * साहित्य समाचार * || * कला जगत  *|| * पाक कला * || * हास-परिहास * || * नाटक * || * बाल कथा * || * विज्ञान कथा * |* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4095,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,341,ईबुक,196,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3061,कहानी,2275,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,542,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,110,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,29,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,245,लघुकथा,1269,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,340,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2013,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,714,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,802,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,91,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,211,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: नए रचनाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं - वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र चौहान से अर्जुन प्रसाद सिंह की बातचीत
नए रचनाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं - वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र चौहान से अर्जुन प्रसाद सिंह की बातचीत
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2012/10/blog-post_9192.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2012/10/blog-post_9192.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ