बच्चन पाठक 'सलिल' की कविताएँ - भूमिका, अनुपमेय है माताश्री

भूमिका
        -- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

अगर उपस्थित हो जीवन में
कभी परीक्षा की घड़ियाँ
मेरे प्यारे मत घबराना।
प्रथम परीक्षा होती है साहस की
सहज बुद्धि,फिर धैर्य बाद में आते हैं
वे क्या देंगे कभी परीक्षा
प्रश्न देखकर ही जो घबराते हैं।
जीवन है अनवरत परीक्षा
चुने हुए प्रश्नों के उत्तर रटकर
इसमें सफल न हो पाओगे
यदि संयम पूर्वक उत्तर देते जाओगे
तब निश्चय तुम्हें सफलता मिल जाएगी
स्वर्णिम अतीत, हीरक भविष्य की बात न करना
हो वर्तमान का ध्यान
बस यही सफलता की कुंजी है ।
साहसी बनो, रुढियों के धनु तोड़ो
अपने को चरित्रबल से जन जन से जोड़ो
निश्चय ही वरण करेगी विजय श्री तुमको आकर
सही परीक्षार्थी की यदि भूमिका निभाओगे
सफलता रानी को अपने कदमों पर पाओगे

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अनुपमेय है माताश्री 
                
हिमगिरि से ऊँची माताश्री
पर प्रस्तर सी नहीं कठोर ,
ममता का भंडार वहां है
लख कर सारा जगत विभोर।
मातृ-ह्रदय सागर से गहरा,तनिक नहीं पर खारापन
उसके अंतर में बसा हुआ है,वात्सल्य का अपनापन
मलय पवन सी प्राण दायिनी , पर वैसा अदृश्य नहीं
माँ की ममता दृश्य जगत में प्रतिविम्बित सब ओर रही।
माँ की उपमा निखिल भुवन में, नहीं किसी से  है होती
माँ तो केवल माँ होती है, उप-माँ कभी नहीं होती।
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आदित्यपुर
जमशेदपुर -14

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