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देवेन्द्र पाठक महरूम की ग़ज़ल - प्यार से हमने जिसको भी अपना किया

प्यार से हमने जिसको भी अपना किया.

एक दिन उसने ही हमसे धोखा किया.

 

दर्द की तंग सुरंगोँ का अंधा सफर

ताउमर हमने तय तनहा तनहा किया.

 

जब ख़ुदा से नहीँ ख़ुद भी बावस्ता

तुम वास्ता उसका दे हमसे धोखा किया.

 

पैरोँ मेँ बेबसी के घुँघरू पहन ;

दर-ब-दर हसरतोँ ने है मुज़रा किया.

 

रुख बदलते हवाओँ के देखकर ;

रुख बदल हमने 'महरूम' अच्छा किया .

3 टिप्पणियाँ

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