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देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल - जाते 2012, आते 2013 ब्रितानी नववर्ष के नाम -

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देँ नव ब्रितानी वर्ष पर हम क्या बधाइयाँ !

गिरती ही जा रही हैँ नीचे ऊँचाइयाँ ॥

 

जाएँ कहाँ इधर खाई, उधर है कुआँ ;

गुमराह हो गईँ खुद ही अगुआइयाँ ॥

 

हैँ ओहदोँ पर काबिज़ ख़ुदगर्ज़ ताक़तेँ ;

सम्मान हथिया रही हैँ अब गद्दारियाँ ॥

 

शुभकामनाएँ फलीभूत अब होती नहीँ ;

होँ शातिरोँ को हासिल कामयाबियाँ ॥

 

माँ बहन बेटियोँ की चीखो पुकार पर ;

दी अश्रुमग्न आँखोँ को अश्रुगैस लाठियाँ ॥

 

मर्दोँ के ग़ुनाहोँ को ढोती हैँ औरतेँ ;

क्योँ औरत के नाम पर 'महरूम' गालियाँ ॥

 

devendra.mahroom@gmail.com

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