मंजरी शुक्ल की कविता - तुम कब आओगे मेरे राम

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उस राह पर आज तक

निःशब्द असहाय और अकेली

बैठी हुई पथ के कांटे चुन रही हूँ मैं

जिस पर त्याग गए थे महर्षि गौतम

सदिओं पहले अहिल्या को ...

श्राप देकर पाषाण की प्रतिमा

बनाकर मुहँ फेरकर चल दिए

और वो बैठी रही मूर्त रूप में

अपने राम की राह देखती

निश्छल अविचल तटस्थ होकर...

पर मेरी विडंबना देखो

मैं भी वही अहिल्या हूँ

पर हाड़- मांस की चलती फिरती

जिसकी केवल नियति पाषाण की हुई हैं

जिसकी साँसों से उसके

जीवित होने का भ्रम होता हैं

धमनियों में बहता लहूँ प्रमाण देता हैं

कि सभी अंग सुचारू रूप से

अपना -अपना कार्य संपन्न कर रहे है...

पर किसी राम का मुझे इंतज़ार नहीं हैं

क्योंकि तुम्हारे सिवा मेरे मन के

उस रीते, सीले और अँधेरे कोने को कोई कभी

नहीं छू सकेगा ..

तुम कब आओगे मेरे राम ....

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